Wednesday, March 5, 2014

नेरल-माथेरन - दो घंटे में 20 किलोमीटर का रोमांचक सफर (04)

मुंबई से पुणे के मार्ग पर कर्जत से पहले नेरल रेलवे स्टेशन। मुंबई से 83 किलोमीटर दूर रायगढ़ जिले का छोटा सा शहर। यहां से माथेरन के लिए नैरो गेज की ट्रेन का संचालन होने के कारण नेरल को जंक्शन होने का गौरव प्राप्त  है।

समुद्र तल 40 मीटर की ऊंचाई पर स्थित नेरल रेलवे स्टेशन पर सिर्फ पैसेंजर ट्रेनें ही रूकती हैं। निकट का बड़ा रेलवे स्टेशन कल्याण या कर्जत है। नेरल में बड़ी लाइन के दो प्लेटफार्म हैं तो नन्ही नैरो गेज के भी दो प्लेटफार्म हैं। दोनों लाइनों के लिए अलग अलग टिकट घर है। नेरल से माथेरन जाने वाली ट्रेनों के लिए जितनी सीट है उतने ही टिकट जारी किए जाते हैं। पर इन ट्रेनों के लिए एडवांस बुकिंग आईआरसीटीसी की साइट के माध्यम से नहीं होती। यहां पर पहुंचने वालों को ही टिकट जारी किए जाते हैं।टिकट अभी भी पुराने गत्ते वाले ही जारी किए जाते हैं। हमलोग दो घंटे पहले पहुंच गए हैं, टिकट खिड़की खुलने का इंतजार करना पड़ा। इस बीच नैरोगेज के प्लेटफार्म का मुआयना करने में वक्त बिताया। 


टिकट की दरें ज्यादा रखी गई हैं -  नेरल माथेरन रेल मार्ग पर महज 20 किलोमीटर के सफर के लिए साधारण क्लास का किराया 60 रुपये दूसरे दर्जे का किराया 75 रुपये तो पहले का दर्जे का किराया 300 रुपये है। पहले इस रेलमार्ग पर कालका शिमला की तरह कम किराया  ही वसूला जाता था पर कुछ साल पहले किराये में भारी वृद्धि कर दी गई है।

अब नेरल माथेरन के बीच रेल किराया बढ़ गया है तो टैक्सी वाले भी माथेरन के 20 किलोमीटर के सफर का 70 रुपये वसूलते हैं। यानी छोटा सा सफर है पर महंगा है। अगर आप अपने वाहन से जाएं तो अमन लाज में पार्किंग के लिए मोटी फीस देनी पड़ती है। वैसे दार्जिलिंग हिमालयन रेल पर भी यात्रियों से हेरिटेज ट्रेन के सफर के नाम पर ज्यादा किराया वसूला जाता है।

चार गाड़ियां हर रोज - सुबह से दोपहर 12 बजे तक माथेरन की ओर तीन रेलगाड़ियां जाती हैं। शाम को 5 बजकर 5 मिनट पर आखिरी ट्रेन माथेरन जाती है। अगर आप दोपहर में पहुंचे हैं तो शाम की ट्रेन का इंतजार करना होगा।

ऑफ सीजन में माथेरन की रेल में ज्यादा भीड़ नहीं होती, पर सीजन में टिकट के लिए लंबी लाइन लग जाती है। काफी लोगों को टिकट नहीं मिल पाता। तब टैक्सी से जाना मजबूरी बन जाती है। हर शनिवार रविवार को भी ट्रेन हाउसफुल चलती है। इसलिए जब भी आएं टिकट पाने के लिए यहां पर्याप्त समय पहले पहुंचे। 

कोच को धक्का देकर प्लेटफार्म पर लाते हैं -  माथेरन से नेरल आने वाली ट्रेन के इंजन को बदल कर पीछे से आगे की ओर करने की सुविधा यहां उपलब्ध नहीं है। मतलब इंजन आगे से पीछे करने के लिए तीसरी लाइन का इंतजाम नहीं है। लिहाजा प्लेटफार्म पर आने के बाद रेल फिर लोको शेड की ओर वापस चली जाती है। वहां से एक एक कोच को पोर्टर धक्का देते हुए प्लेटफार्म पर लाकर खड़ा करते हैं।

नेरल माथेरन रेल के कोच इतने हल्के हैं कि इनको सिर्फ दो पोर्टर धक्का देते हुए लाकर प्लेटफार्म पर लगा जाते हैं जिससे यात्री इसमें सवार हो सकें। ये बड़ा मजेदार नजारा होता है। लेकिन पोर्टर का काम यहीं खत्म नहीं होता। माथेरन की तरफ चढ़ाई कर रही ट्रेन के हर कोच में दो पोर्टर सवार होते हैं। ट्रेन के रूकने पर वे हर कोच में अतिरिक्त ब्रेक लगाने का काम करते हैं जिससे ट्रेन पहाड़ों से वापस लुढ़क न जाए। क्योंकि ट्रेन 20 किलोमीटर तक लगातार चढ़ाई ही करती जाती है।  
कोच को धक्का देकर प्लेटफार्म पर लाकर लगाया जाता है....

दूसरे दर्जे के तीन कोच -  नेरल माथेरन रेलवे के ट्रेन में डी1, डी2, डी3 तीन कोच दूसरे दर्जे के होते हैं। हर कोच में 30 सीटें। 30 सीटें साधारण दर्जे की और 20 सीटें पहले दर्जे की। पहले दर्जे की सीटें सोफा जैसी हैं। एक पांच सीट वाला सैलून मांग पर लगाया जाता है जिसमें एलसीडी स्क्रीन लगा है जिसमें बाहर के नजारे दिखाई देते हैं। हमें दूसरे दर्जे की तीन टिकटें प्राप्त करने में सफलता मिल गई। टिकट लेकर हम अपनी ट्रेन का इंतजार कर रहे हैं। तभी दो नए सहायक लोको पायलटों से परिचय होता है। उनकी पहली पोस्टिंग एनएमआर सेक्शन में हो गई है। वे भी इस खिलौना ट्रेन को देखकर हैरान हैं। 

नेरल रेलवे स्टेशन पर नैरो गेज का डीजल लोको शेड दिखाई देता है जो 1905 से सेवा में है। पहले स्टीम इंजन के लिए अब डीजल इंजन के लिए अपनी सेवाएं दे रहा है। 

हमलोग शाम 5 बजे वाली ट्रेन में सवार हैं। हमारी ट्रेन समय से चल पडी है। ट्रेन में ज्यादा भीड़ नहीं है। नेरल शहर की सीमा में आधा किलोमीटर दौड़ लगाने के बाद ट्रेन सरपट पहाड़ी पर चढ़ने लगती है। पहला स्टेशन आता है जुम्मापट्टी। यहां अक्सर ट्रेनों का क्रासिंग होता है। यहां पर शौचालय, पेयजल की सुविधा है। यहां सैलानियों को कुछ फल फूल खाने को मिल जाता है। रेहड़ी वाले दुकानदार स्थानीय फल बेचते नजर आते हैं। अगला ठहराव वाटर पाइप।  


गणेश जी के घंटी बजाइए - वाटर पाइप के बाद नजर आती है एक विशाल गणपति की प्रतिमा। यहां पर गणेश जी के सम्मान में  ट्रेन धीमी हो जाती है। रेललाइन के किनारे एक घंटी लगी है। जिसे आप बजा सकते है। इस गणेश प्रतिमा को नेरल माथेरन के लोको पायलट रहे राजेश खड़े ने अपने निजी प्रयास से बनवाया है। वे अब रिटायर हो चुके हैं। उनकी गणपति में अटूट आस्था थी। पर अब भी इस मार्ग पर चलने वाला हर लोको पायलट गणेश जी के पास ट्रेन बिल्कुल धीमी कर देता है। लोग घंटी बजाते हैं फिर ट्रेन आगे बढ़ती है। 

बीस किलोमीटर का सफर दो घंटे 20 मिनट में पूरा होता है। अमन लाज स्टेशन पर ट्रेन 15 मिनट रूकती है। अमन लाज से माथेरन के तीन किलोमीटर के सफर का किराया  है 45 रुपये। ये माथेरन वासियों को बहुत ज्यादा लगता है। लिहाजा वे ट्रेन से बिल्कुल नहीं चलते। काफी सैलानी भी ये दूरी पैदल पूरा करना पसंद करते हैं। लोग पटरी पकड़कर माथेरन रेलवे स्टेशन तक पहुंच जाते हैं। अपने दो घंटे के सफर में ये नन्ही ट्रेन 40 मीटर से 800 मीटर की ऊंचाई का सफर तय कर लेती है। जैसे जैसे ऊंचाई बढती जाती है नेरल शहर की हरी भरी वादियों के खूबसूरत नजारे लोगों का मन मोहते हैं। कब दो घंटे गुजर गए पता भी नहीं चलता।


माथेरन की ओर चली ट्रेन...



और नेरल की ओर वापसी.....
( NERAL MATHERAN RAIL - NMR-4 )