Saturday, May 16, 2015

मुंबई के फोर्ट में प्राचीन फायर टेंपल ( पारसी मंदिर)




पारसी मंदिर यानी फायर टेंपल - मुंबई के सीएसटी इलाके में घूमते हुए हमें एक पारसी मंदिर नजर आता है। इसके आगे साइन बोर्ड पर फायर हाउस लिखा है। पर क्या आपको पता है अगर आप गैर पारसी हैं तो किसी पारसी के मंदिर में नहीं जा सकते। आप गुरुद्वारा में जा सकते है, मसजिद में जा सकते है, यहूदियो के साइनागॉग में जा सकते हैं। पर पारसी मंदिर में नहीं जा सकते। देखिए बोर्ड पर साफ लिखा है कि गैर पारसियों के लिए प्रवेश निषेध है। 

मानेक जी सेठ जी आग्यारी फायर टेंपल मुंबई के सबसे पुराने फायर टेंपल में शुमार है। इसका निर्माण 1733 में सेठ मानेक जी ने करवाया था। यह मुंबई का दूसरा सबसे पुराना फायर टेंपल है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर दो लामासू देव की मूर्तियां लगी हैं। पारसी में लामासू सुरक्षा के देवता हैं। उनका सिर इंसानों का है जबकि शरीर शेर का है। हिंदूओं के गणेश जी की तरह वे हाईब्रिड देवता हैं। वैसे मुंबई में कुल 50 फायर टेंपल है। भला फायर टेंपल नाम क्यों। पारसी लोग अग्नि की पूजा करते हैं इसलिए उनके मंदिरों को ये नाम दिया गया है। मुंबई में दादर और नवी मुंबई में भी पारसी लोगों के मंदिर हैं। 



दिल्ली मेट्रो से तेज है मुंबई लोकल 

मुंबई की लोकल ट्रेन एक घंटे में औसतन 42 से 44 किलोमीटर चलती है और दिल्ली की मेट्रो ट्रेन महज 32 किलोमीटर चल पाती है। और किराया मुंबई लोकल का दोगुना है दिल्ली मेट्रो में।  मुंबई के खार घर से चलने वाली लोकल ट्रेन सीएसटी स्टेशन पहुंच जाती है महज एक घंटे 10  मिनट में। दूरी है 43 किलोमीटर। यानी लोकल ट्रेन की स्पीड हुई मेट्रो से तेज। लोकल ट्रेन में किराया तो कम है ही, साथ ही ये हर वर्ग के लोगों को अपने अंदर समेट कर चलती है। पैसे वाले लोगों के लिए फर्स्ट क्लास है तो वेंडरों के लिए और महिलाओं के लिए भी इसमें आरक्षित डिब्बा होता है। तभी तो मुंबई की लाइफलाइन है लोकल ट्रेन।


उन फेरीवालों की सलाम - खार घर से मुंबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनस जाने के लिए लोकल ट्रेन में चढ़ा हूं। भीड कम होने पर पर सीएसटी जाते समय वेंडर डिब्बे में चढ़ जाता हूं। गोवंडी स्टेशन पर चढते हैं दो लोग। उनके पास बड़ा सा गट्ठर है। पूछने पर बताया इलाहाबाद के रहने वाले हैं और यहां घूम घूम कर नाइटी बेचने का धंधा करते है। गोवंडी स्टेशन के पास सेठ की  दुकान से माल उठाते हैं। दिन भर फेरी लगाकर बेचते है। शाम को बचा हुआ माल सेठ को वापस। सेठ ने रहने की जगह भी दे रखी है मुफ्त में। दोनों फेरीवाले इलाहाबाद के रहने वाले हैं। बताते हैं महीने में 10 से 15 हजार की कमाई हो जाती है। कहीं मजदूरी करने से तो अच्छा है। मैं मन ही मन उनकी मेहनत को सलाम करता हूं। मैं उनसे धारावी के बारे में पूछता हूं।



 वे लोग धारावी की गलियों में कपड़े बेचने जाते हैं। कुर्ला से थोडी दूर सायन और माहिम के बीच में स्थित धारावी देश की सबसे बड़ी झुग्गी झोपड़ी कालोनी है। पर अब बदल रहा है धारावी।


धारावी मुंबई का एक झुग्गी बस्ती क्षेत्र है। यह पश्चिम माहिम और पूर्व सायन के बीच में है और यह 200  हेक्टेयर (1.7 वर्ग किलोमीटर करीब 500 एकड़ ) के एक क्षेत्र में है। धारावी की आबादी 10 लाख से अधिक है। अनुमान के अनुसार धारावी में हर साल 3600 करोड़ रुपये से भी अधिक का व्यापार होता है। यहां काम करने वाले अधिकतर उद्योग आधिकारिक रूप से पंजीकृत नहीं हैं। 

 2009 में यूएन की एक रिपोर्ट ने कहा था कि कराची की उरंगी एशिया की सबसे बड़ी झुग्गी बस्ती है। दोनों फेरीवाले भाई रे रोड पर उतर जाते हैं। वे बताते हैं कि हर रोज किसी नए इलाके में फेरी लगाने जाते हैं। जब मर्जी हो जिधर चल दिए। शाम को अपने घोंसले में वापस। मुंबई लोकल सरपट भागी जा रही है। डॉकयार्ड रोड, सेंडर्स रोड, मसजिद के बाद सीएसटी। 
दूरबीन से समंदर का नजारा - 

हमलोग सीएसटी से बस लेते हैं गेटवे आफ इंडिया के लिए। अनादि की गेटवे आफ इंडिया पर दूसरी यात्रा है। सोमवार होने के कारण एलीफैंटा बंद है। इसलिए हमलोग गेटवे आफ इंडिया पर ही देर तक तफरीह करते हैं। अनादि एक दूरबीन किराए पर लेते हैं और कोलाबा और समंदर में आते जाते स्टीमर का खूब नजारा करते हैं।
बेटे अनादि पूछ बैठते हैं कि यहां समंदर के किनारे मुंबई का बोर्ड क्यों लगा हुआ है। बिल्कुल किसी रेलवे स्टेशन की तरह। मैं बताता हूं कि ताकि कोई जहाज आए तो उसे पता चल जाए कि वह कहां पहुंचा है।