Sunday, May 10, 2015

शनिवार वाडा- कभी शानदार किला था, अब लगता है यहां डर

पुणे शहर का शनिवार वाडा वहां का प्रमुख ऐतिहासिक दर्शनीय स्थल है। पुराने पुणे शहर के बीचों बीच स्थित शनिवार वाडा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर देश के संरक्षित स्मारकों में से एक है। ये पेशवाओं द्वारा निर्मित शानदार किला हुआ करता था। पर अब इसकी गिनती देश के भुतहा यानी हाउंटेड किलों में होती है। पर क्या सचमुच ऐसा है। हमें यहां घूमते हुए ऐसा कुछ नहीं लगा। पर इस किले के साथ कुछ दर्दनाक कथाएं जुड़ी हैं। 
अब किले का ज्यादातर हिस्सा खंडहर है। अब यह किला लोगों को डराता भी है। कभी इस किले में एक राजकुमार नारायण राव को बेदर्दी से कत्ल कर दिया गया था ताकि वह राजा न बन सकें। कहा जाता है कि आज भी रात के समय यहां मदद के लिए पुकारते एक युवक की दर्दनाक चीखें सुनाई देती हैं।


यूं पड़ा नाम शनिवार वाडा - किले की नींव शनिवार के दिन रखी गई थी इसलिए इसका नाम शनिवार वाडा पड़ा। मराठा साम्राज्य में पेशवा बाजीराव ( प्रथम) जो सतारा के छत्रपति शाहु के प्रधान मंत्री (पेशवा) थे उन्होंने शनिवार वाड़ा का निर्माण करवाया था। किले की नींव पेशवा बाजीराव प्रथम ने 10 जनवरी 1730 ( शनिवार) को रखी थी। किले के अंदर कई सुंदर इमारतें और बीच में एक लोटस फाउंटेन का निर्माण कराया गया था। इसे हजार करंजी नाम दिया गया था। किले की प्रमुख इमारत सात मंजिला हुआ करती थी जिसे बाजीराव पेशवा प्रथम ने ही बनवाया था। पर वह बाद में आग में नष्ट हो गई। 


किले में सात मंजिला ऊंची इमारत की ऊंची चोटी से यहां 17 किलोमीटर दूर आलंदी स्थ्ति संत ज्ञानेश्वर के मंदिर का शिखर दिखाई देता था। अपने समय में शनिवार वाडा इतिहास की सबसे कलात्मक और आकर्षक रचनाओ में गिना जाता था। पर वर्तमान में शनिवार वाडा का केवल मुख्य बाहरी भाग ही बचा हुआ है। 

1773 में नारायण राव की हत्या हुई-  पेशवाओं के इस किले का उदघाटन 22 जनवरी 1732 को किया गया था। यह किला 1818 तक पेशवाओं की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा। लेकिन इस किले के साथ एक काला अध्याय भी जुड़ा है। इस किले में 30 अगस्त 1773 की रात को 18 साल के  नारायण रावजो की मात्र 16 साल की उम्र में मराठा साम्राज्य के पांचवे पेशवा बने थे, उनकी षड्यंत्रपूर्वक ह्त्या कर दी गई थी। तो लोग कहते हैं कि रात को किले में नारायण राव की आत्मा भटकती है। तो अब इस किले को देश के टॉप मोस्ट हॉन्टेड प्लेस  में शामिल किया जाता है।

1827 में भीषण आग लगी - शनिवार वाडा फोर्ट का निर्माण राजस्थान के ठेकेदारों ने किया था इस किले में लगी सागवान की लकड़ी जुन्नार के  जंगलो सेपत्थर चिंचवड़ की खदानों से लाया गया था। इस महल में 1827 को भयंकर आग लगी थी,  जिसे बुझाने में सात दिन लगे। इस आग में कई इमारतें पूरी तरह जलकर नष्ट हो गईं। उनके अब केवल अवशेष देखे जा सकते हैं।



प्रवेश के लिए पांच द्वार - विशाल किला शनिवार वाडा किले में प्रवेश करने के लिए पांच दरवाजे है। दिल्ली दरवाजा ( उत्तर की तरफ मुख्य दरवाजा है)।
अगला दरवाजा नारायण दरवाजा है इसके अलावा खड़की दरवाजा और गणेश दरवाजा भी हैं। गणेश दरवाजा के पास पेशवा द्वारा बनवाया गया पुराना गणेश मंदिर स्थित है। 
मस्तानी महल और दरवाजा - 
एक दरवाजे का नाम मस्तानी दरवाजा है। पेशवा बाजीराव प्रथम की दूसरी पत्नी मस्तानी जब किले से बाहर जातीं तो इस दरवाजे का इस्तेमाल करती थीं। इसलिए इसका नाम मस्तानी दरवाजा है। बाजीराव प्रथम ने अपनी दूसरी पत्नी मस्तानी के लिए शनिवार वाडा में मस्तानी महल बनवाया था। 

अब किले का मुख्य द्वार और उसके पास की संरचना को ही मूल रूप में देखा जा सकता है। आप किले की चारों तरफ की बाउंड्री पर चल सकते हैं। अब किले के चारों तरफ अब बड़ा बाजार है।


पानीपत की तीसरी लड़ाई में हुई थी हार - पेशवा नाना साहेब के तीन पुत्र थे विशव रावमहादेव राव और नारायण राव। सबसे बड़े पुत्र विशव राव पानीपत की तीसरी लड़ाई में मारे गए थे। नाना साहेब की मृत्यु के उपरान्त महादेव राव को गद्दी पर बैठाया गया। पानीपत की लड़ाई में महादेव राव पर ही रणनीति बनाने की पूरी जिम्मेदारी थी लेकिन उनकी बनाई हुई कुछ रणनीतियां बुरी तरह विफल रही थी फलस्वरूप इस युद्ध में मराठों की बुरी तरह हार हुई थी। 

कैसे पहुंचे - पुणे जंक्शन रेलवे स्टेशन से शनिवार वाडा की दूरी 3.5 किलोमीटर है। आटो या सिटी बसों से यहां तक पहुंचा जा सकता है। ये किला सुबह 8 बजे से शाम 6.30 बजे तक दर्शकों के लिए खुला रहता है।यहां सालों भर हर रोज सैलानियों की भीड़ उमडती है। फिल्म बाजीराव मस्तानी के प्रदर्शन के बाद शनिवार वाडा आने वाले सैलानियों की संख्या में इजाफा हो गया है। 


 ---  विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com  

( SHANIWAR VADA, FORT, PUNE, PESHWA BAJIRAO  FIRST, MASTANI MAHAL, PESHWA NARAYAN RAO) 

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