Tuesday, June 30, 2015

एक लाख में बनाई सोलर कार- 40 हजार किलोमीटर का सफर

एक ऐसी कार जिसको चलाने के लिए डीजल या पेट्रोल की कोई जरूरत नहीं है। यह सूर्य की रोशनी से फर्राटा भरती है। इसे बनाया बेंगलुरु के बनशंकरी इलाके में रहने वाले सैय्यद सज्जाद अहमद ने। इस कार की लागात लगभग शून्य है। सरकारें कौशल विकास की बात करती हैं। पर अहमद के सोलर कार प्रोजेक्ट को लेकर किसी सरकार ने रूचि नहीं दिखाई। उनकी इस कार के निर्माण में महज एक लाख रुपये खर्च आया है।

 वे इस कार को सफलतापूर्वक 40 हजार किलोमीटर तक चला चुके हैं। अहमद ने 2005 में सोलर आटो रिक्शा बनाया। इससे पहले 2004 में वे सोलर कार बना चुके थे। उनके पास सोलर बाइक भी है। पहली बार 2004 में अपनी सोलर कार लेकर बेंगलुरु से चेन्नई चले गए तो लोग कौतूहल से देखते रहे।

 वे 2010 में सोलर कार लेकर दिल्ली चले गए। इस दौरान अन्ना हजारे के आंदोलन का समर्थन किया। मैं उनसे पूछता हूं कार को लेकर ट्रैफिक पुलिस वाले रजिस्ट्रेशन के बारे में सवाल नहीं पूछते। अहमद कहते हैं सोलर कार को लोग कौतूहल से देखते हैं और आगे जाने देते हैं। अब तक वे अपनी सोलर कार को 40 हजार किलोमीटर सफलता पूर्वक चला चुके हैं। सौर ऊर्जा से चलने वाले वाहनों के निर्माण का ख्याल उन्हें 30 साल पहले आया। 2006 में एक शो में पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम उनके काम की तारीफ कर चुके है।


ऐसी है सोलर कार - इस कार में बोनटपीछे के हिस्‍से और इसकी छत सहित तीन जगहों पर सोलर प्‍लेट का प्रयोग किया गया है। इस प्‍लेट्स की मदद से कार में लगी बैटरी चार्ज होती है जो कि कार को शक्ति प्रदान करती है जिससे कार आसानी से चलती है। उनकी कार 20 किलोमीटर प्रति घंटे की स्पीड से चलती है। वे कहते हैं कि इसकी स्पीड 50 किलोमीटर तक बढाई जा सकती है। कार में ज्यादातर पूर्जे लगाए गए हैं वे स्थानीय स्तर पर ही निर्मित हैं इसलिए इसमें खर्च काफी कम आता है।
सोलर कार से चले दिल्ली। ( फोटो सौ - द हिन्दू) 
सज्जाद की पढ़ाई सिर्फ 12वीं तक है पर आविष्कार उनका जुनून है। अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा वे शोध कार्य में लगा देते हैं।  अहमद के मुताबिक 25 फीसदी कमाई शोध में और 25 फीसदी समाजसेवा में जाती है। अहमद बताते हैं कि इस कार के बारें में सरकार बिलकुल भी गंभीर नहीं है इस कार को कई बार नेता और मंत्री भी देख चुके है लेकिन उन्‍होनें इसके लिए कुछ भी नहीं किया।
सज्जाद अहमद। 

बेंगलुरु के इस महान वैज्ञानिक सज्जा अहमद से मेरी मुलाकात सीतामढ़ी में राष्ट्रीय युवा योजना के राष्ट्रीय एकता शिविर के दौरान होती है। वे जनकपुर जाने के क्रम में मेरे साथ वाली सीट पर बस में बैठे हैं। पूरे रास्ते अपने खोज के बारे में चर्चा करते रहे। सरकारी मिशनरी से उन्हें काफी शिकायत है। 
अगर उनकी कार और रिक्शा का व्यवासायिक उत्पादन हो तो पर्यावरण संरक्षण में काफी मदद मिल सकती है। 

सज्जाद को वैज्ञानिक खोज के साथ ही समाज सेवा का भी जुनून है जो उन्हें इस शिविर में खींच लाया है। हालांकि सरकारी एजेंसियों से उन्हें मदद नहीं मिल रही है पर अपनी खोज को लेकर वे ना उम्मीद नहीं हैं।


Monday, June 29, 2015

जनकपुर की वह शाम...राम राम राजा राम राम...

राष्ट्रीय युवा योजना के सीतामढ़ी शिविर के दौरान 12 जून 2015 को जनकपुर जाने का कार्यक्रम तय हुआ। दोपहर में देश भर से आए 200 से ज्यादा शिविरार्थियों के लिए तीन बसों के इतंजाम किया गया जनकपुर जाने के लिए। विश्व बंधुत्व के नारे के साथ 20 राज्यों के लोग जनकपुर की ओर चले। भिट्ठामोड बार्डर पर बसों को नेपाल में प्रवेश करने की औपचारिकता पूरी करने के लिए एक घंटे रुकना पड़ा। नेपाल में भारतीय वाहन जा सकते हैं पर इसके लिए एंट्री पास लेना पड़ता है। हमलोग राजा जनक के शहर जनकपुर धाम में प्रवेश कर चुके थे। जीरो माइल पर पहुंचने के बाद पता चला कि रामानंद चौक के पास पार्किंग में बसें खड़ी होंगी। इस पार्किंग से माता जानकी का मंदिर तीन मिनट के रास्ते पर है। जानकी मंदिर का प्रांगण काफी सुंदर है। 


यहां हजारों लोगों के बैठने की जगह है। तय हुआ की शाम की प्रार्थना यहीं पर होगी। इससे पहले देश भर से आए युवाओँ के पास एक घंटे का वक्त था जानकी मंदिर में दर्शन करने के लिए। दक्षिण भारत से आए हुए भाई बहनों के लिए जनकपुर पहुंचना एक बड़ा मौका था। वे मंदिर को देखकर अभिभूत थे। राम, जानकी के दर्शन के साथ मंदिर में खूबसूरत प्रदर्शनी का भी लोगों ने नजारा किया। तमाम लोगों ने मंदिर के आसपास खरीददारी भी की। हालांकि अब नेपाल से शापिंग करने का कोई आकर्षण नहीं रह गया है। बाजार में 90 फीसदी भारत में बनी वस्तुएं ही बिकती हैं।

शाम छह बजे मंदिर के प्रांगण में हमारी सभा शुरू हुई। 88 वर्ष के सुब्बराव जी ने सबसे पहले भजन गाना शुरू किया। रघुपति राघव राजा राम पतित पावन सीताराम...राम राम राजा राम राम...जनकपुर के मंदिर में रामधुन हमेशा बजती है। पर ये रामधुन कुछ अलग थी। सुब्बराव जी आवाज के साथ सुर मिला रहे थे देश भर के नौजवान। मंदिर के बाहर अदभुत माहौल बन गया। धीरे धीरे जनकपुर शहर के सैकड़ो लोग जुटने लगे। स्थानीय लोग भी हमारे साथ बैठकर भजन गाने लगे। मंच के पास नरेंद्र भाई चरखा पर सूत कात रहे थे। कुछ लोग झाल बजा रहे थे..कुछ तालियों पर साथ दे रहे थे।

उसके बाद सुब्बराव जी ने भजन गाना शुरू किया- हर देश में तू हर वेश में तू...तेरे नाम अनेक तू एक ही है....इस भजन के साथ सुर मिला रहे थे....हजारों लोग...तुकडो जी महाराज के इस भजन में अदभुत शक्ति है। ऐसे माहौल का निर्माण करता है जो हम सबको एक आध्यात्मिक दुनिया में ले जाता है। इसके बाद देश के अलग अलग राज्यों के लोगों ने अपना अपना परिचय अपने नारों के साथ दिया। अंत में भारत माता की जय और नेपाल माता की जय के नारे लगाए। नेपाल के लोग ये सब देखकर अभिभूत थे।

कार्यक्रम खत्म होने के बाद मेरी कुछ स्थानीय दुकानदारों से बात हुई। वे कार्यक्रम से काफी प्रसन्न थे। वे सुब्बराव जैसे महान संत के बारे में जानना चाहते थे। कार्यक्रम के बाद अजय पांडे ( लखनऊ) ने लोगों को सुब्बाराव के जीवन के बारे में बताया। ये जनकपुर की एक यादगार शाम थी। स्थानीय लोगों के लिए भी और देश भर से आए नौजवानों के लिए भी। सब अपनी यादों को सहेज लेना चाहते थे।


Sunday, June 28, 2015

कभी डाकू थे अब शांति का संदेश देते हैं....

नेत्रपाल सिंह, कभी चंबल के बीहड़ में आतंक था इनका।

उनका नाम नेत्रपाल सिंह। कभी चंबल के नामी डकैतों में शुमार थे। उनकी बड़ी बड़ी मूंछे आज भी इस बात की गवाही देती है कि जवानी के दिनों में कैसे खूंखार लगते होंगे। गांधीवादी एसएन सुब्बाराव की अगुवाई में सीतामढ़ी में आयोजित राष्ट्रीय एकता शिविर ( 10 से 15 जून 2015) के दौरान उनसे मेरी मुलाकात हो गई। कई पुरानी यादें ताजा हो गई। दरअसल 1995 से 1995 के मध्य चली सदभावना रेल यात्रा में भी वे कुछ दिनों के लिए शामिल हुए थे। अब उम्र 77 पार हो गई है पर जोश उसी तरह कायम है।

नेत्रपाल सिंह गर्व से कहते हैं कि डाकूओं की मंडली में में उन्हें नेत्रा डाकू के नाम से जाना जाता था। कैसे डाकू बने, कितनों को मारा ऐसी बातों पर अब वे ज्यादा चर्चा नहीं करना चाहते। पर वे कहते हैं कि चंबल के बीहड़ में रहने वाले डाकूओं के भी अपने वसूल होते थे। वे हर किसी को नहीं मारते थे। किसी बहु बेटियों की इज्जत नहीं लूटते थे। और हां फिल्मों जैसा डाकूओं को दिखाया जाता है घोडे पर दौड़ते हुए चंबल के बीहड़ के डाकू कभी घोडे पर नहीं दौड़ते थे। 
नेत्रपाल सिंह जब किसी शिविर में आते हैं, देश के अलग अलग राज्यों के युवाओं के परिचय कराने के दौरान सुब्बराव जी नेत्रपाल सिंह का भी परिचय कराते हैं। वे बोलते हैं – हम चंबल से आए हैं...शांति का संदेश लाए हैं। कभी चंबल में डाकूओं का आतंक था। अब शांति है। पर जैसे डाकू चंबल की घाटियों में थे उससे ज्यादा खतरनाक तो अब सभ्य समाज के बीच में चोला बदलकर बैठे हुए हैं। ऐसे डाकूओं से हमें खतरा ज्यादा है।
नेत्रपाल सिंह के साथ जनकपुर में। 
नेत्रपाल सिंह उन 654 डाकूओं की फेहरिस्त में शामिल हैं जिन्होंने 1972 और 1976 में महात्मा गांधी सेवा आश्रम जौरा ( मुरैना) में सरेंडर किया था। वे सुब्बराव जी का बड़ा सम्मान करते हैं। डाकूओं के सरेंडर को लेकर किए गए उनके प्रयासों को याद करते हैं। सरेंडर के बाद वे उत्तर प्रदेश के शिकोहाबाद में रहते हैं। वे कहते हैं कि शिकोहाबाद रेलवे स्टेशन के बाहर मेरा नाम ले लेना, कोई भी मेरे पास पहुंचा देगा। रेल यात्रा के दौरान नेत्रपाल सिंह से मेरी लंबी लंबी बातें होती थीं। कभी गोलियां चलाने वाले नेत्रपाल बातें फेंकने में भी माहिर हैं।

जौरा आश्रम के दौरा के क्रम में मेरी एक सरेंडर डकैत राम सनेही पंडित से मुलाकात हुई थी। वे भी सरेंडर के बाद खेती किसानी में लग गए थे। वहां हमने माधो सिंह, मोहर सिंह की जोड़ी में से मोहर सिंह को भी देखा था। अब दोनों इस दुनिया में नहीं है। पर नेत्रपाल सिंह को राष्ट्रीय एकता शिविरों में आना और देश भर के नौजवानों से मिलना अच्छा लगता है। नई पीढ़ी के युवा भी उनसे मिलकर उनकी जुबां से शांति मैत्री का संदेश सुनकर खुश होते हैं।


नेत्रपाल  ऐसे बने थे डाकू
जनकपुर शिविर में नेत्रपाल सिंह युवाओं के साथ। 
नेत्रपाल के सिर पर कभी 50 से ज्यादा हत्याओं के मुकदमे थे। वे एक समय लाखन गैंग का दायां हाथ थे। कभी चंबल के बीहड़ में उनकी दहशत थी। यूपी जनपद फिरोजाबाद के थाना मखनपुर क्षेत्र के गांव हिम्मतपुर के रहने वाले नेत्रपाल के पिता का नाम अकबर सिंह था। 1954 में हाईस्कूल की परीक्षा पास कर 1955 में सेना में भर्ती हो गए, लेकिन सात माह कि बाद वह सेना की नौकरी छोड़कर आ गए।  वे 1956 में पटवारी बन गए। सन 1958 में गांव के ही एक परिवार ने रंजिशन उनके परदादा की हत्या कर दी। तब नेत्रपाल ने सरकारी नौकरी छोड़ दी और चंबल के मशहूर डाकू लाखन सिंह के गिरोह में शामिल हो गए।

1960 में अपना गिरोह बनाया 
पर पुलिस मुठभेड़ के दौरान 1960 में लाखन सिंह का पूरा गिरोह मारा गया, केवल नेत्रपाल किसी तरह जिंदा बच गए। फिर उन्होंने अपने नाम से एक नया गिरोह बनाया और 18 सालों तक अपने गिरोह कि साथ मिलकर 53 लोगों को मौत के घाट उतारा। वे गर्व से बताते हैं कि गरीबों को सताने वाले 176 साहूकारों के यहां पर डकैती डाली और इस दौरान 87 अपहरण किए। 


दोनों तरफ से चल रही थीं दनादन गोलियां 

नेत्रपाल सिंह एक बार बताते हैं - तीन जून 1976 की दोपहर थी। पुलिस की वर्दी में उनका गिरोह डकैती डालने जा रहा था। उधर से पुत्तन बागी और जगन्ननाथ का गिरोह पुलिस की वर्दी पहनकर आ गया। दोनों गिरोह ने एक-दूसरे को पुलिस मान लिया और मुठभेड़ शुरू हो गई। उधर से गांधीवादी सुब्बाराव आगरा जिले के इसी गांव में बागियों से संवाद करने आए थे। सुब्बाराव इस फायरिंग के बीच एक पेड़ के नीचे बैठ गएजबकि दोनों तरफ से गोलियां चल रही थी। मुठभेड़ के बाद दूसरा गिरोह भाग निकला। तब डाक्टर सुब्बाराव से पूछाउन्हें डर नहीं लगा। तब उन्होंने कहा कि अहिंसा के हथियार में बहुत ताकत होती है। मैंने उसी दिन समझा यह कोई महान आत्मा है। और मेरे मन में सरेंडर करने का विचार आने लगा।

 और बदल गई जिंदगी 

इसी साल 1976 में डॉ. एसएन सुब्बाराव की बातों ने उनके दिमाग को बदलकर रख दिया। इसी साल डॉ. सुब्बाराव के नेतृत्व में 413 डाकुओं का गिरोह उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी से मिला। सरकार ने उनकी सरेंडर संबंधी सभी 20 शर्ते मान लीं। समर्पण के बाद नेत्रपाल सिंह को 10 साल की कैद हुई। जेल काटने के बाद वे 1986 में बरी होकर बाहर आ गए। तब से लोगों को शांति का संदेश देने में जुटे हैं।

नहीं रहे बागी नेत्रपाल सिंह  - साल 2016 के अगस्त महीने में एक दिन मनहूस खबर आई। नेत्रपाल सिंह नहीं रहे। 8 अगस्त 2016 को वे इस दुनिया को छोड़ गए। जीवन के आखिरी दिनों में नौजवानों की तरह सक्रिय नेत्रपाल सिंह बटेश्वर में एक राष्ट्रीय शिविर का आयोजन करवाना चाहते थे। उनकी इच्छा अधूरी रह गई। उन्होंने मुझे कई बार शिकोबाद आने को कहा भी था, पर उनका आमंत्रण भी उनके साथ ही चला गया। नेत्रपाल भाई को श्रद्धांजलि। 
vidyutp@gmail.com  

( BAGI NETRAPAL SINGH, SHIKOHABAD, SUBBARAO )

Saturday, June 27, 2015

राजा जनक जी के बाग में अलबेला रघुबर आयो रे...

जनकपुर शहर से भारत के हिंदुओं का आत्मीय रिश्ता है। भला हो भी क्यों न राजा रामचंद्र जी की ससुराल है। यहीं की बगिया में सीता माता ने पहली बार रामजी को देखा था और उनके रुप मोहित हो गई थीं। हमने देखा कि आज भी जनकपुर में शादियां बड़े संस्कारी तरीके से होती है। जनकपुर के बाजार में सुरूचिपूर्ण तरीके से दुल्हे और दुल्हनें सजती दिखाई दीं। नेपाली दुल्हे का श्रंगार अदभुत होता है। यहां की दुल्हनें..मानो हर दुल्हन माता सीता का रुप ही हो। शादी से पहले दुल्हने सज संवर का माता जानकी मंदिर में आशीर्वाद लेने जाती है। 12 जून को जब हमलोग जनकपुर मंदिर में पहुंचे तो आसपास में कई बारात निकल रही थी। तो हमारे राष्ट्रीय एकता शिविर में आए 19 राज्यों के कई उत्साही नौजवान शादी के बैंडबाजा के साथ कूद पड़े। बेगानी की शादी में अब्दुल्ला दीवाना की तरह जमकर नाचे।  

राजा जनक जी का मंदिर 

जनकपुर शहर की सड़कें काफी अच्छी बनी हैं। इनमें से कई सड़कों के निर्माण में भारत सरकार ने सहयोग किया है। जानकी मंदिर के पूरब तरफ के छोटा सा सुंदर सा राजा जनक जी का मंदिर भी है। इस मंदिर के बगल में विशाल सरोवर है। सरोवर के तट पर ईंटैलियन सैलून नजर आते हैं। यहां हज्जाम फुटपाथ पर बैठकर लोगों की हजामत बनाते नजर आते हैं। भारत में ऐसे नजारे खत्म होते जा रहे हैं।

जनकपुर शहर का मुख्य बाजार जानकी मंदिर के आसपास में ही सिमटा है। बाजार खूबसूरत है। किसी भारतीय बाजार सा ही दिखाई देता है। सारे साइन बोर्ड देवनागरी लिपी में है। लगता नहीं है कि आप हिंदुस्तान से बाहर है। दुकानदार मीठी मैथिली में गप्प करते नजर आते हैं। 

पर अब जनकपुर से खरीददारी का आकर्षण खत्म हो चुका है। बाजार में 90 फीसदी सामान भारत का ही बिकता है। किसी जमाने में लोग नेपाल के बाजारों से छाता, टार्च, घड़ी, कैमरा, जींस जैसी चीजें खरीद लाते थे। अब वे सब चीजें भारतीय बाजार में सुलभ हैं।
जानकी मंदिर परिसर में सजी दुकानें

जनकपुर के बाजार में अब बड़ी संख्या में बैटरी रिक्शा दौड़ते हुए दिखाई दे रहे हैं। किराया भी वाजिब है। पर नेपाल में ये बैटरी रिक्शा दो लाख से अधिक का पड़ रहा है। जबकि भारत में 70 हजार से 1.20 लाख का पड़ता है।

हमारे बैटरी रिक्शा चालक नृपेंद्र लाल कर्ण बताते हैं कि बैटरी रिक्शा महंगा जरूर है पर इससे कमाई अच्छी हो जाती है। कर्ण कायस्थ बिरादरी के हैं। उनकी ससुराल बिहार के मधुबनी जिले में है। वे अक्सर वहां जाते भी रहते हैं।

नेपाल की सड़कों पर भारतीय कंपनियों की गाड़ियां - 

नेपाल की सड़कों पर भारतीय कंपनी हीरो, बजार, होंडा आदि की बनी बाइक खूब नजर आती है। पर हीरो की बाइक पैसन प्रो यहां आकर एक लाख 20 हजार की हो जाती है भारतीय करेंसी में।जबकि भारत में ये 55 हजार की पड़ती है।

आखिरी इतनी महंगी क्यों। भारत निर्मित कारों की कीमत भी नेपाल में दुगुनी हो जाती है। ऐसा नेपाल सरकार की महंगी टैक्स व्यवस्था के कारण होता है। हाल के कुछ सालों से नेपाल के लोग अरब देशों में भी जाकर नौकरी करने लगे हैं। इसके कारण नकदी का प्रवाह बढ़ा है। लोग फटाफट बाइक खरीद रहे हैं।
- विद्युत प्रकाश मौर्य-  vidyutp@gmail.com

Friday, June 26, 2015

सीता माता के शहर - जनकपुर धाम में

भारत नेपाल के चेकपोस्ट पर धर्मेंद्र भाई के साथ। 
यह संयोग रहा कि सीतामढ़ी में जिस दिन मैं राष्ट्रीय युवा योजना के शिविर में पहुंचा हूं पूरे शिविरार्थियों के नेपाल में जनकपुर जाने का कार्यक्रम है। दोपहर में लंच के बाद बसों से सभी लोग जनकपुर के लिए प्रस्थान करेंगे। तो मेरी भी संयोग से जनकपुर के लिए एक और यात्रा बन गई है। 
नेपाल में भारत की सीमा पर स्थित है सीता माता का शहर जनकपुर धाम। मैं पहली बार में 1999 में जनकपुर गया, दूसरी बार 2015 में। पर इन 16 सालों में एक चीज नहीं बदली। सीतामढ़ी शहर से भिट्ठा मोड़ से जनकपुर के 19 किलोमीटर का सफर। ये सड़क बदहाल है। बिल्कुल कच्ची सड़क जैसी है। नेपाल सड़क पर रोड़े बिछे हैं। बसें उछलती कूदती चलती हैं। ये सफर काफी मुश्किलों भरा है। इस 19 किलोमीटर में एक घंटे से ज्यादा का वक्त लग जाता है। इस सड़क के निर्माण को लेकर नेपाल सरकार या फिर भारत सरकार बेजार है। वैसे भारत से जनकपुर धाम जाने के दो रास्ते हैं। पहला सीतामढ़ी जिले के भिट्ठा मोड़ से जलेश्वर होते हुए जनकपुर का है। दूसरा मार्ग जटही बार्डर से है जो मधुबनी जिले को जोड़ता है। पर जटही मार्ग को अंतरराष्ट्रीय सीमा का दर्जा नहीं प्राप्त है।


 बदहाल है नेशनल हाईवे -  सीतामढ़ी शहर से भिट्ठामोड़ की दूरी 30 किलोमीटर है। ये सड़क एनएच 104 घोषित हो चुकी है। पर सड़क अभी चौड़ी नहीं हुई है। रास्ते में कई पुल टूटे हैं। इस 30 किलोमीटर के सफर में दो घंटे लग सकते हैं। भारत सरकार ने चकिया से नेपाल सीमा से होकर चलने वाली सड़क को एनएच 104 का दर्जा जरूर दे दिया है पर सड़क का निर्माण नहीं हुआ है। जो लोग वेबसाइट देखकर इस सड़क पर सफर के लिए निकल जाएं उन्हें निराशा हाथ लगेगी।
जलेश्वर से जनकपुर जाती सड़क। 

सीतामढ़ी से जनकपुर के लिए चलने पर शहर के बाद महिसौल, बथनाहा, सुतिहारा, सुरसंड़ जैसे बाजार रास्ते में आते हैं। इस रास्ते में नदियों पर कई पुल हैं जो ध्वस्त हो चुके हैं। भारी वाहनों के लिए रास्ता बंद है। बरसात में हालत और भी खराब हो जाती है। हालांकि भिट्टामोड से पटना के लिए सीधी लग्जरी बसें चलती हैं। पर खराब सड़क के कारण इस यात्रा में काफी बाधाएं आती हैं। भिट्ठामोड़ बार्डर पर सशस्त्र सुरक्षा बल ( एसएसबी) के जवान सुरक्षा में तैनात हैं। उस पार नेपाल के सुरक्षा प्रहरी। भिट्टामोड़ पर उत्तर बिहार ग्रामीण बैंक की एक शाखा है। मेरे पिता जी कभी इसी ग्रामीण बैंक में मैनेजर रह चुके हैं।

भिट्ठामोड़ और सीतामढी में कई दुकानों के नाम भारत नेपाल मैत्री की कहानी सुनाते हैं। दुकान के नाम हैं भारत नेपाल साड़ी सेंटर, भारत नेपाल मीट सेंटर आदि आदि। नेपाल का कस्टम कार्यालय जिसे वहां भंसार कहते हैं वहां तैनात रहते हैं। भिट्ठामोड़ के पास नेपाल की सीमा के शहर का नाम जलेश्वर है।
जलेश्वर से जनकपुर की दूरी 19 किलोमीटर है। जलेश्वर में रहने के लिए कुछ होटल और गेस्ट हाउस भी बने हुए हैं। जलेश्वर से काठमांडू के लिए सीधी बसें भी जाती हैं। 12 घंटे के सफर का भारतीय मुद्रा में किराया 440 रुपये हैं। नेपाली मुद्रा में 700 रुपये। बसें बहुत अच्छी हैं। रोजाना लगभग 25 बसें जलेश्वर और जनकपुर से काठमांडू के लिए जाती हैं।
जनकपुर जानकी मंदिर के पास स्थित सरोवर। 
अगर आप अपने वाहन से जनकपुर जाना चाहते हैं तो ऐसा कर सकते हैं। नेपाल में भारतीय वाहनों को दिन के हिसाब से प्रवेश शुल्क देना पड़ता है। इस शुल्क को देने के लिए सीमा पर लंबी लाइन लगी रहती है। हालांकि जलेश्वर अंतरराष्ट्रीय प्रवेश सीमा है पर यहां पर कोई शानदार प्रवेश द्वार नहीं बना है जैसा कि रक्सौल के बाद दिखाई देता है। 12 जून 2015 को हम तीन बसों में बैठकर जनकपुर जा रहे थे। हमारी बसों को प्रवेश पास बनवाने में एक घंटे लग गए।

जलेश्वर के बाद पीपरा, सहोरवा बाजार जैसे छोटे बाजार आते हैं। नेपाल में प्रवेश के बाद कहीं से कुछ बदला हुआ नजर नहीं आता। जनकपुर शहर के प्रवेश सीमा पर जीरो माईल आता है। जनकपुर शहर जीरो माइल से रेलवे स्टेशन तक तीन किलोमीटर में फैला हुआ है। जीरो माइल बाद रामानंद चौक आता है जहां से दाहिनी तरफ की सड़क लेने पर आप मां जानकी के मंदिर तक पहुंच जाते हैं। इसी मार्ग पर निजी वाहनों के लिए विशाल पार्किंग बनी हुई है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य -         vidyutp@gmail.com     
  ( JANAKPUR DHAM, SITAMARHI, BHITHA MOR, JALESHWAR, NEPAL ) 


Thursday, June 25, 2015

सीतामढ़ी - राष्ट्रीय एकता शिविर में एक दिन

सीतामढ़ी के राष्ट्रीय एकता  शिविर में 12 जून की सुबह के वक्त जमा शिविरार्थी। 
सीतामढ़ी पहुंचते हुए रात का अंधेरा हो चुका है। पर मेरी मंजिल है गोयनका कॉलेज जो शहर में ही है। यहां पर राष्ट्रीय युवा योजना का राष्ट्रीय एकता शिविर लगा हुआ है। मैं इस शिविर में दो दिनों के लिए हिस्सा ले रहा हूं। वैसे तो शिविर हफ्ते भर का होता है। पर आजकल मेरे पास इतना लंबा वक्त नहीं है कि हफ्ते भर शिविर में रह सकूं। गोयनका कॉलेज परिसर में पहुंचते ही तमाम पुराने दोस्तों से मुलाकात होती है। मैं एसएन सुब्बराव जी से मुलाकात कर अपने शिविर के साथियों के संग रात्रि भोजन और सोने के लिए चला जाता हूं। 


अब बात करते हैं कैसा होता है शिविर का एक दिन....ठीक 4.55 बजे राइजिंग कॉल की सिटी बजती है, घंटा बजता है और सारे शिविरार्थी दौड़ पड़ते हैं गोल पोस्ट की ओर। सावधान के साथ। शुरू हो जाता है प्रयाण गीत नौजवान आओ रे नौजवान गाओ रे...लो कदम बढ़ाओ रे लो लो कदम मिलाओ रे.. देश भक्ति का ये गीत आलस भरे शरीर में जोश भरने का काम करता है। ये गीत बालकवि बैरागी की रचना है। गीत के  बाद समय मिलता है 45 मिनट का नित्यक्रिया के लिए। इसी दौरान होता शिविर का चाय काल। चाय के बाद एक बार फिर 6 बजे जुट जाते हैं रैली पोस्ट पर। इस बार 15 मिनट व्यायाम और योगासन के लिए। आजकल शिविर में फ्लैग होस्टिंग को जोड़ा गया है। इस दौरान राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा लहराया जाता है। युवाओं को तिरंगा फहराने का सही तरीका सिखाया जाता है।
सीतामढ़ी के राष्ट्रीय एकता  शिविर में 12 जून की सुबह के वक्त जमा शिविरार्थी। 


इसके बाद का समय तय होता है श्रमदान के लिए। हर रोज दो घंटे श्रमदान शिविर की दिनचर्या में शामिल है। कोशिश ये रहती है कि सात दिनों के शिविर में श्रमदान से कोई निर्माण कर दिया जाए या फिर किसी गंदे स्थल की पूरी तरह सफाई कर डाली जाए। श्रमदान शिविर का मुख्य हिस्सा है जो सालों से चला आ रहा है...शिविरार्थी गीत गाते हैं---- करना है निर्माण हमें नवभारत का निर्माण। श्रमदान वैसे शहरी लोगों को श्रम का महत्व समझाता है जो आमतौर पर कभी श्रम नहीं करते। कई लोग इस सीख को शिविर के बाद भी घर जाने पर सालों भर जारी रखते हैं।
सीतामढ़ी के गोयनका कॉलेज में राष्ट्रीय एकता  शिविर में श्रमदान करते शिविरार्थी। 

श्रमदान के बाद बारी आती है रैली की। राष्ट्रीय एकता का अलख जगाते देश भर के अलग अलग राज्यों से आए युवा शहर में 6 से 10 किलोमीटर तक की रैली निकालते हैं। इस रैली में दिल्ली हो या गुवाहाटी, अपना देश अपनी माटी जैसे नारे लगाए जाते हैं। सडकों पर रैलियां तो बहुत निकलती हैं, पर ऐसी रैली जिसमें 20 से ज्यादा राज्यों को युवक युवतियां शांति और राष्ट्रीय एकता के नारे लगाते हों ऐसा कम ही होता है। लोग रैली को कौतूहल से देखते हैं। एक अलग किस्म का माहौल बनता है। 

भाषा सीखें, कौशल सीखें-  रैली के बाद शिविर में दो घंटे का सत्र होता है लैंग्वेज एक्सचेंज और कल्चर एक्सचेंज का। इस दौरान हिन्दी जानने वाले लोग, तमिल, तेलुगु, मलयालम जैसी कोई भी दूसरी भारतीय भाषा सीखते हैं। सात दिन में लोगों को समान्य संप्रेषण जैसी भाषा आ जाती है। ऐसे कार्यक्रम में देश भर से आए लोगों में मैत्री में भी काफी इजाफा होता है।

इसके बाद ब्रेक होता है नहाने के खाने के लिए। खाने की शुरूआत भोजन मंत्र से होती है। साथ में खेलें साथ में खाएं, साथ करें हम अच्छे काम, जब तक सबका भला न होगा नहीं करेंगे हम आराम। इस मंत्र के साथ खाने पर जाते है। सभी शिविरार्थी अपना थाली ग्लास अपने घर से लेकर आते हैं। लाइन लग कर खाना लेते हैं। कई बार रसोई में मदद भी करनी पड़ती है। पर खाते वक्त खाना कैसा भी बन हो, आज का खाना सबसे अच्छा कह कर जीमते हैं। सीतामढ़ी में जून में आम का मौसम था तो हर खाने के साथ लोगों को आम जरूर मिल रहा था।

और अब दोपहर के खाने का वक्त है....
 भोजन के बाद थोड़ा आराम और उसके बाद कई बार चर्चा सत्र होता है जिसमें विभिन्न मुद्दों पर लोगों को बोलने का मौका मिलता है। शिविर के दौरान कई बार शाम को 4 से 6 बजे के बीच भी रैली निकाली जाती है। शाम 6 बजे हर रोज सर्व धर्म प्रार्थना होती है। ये आयोजन शहर के अलग अलग हिस्से में होता है। प्रार्थना के बाद डेढ़ घंटे का सांस्कृतिक कार्यक्रम होता है। रात 9 बजे भोजन के बाद शुरू हो जाता है सोने का वक्त। तो ऐसा होता है शिविर का एक दिन।
सीतामढ़ी रात को शिविर में मच्छरों ने खूब काटा। मैं रात भर ठीक से सो नहीं पाया। कई शिविरार्थियों ने मच्छरदानी का इंतजाम भी कर लिया है।
सुबह सुबह शिविर में श्रमदान का समय। 

सुबह सुबह उठकर मैं पिताजी के दोस्त लक्ष्मीनारायण साह से मिलने उनके घर पहुंचा। कई साल पहले 1999 में उनके घर आना हुआ था। उनका घर लक्ष्मीनारायण हाईस्कूल के पीछे था। कई साल बाद आने पर मैं उनका घर भूल गया था। बिहार के शहरों में लोग मकान नंबर से नहीं बल्कि नाम से ही पहचाने जाते हैं। तो पड़ोस के एक दुकानदार ने मुझे उनका सही घर बता दिया। बिना किसी सूचना के अचानक सुबह सुबह अपने घर देखकर उनकी खुशियों का ठिकाना नहीं था। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य -- vidyutp@gmail.com
( NYP NATIONAL INTEGRATION CAMP, SITAMARHI, GOENKA COLLEGE, BIHAR ) 

Wednesday, June 24, 2015

बेतिया से सीतामढ़ी - उत्तर बिहार में बेहतर सड़कों का संजाल

नरकटियागंज में जय प्रकाश नारायण की प्रतिमा। 

मैं भितिहरवा में बापू के आश्रम की मिट्टी को नमन कर आगे बढ़ता हूं। दो परिवार के लोग अपने वाहन से आश्रम देखने पहुंचे हैं। आश्रम के बाहर चौक पर चाय नास्ते की तीन दुकाने हैं। यहां चाय, दही चूड़ा आदि मिल जाता है। मुझे थोड़े इंतजार के बाद नरकटियागंज जाने के लिए आटो रिक्शा मिल जाता है। नरकटियागंज रेलवे स्टेशन के पूरब तरफ रेलवे गुमटी के पास बेतिया के लिए बस मिल जाती है। चनपटिया होते हुए बस बेतिया शहर पहुंच जाती है।


बेतिया से मुजफ्फरपुर के लिए दोपहर में बस लेता हूं। बस बेतिया बस स्टैंड से बाहर निकलती है। बेतिया से मोतिहारी की सड़क एनएच 28बी घोषित है। हालांकि इस सड़क पर लगातार निर्माण कार्य चल रहा है इसलिए जगह जगह धूल उड़ रही है।  एनएच 28बी छपरा से मोतिहारी, बेतिया, लौरिया, बगहा होते हुए कुशीनगर तक जाती है। पर इसके कई हिस्सों पर निर्माण कार्य जारी है। 

चलते चलते रास्ते में फुलवरिया बाजार आता है। यहां से रक्सौल के लिए रास्ता बदलता है। रक्सौल तक एनएच 28ए जाती है। सड़क मार्ग आने पर सुगौली रेलवे स्टेशन रास्ते में नहीं पड़ता। हालांकि रेल से आने पर सुगौली जंक्शन रेलवे स्टेशन पड़ेगा। सुगौली का इतिहास में अपना महत्व है। यहां अग्रेजों और नेपाल के बीच सुगौली की संधि हुई थी।
विकास की दास्तां सुनाता- मुजफ्फरपुर पूर्णिया नेशनल हाईवे -57 

फुलवरिया से आगे बढ़ने पर सेमरा रेलवे स्टेशन आता है। सेमरा रेलवे स्टेशन सड़क के किनारे है। रास्ते में सड़क के किनारे ताड़ी की दुकानें दिखाई देती हैं। कई दुकानें महिलाएं भी चला रही हैं। कहीं कहीं बारात निकल रही है। मैं बड़ा बदलाव देख रहा हूं। यहां बारात में महिलाएं भी झूमकर नाच रही हैं।

इसके बाद पटखौलिया, बनजरिया जैसे छोटे बाजार आते हैं। इसके बाद हम पहुंच जाते हैं मोतिहारी। मोतिहारी यानी बापूधाम मोतिहारी। मोतिहारी में महात्मा गांधी के नाम पर संग्रहालय है। मैं उसे देखने के लिए रुक नहीं पाता। बस निजी बस स्टैंड में जाकर थोड़ी देर रुकती है। मुजफ्फरपुर जाने वालों की बड़ी भीड़ आकर चढ़ती है। बस फिर आगे चल पड़ती है। सड़क अभी भी अच्छी नहीं है। पीपरा कोठी में एनएच 28 आ जाता है। चार लेन की शानदार सड़क का रूप ले चुकी है एनएच 28। सड़क के बीचों बीच सुंदर वृक्षारोपण किया गया है।

इस नेशनल हाईवे पर मुजफ्फरपुर तक बसें हवा से बातें करती हुई चलती हैं। रास्ते में चकियामेहसी जैसे बाजार आते हैं। इसके बाद मुजफ्फरपुर जिले का मोतीपुर और फिर कांटी थर्मल पावर स्टेशन आता है। मुजफ्फरपुर शहर से पहले आम के विशाल बगान भी नजर आते हैं। मैं मुजफ्फरपुर में बस बदलता हूं। यहां सीतामढ़ी जाने वाली बस तुरंत ही मिल जाती है। मुजफ्फरपुर से सीतामढ़ी का सफर एनएच 77 पर शुरू होता है। 

मुजफ्फरपुर से दरभंगा के लिए एनएच 57 शानदार सड़क बन चुकी है। ये पूर्णिया तक जाती है। कोसी महासेतु से होकर फरबिसगंज अररिया होते हुए ये सड़क उत्तर बिहार की लाइफलाइन बन चुकी है। चकिया से शुरू होता है एनएच 104 जो मधुबन, शिवहर सीतामढ़ी, बथनाहा, सुरसंड, भिट्ठामोड, जयनगर होते हुए फुलपरास तक जाता है। सड़क निर्माणाधीन है इसलिए जगह जगह पर पुल नहीं बने हैं। अभी रास्ता खराब है। सड़क तैयार होने पर नेपाल सीमा से लगती ये एक और महत्वपूर्ण सड़क होगी। शाम ढलने के साथ ही मैं सीतामढ़ी पहुंच चुका हूं। 

लखनदेई नदी की दुर्दशा - सीतामढ़ी शहर के बीचों बीच लखनदेई नामक नदी बहती है। बहुत कम चौड़ाई वाली यह नदी साल के आठ महीने तो सूखी ही रहती है। पर बारिश के दिनों में उफान पर होती है। कई बार इतनी उफान पर होती है कि आधे से ज्यादा सीतामढ़ी शहर को डूबो देती है। पर साल के आठ महीने शहर के लोग इस नदी की कोई इज्जत नहीं करते। नदी को नाला समझ उसमें कचरा फेंकते रहते हैं। मुझे नदी में कचरा देखकर बड़ा दुख होता है। लखनदेई बागमती की सहायक नदी है जो नेपाल से निकलती है। धार्मिक मान्यता है कि लखनदेई सीता की सहेली है। इसलिए इस नदी का पौराणिक,आध्यात्मिक तथा धार्मिक महत्व भी है। 

 -विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( NORTH BIHAR, ROAD, BETIAH, FULWARIA, SEMRA, MOTIHARI, MUZAFFARPUR ) 

Tuesday, June 23, 2015

भिखना ठोरी – यहां जार्ज पंचम ने मारे थे 39 बाघ

बिहार के पश्चिम चंपारण जिले का भिखना ठोरी रेलवे स्टेशन। गवनहा ब्लाक में स्थित भिखना ठोरी के जंगलों में बिखरे हैं इतिहास के कई पन्ने। यह इलाका ब्रिटेन के राजा जार्ज पंचम के शिकारगाह के तौर पर प्रसिद्ध है। वे नेपाल के राजा के आमंत्रण पर इधर शिकार करने पहुंचे थे। दिसंबर 1911 में ग्रेट ब्रिटेन के किंग जार्ज पंचम ने 21 दिन चंपारण के भिखना ठोरी में गुजारे।


शिकार के लिए शिविर लगाया यहां उन्होंने शिकार के लिए शिविर लगाया था। इस तीन हफ्ते में उन्होंने 39 बाघों का शिकार किया। जार्ज पंचम का जत्था हाथियों पर सवार होकर नेपाल की तराई के जंगल जंगल में घूमता था।

बेतिया और रामनगर के राजा ने की खातिरदारी - जार्ज पंचम की खातिरदारी इस दौरान बेतिया और रामनगर के राजा ने की थी। इसके लिए पूरा लाव लश्कर सजाया गया था। उनकी सहायता के लिए उनके साथ नेपाली सिपाहियों और शिकारियों की टीम भी थी। 18 दिसंबर को किंग जार्ज ने पहला बाघ मारा। जार्ज पंचम 12 दिसंबर 1911 के दिल्ली दरबार के बाद चंपारण पहुंचे थे। जार्ज पंचम को शिकार का शौक था। वे इससे पूर्व 1905-06 में प्रिंस ऑफ वेल्स के तौर पर भारत आ चुके थे। 1911 में जार्ज पंचम ट्रेन से भिखना ठोरी तक पहुंचे। 

और ऐसे की गई शिकार की तैयारी - जॉर्ज पंचम के बाघों के शिकार की कहानी अदभुत है।  यहां से आगे का सफर उन्होंने मोटर और हाथी से किया। शिकार के लिए 600 हाथियों की मदद ली गई जो एक रिंग बनाकर बाघों को घेरने का काम करते थे। जार्ज पंचम ने नेपाल के चितवन नेशनल पार्क में जाकर इन बाघों का शिकार किया। शिकार से पहले पूरी तैयारी की गई थी। थल सेना के दल ने 40 ठिकानों की पहचान की थी जहां राजा शिकार कर सकें।


ठोरी में जार्ज पंचम के लिए बना अस्थायी निवास। 



बाघों को ललचाने के लिए बकरियां - शिकार करने के नेपाली तरीके में बाघों को आकर्षित करने के लिए बकरियां बांध दी जाती थीं। पर जार्ज पंचम की टीम ने रिंग तकनीक अपनाई और सफलतापूर्वक कई बाघों का शिकार किया। भिखना ठोरी में जार्ज पंचम के अस्थायी निवास के लिए एक बंगला बनाया गया था जिसके अवशेष आज भी मौजूद हैं। जार्ज पंचम के प्रवास के दौरान इस बंगले के बाहर चौकीदार तैनात रहते थे। भिखना ठोरी इलाके से हिमालय की सुंदर चोटियां दिखाई देती हैं। ये इलाका बिल्कुल नेपाल की सीमा पर स्थित है।

जार्ज पंचम के आगमन के लिए बिछाई गई रेलवे लाइन 


नरकटियागंज तक रेल संपर्क तो जॉर्ज पंचम के आने से पहले से ही मौजूद था। पर जब 1911 में जार्ज पंचम ने नेपाल की तराई में शिकार की योजना बनाई तो उनके पहुंचने के लिए नरकटिया गंज से भिखना ठोरी तक के लिए 35 किलोमीटर की लंबाई वाली मीटर गेज लाइन बिछाई गई।




इसी रेल मार्ग से जार्ज पंचम भिखना ठोरी दल बल के साथ पहुंचे। इस मार्ग पर कुल तीन रेलवे स्टेशन थे। यह संयोग रहा है कि 1917 में महात्मा गांधी ने जब इस क्षेत्र में निलहे किसानों को लेकर आंदोलन की शुरुआत की तो अपना आश्रम भितिहरवा में बनाया। भितिहरवा इसी रेल मार्ग पर 16 किलोमीटर पर स्थित है। बाद में भितिहरवा आश्रम के नाम से इस रेल मार्ग पर एक हॉल्ट बनाया गया। लंबे समय से लोग इस रेल मार्ग को बड़ी लाइन में तब्दील करने की लगातार मांग कर रहे थे। अब उनके ये मांग पूरी होती हुई नजर आ रही है। हालांकि मुनाफे के लिहाज से ये रेलवे के लिए घाटे की लाइन है। पर इसका ऐतिहासिक महत्व ज्यादा है। 
 वाल्मिकी नगर से दो बार संसद का चुनाव लड़ चुके पत्रकार मनोहर मनोज ने भी इस लाइन को बड़ी लाइन में तब्दील करने और इसे हेरिटेज लाइन घोषित करने की मांग रखी थी।
अंततः  समस्तीपुर रेलमंडल अंतर्गत नरकटियागंज- भिखना ठोरी रेल ट्रैक पर 24 अप्रैल 2015 से रेल गाड़ियों का परिचालन बंद कर दिया गया है। रेलवे अब इस मार्ग को ब्रॉडगेज में बदलने जा रहा है। वास्तव में रेलवे के इतिहास में ये एक हेरिटेज लाइन है। इस लाइन से ब्रिटेन के महाराजा जार्ज पंचम और महात्मा गांधी की स्मृतियां जुड़ी हैं।

नरकटियागंज भिखना ठोरी रेल मार्ग - 
कुल लंबाई - 35.7 किलोमीटर
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मार्ग के स्टेशन –-
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1  नरकटियागंज ( NRKG)  -

2 अमोलवा  - (12किमी पर)

3 भितिहरवा आश्रम हाल्ट (BHWR) – (16 किमी पर)

4 गवनहा  ( 22 किमी पर)

5 भिखना ठोरी ( BKF) ( 35.7 किमी पर)
------------------------------------------- विद्युत प्रकाश मौर्य  ---- vidyutp@gmail.com
( NARKATIA GANJ BHIKHNA THORI RAIL MARG, METER GAUGE  )