Saturday, May 30, 2015

हुमायूं का मकबरा से मिली थी ताजमहल बनाने की प्रेरणा

दिल्ली का हुमायूं का मकबरा ताजमहल के जैसा खूबसूरत है । कुछ साम्यताएं ताजमहल और हुमायूं के मकबरे में। दोनों चार बाग शैली में बने हैं। यानी मकबरे के चारों तरफ चार बागीचे हैं। पर हुमायूं का मकबरा पहले बना है ताजमहल बाद में। ताज संगमरमर का है तो हुमायूं का मकबरा लाल पत्थर यानी रेड स्टोन का। ये लाल पत्थर लाया गया राजस्थान के धौलपुर जिले में बाड़ी से। जब अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा दिल्ली आए तो उनके पास आगरा जाकर ताजमहल देखने का वक्त नहीं था। तब उन्हें हुमायूं का मकबरा दिखाया गया और उन्होंने खूब रूचि लेकर देखा भी।

दिल्ली में दर्जनों किले और मकबरों के साथ मुगलकालीन बाग हैं। इन बागों के कारण दिल्ली में हरियाली बची हुई है। अगर ये नहीं होते तो बिल्डर यहां भी कंक्रीट के जंगल खड़े कर चुके होते।
1572 में तैयार हुआ मकबरा - मकबरे का निर्माण हुमायूं की मृत्यु वर्ष 1556 के नौ साल बाद उसकी  शोकग्रस्त बेगा बेगम ( हमीदा बानू ) ने करवाया। इसका निर्माण 1565 से 1572 के मध्य हुआ। इस मकबरे का निर्माण 120 वर्ग मीटर के चबूतरे पर हुआ है। मकबरे का भवन दो मंजिला है। पहली मंजिल पर चढ़ने के लिए चारों तरफ से सीढ़ियां बनी हुई हैं। इसकी कुल ऊंचाई 47 मीटर है। मकबरे के प्रथम तल पर चारों तरफ विशाल बरामदा बना हुआ है। इन बरामदों में चौबारे बने हैं। यहां से बागों का नजारा सुंदर दिखाई देता है। यह देश की ऐसा उत्कृष्ट निर्माण है जिस पर फारसी शैली का प्रभाव दिखाई देता है। मकबरे के अंदर हुमायूं तो सो ही रहा है।

मुगल परिवार के सौ कब्र -  मुगल परिवार के सौ लोगों की कब्रें हुमायूं मकबरे के अंदर ही बनाई गई हैं। इसलिए हुमायूं के मकबरे को मुगलों का शयनागार भी कहा गया है। यहां हुमायूं के अलावा सात मुगल बादशाह की कब्रे हैं।  यहां पर हुमायूं की बेगम बेगा, हमीदा बानो, महान विद्वान दारा शिकोह आदि की भी कब्र है।


मकबरे में लाल पत्थर के साथ सफेद संगमरर का भी इस्तेमाल किया गया है। इसके छत पर छोटी छोटी छतरियां हैं हो चमकदार नीली टाइलों से टकी हैं। सफेद संगमरर के गुंबद पर छह मीटर तांबे की स्तूपिका बनी है। इस मकबरे के वास्तुकार मिराक मिर्जा गियासी थे।

जन्नत का दरिया -  हुमायूं के मकबरे के ठीक सामने चार बाग में विशाल तालाब भी बनाए गए हैं। इन तालाब की प्रेरणा कुरानशरीफ से मिली है। ऐसे बाग की कल्पना जन्नत के नजारे में की गई है। जन्नत जहां चार नदियां बहती हैं। दूध की, शहद की। उन नदियों को इस बाग में उतार दिया गया है। 

मकबरे के चारों तरफ बाग में कई किस्म के हरे भरे पेड़ हैं। इनमें नीबू के पेड़ भी खूब हैं। दिल्ली आने वाले विदेशी सैलानी हुमायूं का मकबरा जाना नहीं भूलते। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित इस इमारत में प्रवेश के लिए टिकट है। मुख्य प्रवेश द्वार के पास एक छोटा सा संग्रहालय भी है। कहा जाता है हुमायूं के पोते शाहजहां तो आगरे में ताजमहल बनवाने की प्रेरणा हुमायूं के मकबरे से ही मिली।


विश्व विरासत की सूची में -  1993 में हुमायूं के मकबरे को युनेस्को ने विश्व विरासत के स्थलों की सूची में शामिल किया। मकबरे को बनाने के लिए इस जगह का चयन इसलिए किया गया कि क्योंकि यह महान सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह के पास था। दूसरा बड़ा कारण था इसका यमुना नदी के तट पर होना। हालांकि अब यमुना की धारा थोड़ी दूर चली गई है।



ईशा खां नियाजी का मकबरा - हुमायूं के मकबरे के परिसर में दक्षिणी कोने पर ईशा खां नियाजी की भी कब्र है। ईशा खां नियाजी अफगान शासक शेरशाह सूरी के दरबारी थे। उनका मकबरा सासाराम में स्थित शेरशाह सूरी के मकबरे की ही तर्ज पर अष्टकोणीय वास्तु शैली में बनाया गया है। इस मकबरे का निर्माण 1547 में हुआ । यानी ये हुमायूं के मकबरे से ज्यादा पुराना है। ईशा खान ने मुगलों के साथ लंबी लड़ाई लड़ी थी। उनके अष्टकोणीय मकबरे के बाहर अष्टकोणीय उद्यान भी बना है।

अरब सराय और विशाल दरवाजा - हुमायूं के मकबरे के परिसर में अरब सराय बना है। इसे बेगा बेगम ने 1560-61 में बनवाया था। इसमें 300 अरब से आए शिल्पियों के रहने का इंतजाम था। इन शिल्पियों ने ही हुमायूं के मकबरे का निर्माण कराया। हालांकि अरब सराय के कमरे अब नष्ट प्राय हो चुके हैं। पर अरब सराय का दरवाजा बेहतरीन हाल में देखा जा सकता है। इस दरवाजे के का निर्माण हुमायूं के पोते जहांगीर के शासन काल में हुआ था। यह मकबरे का दक्षिणी दरवाजा है जो बाहर से काफी रंगबिरंगा है। यह दरवाजा निजामुद्दीन ईस्ट की कालोनी में खुलता है। इस द्वारा से सैलानियों को प्रवेश की इजाजत नहीं दी जाती। कभी इस द्वार के बाहर बाजार हुआ करता था, जो अब नहीं है।

कैसे पहुंचे - दिल्ली में हुमायूं का मकबरा निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन के पास स्थित है। प्रगति मैदान से आश्रम वाली सड़क मथुरा रोड पर निजामुद्दीन थाना के बस स्टॉप पर उतर कर आप यहां पहुंच सकते हैं। मकबरे के सामने सड़क के बीचों बीच नीला गुंबद स्थित है। मकबरे सामने सड़क के उस पार निजामुद्दीन औलिया की दरगाह है, जबकि मकबरे के पीछे गुरुद्वारा दमदमा साहिब है।

प्रवेश शुल्क - मकबरा सुबह सूर्योदय से सूर्यास्त तक सैलानियों के लिए खुला रहता है। इसमेंप्रवेश के लिए 40 रुपये का टिकट लेना पड़ता है। परिसर में पेयजल और शौचालय का इंतजाम है। पर खाने पीने की चीजें अंदर नहीं ले जा सकते।  


- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com

( WORLD HERITAGE SITE, HUMAUN TOMB, DELHI  )


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