Thursday, April 30, 2015

माथेरन में हर सैलानी को देना पड़ता है प्रवेश शुल्क

शाम गहराने के साथ हमारी ट्रेन माथेरन रेलवे स्टेशन पर पहुंच चुकी थी। माथेरन देश में एक ऐसा हिल स्टेशन है जहां हर आने वाले सैलानी को प्रवेश शुल्क देना पड़ता है। आजकल हर बाहरी वयस्क के लिए 50 रुपये और बच्चों के लिए 25 रुपये लिए जाते हैं। ये कर माथेरन गिरिस्थान नगर परिषद वसूलती है। इसके वसूली काउंटर रेलवे स्टेशन और अमन लाज के पास टैक्सी स्टैंड में बने हुए हैं। टैक्स देने के बाद आप अगले कुछ दिन यहां निवास करने के अधिकारी बन जाते हैं। इस कर की राशि को शहर के ररखाव में खर्च किया जाता है। 
हमलोग जैसे माथेरन रेलवे स्टेशन पर उतरे टैक्स वसूलने वालों से हमारा सामना हुआ। पहले तो थोड़ा अजीब लगा या यूं कहें कि दादागिरी जैसा प्रतीत हुआ। पर बाद में पता चला ये तो दस्तूर है, मानना ही पड़ेगा। 

महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में स्थित माथेरन 800 मीटर से ज्यादा की ऊंचाई पर है। शहर की आबादी महज 7000 है। इसमें बड़ी संख्या में मुस्लिम लोग हैं। कई पारसियों की कोठियां भी माथेरन में है जो विरान पड़ी रहती हैं। कभी माथेरन मुंबई के अमीर पारसी लोगों का पसंदीदा हिल स्टेशन हुआ करता था। आजकल हर मुंबई वासी यहां सुकुन के कुछ दिन बीताने के लिए आना चाहता है। इसलिए शनिवार और रविवार को यहां खासी भीड़ हो जाती है। तो कभी माथेरन में प्रवेश का कर दो रुपये था जो बढ़ते हुए 50 रुपये हो गया। वैसे महाराष्ट्र के एक और हिल स्टेशन महाबलेश्वर में भी 20 रुपये का प्रवेश कर लगता है।


हमारा ठिकाना हुंजर हाउस - माथेरन में हमारा ठिकाना पहले से ही तय था। स्टेजिला डाट काम से हमने ऑनलाइन बुकिंग करा रखी थी। रेलवे स्टेशन के बगल में ही है हुंजर हाउस। रंगोली होटल के ठीक सामने। यह माथेरन का एक किफायती होटल है। यहां हमे आवास 700 रुपये प्रतिदिन की दर से मिल गया है। पर यहां बाकी ज्यादातर होटल महंगे हैं। 
खासतौर पर शनिवार और रविवार को यहां होटलों की दरें सीधे दोगुनी हो जाती है। मुंबई से छुट्टियां मनाने वाले लोग माथेरन बडी संख्या में शनिवार और रविवार को ही पहुंचते हैं। दूसरी ध्यान देने की बात है कि सप्ताहांत में यहां होटलों की बुकिंग भी कम से कम दो दिन के लिए ही होती है।

 खैर हमलोग माथेरन रेलवे स्टेशन से उतर कर लोगों से रास्ता पूछकर टहलते हुए होटल तक पहुंच गए तो होटल के बाहर बैठे प्रोपराइटर हमारा ही इंतजार कर रहे थे। यहां कई होटलों में खाना नास्ता के पैकेज के साथ बुकिंग होती है। पर हमारा हुंजर हाउस किफायती होने के बावजूद बेहतर होटल है।

इस होटल के कमरे से खिलौना ट्रेन हमेशा आती जाती दिखाई देती है। होटल के लान में दो झूले भी लगे हैं। यहां अनादि देर तक झूले पर झूलते रहे। होटल में कैंटीन नहीं है पर आप आसपास में निकट के रेस्टोरेंट में खाने के लिए जा सकते हैं। पहले दिन शाम ढल चुकी है इसलिए हमलोग पास के एक रेस्टोरेंट में जाकर रात का खाना खाने के बाद सो गए। 


माथेरन के माधव जी पार्क में ( 2015 ) 
अगली सुबह मैं जल्दी जगता हूं और टहलने निकल पड़ता हूं। कहां नेरल माथेरन रेलवे के ट्रैक पर। इस नैरो गेज के ट्रैक को पकड़कर तकरीबन दो किलोमीटर टहलता हुआ जाता हूं। फिर इसी रास्ते से लौट आता हूं। रास्ते में पक्षियों का कलरव सुनाई देता है। रात को इसी ट्रैक से होकर चलने वाली ट्रेन पर आना हुआ था। पर सुबह में इस ट्रैक पर सैर करने का भी अपना अलग आनंद है। हरे भरे वन के बीच दो फीट का ट्रैक। होटल लौटकर आने के बाद माधवी और वंश को जगाया। बोला चलो नास्ते के लिए चलें और उसके बाद दिन भर भ्रमण के लिए तैयार हो जाइए।
- विद्युत प्रकाश मौर्य  ( MATHERAN HILL STATION - 2 ) 

Wednesday, April 29, 2015

माथेरन - इस शहर में कोई डीजल वाहन नहीं आ सकता

औरंगाबाद मुंबई जनशताब्दी एक्सप्रेस में 
अजंता एलोरा में कुछ दिन गुजारने के बाद हमारा अगला पड़ाव था माथेरन। महाराष्ट्र का एक खूबसूरत हिल स्टेशन। सफर शुरू हुआ औरंगाबाद से मुंबई मार्ग पर कल्याण होकर। कल्याण से नेरल फिर नेरल से खिलौना ट्रेन का सफर करके हम पहुंचे माथेरन। माथेरन के प्रदूषण मुक्त हिल स्टेशन है। 
12072 औरंगाबाद मुंबई जन शताब्दी एक्सप्रेस सुबह 6 बजे औरंगाबाद के प्लेटफार्म नंबर एक से खुलती है। हमलोग होटल से टहलते हुए रेलवे स्टेशन पहुंच गए। जनशताब्दी के वातानुकूलित कोच का सफर अच्छा रहा। अनादि सहयात्री के साथ वीडियो गेम खेलने में व्यस्त हो गए। यह ट्रेन हमें दोपहर से पहले 11.30 बजे कल्याण स्टेशन पर पहुंचा देती है।
हमें नेरल जाना है इसलिए छत्रपति शिवाजी टर्मिनस जाने की कोई जरूरत नहीं है। कल्याण भी काफी बड़ा और भीड़ भाड़ वाला रेलवे स्टेशन है। यहां से नेरल के लिए लोकल ट्रेन हर वक्त मिलती है। इसलिए हमलोग थोड़ी सी पेट पूजा करने के लिए स्टेशन से बाहर निकल गए। होटल में खाने के दौरान अनादि बोले टायलेट जाना है। तो होटल वाले ने बताया पड़ोस के बार में चले जाएं। बार में दिन दहाड़े लोग पेग लगा रहे थे। मैं भी किसी मुंबई के बार में पहली बार दाखिल हुआ था। खैर हम टायलेट का इस्तेमाल कर बाहर आ गए। दोपहर का भोजन कल्याण में लेने के बाद हमने नेरल के लिए लोकल ट्रेन ली। करजत पुणे की तरफ जाने वाली हर लोकल ट्रेन नेरल में रूकती है। पर नेरल से हमारी माथेरन की ट्रेन शाम को है। इसलिए हमें नेरल में कुछ घंटे इंतजार करना पड़ा। इस दौरान माधवी की तबीयत थोड़ी खराब हो गई। हमलोगों ने उन्हें प्लेटफार्म की बेंच पर ही सुला दिया और हवा करने लगे। इस दौरान नन्हें अनादि ने मां का खूब ख्याल रखा। फिर थोड़ी देर में ठीक हुईं तो नेरल के बाजार का थोड़ा मुआयना किया। रेलवे स्टेशन के बाहर से माथेरन के लिए टैक्सियां भी मिल रही हैं। शेयरिंग भी जाती हैं। अगर रेल का टिकट न मिल पाए तो टैक्सी से जा सकते हैं।




शून्य प्रदूषण वाला हिल स्टेशन है माथेरन 

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने 8 अप्रैल 2015 को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में 10 साल से ज्यादा पुराने डीजल वाहनों पर प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया है । ऐसा आदेश शहर के पर्यावरण को बचाने को ध्यान में रखते हुए दिया गया है। वाहनों की लॉबी हाय तौबा मचा रही है। पर देश में एक ऐसा पर्वतीय शहर है जहां डीजल या पेट्रोल चलित किसी भी वाहन का प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित है। महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में है हिल स्टेशन माथेरन जहां किसी तरह का वाहन शहर के अंदर नहीं जाता। शहर की प्राकृतिक आबोहवा को बचाए रखने के लिए इस तरह का फैसला बहुत साल पहले लिया गया था।

पार्किंग से पैदल सफर  - माथेरन शहर की सीमा से बाहर अमन लाज के पास पार्किंग में वाहनों को पार्क करके आगे का सफर पैदल करना पड़ता है। माथेरन एशिया का एकमात्र हिल स्टेशन है जहां पर सिर्फ पदयात्रा करके ही चल सकते हैं। इसलिए इसे सैलानी जीरो पल्यूशन हिल स्टेशन कहते हैं। यहां तक की साइकिल भी यहां नहीं चलती। सामान ढुलाई के लिए घोड़े हैं ना। मुंबई से इस हिल स्टेशन की दूरी 100 किलोमीटर है। यहां स्थानीय लोग भी किसी तरह का डीजल पेट्रोल चलित वाहन नहीं रख सकते। इमरजेंसी के लिए सिर्फ शहर में दो एंबुलेंस हैं। अगर कोई नेता या वीआईपी भी शहर में आता है तो वह भी पदयात्रा ही करता है। बूढे और बीमारों के लिए हाथ रिक्शा का विकल्प मौजूद है। सामान ढोने के लिए लोग महिला और पुरुष कुलियों की सेवाएं लेते हैं।



हालांकि शहर के बीचों बीच बाजार तक खिलौना ट्रेन आती है। उसमें डीजल इंजन लगा है। पर्यावरणविद काफी समय से तर्क दे रहे हैं कि इस ट्रेन को बिजली या फिर सीएनजी इंजन से चलाया जाए, जिससे माथेरन में कोई डीजल लोको भी प्रवेश नहीं कर सके। अगर रेलवे ये सुझाव मान लेता है तो आने वाले दिनों में यहां डीजल लोको का आना भी बंद हो सकता है।
वास्तव में हमें इस नन्हें से शहर से सीख लेने की जरूरत है ताकि हम अपने शहर की आबोहवा बचा सकें। वरना हम आने वाली पीढ़ी को क्या जवाब देंगे।

डीजल ईंजन या जनरेटर से जो धुआं निकलता है उसमें बारीक से बारीक ऐसे ऐसे तत्व होते हैं जो आपकी सांस की नली से होते हुए फेफड़े को ख़राब कर देते हैं।  दिल के आस पास दौड़ने वाली धमनियों को कमज़ोर कर देते हैंदिमाग की कोशिकाओं को बेकार कर देते हैं। कैंसरपार्किंसनअलझाईमरहार्ट अटैकसांस की तकलीफ़बिना बात की खांसीआंखों में जलन जैसी बीमारियां डीजल प्रदूषण से हो सकती है।

बढ़ता जा रहा है खतरा 


80 हजार से भी ज्यादा डीज़ल वाले ट्रक दिल्ली में रोज रात को प्रवेश करते हैं और इसकी हवा खराब कर जाते हैं। 
16 गुना ज़्यादा हो गई है दिल्ली में डीज़ल की खपत बढ़ने से RSPM यानी रेस्पिरेपल सस्पेंडेट पर्टिकुलेट मैटर की मात्रा तय मानकों से।
2020 तक सभी डीज़ल कारों को बैन कर दिया जाएगा फ्रांस की राजधानी पेरिस में

2019 तक हटा देने की कवायद हो रही है हांगकांग में यूरो फोर डीजल गाड़ियों को। 

- विद्युत प्रकाश मौर्य 
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 PS -  मनाली के आगे डीजल वाहन नहीं
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटीके आदेश के मुताबिक पहली मई 2015 से मनाली से रोहतांग जाने वाले डीजल इंजन पर्यटक वाहनों पर प्रतिबंध लगा दिया है। अब पहली मई के बाद केवल पेट्रोल इंजन वाहनों में ही पर्यटक रोहतांग जा सकेंगे। एनजीटी ने यह आदेश रोहतांग दर्रे के आसपास बढ़ते हुए प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए जारी किए हैं।

हिमाचल प्रदेश का पर्यटक सीजन भी मई और जून में यौवन पर रहता है। उस समय मैदानी इलाकों की भीषण गर्मी से राहत पाने के लिए पर्यटक पहाड़ों का रुख करते हैं। एनजीटी के आदेशों से कुल्लू-मनाली के पर्यटन कारोबारियों में हड़कंप मच गया है। कुल्लू में 80 फीसद पर्यटक वाहन डीजल इंजन हैं और 20 फीसद पेट्रोल इंजन हैं। अकेले मनाली में ही पर्यटक वाहनों की संख्या आठ सौ के करीब है। मई व जून में रोजाना रोहतांग के लिए मनाली से ढाई से तीन हजार पर्यटक वाहन आते-जाते हैं। इन आदेशों के बाद डीजल इंजन वाहन संचालकों की चिंता बढ़ गई है।
 ( 21 अप्रैल 2015 को प्रकाशित एक खबर) 




( MATHERAN -1)

Tuesday, April 28, 2015

भाप इंजन की विरासत की दास्तां सुनिए...

महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर का रेलवे स्टेशन। बाहर आने पर स्टेशन के भवन को देखकर ये एहसास हो जाता है कि आप अंजता और एलोरा के शहर में आ गए हैं। पर स्टेशन के बाहर एक और नायाब चीज आपका इंतजार कर रही है जो रेलवे के इतिहास से रूबरू कराता है। स्टेशन परिसर में खड़ा है मीटर गेज का स्टीम लोकोमोटिव। यह भारतीय रेलवे के स्टीम इंजन की गौरवशाली विरासत की कहानी चुपचाप खड़ा होकर सुना रहा है। 

औरंगाबाद रेलवे स्टेशन के बाहर खड़ा यह स्टीम लोकोमोटिव रेलवे को 1998 तक अपनी सेवाएं दे रहा था। हालांकि वह अभी थका भी नहीं था रिटायर भी नहीं हुआ था। पर इलाके में स्टीम इंजन का दौर खत्म हो रहा था इसलिए उसे मजबूरी में रिटायर होना पड़ा। ये लोकोमोटिव है वाईपी 2590 ( YP2590 ) 

यह एक स्वदेशी लोकोमोटिव है। इसका निर्माण टेल्को जमशेदपुर में किया गया था। 1965 में निर्मित यह लोकोमोटिव मीटर गेज पर लंबे समय तक अपनी सेवाएं देता रहा। यह 4-6-2 श्रेणी का लोकोमोटिव है जो मीटर के गेज रेलवे ट्रैक का पापुलर माडल हुआ करता था। 16 अगस्त 1998 को इसने अपना आखिरी सफर महाराष्ट्र क्षेत्र में किया। किसी समय में मनमाड से नांदेड़ का रेल मार्ग मीटर गेज का हुआ करता था। तब इस मार्ग पर यह लोकोमोटिव यात्री गाडियां को खींचा करता था। पर अब वह दौर इतिहास बन चुका है। 

अब न स्टीम इंजन हैं न ही मीटर गेज ट्रैक। पर लोग रेलवे का इतिहास जान सकें और देख सकें इसलिए इस लोकोमोटिव को औरंगाबाद रेलवे स्टेशन के बाहर लाकर स्थापित किया गया है।
वैसे स्टीम लोकोमोटिव की सबसे ब़ड़ी रेंज हरियाणा के रेवाड़ी में देखी जा सकती है। पर आप रेल से देश के अलग अलग हिस्सों में भ्रमण करते हुए कई जगह स्टीम लोकोमोटिव देखकर रेलवे की विरासत को याद कर सकते हैं। वैसे सन 2000 से पहले देश में सभी स्टीम लोकोमोटिव इतिहास का हिस्सा बन चुके थे।
( INDIAN RAIL, STEAM, LOCOMOTIVE, AURNGABAD )

Monday, April 27, 2015

26 गुफाओं में बुद्ध का जीवन और दर्शन


अजंता में आप एक नंबर गुफा से घूमते हुए आगे की ओर बढ़ते हैं। गुफा नंबर 26 अजंता की आखिरी देखने वाली गुफा है। इनमें कई गुफाओं में बौद्ध चैत्यगृह और स्तूप बने हैं तो कई में पेंटिंग हैं। गुफा नंबर 17 में बुद्ध की जातक कथाओं से संबंधित चित्र बने हैं। न सिर् दीवारों पर बल्कि छत पर भी चित्र बनाए गए हैं। आप सारी गुफाएं देखते हुए आगे बढ़ें। कोई छोड़ने का मतलब नहीं बनता। अजंता की गुफा नंबर 27 से 30 तक जाने के लिए कोई रास्ता मौजूद नहीं है। रास्ता बनाया ही नहीं गया। पुरातत्व सर्वेक्षण का स्टाफ इन गुफाओं में रस्सी के सहारे सफाई के लिए जाते हैं। आम दर्शकों के लिए वहां पहुंचना मुश्किल है।

अजंता की कई गुफाओं में प्राकृतिक रोशनी नहीं जाती। यहां पर किसी जमाने में धूप में बड़े बड़े आइने लगाकर रोशनी रिफ्लेक्टर के माध्यम से भेजी जाती थी। पर कुछ साल पहले जापान सरकार ने यहां पर ऐसी एलइडी लाइटें लगवा दी हैं जिनसे मूर्तियों को कोई नुकसान नहीं होता।

बुजुर्ग लोग जो पैदल चलने में थक जाते हैं उनके घूमने के लिए अजंता में पालकी भी मौजूद है। पालकी किराया 1400 रुपये प्रति व्यक्ति है। आपको प्रवेश द्वार पर अजंता के गाइड मिलते हैं तो 300 रुपये या अधिक राशि की मांग करते हैं। आप समूह में हैं तो गाइडकर सकते हैं। अन्यथा आप अजंता का ब्रोशर ले लें। इस ब्रोशर के सहारे भी घूम सकते हैं। हर गुफा के बाहर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से चौकीदार तैनात हैं वे भी गुफा के बारे में बताते हैं। बाद में वे आपसे थोड़ी बक्शीश की अपेक्षा रखते हैं।

अजंता की गुफाएं देखकर लौटने के बाद थक गए हों तो खाने पीने के लिए आपको यहां एमटीडीसी का रेस्टोरेंट नजर आता है। पर ये रेस्टोरेंट ठेके पर चलाया जाता है। यहां खाना काफी महंगा भी है। अगर आप यहां न खाना चाहें तो शटल बस सेवा से वापस आप जब शापिंग प्लाजा पहुंचेंगे तो वहां भी खाने पीने के लिए दो समान्य से होटल हैं। यहां पर हमें मुरली कृष्ण होटल में सिर्फ 50 रुपये की थाली मिल गई, जिसका खाना संतोष जनक था। इस शापिंग प्लाजा से आप मूर्तियां खरीद सकते हैं। थोड़ा मोलभाव करके सस्ते में मूर्तियां खरीदी जा सकती हैं।


अगर आप अजंता में एक दिन से ज्यादा वक्त गुजारना चाहते हैं तो अजंता की गुफाओं से 3 किलोमीटर आगे जलगांव मार्ग पर फर्दापुर गांव में एमटीडीसी का रेस्ट हाउस है, जहां ठहरा जा सकता है। इसके अलावा अजंता से आठ किलोमीटर आगे पहाड़ी पार करने के बाद अजंता गांव में भी एक दो गेस्ट हाउस हैं।

अजंता घूमते समय सावधानियां  अजंता और एलोरा की गुफाओं में फोटोग्राफी करते समय फ्लैश का इस्तेमाल कत्तई नहीं करें। कलाकृतियों के संरक्षण के लिहाज से यहां फ्लैश का इस्तेमाल प्रतिबंधित है। अपने साथ पानी की बोतल लेकर चलें पर खाने पीने की सामग्री नहीं ले जाएं। ये पालीथीन मुक्त क्षेत्र है इसलिए यहां कचरा नहीं फैलाएं।



कर्मचारियों को महीनों से वेतन नहीं  मैं 31 मार्च 2015 को अजंता पहुंचा। गुफाओं में घूमते हुए कई चौकीदारों से बात हुई, पता चला कि इन चौकीदारों की नौकरी अस्थायी है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने सालों से इन्हे स्थायी नहीं किया है। 

ये भारत सरकार के दैनिक मजदूर  हैं। सबसे बुरी बात तो ये है कि इन्हे वेतन 5 से 6 माह बाद मिलता है। इन कर्मचारियों ने बताया कि दिसंबर के बाद से वेतन नहीं मिला है। इसी तरह यहां निजी कंपनी के सुरक्षा गार्ड लगाए गए हैं।
उन्हे भी छह माह बाद वेतन मिल पाता है। जब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इनकी कंपनी को चेक जारी करता तब जाकर सुरक्षा गार्डों को वेतन मिल पाता है। भारत सरकार की इस संस्था में जो हो रहा है वह शर्मनाक है।


अजंता में गौतम बुद्ध 
चलों चलें अजंता की सैर करने..

अजंता - दीवारों पर चित्रकारी....





( WORLD HERITAGE SITE)  

( AJANTA, AURANGABAD, BUDDHA, CAVES, WORLD HERITAGE SITE)  




Sunday, April 26, 2015

गीत गाया पत्थरों ने - अजंता


यहां पत्थरों में सुनाई देता है संगीत। अनवरत संगीत। प्राणों को झंकृत कर देने वाला संगीत। जो अन्यत्र दुर्लभ है। सैकड़ो साल हजारों कलाकारों की अनवरत तपस्या की परिणति है अजंता की गुफाएं।

अजंता की गुफाओं में बनी कलाकृतियों में हजारों शिल्पियों के श्रम और साधना को महसूस किया जा सकता है। यहां पत्थरों से निकलने वाले संगीत को तो यहां पहुंचकर ही महसूस किया जा सकता है। तभी तो अजंता की गुफाएं विश्व के सर्वश्रेष्ठ दर्शनीय स्थलों में एक हैं। दुनिया भर से लाखों सैलानी हर साल अजंता की गुफाओं में शांति
, आध्यात्म और ज्ञान की तलाश में पहुंचते हैं।आप जिस नजरिए से भी देखें आपको कुछ अदभुत दिखाई देगा यहां....  




काफी लोग ताजमहल को देखकर अद्भुत कहते हैं, पर अजंता की गुफाओं को देखने के बाद ये लगता है कि देश का दुनिया में ऐसी नायाब कृति कहीं नहीं हो सकती। वर्गुना नदी के तीन तरफ पहाड़ों की 20 मीटर गहराई तक काट कर गुफाएं बनाई गई हैं जिसमें गौतम बुद्ध का जीवन दर्शन कलाकृतियों और मूर्ति शिल्प में उतारा गया है। ऐसा लगता है मानो पत्थर गीत गा रहे हों। सारी गुफाएं देखते देखते आप आनंदित होते हैं, रोमांचित होते हैं, अचरज करते हैं, कब शाम ढलने लगती है पता भी नहीं चलता। अजंता की 30 गुफाओं का निर्माण पहली शताब्दी से सातवीं शताब्दी के बीच हुआ है। सह्याद्रि की पहाडि़यों पर स्थित इन 30 गुफाओं में लगभग 5 प्रार्थना भवन और 25 बौद्ध मठ हैं। 1819 से पहले ये गुफाएं सैकड़ो साल तक लोगों की नजरों से ओझल रही हैं।

इन गुफाओं की खोज आर्मी ऑफिसर जॉन स्मिथ व उनके दल द्वारा सन् 1819 में की गई थी। वे यहाँ शिकार करने आए थे, तभी उन्हें कतारबद्ध 29 गुफाओं की एक शृंखला नज़र आई और इस तरह ये गुफाएँ प्रसिद्ध हो गई। घोड़े की नाल के आकार में निर्मित ये गुफाएं अत्यन्त ही प्राचीन व ऐतिहासिक महत्त्व की है।


अजंता - गुफा नंबर 21 के इन स्तंभों पर थपकी देने से निकलता है संगीत। 

गीत गाया पत्थरों ने  इऩ गुफाओं का इस्तेमाल भगवान बुद्ध की शिक्षाओं का अध्‍ययन करने के लिए किया जाता था। एक गुफा ऐसी है जिसके स्तंभ को थपकाने पर संगीत की धुन निकलती है। गुफाओं की दीवारों तथा छतों पर बनाई गई ये तस्‍वीरें भगवान बुद्ध के जीवन की विभिन्‍न घटनाओं और विभिन्‍न बौद्ध देवत्‍व की घटनाओं का चित्रण करती हैं। इसमें से सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण चित्रों में जातक कथाएं हैं, जो बोधिसत्व के रूप में बुद्ध के पिछले जन्‍म से संबंधित विविध कहानियों का चित्रण करते हैं। यूनेस्‍को द्वारा 1983 में अजंता को विश्‍व विरासत स्‍थल घोषित किया गया। यह देश का पहला विश्व विरासत स्थल है।

कैसे पहुंचे  औरंगाबाद से अजंता की दूरी 110 किलोमीटर है। औरंगाबाद सेंट्रल बस स्टैंड से नियमित तौर पर जलगांव की तरफ जाने वाली बसें अजंता में रूकती हैं। पर अगर आपको सिर्फ अजंता जाना हो तो जलगांव में रूक कर भी जा सकते हैं। जलगांव से अजंता की दूरी महज 65 किलोमीटर है। अजंता की गुफाओं से पहले अजंता नामक एक गांव आता है। यहां पर एक दो गेस्ट हाउस बने हैं। इस गांव में भी एक किला नजर आता है।


बारिश में जाएं आनंद आएगा  बारिश के दिनों में अजंता का सौंदर्य बढ़ जाता है। आसपास के पहाड़ों से लगातार झरने बह रहे होते हैं। पहाड़ों की हरियाली कई गुना बढ़ जाती है। आप अपने साथ छाता रखें। गुफा के अंदर तो वैसे भी बारिश से बचाव होगा। बाहर का नजारा नयनाभिराम होगा।
अजंता के प्रवेश द्वार के पास सड़क पर कोई मार्क नहीं बना हुआ है। पर जलगांव औरंगाबाद के बीच चलने वाली बसें यहां रूक जाती हैं। गुफा का स्वागत कक्ष शानदार बना है। यहां पर 15 रुपये का शुल्क देना पड़ता है। यहां एक छोटा सा सुंदर सा बाजार है। जहां खाने पीने और उपहार खरीदने की सुविधा है। इस बाजार को पार करने के बाद एक बस स्टैंड आता है। यहां से अजंता के दूसरे प्रवेश द्वार के लिए बसें चलती हैं। 4 किलोमीटर की दूरी का किराया 15 रुपये है। एसी बस का किराया 20 रुपये है। मुख्य द्वार पर दुबारा प्रवेश का टिकट खरीदना पड़ता है। भारतीय लोगों का टिकट 10 रुपये का है। समूह में 5 रुपये का लाइटिंग का टिकट अलग से लेना पड़ता है। गुफाओं के बीच में जगह जगह पेयजल का इंतजाम किया गया है। 
vidyutp@gmail.com
अजंता में बुद्ध। 
अजंता में एमटीडीसी का रेस्टोरेंट 

तो लो हम पहुंच गए हैं अजंता....

     
चलते चलते कुछ खरीददारी हो जाए....

 आगे पढ़िए - अजंता - 26 गुफाओं में गौतम बुद्ध के दर्शन 


   ( AJANTA, AURANGABAD, BUDDHA, CAVES, WORLD HERITAGE SITE)  


Saturday, April 25, 2015

दौलताबाद का किला - जिसे बेधना था मुश्किल


देवगिरी यानी दौलतबाद का किला औरंगाबाद शहर से 11 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम दुर्जेय पहाड़ी पर स्थित है। यह किला की किसी तिलिस्म सा लगता है जिसे भेदना दुश्मन के लिए मुश्किल था। दौलताबाद नाम मुहम्‍मद बिन तुगलक द्वारा तब दिया गया था जब सन् 1327 में मुहम्मद बिन तुगलक ने यहां अपनी राजधानी यहां बसाई थी। यह भारत के सबसे मजबूत किलों में एक यह एक तीन मंजिला किला है जिसे जीत पाना टेढी खीर था।  688 फीट ऊंचे इस किले के मुख्य द्वार से सबसे ऊपर की चोटी तक जाने के लिए आपको दो किलोमीटर की मुश्किल पैदल ट्रैकिंग करनी पड़ती है। लिहाजा पानी की बोतलें अपने साथ रखें।

देवगिरी के शहर यादव राजा भिलण द्वारा 1187 ईस्वी में इस किले का निर्माण कराया गया। यह किला लगभग 200 मीटर की ऊंचाई तक के शंकु के आकार की पहाड़ी पर स्थित है। पहाड़ी के चारों ओर इसके नीचे की ओर खाइयां और ढलानें इसकी रक्षा करती थीं।  दुर्ग गढ़ की बड़ी संख्या के साथ रक्षात्मक दीवारों की तीन लाइनों का निर्माण किया गया है। किले की उल्लेखनीय सुविधाओं खाई, सीधी ढाल हैं। किले मे दुश्मन को रोकने के अनूठे इंतजाम हैं। किले में सात विशाल द्वार आते हैं जहां दुश्मनों से मुकाबले के लिए पर्याप्त इंतजाम हैं।



सभी दीवारों पर तोपें तैनात रहती थीं। आखिरी दरवाजे पर एक 16 फीट लंबी और दो फीट गोलाकार की मेंडा नामक तोप आज भी मौजूद है। जिसकी मारक क्षमता 3.5 किलोमीटर है और यह तोप अपनी जगह पर चारों ओर घूम सकती है। किले में चांद मीनार, चीनी महल और बारादरी भीतर की महत्वपूर्ण संरचनाएं हैं। किले के शीर्ष पर शाही निवास, मस्जिद, स्नान घर,  मनोरंज के कमरे आदि बने हैं। किले के पहले प्रवेश द्वार के बाद बायीं तरफ अंदर एक भारत माता मंदिर भी बनाया गया है।
किले के चारों ओर गहरी खाई बनाई गई है और उसमें पानी भर दिया जाता था जिसमें मगरमच्छ छोड़ दिए जाते थे। उस समय किले में जाने के लिए चमड़े का पुल बनाया गया था और जब युद्ध की आशंका होती थी तो पुल हटा लिया जाता था। कहा जाता है कि यदि दुश्मन की सेना किसी तरह सातों दरवाजे पर पहुंच भी गई तो उसे गहरी खाइयों का सामना करना पड़ता था जिसमें सैनिकों के उतरते हुए उनके स्वागत के लिए खतरनाक मगरमच्छ तैयार रहते थे।



शानदार चांद मीनार  चांद मीनार की ऊंचाई 63 मीटर है और इसे अलाउद्दीन बहमनी शाह ने 1435 में दौतलाबाद पर विजयी होने के उपलक्ष्य में बनाया था। इसके अंदर सीढ़ियां बनाई गई हैं जिससे ऊपर तक जाया जा सकता है। वर्ष 1986 में इसके अंदर भगदड़ मच गई जिसमें दो लोगों की मृत्यु हो गई थी उसके बाद से इसमें अंदर जाना और चढ़ना मना कर दिया गया है।

अंधेरा रास्ता यानी भूलभुलैया  अंधेरा रास्ता तकरीबन 150 फीट लंबा है। इसे लोग भूल भुलैया भी कहते हैं। इसे बिना मशाल, टार्च के पार नहीं किया जा सकता। ऊपर की ओर जाती हुई लंबी सुरंग खड़ी सीढियों द्वारा खड़ी और घुमाव खाती हुई बढ़ती रहती है। इसमें थोड़े-थोड़े अंतराल पर जो विवर आते हैं वे उन गार्डो के कक्ष हैं जिनके हाथ में सुरंग के इस मार्ग की कमान थी। सुरंग के मुख पर लोहे का एक शटर है जो छोटे पहियों पर क्षैतिजीय रूप में एक चोर दरवाजे की भांति विवर को खोलते-बंद करते हुए चलता है। इस सुरंग का एक सर्वाधिक प्रभावी रक्षा उपाय यह था कि इसमें धुएं के एक अवरोधक की व्‍यवस्‍था की गई थी। लगभग आधा रास्‍ता पार करके एक स्थान पर, जहां सुरंग चट्टान के ऊर्ध्‍वाधर मुख के पास से होकर गुजरती है, एक सुराख बनाया गया था ताकि लोहे की एक अंगीठी में आग के लिए हवा का प्रवाह बन सके। यह अंगीठी सुरंग में खुलने वाले एक छोटे कक्ष के विवर में स्‍थापित की गई थी और जब आग सुलगती थी तो सुराख से बहने वाली हवा धुएं को सुरंग में उड़ा देती थी और सुरंग के मार्ग को दुर्गम बना देती थी।


राजधानी दिल्ली से दौलताबाद  - 1325-1351 के बीच दिल्ली की गद्दी पर आसीन थे मुहम्मद बिन तुगलक। वह मध्यकालीन सभी सुल्तानों में सर्वाधिक शिक्षित, विद्वान एवं योग्य व्यक्ति था। पर अपनी सनक भरी योजनाओं के कारण इसे 'स्वप्नशील', और 'पागल' कहा गया है। तुग़लक़ ने 1327 में अपनी राजधानी को दिल्ली से देवगिरि स्थानान्तरित किया। सुल्तान कुतुबुद्दीन मुबारक ख़िलजी ने देवगिरि का नाम 'कुतुबाबादरखा था और मुहम्मद बिन तुगलक ने इसका नाम बदलकर दौलताबाद कर दिया। सुल्तान की इस योजना के लिए सर्वाधिक आलोचना की गई। अरब यात्री इब्न बतूता ने भी राजधानी परिवर्तन योजना का मजाक उड़ाया है। देवगिरि का भारत के मध्य स्थित होना, मंगोल आक्रमणकारियों के भय से सुरक्षित रहना, दक्षिण-भारत की सम्पन्नता की ओर खिंचाव आदि ऐसे कारण थे, जिनके कारण सुल्तान ने राजधानी परिवर्तित करने की बात सोची। पर तुगलक की यह योजना भी पूर्णतः असफल रही और उसने 1335 में दौलताबाद से लोगों को दिल्ली वापस आने की अनुमति दे दी। पर राजधानी परिवर्तन के परिणामस्वरूप दक्षिण में मुस्लिम संस्कृति का विकास हुआ।

फिल्मों में दौलताबाद का किला  - 1979 में आई सुनील दत्त की फिल्म अहिंसा के बड़े हिस्से की शूटिंग दौलताबाद के किले में की गई। ये फिल्म डाकू समस्या पर केंद्रित थी। कई साल बाद एक बार दौलताबाद का किला फिल्मो में देखने को मिला 2011 में आई फिल्म तेरी मेरी प्रेम कहानी में। इसके गीत अल्लाह जाने... की शूटिंग किले के पृष्ठ भूमि मे की गई। इस गाने में शाहिद कपूर और प्रियंका चोपड़ा का रोमांस देखा जा सकता है। किले तोप, दीवारें और रास्ते इस गाने में दिखाई देते हैं।



Friday, April 24, 2015

लेटे हुए हनुमान जी यानी भद्र मारुति


यहां भाव समाधि में हैं रामभक्त हनुमान

देश में बजरंग बली के लाखों मंदिर होंगे, पर इनमें खुल्ताबाद का भद्र मारुति मंदिर काफी अलग है। खुल्ताबाद गांव में स्थित इस मंदिर में लेटे हुए हनुमान जी की विशाल प्रतिमा है। इस तरह के लेटे हुए हनुमान जी की प्रतिमा देश में सिर्फ इलाहाबाद में हैं। एलोरा से भद्रा मारूति की दूरी तीन किलोमीटर है।
यहां पर खास तौर पर हनुमान जयंती और रामनवमी के समय भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। 
मधुर संगीत सुन सो गए हनुमान जी - कहा जाता है कभी खुल्ताबाद का नाम भद्रावती था। यहां के शासन का नाम भद्रसेन था। वह भगवान राम का अनन्य भक्त था। अक्सर वह राम धुन में डूबा रहता था। एक बार हनुमान जी ने भद्रसेन को राम की धुन में मगन होकर गाते हुए सुना। हनुमान जी को संगीत इतना अच्छा लगा कि वे वहीं पर सो गए। इसे हनुमान जी की भाव समाधि कहा जाता है। ये हनुमान जी का अदभुत रूप है जो अन्यत्र देखने को नहीं मिलता।
जब भद्रसेन ने अपना गाना खत्म किया तो उसने पाया कि हनुमान जी उसके आगे सो रहे हैं। तब भद्रसेन ने हनुमान जी से आग्रह किया कि वे यहीं पर हमेशा के लिए विराजमान हों और भक्तों को आशीर्वाद दिया करें। इसलिए भद्र मारुति मंदिर का हनुमान भक्तों में खास महत्व है।

और भी हैं विलक्षण हनुमान मंदिर -  देश में और भी हनुमान जी के विलक्षण मंदिर हैं। इसी क्रम में इंदौर के उलटे हनुमान मंदिर है। यह भारत कि एक मात्र उलटे हनुमान कि प्रतिमा है। इसी तरह छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में रतनपुर के गिरिजाबंध हनुमान मंदिर में स्त्री रुप में हनुमान प्रतिमा है। इन सबसे अलग गुजरात के जामनगर के बाल हनुमान मंदिर है।

एलोरा गुफाओं के बाद हमारा अगला पड़ाव था भद्र मारूति। यहां पहुंचने पर हमें मंदिर के आसपास निर्माण कार्य चलता हुआ दिखाई दिया। मंदिर को और भव्य बनाने की तैयारी जारी है। हमारे बीएचयू  के दोस्त जीतेंद्र यादव जो आरपीएफ में पदस्थापित हैंने सलाह दी थी इस तरफ आएं तो भद्र मारूति के जरूर दर्शन करें। जय बजरंग बली...


( AURANGABAD, BHADRA MARUTI TEMPLE, KHULTABAD ) 


Thursday, April 23, 2015

औरंगाबाद - लड़कियों के लिए सस्ता खाना लड़कों के लिए महंगा

औरंगाबाद शहर के बंशीलाल नगर में खाने पीने के लिए होटल ढूंढते हुए हम जा पहुंचे महाराष्ट्रियन भोजनालय। इस भोजनालय में खास तौर पर आसपास में रहकर कोचिंग में पढ़ाई करने वाले छात्र छात्राएं खाने के लिए पहुंचते हैं। 

लड़के लड़कियों के लिए अलग अलग दरें 
पर यहां पर मासिक तौर पर खाने वाले लड़के और लड़कियों के लिए खाने की दरें अलग अलग है। इसके पीछे होटल के मैनेजर का तर्क था कि लड़कियां लड़कों की बनिस्पत कम खाती हैं। इसलिए हमने लड़कियों के लिए अलग दरें रखी हैं। मासिक तौर पर लड़कों से 3000 लिए जाते हैं तो लड़कियों से महज 2000 ही लिए जाते हैं। होटल एक महीने का कूपन जारी कर देता है पैसे लेने के बाद। आप जब खाएं तब एक कूपन जमा कर दें। तो लड़के और लड़कियों के कूपन का रंग अलग अलग रखा गया ताकि कोई गडबड़ी नहीं हो ।

होटल लालजी के रेस्टोरेंट में। 
खाने के मीनू की बात करें तो महाराष्ट्रियन भोजनालय का खाना सादा है। महाराष्ट्र में हैं तो थोड़ा मसालेदार जरूर है। पर ऐसा है कि आप खाकर बीमार नहीं पड़ेगें। सर्विस बहुत तेज है। खाना पैक कराकर भी ले जा सकते हैं। दाल, पनीर, चपाती जैसे रोज खाने वाले व्यंजन यहां बनते हैं।

 मुहल्ले में महाराष्ट्रियन भोजनालय इतना लोकप्रिय है कि इन्होंने अलग से अपना टेक अवे स्टाल भी खोला हुआ है जिसका नाम सुमन स्वंयपाक घर है। यहां से घरो में रहने वाले लोग पैक कराकर भोजन ले जाते हैं। महाराष्ट्रियन भोजनालय में मिनरल वाटर आदि की दरें भी दूसरी दुकानों से कम रखी गई हैं। इसके पास ही डाक्टर भापकर रोड पर रेनो शोरूम के बगल में आप हार्ट बीट की ओर भी रुख कर सकते हैं। बेसमेंट में स्थित इस रेस्टोरेंट के खाने का स्वाद शानदार है। थोडा महंगा है पर साज सज्जा के हिसाब से आपको निराशा नहीं मिलेगी। यह औरंगाबाद के बेस्ट रेस्टोरेंट में गिना जाता है।

होटल न्यू भारती, स्टेशन रोड। 
रेलवे स्टेशन के आसपास की बात करें तो एक दिन हमलोग होटल लालजी पहुंचे। ये एक आवासीय होटल है पर इनका डायनिंग हाल शानदार है। सफेद रंग की थीम पर बने डायनिंग हाल की सर्विस काफी अच्छी है। खाने के बाद इन्होंने फीडबैक फार्म भी भरवाया। लालजी के स्टेशन रोड पर ही दो होटल हैं। एक रेलवे स्टेशन के गेट के बिल्कुल बगल में है जो छोटा है, थोड़ा आगे चलकर इनका होटल है जो आवासीय है। ग्राउंड फ्लोर पर डायनिंग हाल है।  http://lalajishotel.com/index.html 

रेलवे स्टेशन के पास आप न्यू भारती में एक दिन स्वाद ले सकते हैं। इनका डायनिग हाल काफी बड़ा है। थाली 80 से 90 रुपये की है। पर यहां का मसाला डोसा काफी अच्छा है। हमारे टैक्सी वाले भाई साहब रफीक भाई ने भारती की अनुसंशा की थी। यहां जाकर भी हमें निराशा नहीं मिली। (http://www.hotelnewbharti.in/)  


स्टेशन रोड पर ही भारती के बगल में तिरुपति होटल है। इस आवासीय होटल में भी आधार तल पर रेस्टोरेंट है। यहां भी थाली 80 से 90 रुपये की है। मासाला डोसा विशाल आकार है जिसे खाकर आप खुश हो जाएंगे।

तिरुपति का अपना आवासीय होटल भी है। यह रेलवे स्टेशन के बिल्कुल ही बगल में स्थित है। माधवी को यहां का मसाला डोसा काफी पसंद आया। इनकी थाली में मिठाई भी होती है। ये चाहें तो मिठाई हटाकर थाली की कीमत कम भी कर सकते हैं। 

औरंगाबाद शहर में आप बाबा पेट्रोल पंप चौराहे के आसपास भी आपकी खाने पीने के कुछ अच्छे होटलों की तलाश पूरी हो सकती है। हलांकि हमें बस स्टेंड के सामने स्थित होटलों का भोजन कुछ खास नहीं जमा।
होटल तिरूपति की थाली। 

शहर के कई इलाकों में बड़ा पाव की अच्छी दुकाने खुल गई हैं जिनका डेकोरेशन अत्याधुनिक है। कई शहरों में अब बडा पाव की ब्रांडेड दुकानें खुलती जा रही है। गोली बड़ा पाव की तर्ज पर। यहां पर आप दिन भर कई किस्मों के बडा पाव का आनंद ले सकते हैं। आनादि को ऐसे ही एक स्टोर का बड़ा पाव  खूब पसंद आया। अब आप महाराष्ट्र में हैं और बड़ा पाव का स्वाद नहीं लिया तो भला क्या खाया...

औरंगाबाद के रेलवे स्टेशन के पास डाक्टर भापकर रोड पर एमटीडीसी का टूरिस्ट कांप्लेक्स भी स्थित है पर यह हर शहर की तरह ऊंची दुकान फीकी पकवान की तरह ही है।


(AURANGABAD CITY, MARATHWADA, FOOD, BADA PAW ) 

Wednesday, April 22, 2015

चलिए रफीक भाई के साथ देश की सैर पर चलें

औरंगाबाद के टैक्सी ड्राईवर रफीक भाई। वे कोई मामूली टैक्सी ड्राईवर नहीं है बल्कि वे एक चलता फिरता टूरिज्म का दफ्तर, वेबसाइट, टूर प्लानर सब कुछ हैं। उनकी जानकारी अदभुत है जो सैलानियों को रोमांचित करती है। पर इन सबके के बीच वे बड़े सहज और शांत हैं।

यह महज संयोग था कि हमने एलोरा और आसपास घूमने के लिए रफी भाई की इंडिका कार बुक की।उनकी गाड़ी हमें होटल श्रीमाया के स्वागत कक्ष के सौजन्य से मिली। तय समय के मुताबिक वे अपनी कार लेकर 30 मार्च को सुबह साढ़े छह बजे हमारे होटल पर पहुंच गए। हालांकि हमने दिन भर का प्लान पहले से तय कर लिया था।

 पर रफीक भाई ने शहर के बारे में हमें जानकारी देनी शुरू की। होटल से बाहर निकलते हैं चौड़ी सड़क पर आया वाकिंग प्लाजा। रफीक भाई बताते हैं कि शहर के लोग सुबह सुबह यहां टहलने आते हैं। जाते समय बाहर की अस्थायी दुकानों से ताजी सब्जियां लेकर जाते है। हमलोग कैंटोनमेंट एरिया पार कर शहर के बाहर मनमाड रोड पर आगे बढ़ रहे हैं। दोनों तरफ हरे भरे पेड़ हैं। वे हमे सुबह के नास्ते में बड़ा पाव खाने लिए बेहतरीन रेस्टोरेंट के बारे में बताते हैं। 

 हम पहले घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन करते हैं। उसके बाद कुछ घंटे एलोरा के लिए हैं। हम एलोरा में ही नास्ते में पूड़ी सब्जी, बड़ा पाव लेते हैं। उसके बाद आगे चल पड़ते हैं। रफी भाई हमें अंजीर(फिग) की खेती दिखाते हैं। भद्र मारूति के दर्शन के बाद हमलोग औरंगंजेब की मजार पर पहुंचे। हमारा अगला पड़ाव था दौलताबाद का किला। रफी भाई तमाम स्थलों के बारे में रोचक जानकारियां परोसते रहे।

रफीक भाई अपनी टैक्सी से देशी विदेशी सैलानियों को महाराष्ट्र का हर कोना, राजस्थान, मध्य प्रदेश और पूरा दक्षिण भारत घूमा चुके हैं। इसलिए उन्हें आधे देश के सड़क मार्ग की बहुत अच्छी जानकारी है। वे अपने साथ के सैलानियों को सबसे छोटे और सुविधाजनक मार्गों की जानकारी देते हैं। 

रफीक भाई ने अपने 20 साल के कैरियर में कभी किसी सैलानी को नाराज होने का मौका नहीं दिया। दुनिया के कई देशों के सैलानियों ने उनकी सेवा और ज्ञान से खुश होकर उनके बारे मे दुनिया के कई भाषाओं में लिखा है। आमतौर पर रफी भाई औरंगाबाद रेलवे स्टेशन बाहर आपको मिल जाएंगे। उनका फोन नंबर है – Md. RAFIK +91 98232 08932 ईमेल – md_rafik@rediff.com
एलोरा की गुफाओं में। 


 (AURANGABAD CITY, MARATHWADA, TRAVEL WITH RAFIK BHAI )