Thursday, April 30, 2015

माथेरन में हर सैलानी को देना पड़ता है प्रवेश शुल्क

शाम गहराने के साथ हमारी ट्रेन माथेरन रेलवे स्टेशन पर पहुंच चुकी थी। माथेरन देश में एक ऐसा हिल स्टेशन है जहां हर आने वाले सैलानी को प्रवेश शुल्क देना पड़ता है। आजकल हर बाहरी वयस्क के लिए 50 रुपये और बच्चों के लिए 25 रुपये लिए जाते हैं। ये कर माथेरन गिरिस्थान नगर परिषद वसूलती है। इसके वसूली काउंटर रेलवे स्टेशन और अमन लाज के पास टैक्सी स्टैंड में बने हुए हैं। टैक्स देने के बाद आप अगले कुछ दिन यहां निवास करने के अधिकारी बन जाते हैं। इस कर की राशि को शहर के ररखाव में खर्च किया जाता है। 
हमलोग जैसे माथेरन रेलवे स्टेशन पर उतरे टैक्स वसूलने वालों से हमारा सामना हुआ। पहले तो थोड़ा अजीब लगा या यूं कहें कि दादागिरी जैसा प्रतीत हुआ। पर बाद में पता चला ये तो दस्तूर है, मानना ही पड़ेगा। 

महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में स्थित माथेरन 800 मीटर से ज्यादा की ऊंचाई पर है। शहर की आबादी महज 7000 है। इसमें बड़ी संख्या में मुस्लिम लोग हैं। कई पारसियों की कोठियां भी माथेरन में है जो विरान पड़ी रहती हैं। कभी माथेरन मुंबई के अमीर पारसी लोगों का पसंदीदा हिल स्टेशन हुआ करता था। आजकल हर मुंबई वासी यहां सुकुन के कुछ दिन बीताने के लिए आना चाहता है। इसलिए शनिवार और रविवार को यहां खासी भीड़ हो जाती है। तो कभी माथेरन में प्रवेश का कर दो रुपये था जो बढ़ते हुए 50 रुपये हो गया। वैसे महाराष्ट्र के एक और हिल स्टेशन महाबलेश्वर में भी 20 रुपये का प्रवेश कर लगता है।


हमारा ठिकाना हुंजर हाउस - माथेरन में हमारा ठिकाना पहले से ही तय था। स्टेजिला डाट काम से हमने ऑनलाइन बुकिंग करा रखी थी। रेलवे स्टेशन के बगल में ही है हुंजर हाउस। रंगोली होटल के ठीक सामने। यह माथेरन का एक किफायती होटल है। यहां हमे आवास 700 रुपये प्रतिदिन की दर से मिल गया है। पर यहां बाकी ज्यादातर होटल महंगे हैं। 
खासतौर पर शनिवार और रविवार को यहां होटलों की दरें सीधे दोगुनी हो जाती है। मुंबई से छुट्टियां मनाने वाले लोग माथेरन बडी संख्या में शनिवार और रविवार को ही पहुंचते हैं। दूसरी ध्यान देने की बात है कि सप्ताहांत में यहां होटलों की बुकिंग भी कम से कम दो दिन के लिए ही होती है।

 खैर हमलोग माथेरन रेलवे स्टेशन से उतर कर लोगों से रास्ता पूछकर टहलते हुए होटल तक पहुंच गए तो होटल के बाहर बैठे प्रोपराइटर हमारा ही इंतजार कर रहे थे। यहां कई होटलों में खाना नास्ता के पैकेज के साथ बुकिंग होती है। पर हमारा हुंजर हाउस किफायती होने के बावजूद बेहतर होटल है।

इस होटल के कमरे से खिलौना ट्रेन हमेशा आती जाती दिखाई देती है। होटल के लान में दो झूले भी लगे हैं। यहां अनादि देर तक झूले पर झूलते रहे। होटल में कैंटीन नहीं है पर आप आसपास में निकट के रेस्टोरेंट में खाने के लिए जा सकते हैं। पहले दिन शाम ढल चुकी है इसलिए हमलोग पास के एक रेस्टोरेंट में जाकर रात का खाना खाने के बाद सो गए। 


माथेरन के माधव जी पार्क में ( 2015 ) 
अगली सुबह मैं जल्दी जगता हूं और टहलने निकल पड़ता हूं। कहां नेरल माथेरन रेलवे के ट्रैक पर। इस नैरो गेज के ट्रैक को पकड़कर तकरीबन दो किलोमीटर टहलता हुआ जाता हूं। फिर इसी रास्ते से लौट आता हूं। रास्ते में पक्षियों का कलरव सुनाई देता है। रात को इसी ट्रैक से होकर चलने वाली ट्रेन पर आना हुआ था। पर सुबह में इस ट्रैक पर सैर करने का भी अपना अलग आनंद है। हरे भरे वन के बीच दो फीट का ट्रैक। होटल लौटकर आने के बाद माधवी और वंश को जगाया। बोला चलो नास्ते के लिए चलें और उसके बाद दिन भर भ्रमण के लिए तैयार हो जाइए।
- विद्युत प्रकाश मौर्य  ( MATHERAN HILL STATION - 2 )