Sunday, May 31, 2015

गुरुद्वारा दमदमा साहिब – गुरु गोबिंद सिंह की दिलाता है याद


वैसे तो दिल्ली प्रसिद्ध गुरुद्वारों में गुरुद्वारा शीशगंज साहिब, गुरुद्वारा बंगला साहिब, गुरुद्वारा रकाबगंज के बारे में सभी लोग जानते हैं। पर दिल्ली में और भी कई ऐतिहासिक गुरुद्वारे हैं। इनमें  से एक है गुरुद्वारा दमदमा साहिब।

गुरुद्वारा दमदमा साहिब दक्षिण दिल्ली में हुमांयू के मकबरे के पीछे स्थित है। यहां जाने का रास्ता हुमायूं के मकबरा के बगल से होकर है। गुरुद्वारा के बगल से निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन की रेलवे लाइन गुजरती है। गुरुद्वारा दमदमा साहिब की यादें दसवें गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी से जुड़ी हुई हैं। यह गुरुद्वारा गुरु गोबिंद सिंह जी और मुगल बादशाह बहादुर शाह के बीच 1707 में हुई मुलाकात की याद दिलाता है। 
बहादुर शाह के शासन काल में गुरुगोबिंद सिंह का दिल्ली आगमन हुआ। वे सिख फौज के साथ उन्होने मोती बाग ( धौला कुआं के पास ) अपना ठिकाना बनाया।
 गुरु साहिब और बादशाह से मुलाकात का स्थान हुमायूं के मकबरे के पीछे हजरत निजामुद्दीन के पास तय किया गया। शुरू की मुलाकात में गुरु साहिब ने  उन फौजदारों, अमीरों जमींदारों और पहाड़ी राजाओं के नाम बादशाह को दिए जिन्होंने साहिबजादों और अमीर सिखों और पर जुल्म ढाए थे। 


उन्होंने धोखे और फरेब से आनंदपुर साहिब खाली करवा लिया और गुरु घर का कीमती सामान और साहित्यिक खजाना बरबाद किया। दास्तां सुनकर बादशाह ने भरोसा दिलाया कि वह तख्त की सुर्खियत रहते ही इन सब दोषियों को माकूल सजाएं देगा।

इसके पश्चात शाही फौज और सिख फौजी अपने अपने करतब दिखाने लगे। बादशाह सिख फौज के करतब देखकर उनकी बहादुरी का कायल हुआ। बाद में जंगी हाथियों की लड़ाई करवाने का भी विचार बना। गुरु साहिब ने शाही जंगी हाथी के मुकाबले में अपना जंगी झोटा पेश किया। सबकी हैरानी की सीमा न रही जब गुरु साहिब का झोटा ने शाही जंगी हाथी को थोड़ी देर में ही मात दे दी। यह सब देखकर बादशाह गुरु साहब की फौज का बड़ा प्रशंसक बन गया।
इस मुलाकात की याद में यहां पर गुरुद्वारा दमदमा साहिब का निर्माण करवाया गया है। यहां का वातावरण बड़ा ही मनोरम है। हर रविवार को यहां बड़ी संख्या में दिल्ली के श्रद्धालु पहुंचते हैं। यहां गुरु का लंगर भी लगता है। आप अगर रविवार को यहां पहुंचते हैं तो काफी सिख श्रद्धालु नजर आएंगे। 

कैसे पहुंचे - गुरुद्बवारा दमदमा साहिब पहुंचने के लिए सबसे नजदीक रेलवे स्टेशन हजरत निजामुद्दीन है। आप हुमायूं के मकबरे के बगल से टहलते हुए यहां पहुंच सकते हैं। मकबरा और सुंदर नर्सरी के बीच से रास्ता गुरुद्वारा की तरफ जाता है। मथुरा रोड पर सड़क के बीचो बीच नीला गुंबद स्थित है। इसी नीला गुंबद के सामने से गुरुद्वारा के लिए सड़क जा रही है।  


Saturday, May 30, 2015

हुमायूं का मकबरा से मिली थी ताजमहल बनाने की प्रेरणा

दिल्ली का हुमायूं का मकबरा ताजमहल के जैसा खूबसूरत है । कुछ साम्यताएं ताजमहल और हुमायूं के मकबरे में। दोनों चार बाग शैली में बने हैं। यानी मकबरे के चारों तरफ चार बागीचे हैं। पर हुमायूं का मकबरा पहले बना है ताजमहल बाद में। ताज संगमरमर का है तो हुमायूं का मकबरा लाल पत्थर यानी रेड स्टोन का। ये लाल पत्थर लाया गया राजस्थान के धौलपुर जिले में बाड़ी से। जब अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा दिल्ली आए तो उनके पास आगरा जाकर ताजमहल देखने का वक्त नहीं था। तब उन्हें हुमायूं का मकबरा दिखाया गया और उन्होंने खूब रूचि लेकर देखा भी।

दिल्ली में दर्जनों किले और मकबरों के साथ मुगलकालीन बाग हैं। इन बागों के कारण दिल्ली में हरियाली बची हुई है। अगर ये नहीं होते तो बिल्डर यहां भी कंक्रीट के जंगल खड़े कर चुके होते।
1572 में तैयार हुआ मकबरा - मकबरे का निर्माण हुमायूं की मृत्यु वर्ष 1556 के नौ साल बाद उसकी  शोकग्रस्त बेगा बेगम ( हमीदा बानू ) ने करवाया। इसका निर्माण 1565 से 1572 के मध्य हुआ। इस मकबरे का निर्माण 120 वर्ग मीटर के चबूतरे पर हुआ है। मकबरे का भवन दो मंजिला है। पहली मंजिल पर चढ़ने के लिए चारों तरफ से सीढ़ियां बनी हुई हैं। इसकी कुल ऊंचाई 47 मीटर है। मकबरे के प्रथम तल पर चारों तरफ विशाल बरामदा बना हुआ है। इन बरामदों में चौबारे बने हैं। यहां से बागों का नजारा सुंदर दिखाई देता है। यह देश की ऐसा उत्कृष्ट निर्माण है जिस पर फारसी शैली का प्रभाव दिखाई देता है। मकबरे के अंदर हुमायूं तो सो ही रहा है।

मुगल परिवार के सौ कब्र -  मुगल परिवार के सौ लोगों की कब्रें हुमायूं मकबरे के अंदर ही बनाई गई हैं। इसलिए हुमायूं के मकबरे को मुगलों का शयनागार भी कहा गया है। यहां हुमायूं के अलावा सात मुगल बादशाह की कब्रे हैं।  यहां पर हुमायूं की बेगम बेगा, हमीदा बानो, महान विद्वान दारा शिकोह आदि की भी कब्र है।


मकबरे में लाल पत्थर के साथ सफेद संगमरर का भी इस्तेमाल किया गया है। इसके छत पर छोटी छोटी छतरियां हैं हो चमकदार नीली टाइलों से टकी हैं। सफेद संगमरर के गुंबद पर छह मीटर तांबे की स्तूपिका बनी है। इस मकबरे के वास्तुकार मिराक मिर्जा गियासी थे।

जन्नत का दरिया -  हुमायूं के मकबरे के ठीक सामने चार बाग में विशाल तालाब भी बनाए गए हैं। इन तालाब की प्रेरणा कुरानशरीफ से मिली है। ऐसे बाग की कल्पना जन्नत के नजारे में की गई है। जन्नत जहां चार नदियां बहती हैं। दूध की, शहद की। उन नदियों को इस बाग में उतार दिया गया है। 

मकबरे के चारों तरफ बाग में कई किस्म के हरे भरे पेड़ हैं। इनमें नीबू के पेड़ भी खूब हैं। दिल्ली आने वाले विदेशी सैलानी हुमायूं का मकबरा जाना नहीं भूलते। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित इस इमारत में प्रवेश के लिए टिकट है। मुख्य प्रवेश द्वार के पास एक छोटा सा संग्रहालय भी है। कहा जाता है हुमायूं के पोते शाहजहां तो आगरे में ताजमहल बनवाने की प्रेरणा हुमायूं के मकबरे से ही मिली।


विश्व विरासत की सूची में -  1993 में हुमायूं के मकबरे को युनेस्को ने विश्व विरासत के स्थलों की सूची में शामिल किया। मकबरे को बनाने के लिए इस जगह का चयन इसलिए किया गया कि क्योंकि यह महान सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह के पास था। दूसरा बड़ा कारण था इसका यमुना नदी के तट पर होना। हालांकि अब यमुना की धारा थोड़ी दूर चली गई है।



ईशा खां नियाजी का मकबरा - हुमायूं के मकबरे के परिसर में दक्षिणी कोने पर ईशा खां नियाजी की भी कब्र है। ईशा खां नियाजी अफगान शासक शेरशाह सूरी के दरबारी थे। उनका मकबरा सासाराम में स्थित शेरशाह सूरी के मकबरे की ही तर्ज पर अष्टकोणीय वास्तु शैली में बनाया गया है। इस मकबरे का निर्माण 1547 में हुआ । यानी ये हुमायूं के मकबरे से ज्यादा पुराना है। ईशा खान ने मुगलों के साथ लंबी लड़ाई लड़ी थी। उनके अष्टकोणीय मकबरे के बाहर अष्टकोणीय उद्यान भी बना है।

अरब सराय और विशाल दरवाजा - हुमायूं के मकबरे के परिसर में अरब सराय बना है। इसे बेगा बेगम ने 1560-61 में बनवाया था। इसमें 300 अरब से आए शिल्पियों के रहने का इंतजाम था। इन शिल्पियों ने ही हुमायूं के मकबरे का निर्माण कराया। हालांकि अरब सराय के कमरे अब नष्ट प्राय हो चुके हैं। पर अरब सराय का दरवाजा बेहतरीन हाल में देखा जा सकता है। इस दरवाजे के का निर्माण हुमायूं के पोते जहांगीर के शासन काल में हुआ था। यह मकबरे का दक्षिणी दरवाजा है जो बाहर से काफी रंगबिरंगा है। यह दरवाजा निजामुद्दीन ईस्ट की कालोनी में खुलता है। इस द्वारा से सैलानियों को प्रवेश की इजाजत नहीं दी जाती। कभी इस द्वार के बाहर बाजार हुआ करता था, जो अब नहीं है।

कैसे पहुंचे - दिल्ली में हुमायूं का मकबरा निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन के पास स्थित है। प्रगति मैदान से आश्रम वाली सड़क मथुरा रोड पर निजामुद्दीन थाना के बस स्टॉप पर उतर कर आप यहां पहुंच सकते हैं। मकबरे के सामने सड़क के बीचों बीच नीला गुंबद स्थित है। मकबरे सामने सड़क के उस पार निजामुद्दीन औलिया की दरगाह है, जबकि मकबरे के पीछे गुरुद्वारा दमदमा साहिब है।

प्रवेश शुल्क - मकबरा सुबह सूर्योदय से सूर्यास्त तक सैलानियों के लिए खुला रहता है। इसमेंप्रवेश के लिए 40 रुपये का टिकट लेना पड़ता है। परिसर में पेयजल और शौचालय का इंतजाम है। पर खाने पीने की चीजें अंदर नहीं ले जा सकते।  


- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com

( WORLD HERITAGE SITE, HUMAUN TOMB, DELHI  )


Friday, May 29, 2015

पानीपत का हुक्का और हारमोनियम

पानीपत शहर हुक्का और हारमोनिय के लिए जाना जाता है। इन दोनों की चीजों का यहां बड़े स्तर पर निर्माण होता है। हुक्का हरियाणा की संस्कृति का हिस्सा है। आज भी गांव चौपाल पर लोग हुक्का गुड़गुड़ाते नजर आएंगे। पानीपत के असंध रोड पर स्थित किसान भवन में गांव के किसानों को बैठकर दोपहर में हुक्का गुड़गुडाते देखा जा सकता है। हरियाणा की राजनीति में भी हुक्का का स्थान काफी महत्व का है। हर पार्टी के वरिष्ठ नेता गांव के दौरे में गांव की चौपाल पर हुक्का पीने की रस्म जरूर करते हैं। होगा नशा भी पर ये मिलनसार रस्म का हिस्सा है।

 बात पानीपत की हो रही है तो बता दें कि पानीपत में बड़ी संख्या में कारीगर हुक्का बनाते है। पानीपत के मेन बाजार की गलियों में कई हुक्का की दुकाने हैं। यहां पर कारीगर लकड़ी को तराश कर हुक्का तैयार करते हुए देखे जा सकते हैं। पानीपत आने वाले लोग हुक्का खरीदकर अपने गांव ले जाते हैं। 

हरियाणा के हर परंपरागत घर में हुक्का जरूर देखने को मिल जाएगा। लोग किसी को सम्मान में हुक्का उपहार स्वरुप पेश करते हैं। पानीपत दैनिक भास्कर में काम करते हुए जब हमारे स्थानीय संपादक मुकेश भूषण जी का तबादला हुआ तो स्टाफ की ओर से विदाई समारोह में उन्हें हुक्का भेंट किया गया। बात हुक्के की कीमत की करें तो एक हुक्का 200 से 300 रुपये से आरंभ होता है। आगे उसके साइज और डिजाइन को लेकर कीमतों में इजाफा होता जाता है।

अब बात हारमोनियम की। कहा जाता है  जब अंग्रेजों ने भारत के शासन की बागडोर अपने हाथ में ली थी तो वे अपने साथ संगीत के वाद्य-यंत्र पियानो, ऑर्गनहारमोनियम तथा वायलिन आदि लाए ।  हारमोनियम, पेटी या रीड ऑर्गन भी कहलाता है।  देश भर में बजाए जाने वाले इस वाद्य यंत्र का निर्माण खासतौर पर पानीपत में होता है ये मुझे मालूम न था। सुबह सुबह तहसील कैंप की गलियों में टहलते समय मुझे कुछ घरों से मधुर सी आवाज आती। लगता कोई संगीत का रियाज कर रहा है पर ऐसा नहीं था। वास्तव में हारमोनियम बनाने वाले कलाकार लकड़ी को तराश कर उनसे सुर निकाला करते थे। बहुत ही मेहनत भरा काम है हारमोनियम का निर्माण करना। इसके हर बटन से अलग अलग सुर निकालने के लिए काफी श्रम करना पड़ता है। बाद में इन शिल्पियों द्वारा बनाए गए हारमोनियम बिकने के लिए शोरुम में चले जाते हैं। पानीपत में खालसा म्यूजिक स्टोर, बिशन स्वरूप कालोनी ( निकट बस स्टैंड) से हारमोनियम खरीद सकते हैं।


पानीपत शहर में एक राष्ट्रीयस्तर के हारमोनियम वादक भी हुए दिनकर शर्मा। वे यहां पर एक म्यूजिक स्कूल में संगीत के शिक्षक के तौर पर लंबे समय तक सेवाएं देते रहे। उन्हें मैंने पहली बार वाराणसी में संकट मोचन संगीत सम्मेलन में सोलो हारमोनियम वादन करते हुए सुना था।

दिव्य चक्षु दिनकर शर्मा की पत्नी उन्हें सहारा देकर मंच तक लाती थीं। बाद में उन्हें मैने जालंधर के हरि वल्लभ संगीत सम्मेलन में हारमोनियम पर महमूद धौलपुरी के साथ मुकाबला करते भी देखा। 
Email -  vidyutp@gmail.com 
 ( PANIPAT, HUKKA, HARMONIUM, DINKAR SHARMA) 

Thursday, May 28, 2015

इब्राहिम लोदी की मजार – कोई नहीं आता फूल चढ़ाने


पानीपत शहर के जीटी रोड पर स्थित स्काईलार्क रिजार्ट के बगल से अंदर जाते रास्ते पर दो फर्लांग आगे इब्राहिम लोदी की मजार है। वही इब्राहिम लोदी जो पहले पानीपत युद्ध में बाबर से हार गया था और लोदी वंश के अंत के साथ देश में मुगलिया सल्तनत की नींव पड़ी। इसी मजार से 200 मीटर की दूरी पर मैं दो साल तक पानीपत में रहा। आते जाते कई बार इस मजार पर नजर पड़ जाती थी, जिस पर कभी कोई फूल चढ़ाने नहीं आता है। 

 पानीपत की पहली लड़ाई 1526 में बाबर और इब्राहिम लोधी के मध्य हुई। इस युद्ध में बाबर ने लोधी को पराजित किया था। इसी युद्ध से भारत में मुगल साम्राज्य की नींव पड़ी।  इब्राहिम लोधी दिल्ली सल्तनत का अंतिम अफगान सुल्तान था। उसने भारत पर 1517-1526 तक राज किया और फिर मुगलों द्वारा पराजित हुआजिन्होंने एक नया वंश स्थापित कियाजिस वंश ने देश पर तीन शताब्दियों तक राज्य किया। इब्राहिम लोदी को अपने पिता सिकंदर लोदी के मरने के बाद गद्दी मिली थी। हालांकि उसकी शासकीय योग्यताएं अपने पिता जैसी नहीं थीं। उसे कई विद्रोहों का सामना करना पड़ा।

इब्राहिम लोदी की मौत पानीपत के प्रथम युद्ध के दौरान ही हो गई। कहा जाता है कि बाबर के पास उच्च कोटि के सैनिक थे जबकि लोधी सैनिकों से अलग हो गया था। इब्राहिम लोदी की सबसे बड़ी कमजोरी उसका हठी स्वभाव था। पानीपत का पहला युद्ध भारत उन कुछ युद्धों में से एक था जिनमें तोपहथियार और बारूद का इस्तेमाल किया गया था।

हालांकि लोधी साम्राज्य की सेना काफी बड़ी थी लेकिन फिर भी बाबर ने इब्राहिम लोधी को इस लड़ाई में धूल चटा दी। एक अनुमान के मुताबिक बाबर की सेना में लगभग 15 हजार सैनिक और 25 तोपें थी जबकि इब्राहिम लोधी की सेना में लगभग एक लाख सैनिक थे जिनमें 30,000 से 40,000 तक सैनिक और शिविर अनुयायी थे। इसमें 1000 युद्ध हाथी भी शामिल थे। पर बाबर एक चतुर रणनीतिकार था। उसने अपनी तोपों को गाडि़यों के पीछे रखा जिन्हें जानवरों की चर्बी से बनी मजबूत रस्सियों से बांधा गया था। उन तोपों को पर्दों से बांधा और ढका गया था। इससे यह सुनिश्चित हो गया कि उसकी सेना बिना हमला हुए बंदूकें चला सकती है।

 युद्ध के दौरान 21 अप्रैल 1526 को पानीपत के मैदान में इब्राहीम लोदी और बाबर के मध्य हुए भयानक संघर्ष में लोदी की बुरी तरह हार हुई और उसकी हत्या कर दी गई। इब्राहिम लोधी का मृत शरीर पानीपत में ही दफना दिया गया था। बाद में वहां ब्रिटिश सरकार ने उर्दू में एक संक्षिप्त शिलालेख के साथ एक साधारण मंच का निर्माण करवाया। पर कई दशक तक ये मजार बदहाल रहा। एक हारे हुए शासक की मजार पर कभी कोई फूल चढाने भी नहीं आता।आसपास में गंदगी का आलम था।
पर हाल के साल में इस मजार के आसपास सौंदर्यीकरण किया गया है। हालांकि 1517 में निधन होने के बाद उसके पिता सिकंदर लोदी की मजार दिल्ली में बनाई गई। ये अष्टकोणीय मजार दिल्ली के प्रसिद्ध लोदी गार्डन में स्थित है।
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( IBRAHIM LODHI, PANIPAT, FIRST WAR OF PANIPAT  ) 



  


Wednesday, May 27, 2015

आस्था का केंद्र - पानीपत का देवी मंदिर

पानीपत का देवी मंदिर मराठों का बनवाया हुआ है। हालांकि मराठे पानीपत की तीसरी लड़ाई में पराजित हो गए थे। पर उनका बनवाया हुआ मंदिर श्रद्धालुओं की असीम आस्था का केंद्र है। 1761 के युद्ध में हार के बाद उत्तर भारत की राजनीति में मराठों का प्रभाव कम हुआ लेकिन उन्होंने उत्तर भारत में संस्कृति और लोककला पर गहरा प्रभाव छोड़ा। इस छाप को ऐताहसिक नगर पानीपत में देखा जा सकता है। इस शहर में ऐसे अवशेष मौजूद हैं, जो मराठों और पानीपत के सांस्कृतिक रिश्तों का संकेत देते हैं। 

मराठा सेनापति ने बनवाया देवी मंदिर - पानीपत शहर में मराठों की स्मृति के रूप मे देवी मंदिर भी मौजूद है। इस मंदिर का निर्माण मराठा सेनापति गणपतिराव पेशवा ने करवाया था। देवी मंदिर पानीपत में मराठों के योगदान का एक प्रमाण है। इस मंदिर में मौजूद हरहरेश्वर की प्रतिमा उपसना में मराठों के योगदान का महत्वपूर्ण प्रतीक है। देवी मंदिर में स्थित हरहरेश्वर की प्रतिमा मध्यकालीन भारत में विकसित वास्तु से प्रभावित है।


 भूरे पत्थर से बनी यह प्रतिमा विष्णु और शिव का संयुक्त रूप है। इस प्रतिमा के दाएं भाग में शिव का रूप है। इसके हाथ में त्रिशूल और अक्षमाला है। प्रतिमा का वाम भाग विष्णु का रूप है। इसके हाथ में शंख और चक्र है। प्रतिमा के दाएं नंदी और बाएं गरुड़ बैठे हैं। पंचरथ पर स्थित प्रतिमा के इर्दगिर्द मध्यकालीन प्रतिमाओं की भांति सेविकाएं बनी हुई हैं। इस मंदिर के पास ही गंगाजी का मंदिर भी है। यहां संत महात्मा शिवगिरी की समाधि है। इस समाधि का निर्माण भी गणपतिराव पेशवा ने ही करवाया था। महात्मा शिवगिरी के अध्यात्मिक प्रभाव का वर्णन तजकरा-ए-गौस अली शाह में भी मिलता है।

अग्रवाल समाज का दावा - हालांकि पानीपत का अग्रवाल वैश्य पंचायत यह दावा करता है देवी मंदिर पानीपत में मराठों के आगमन से पहले का है और 16वीं शताब्दी से ही अग्रवाल पंचायत इसका प्रबंधन कर रही है। अग्रवाल समाज का दावा है कि इस देवी मंदिर का निर्माण लगभग 600 वर्ष पूर्व लाला मथुरादास के पूर्वजों द्वारा किया गया था। यह भी दावा है कि यहां पर बना तालाब पहले मथुरादास वाला तालाब के नाम से जाना जाता था और इसमें यमुना नदी का जल आता था।

हालांकि अग्रवाल समाज ने पिछले कुछ सालों में मंदिर के सौंदर्यीकरण के लिए काफी काम किया है। मंदिर का प्रवेश द्वार भव्य बनाया गया है। मंदिर के अंदर भवन को मजबूती प्रदान करने के साथ ही परिसर में हरियाली और साफ सफाई के इंतजामात किए गए हैं। मंदिर परिसर में साधुओं का निवास रहता है। 

सालों भर सूखा रहता है तालाब - आज देवी मंदिर के परिसर में स्थित विशाल तालाब सालों भर सूखा रहता है। हालांकि ये तालाब अत्यंत सुंदर है। तालाब के चारों तरफ टहलने के लिए पथ बना हुआ है। चारों तरफ से तालाब में उतरने के लिए सीढ़िया भी बनी हैं। पर तालाब में पानी नहीं रहता। दशहरे के समय तालाब के अंदर विशाल मेला लगता है। बाकी के साल तालाब के सूखे क्षेत्र में बच्चे क्रिकेट खेलते हुए नजर आते हैं। वास्तव में इस तालाब को जीवित करने की आवश्यकता है। 

अगर ये तालाब जिंदा हो गया तो इसका सौंदर्य और बढ़ जाएगा। इस हालात में तालाब के जल में बोटिंग आदि के इंतजाम भी किए जा सकते हैं। कई बार प्रतीत होता है मानो ये तालाब अभिशिप्त है। कहा जाता है कि पानीपत की तीसरी लड़ाई के समय इस तालाब में पानी के आने का इंतजाम था। ये पानी यमुना नदी से नहर बनाकर लाया गया था। इस तालाब में मराठा रानियां स्नान किया करती थीं। तालाब के ही पानी से मराठा सेना का भोजन आदि बनाया जाता था।


इस तरह का एक सूखा हुआ तालाब जालंधर शहर के बीच भी है। अपेक्षाकृत छोटा ये तालाब भी सालों भर सूखा ही रहता है। इसी के नाम पर जालंधर में सूखा तालाब मुहल्ला है। पर हमें जरूरत है देश के किसी भी शहर में ऐसे तालाब को हम जीवित करें। पानीपत के लोगों को इस तालाब को जिंदा करने की कोशिश करनी चाहिए। 
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Tuesday, May 26, 2015

बू अली शाह कलंदर - दमादम मस्त कलंदर

पानीपत में स्थित कलंदर शाह की दरगाह हिंदुओं और मुसलमानों के लिए समान रूप से श्रद्धा का केंद्र है। सूफी संत बू अली शाह कलंदर की यह दरगाह 700 साल पुरानी है। दरगाह पर पर बैठ कर कव्वाली सुनते हुए मन को बड़ी शांति मिलती है। ये दरगाह अजमेर शरीफ, हजरत निजामुद्दीन की तरह ही सम्मानित स्थान रखता है। बू-अली शाह कलंदर की स्मृति में बनवाया गया था ये मकबरा।

आखिर कौन थे कलंदर शाह। कलंदर शाह का वास्तविक नाम शेख शर्राफुद्दीन था। उनके पिता शेख फख़रुद्दीन भी अपने समय के एक महान संत और विद्वान थे। कलंदर शाह 1190 ई. में पैदा हुए और 122 साल की उम्र में 1312 ई. में उसका निधन हो गया था। कलंदर शाह के जीवन के शुरुआत के 20 साल दिल्ली में कुतुबमीनार के पास गुजरे। उसके बाद वे पानीपत आ गए। 



कुछ विद्वान कहते हैं कि वे इराक से आए थे और पानीपत में बस गए। उनके नाम के साथ कलंदर जोड़ दिया गया जिसका अर्थ है- वह व्यक्ति जो दिव्य आनंद में इतनी गहराई तक डूब चुका है कि अपनी सांसारिक संपत्ति और यहां तक कि अपनी मौजूदगी के बारे में भी परवाह नहीं करता। उन्होंने पारसी काव्य संग्रह भी लिखा था जिसका नाम दीवान ए हजरत शरफुद्दीन बु अली शाह कलंदर है। वे सूफी संत ख्वाजा कुतुबद्दीन बख्तियार काकी के शिष्य थे।

बू-अली शाह कलंदर महान सूफी संत थे। कहा जाता है सूफी संत लोग भीख नहीं मांगते हैं, लेकिन अपने प्रशंसको और भक्तों द्वारा स्वेच्छा से जो कुछ भी दिया जाता है,  उसी पर अपना जीवन निर्वाह करते रहते हैं। 700 साल पुराना मकबरा अला-उद्-दीन खिलजी के बेटों, खिजि़र खान और शादी खान ने बनवाया था।

कलंदर शाह का यह मकबरा पानीपत में कलंदर चौक पर स्थित है जो उसी के नाम पर है। मकबरे के बगल में मसजिद भी है। इस मकबरे के मुख्य द्वार के दाहिनी तरफ प्रसिद्ध उर्दू शायर ख्वाजा अल्ताफ हुसैन हाली पानीपती की कब्र भी है। सभी समुदायों के लोग हर गुरुवार को प्रार्थना करने और आशीर्वाद लेने के लिए यहां आते हैं।


मन्नत मांगने वाले लगाते हैं ताला – कलंदर शाह की दरगाह पर बड़ी संख्या में लोग मन्नत मांगने आते हैं। मन्नत मांगने वाले लोग दरगाह के बगल में एक ताला लगा जाते हैं। कई बार इस ताले के साथ लोग खत लिख कर भी लगाते हैं। दरगाह के बगल में हजारों ताले लगे देखे जा सकते हैं। वैसे कलंदर शाह की दरगाह पर हर रोज श्रद्धालु उमड़ते हैं। पर हर गुरुवार को दरगाह पर अकीदतमंदों की भारी भीड़ उमड़ती है।


कैसे पहुंचे – कलंदर शाह की दरगाह शहर के तंग गलियों के बीच गांधी उद्यान के पास स्थित है। पानीपत बस स्टैंड से रिक्शा से कलंदर चौक के पास तक पहुंच सकते हैं। वहीं आप जीटी रोड से इंसार बाजार, मेन बाजार, हलवाई हट्टा होते हुए पैदल पैदल भी दरगाह तक पहुंच सकते हैं।  
vidyutp@gmail.com - 
( SHAH QUALANDAR, KALANDAR SHAH, SUFI SAINT, PANIPAT ) 

Monday, May 25, 2015

मशहूर शायर हाली का शहर पानीपत

पानीपत के कलंदर शाह की दरगाह एक अजीम शायर की मजार है। दरगाह के मुख्य द्वार से घुसते ही दाहिनी तरफ उनकी मजार नजर आती है। उनकी दरगाह के उपर उनका सबसे लोकप्रिय शेर लिखा है....

है यही इबादत और यही दीनों-इमां
कि काम आए दुनिया में इंसा के इंसा

हाली की एक और गजल का अंश -

हक वफा का हम जो जताने लगे, आप कुछ कह के मुस्कुराने लगे।
हम को जीना पड़ेगा फुरक़त में, वो अगर हिम्मत आज़माने लगे
डर है मेरी जुबान न खुल जाये, अब वो बातें बहुत बनाने लगे।

क्या आपको याद है इस शायर का नाम… इस शायर का नाम है- ख्वाजा अल्ताफ हसन हाली....( 1837-1914) हाली की शायरी से वे सभी लोग वाकिफ होंगे जो उर्दू शायरी में रूचि रखते हैं। वर्ष1837 में हाली का जन्म पानीपत में हुआ। उन्होंने 1856 में हिसार कलेक्टर कार्यालय में नौकरी की। छह साल तक तक कवि नवाब मुस्तफा खान शेफ्ता के साथ रहे। वे साल 1871 में लाहौर चले गए। पानीपत में 30 सितंबर, 1914 में उनका निधन हो गया। 

पर क्या आपको पता है कि हाली मशहूर फिल्मकार ख्वाजा अहमद अब्बास के दादा थे.... शायर हाली मिर्जा गालिब के शिष्य थे और गालिब की परंपरा के आखिरी शायर। हाली ने गालिब की आत्मकथा भी लिखी है। 

हाली का ज्यादर वक्त कलंदर शाह की दरगाह के आसपास बीतता था और उनके इंतकाल के बाद वहीं उनकी मजार भी बनी। जाहिर है कि हाली के वंशज होने के कारण पानीपत मशहूर शायर और फिल्मकार ख्वाजा अहमद अब्बास का शहर भी है। 

वही ख्वाजा अहमद अब्बास जिन्होंने सात हिंदुस्तानी में अमिताभ बच्चन को पहली बार ब्रेक दिया था। हालांकि अब पानीपत शहर को हाली और ख्वाजा अहमद अब्बास की कम ही याद आती है। एक जून 1987 को अंतिम सांस लेने से पहले ख्वाजा अहमद अब्बास पानीपत आया करते थे। 

ख्वाजा अहमद अब्बास एक पत्रकार, कहानी लेखक, निर्माता निर्देशक सब कुछ थे। राजकपूर की फिल्म बाबी की स्टोरी स्क्रीन प्ले उन्होंने लिखी। उनकी लिखी कहानी हीना भी थी। भारत पाक सीमा की कहानी पर बनी यह फिल्म आरके की यह फिल्म उनकी मृत्यु के बाद ( हीना, 1991) रीलिज हुई।

शायर हाली की हवेली कलंदरशाह के दरगाह के पास थी। इसलिए उनका ज्यादा वक्त कलंदरशाह की दरगाह पर गुजरता था। कलंदर दरगाह के पास चढ़ाऊ मोहल्ला में 200 वर्ग गज में बनी हवेली, मिर्जा गालिब के अंतिम शागिर्द अल्ताफ हुसैन हाली की एक मात्र निशानी थी। 

बाद में इस भवन में स्कूल बना फिर उसे बंद कर दिया गया। अतं में सितंबर, 2014 को यह इमारत जमींजोद कर दी गई। अब 119 साल पुरानी हाली हवेली को जिला प्रशासन फिर से बनाने वाला है। हवेली के बीच हाल में बने दो चौबारे भी बनाए जाएंगे, जहां मुशायरे अन्य कार्यक्रम के समय में महिलाएं बैठा करती थीं।

वर्ष 1937 में पानीपत शहर में हाली की जन्म शताब्दी मनाई गई थी, जिसमें शायर इकबाल भी शामिल हुए थे। उस वक्त एक हाली की पेंटिंग बनवाई गई थी, जो हाली पानीपती ट्रस्ट के महासचिव एडवोकेट राममोहन राय सैनी के पास मौजूद है। हाली पानीपती ट्रस्ट इस मशहूर शायर की स्मृतियों को ताजा बनाए रखने की कोशिश में लगा हुआ है।


हिंदी के साहित्यकार कर्मेदु शिशिर लिखते हैं - मौलाना अल्ताफ हुसैन 'हाली' उर्दू नवजागरण के महानायकों में हैं। उनका नाम उर्दू साहित्य में आधुनिक युग के महान् साहित्य निर्माताओं में लिया जाता है। नवजागरण का स्पष्ट संदेश देने वाली उनकी कविताओं में उर्दू काव्य परंपरा की वह नजाकत, शब्दाडंबर और आलंकारिता नहीं थी। उनकी रचनाओं में एक उपदेशक और शिक्षक हमेशा मौजूद रहा है। लेकिन यह बात भी सच है कि उनकी कविताओं में आने वाले समय की पदचाप सुनाई पड़ती है।

हाली की कुछ और पंक्तियां-

इश्क सुनते थे जिसे हम वो यही है शायद,
खुद-बखुद दिल में इक शख्श समाया जाता।

कहते हैं जिको जन्नत वो इक झलक है तेरी
सब वाइजों की बाकी रंगीं-बयानियां हैं। 

-विद्युत प्रकाश मौर्य -  vidyutp@gmail.com

( ALTAF HASAN HALI , PANIPAT, POET  ) 

Sunday, May 24, 2015

हर ‘आम’ में है कुछ खास

मुंबई के बाजार में अलफांसो आम। 
नाम आम है, पर आम फलों का राजा है। आम सिर्फ स्वाद में ही बेहतर नहीं है बल्कि यह अनेक गुणों का खजाना है।  महाराष्ट्र में रत्नागिरी जिले का हापुस यानी अलफांसो को देश का सबसे बेहतरीन आम माना जाता है। हालांकि देश के दूसरे राज्यों को लोग इससे सहमत नहीं हो सकते। गुजराती केशर को सबसे सुस्वादु आम मानते हैं। बनारसी लंगड़ा के आगे किसी को नहीं रखते। लखनऊ के लोग मलिहाबाद की दशहरी को देश का राजा मानते हैं। बिहार पहुंचे तो सफेद मालदह का जवाब नहीं।

सबसे पहले बात हापुस की करें तो, हापूस (अंग्रेजी में ALPHANSO  अलफांसो) , मराठी में हापुस, गुजराती में हाफुस  और कन्नड़ में आपूस कहा जाता है। यह आम की एक किस्म है जिसे मिठास, सुगंध और स्वाद के मामले में अक्सर आमों की सबसे अच्छी किस्मों में से एक माना जाता है।

यूरोपीय भाषाओं में इसका नाम अलफांसो, अफोंसो दि अल्बूकर्क (पुर्तगाली में AFONSO DE ALBUQUERQUE) के सम्मान में रखा गया है। वैसे हापुस कर्नाटक में भी होता है, पर महाराष्ट्र के कोंकड़ क्षेत्र के हापुस का जवाब नहीं।
हर साल मार्च के महीने में रत्नागिरी के राजा हापुस आम की आवक शुरू हो जाती है। मुंबई और आसपास के बाजारों में शुरुआत में इसके दाम 500-600 रुपए दर्जन तक रहते हैं। यानी एक आम 50 रुपये का। साल 2014 में महंगाई के कारण हापुस आम, आमजन के पहुंच से बाहर रहा। पर हापुस के स्वाद के दीवाने बड़े बड़े लोग हैं। बालीवुड से लेकर विदेशी बाजारों में इसकी धमक है। लम्बे समय तक विदेश में रहने वाली बॉलीवुड में वापसी करने वाली अभिनेत्री माधुरी दीक्षित को आम बेहद पसंद हैं और उन्होंने विदेश में रहने के दौरान स्थानीय आम हापुस की काफी कमी महसूस की। एक बार माधुरी ने अपने ट्विटर अकाउंट पर लिखा, मुम्बई में आम का मौसम चल रहा है। भूल गई थी कि हापूस आम कितना अच्छा है। अलफासों बड़े बड़े शापिंग मॉल और फलों के विशिष्ट बाजारों में अपनी जगह बनाकर अपनी किस्मत पर इठलाता है।

यूपी का लंगड़ा, दशहरी और चौसा 
बनारस का लंगड़ा आम।
नाम में लंगड़ा है पर मिठास में अव्वल। लंगड़ा आम मूल रूप से वाराणसी के नजदीकी इलाके में ही होता है। आम की इस किस्म, जैसा कि इससे संबद्ध कहानी कहती है, का नाम एक लंगड़े साधु के नाम पर रखा गया, जिसने पहली बार इस आम की खेती की। अब बनारस के आसपास लंगडा आम के बाग बगीचे कम हो गए हैं इसलिए उत्पादन भी कम हो रहा है। अबकी वर्ष तो लंगड़ा ही नहीं बल्कि देशी आम की पैदावार भी कम हुई है। बिहार के भी कुछ जिलों में लंगड़ा आम के बगीचे हैं। दिल्ली के आसपास सहारनपुर का चौसा आम पहुंचता है। यूपी के सहारनपुर के आसपास चौसा आम के बड़े बड़े बाग हैं।

बिहार का सफेद मालदह आम। 
बिहार का सफेद मालदह - 
बिहार के भागलपुर के सफेद मालदह आम की जबरदस्त मांग रहती है। मालदह आम कोलकाता सहित देश के अन्य स्थानों के बाजारों में बिकने जाता है। वहीं पटना के पास दीघा का दूधिया मालदह आम अपने स्वाद के लिए जाना जाता है। अमेरिकाइजिप्टअरबइंडोनेशियाजापान सहित करीब सभी पड़ोसी देशों में सफेद मालदह आम की मांग रहती थी। पतला छिलकाकाफी पतली गुठली और बिना रेशे वाले गुदे के कारण यह हर किसी के दिलों पर राज करता है। पर अब दीघा क्षेत्र में आम के बगीचे कम हो गए हैं।
 हर आम की अपनी मिठास है। पर उत्तर बिहार में एक आम होता है सीपिया उसका स्वाद बाकी सबसे अलग होता है।  पकने पर पीले रंग का। छिलका बिलकुल पतला। गुठला कम गुदा ज्यादा । मिठास में अनूठा। ये है सीपिया की खासियत। इस लोग चूड़ा या मकई की रोटी के साथ भी खाते हैं। बिहार के वैशाली जिले में एक कहावत है- मकई के रोटी सीपिया आमबुढिया मर गई जय सीताराम।
 भारतीय आम की विदेशों में खूब मांग है। दशहरी, चौसा और लंगडा के बल पर उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा आम उत्पादक राज्य है।

अमरोहा का चौसा आम

यूपी के सहारनपुर अमरोहा के आसपास चौसा आम के बाग हैं। कुछ लोग चौसा को दशहरी से अव्वल आम मानते हैं। यह बाजार में दशहरी से महंगा भी बिकता है। आकार में दशहरी से बड़ा और हरे रंग के छिलके वाला आम है चौसा। यह देर से आने वाला आम है, इसलिए जुलाई महीने तक मिलता रहता है। चौसा आम का निर्यात दुबई और सउदी अरब देशों को होता है। यूपी के सहारनपुर शहर के आसपास भी चौसा आम के बडे बडे बाग हैं। 
 आम पर शहर अमरोहा - यूपी के अमरोहा शहर का नाम ही आम के नाम पर पड़ा है। संस्कृत में आम्र वनम का जिक्र आता है। यहां आज भी आम के बड़े बड़े बाग हैं। देश-दुनिया में अमरोहा आम के नाम से ही पहचाना जाता है। 

मलिहाबाद के दशहरी की अलग पहचान 
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के पास एक छोटा सा कस्बा है मलिहाबाद। यह अपनी मलिहाबादी दशहरी आम के लिए प्रसिद्ध है। हालांकि दशहरी लंगड़ा, चौसा या मालदह की तुलना में आकार में छोटा होता है। यह अपेक्षाकृत सस्ता भी बिकता है। पर दशहरी के बड़ी संख्या में दीवाने हैं। कुछ लोगों को दशहरी के सामने सारे आम फीके लगते हैं। आमतौर पर दशहरी मई महीेने में बाजार में दस्तक दे देता है। 


उत्तर प्रदेश के मलीहाबाद का दशहरी। 
साल 2010 में मलिहाबाद के दशहरी आम को पेटेंट का दर्जा मिला। मतलब इसका ज्योग्राफिकल इंडेक्स बन चुका है। ठीक उसी तरह जैसे महाबलेश्वर की स्ट्राबेरी का। उसके बाद इसकी मांग भी विदेशों में बढ़ गई। 


 बागपत का 'रटौलआम
 रटौल के आम की बदौलत दिल्ली की सीमा से लगे यूपी के बागपत जिले की पहचान देश के साथ विदेशों में भी है। रटौल से हर साल लाखों टन आम का निर्यात देश विदेशों में किया जाता है। खेकड़ा तहसील का रटौल गांव आम के लिए विश्व विख्यात है। यहां कभी मुंबईदशहरीजुलाई वालाचौसालंगड़ातोता परीकच्चा मीठारामकेलाआदि आम की लगभग साढे पांच सौ प्रजातियां होती थीं। जो अब सिमट कर आधे से भी कम रह गई हैं। यहां का रटौल प्रजाति का आम तो अपने लजीज स्वाद व सुगंध के लिए विश्व विख्यात है।

पाकिस्तान का सिंदड़ी
पाकिस्तान के सिंध प्रांत में पैदा होने वाले सिंदड़ी ( SINDHARI ) आम भी लोकप्रिय है। सिंध के कस्बे सेवण शरीफ में होने वाले सिंदड़ी आम का स्वाद काफी कुछ दशहरी जैसा होता है। बस इसका रंग थोड़ी सी ललाई लिए हुए होता है। दमादम मस्त कलंदर वाले गीत में सिंदड़ी दा सेवण दा का नाम आता है। हालांकि वह नाम सूफी संतों के लिए है। पर वहां का आम भी हमेशा से लोकप्रिय है। पाकिस्तान का यह आम भी अंतराष्ट्रीय बाजार में अपनी जगह बनाता है। खास तौर पर खाड़ी देशों में सिंदड़ी आम की मांग रहती है।

 कहां कौन सा आम
पाकिस्तान का सिंदड़ी आम। 

अलफांसो या हापुस महाराष्ट्र
केशर गुजरात
चौसा यूपी
दशहरी - यूपी
लंगडा - यूपी
सफेद मालदह बिहार, बंगाल


नया शोध - आम है सुपर फ्रूट

अभी तक हम लोकप्रिय फल आम को फलों का राजा कह देते थे पर एक नए शोध के मुताबिक यह कोई आम फल नहीं बल्कि सुपर फ्रुट है। एक नए शोध में आम के खास फायदों का पता चला है।
आम में कैंसर रोधी गुण होते हैं। यह मोटापा घटाने में सहायक है। जो लोग ऐसा भोजन करते हैं जिससे मोटापा बढ़ता है उन्हें आम खाने से वजन कम करने में लाभ मिलता है। शोध के मुताबिक आम फैट सेल्स को कम करता है। साथ ही स्तन कैंसर के ट्यूमर को भी कम करने में सहायक पाया गया है। सैन डियागो में इस साल एक्सपेरिमेंटल बायोलोजी कान्फ्रेंस में पढ़े गए शोध पत्र के मुताबिक आम आंत संबंधी रोग में भी लाभकारी है। हालांकि शोधकर्ताओं ने कहा है कि अभी मनुष्यों को लेकर इस मामले में और शोध किए जाने की जरूरत है। 
अगर हम 400 ग्राम आम प्रतिदिन खाते हैं अगले 10 दिनों में इसके काफी सकारात्मक परिणाम देखने को मिलते हैं। इससे पहले आम पर हुए एक शोध में पाया गया था कि भरपूर मिठास से भरा ये फल रक्त में शर्करा के स्तर को भी कम करता है। यानी आप डायबिटिक भी हैं तो बेतकल्लुफ होकर आम खाइए।

ये हैं आम खाने के फायदे

कई तरह के कैंसर का खतरा कम होता है
मोटापा घटाने में सहायक है
उत्तेजना को कम करता है
सेहत को बेहतर करने वाले तत्वों से भरपूर है
शरीर में उपापचय गतिविधियों को बढ़ाता है
शरीर में ब्लड शुगर की मात्रा को कम करता है। 

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com -