Thursday, April 30, 2015

पहाड़ों के देवता - माथेरन का पिसरनाथ मंदिर

माथेरन में मुख्य बाजार से आगे पैदल चलते हुए हमलोग घने जंगलों में पहुंच जाते हैं। रास्ते में होलीक्रास चर्च मिलता है। ये एक कैथोलिक चर्च है जो 1853 का बना हुआ है। यहां लिखी हुई इबारते बताती हैं कि   1906 में इस   चर्च का पुनर्निमाण कराया गया।
जंगल के रास्ते में लाल मिट्टी वाली पगडंडी और दोनों तरफ ऊंचे ऊंचे पेड़। रास्ते में जगह जगह बंदर हैं। इनसे बचने के लिए अनादि ने एक डंडा ले लिया है। आगे पीछे लोग आते जाते नहीं दिखाई दे रहे हैं। सो अनादि को थोड़ा थोड़ा डर भी लगता है। हम सही रास्ते पर जा तो रहे हैं। मैं कहता हूं कि पगडंडी अगर बनी है तो लोग आते जाते भी होंगे। एक जगह जाकर दो रास्ते दिखाई देते हैं।


हमारे होटल में मौजूद एक स्थानीय सज्जन ने कहा था कि मंदिर और लेक की तरफ जाने के लिए दाहिनी तरफ का रास्ता लिजिएगा। हमारी मंजिल थी शॉरलेट लेक। माथेरन की खूबसूरत झील। चलते चलते पानी का एक स्रोत नजर आया तब लगा कि हम झील के पास पहुंच गए है। पर हमें झील के बगल में एक बोर्ड नजर आया लिखा था - पिसरनाथ मंदिर।



स्वंभू शिवलिंगम हैं पिसरनाथ -  जहां पहाड़ हैं वहां महादेव का वास है। माथेरन में पिसरनाथ मंदिर माथेरन मुख्य बाजार से दो किलोमीटर दूर घने जंगलों के मध्य शिव जी का अनूठा मंदिर है। स्थानीय लोग सैकड़ो साल से उनकी पूजा करते आ रहे हैं।
मंदिर समुद्र तल से 2516 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। इस मंदिर में आकर अदभुत शांति का एहसास होता है। ये माथेरन का अति प्रचीन मंदिर है। मंदिर का सुंदर सा प्रवेश द्वार बना है। लाल रंग की दीवारों वाला मंदिर का भवन जंगल में बड़ा ही मनोरम लगता है। मंदिर का भवन  पैगोडा शैली में बना हुआ नजर आता है। मंदिर के अंदर एक बड़ा ध्यान कक्ष बना है। मंदिर के पुजारी जी ने बताया कि यहां स्वंभू शिव हैं। यानी वे खुद प्रकट हुए हैं ठीक उसी तरह जैसे महाबलेश्वर में शिव हैं।

 परंपरागत मंदिरों की तरह यहां शिवलिंग की स्थापना नहीं की गई है। शिवलिंग अंगरेजी के अक्षर एल आकार का है।  शिवजी का श्रंगार सिंदूर से किया जाता है। शिव जी के साथ शेषनाग को स्थापित किया गया है। पुजारी जी की सातवीं पीढ़ी इस मंदिर में पूजा पाठ करा रही है। पिसरनाथ शिव जी की उपनाम है।


पिसरनाथ यानी पहाड़ों के देवता। ये माथेरन के लोगों के ग्राम देवता हैं। इस मंदिर के प्रति लोगों में अटूट आस्था है।  ये शिव जी का बड़ा ही सिद्ध मंदिर है। माथेरन के लोगों की शिवजी में काफी आस्था है। मंदिर के अंदर सिर्फ इंसान ही नहीं बल्कि जीव जंतु भी आस्था से से सीस नवाने आते हैं। मंदिर सूर्योदय से सूर्यास्त तक खुला रहता है। यहां दर्शन के लिए सूर्यास्त से पहले आना ही ठीक रहता है क्योंकि रात्रि में मार्ग में अंधेरा हो जाता है। मंदिर परिसर में पहुंचकर अद्भुत शांति का एहसास होता है। चारों तरफ जंगल और घाटियां मंदिर के वातावारण को और भी आस्थावान बनाते हैं।

हम दोपहर में मंदिर में पहुंचे थे। यहां मंदिर के ध्यान कक्ष में बैठकर थोड़ी देर हमने ध्यान किया। मंदिर के अंदर जाने पर देखा कुछ लोग अनुष्ठान भी संपन्ना करा रहे थे। ध्यान कक्ष कुछ स्वान (कुत्ते) भी मौजूद थे। शिव सबके देवता हैं।

जंगल में है मंगल  - पिसरनाथ मंदिर के बगल में शारलेट झील और झील के किनारे दो-तीन दुकानें हैं, जिसमें चाय नास्ता और जूस आदि मिल जाता है। यहां जंगल में मंगल जैसा माहौल नजर आता है। मंदिर के आसपास दिलकश नजारे हैं। ऐसे नजारे जहां कुछ वक्त गुजारने का दिल करता है। जंगल में चलते चलते आप थक गए हैं तो यहां थोड़ी से पेट पूजा भी कर सकते हैं। मंदिर के पास ही इको प्वाइंट है और झील के उस पार लार्ड प्वाइंट है। 
-विद्युत प्रकाश मौर्य-  vidyutp@gmail.com   (MATHERAN, PISARNATH TEMPLE, SHIVA ) 


Wednesday, April 29, 2015

माथेरन - सनसेट प्वाइंट की सुहानी शाम

महाराष्ट्र के छोटे से हिल स्टेशन माथेरन में घूमने लिए बहुत सारे प्वाइंट हैं। यहां   सबसे अच्छा तरीका पैदल घूमना है। पर आप समर्थ नहीं हैं तो हाथ रिक्शा और घोड़े से भी घूम सकते हैं। पर जो आनंद साफ सुथरी हवा में पैदल घूमने का है वह किसी और तरीके से कहां। हमें स्थानीय लोगों ने बताया कि घोड़े पर सवार हो माथेरन घूम रही एक विदेशी लड़की खंडाला प्वाइंट पर पिछले दिनों गिर कर मर गई। घोड़ा अचानक भड़क गया था। 

क्या क्या देखें -  माथेरन बाजार में राम मंदिर और   माधवजी पार्क है।   इसके अलावा एलेक्जेंडर प्वाइंट, खंडाला प्वाइंट, पिसरनाथ मंदिर, शॉरलेट लेक, लार्ड प्वाइंट, इको प्वाइंट, मंकी प्वाइंट, सनसेट प्वाइंट जा सकते हैं।

अगले दिन की सुबह से ही हमने माथेरन में घूमना शुरू कर दिया। हां, पैदल ही। सबसे पहले हमलोग माधव जी पार्क पहुंचे। पार्क में हमें  
फोटोग्राफर मुकीम शेख   मिले जिन्होने अपने निकॉन कैमरे से हमारी तस्वीरें उतारी। ( फोन – 9423806509)   मुकीम लखनऊ के हैं पर अब माथेरन को अपना ठिकाना बना लिया है। 


अब सालों से यहीं फोटोग्राफी करते हैं। आप जाएंगे तो आपकी भी मुलाकात हो जाएगी। इस पार्क में ढेर से झूले हैं सो अनादि तो यहीं जमे रहना चाहते थे। पर हमलोग आगे चले।   हमारा   अगला पड़ाव है खंडाला प्वाइंट भला खंडाला प्वाइंट क्यों...क्योंकि यहां से खंडाला शहर नजर आता है।

इसके बाद एलेक्जेंडर होटल के पास एलेक्जेंडर प्वाइंट पहुंच गए हैं हमलोग। बंदरों का डर है तो अनादि ने जंगल से लकड़ी उठाकर एक छड़ी बना ली है। इसके बाद जंगलों के बीच से पदयात्रा करते हुए करीब एक किलोमीटर चलने के बाद हमलोग पहुंच गए प्राचीन पिसरनाथ मंदिर। शिव का सुंदर सा मंदिर है एक झील के किनारे। मंदिर के बगल में शॉरलेट लेक है। बताते हैं लोग कि बारिश में ये झील और सुंदर हो जाती है। पर अभी इस झील में थोड़ा पानी कम है।
माथेरन में शॉरलेट लेक के सामने। 

शॉरलेट लेक के बगल में हैं लार्ड प्वाइंट। इस झील से थोड़ा आगे चलने पर आ जाता है इको प्वाइंट। यहां पर क्रॉस द वैली के लिए रोपवे लगा है। क्रॉस द वैली का किराया 300 रुपये प्रति फेरी। हमें इस तरीके से वैसी क्रॉस करने में कोई रूचि नहीं है। हालांकि ये है बड़ा रोमांचकारी। तो हमलोग आगे बढ़ चले। भूख लगी थी सो जंगल में कच्ची कैरी और बड़ा पाव खाया। कुछ मराठी महिलाएं जंगल के रास्ते में कच्ची कैरी (आम) बेच रही थीं। इसके बाद आइसक्रीम भी खाया। और दोपहर में अपने होटल के लिए वापस।

अब शाम को   सनसेट प्वाइंट   जाने का कार्यक्रम बना। हां तो सनसेट तो शाम को ही देखेंगे न.. जाने के लिए तीन किलोमीटर जंगलों से पैदल रास्ता। रेलवे स्टेशन के बगल में दिवादकर होटल से सनसेट प्वाइंट के लिए रास्ता जाता है।   सनसेट प्वाइंट के रास्ते में स्टेट बैंक होलीडे होम और अशोक होटल आते हैं। 


यहां भी खूब बंदर दिखाई देते हैं। इसलिए पास में  एक   मंकी प्वाइंट    भी है। तीन किलोमीटर जंगल से होकर जाते हुए हम रास्ते में अकेले थे। ऐसा लगा जैसे हम ही उधर जाने वाले अकेले बेवकूफ हैं। पर सनसेट प्वाइंट पर शाम को सैकड़ों सैलानी जुटते हैं। डूबते हुए सूर्य के सौंदर्य को निहारने। और ये बन जाती है माथेरन की सबसे यादगार शाम। यहां मौजूद होते हैं मुंबई के कारोबारी घराने के लोग, जो छुट्टियां मनाने पहुंचे हैं।


अनादि को उनकी ही उम्र के गोविंद जैसे दोस्त मिल गए। वही जो सुबह पार्क में मिले थे। तो हमलोगों ने यहां घंटे पर मस्ती की। कुछ खाया पीया। लौटते हुए रात हो गई है, पर जंगल के रास्ते में रोशनी का इंतजाम है। हमें लगा कि माथेरन में प्रवेश के लिए दिए गए 50 रुपये टैक्स का सदुपयोग हो रहा है।
- vidyutp@gmail.com

( MATHERAN, SUNSET POINT , MONKEY POINT)

Tuesday, April 28, 2015

माथेरन में हर सैलानी को देना पड़ता है प्रवेश शुल्क

शाम गहराने के साथ हमारी ट्रेन माथेरन रेलवे स्टेशन पर पहुंच चुकी थी। माथेरन देश में एक ऐसा हिल स्टेशन है जहां हर आने वाले सैलानी को प्रवेश शुल्क देना पड़ता है। आजकल हर बाहरी वयस्क के लिए 50 रुपये और बच्चों के लिए 25 रुपये लिए जाते हैं। ये कर माथेरन गिरिस्थान नगर परिषद वसूलती है। इसके वसूली काउंटर रेलवे स्टेशन और अमन लाज के पास टैक्सी स्टैंड में बने हुए हैं। टैक्स देने के बाद आप अगले कुछ दिन यहां निवास करने के अधिकारी बन जाते हैं। इस कर की राशि को शहर के ररखाव में खर्च किया जाता है। 
हमलोग जैसे माथेरन रेलवे स्टेशन पर उतरे टैक्स वसूलने वालों से हमारा सामना हुआ। पहले तो थोड़ा अजीब लगा या यूं कहें कि दादागिरी जैसा प्रतीत हुआ। पर बाद में पता चला ये तो दस्तूर है, मानना ही पड़ेगा। 

महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में स्थित माथेरन 800 मीटर से ज्यादा की ऊंचाई पर है। शहर की आबादी महज 7000 है। इसमें बड़ी संख्या में मुस्लिम लोग हैं। कई पारसियों की कोठियां भी माथेरन में है जो विरान पड़ी रहती हैं। कभी माथेरन मुंबई के अमीर पारसी लोगों का पसंदीदा हिल स्टेशन हुआ करता था। आजकल हर मुंबई वासी यहां सुकुन के कुछ दिन बीताने के लिए आना चाहता है। इसलिए शनिवार और रविवार को यहां खासी भीड़ हो जाती है। तो कभी माथेरन में प्रवेश का कर दो रुपये था जो बढ़ते हुए 50 रुपये हो गया। वैसे महाराष्ट्र के एक और हिल स्टेशन महाबलेश्वर में भी 20 रुपये का प्रवेश कर लगता है।


हमारा ठिकाना हुंजर हाउस - माथेरन में हमारा ठिकाना पहले से ही तय था। स्टेजिला डाट काम से हमने ऑनलाइन बुकिंग करा रखी थी। रेलवे स्टेशन के बगल में ही है हुंजर हाउस। रंगोली होटल के ठीक सामने। यह माथेरन का एक किफायती होटल है। यहां हमे आवास 700 रुपये प्रतिदिन की दर से मिल गया है। पर यहां बाकी ज्यादातर होटल महंगे हैं। 
खासतौर पर शनिवार और रविवार को यहां होटलों की दरें सीधे दोगुनी हो जाती है। मुंबई से छुट्टियां मनाने वाले लोग माथेरन बडी संख्या में शनिवार और रविवार को ही पहुंचते हैं। दूसरी ध्यान देने की बात है कि सप्ताहांत में यहां होटलों की बुकिंग भी कम से कम दो दिन के लिए ही होती है।


 खैर हमलोग माथेरन रेलवे स्टेशन से उतर कर लोगों से रास्ता पूछकर टहलते हुए होटल तक पहुंच गए तो होटल के बाहर बैठे प्रोपराइटर हमारा ही इंतजार कर रहे थे। यहां कई होटलों में खाना नास्ता के पैकेज के साथ बुकिंग होती है। पर हमारा हुंजर हाउस किफायती होने के बावजूद बेहतर होटल है। पास में एक और होटल है मधुमालती। 


हमारे होटल हुंजर हाउस के कमरे से खिलौना ट्रेन हमेशा आती जाती दिखाई देती है। होटल के लान में दो झूले भी लगे हैं। यहां अनादि देर तक झूले पर झूलते रहे। होटल में कैंटीन नहीं है पर आप आसपास में निकट के रेस्टोरेंट में खाने के लिए जा सकते हैं। पहले दिन शाम ढल चुकी है इसलिए हमलोग पास के एक रेस्टोरेंट में जाकर रात का खाना खाने के बाद सो गए। 

माथेरन के माधव जी पार्क में ( 2015 ) 
अगली सुबह मैं जल्दी जगता हूं और टहलने निकल पड़ता हूं। कहां नेरल माथेरन रेलवे के ट्रैक पर। इस नैरो गेज के ट्रैक को पकड़कर तकरीबन दो किलोमीटर टहलता हुआ जाता हूं। फिर इसी रास्ते से लौट आता हूं। रास्ते में पक्षियों का कलरव सुनाई देता है। रात को इसी ट्रैक से होकर चलने वाली ट्रेन पर आना हुआ था। पर सुबह में इस ट्रैक पर सैर करने का भी अपना अलग आनंद है। हरे भरे वन के बीच दो फीट का ट्रैक। होटल लौटकर आने के बाद माधवी और वंश को जगाया। बोला चलो नास्ते के लिए चलें और उसके बाद दिन भर भ्रमण के लिए तैयार हो जाइए।
- विद्युत प्रकाश मौर्य  ( MATHERAN HILL STATION - 2 ) 

Monday, April 27, 2015

माथेरन - इस शहर में कोई डीजल वाहन नहीं आ सकता

औरंगाबाद मुंबई जनशताब्दी एक्सप्रेस में 
औरंगाबाद-अजंता-एलोरा में कुछ दिन गुजारने के बाद हमारा अब अगला पड़ाव था माथेरन। महाराष्ट्र का एक खूबसूरत हिल स्टेशन। सफर शुरू हुआ औरंगाबाद से मुंबई मार्ग पर कल्याण होकर। कल्याण से नेरल फिर नेरल से खिलौना ट्रेन का सफर करके हम पहुंचे माथेरन। माथेरन के प्रदूषण मुक्त हिल स्टेशन है। 
12072 औरंगाबाद मुंबई जन शताब्दी एक्सप्रेस  सुबह 6 बजे औरंगाबाद के प्लेटफार्म नंबर एक से खुलती है। हमलोग होटल से टहलते हुए रेलवे स्टेशन पहुंच गए। जनशताब्दी के वातानुकूलित कोच का सफर अच्छा रहा। अनादि सहयात्री के साथ वीडियो गेम खेलने में व्यस्त हो गए।


थोड़ी देर बाद ट्रेन मनमाड जंक्शन पर रुकी। यहां पर हमने बड़ा पाव खाया।  क्योंकि नास्ते का समय हो गया था।  अनादि को बड़ा पाव खूब पसंद आने लगा है।  यह हल्का नास्ता भी है। इसलिए ठीक है।  तो चलती  ट्रेन में ही हमारा नास्ता हो गया है।  जनशताब्दी का   अगला स्टेशन आया है नासिक रोड।


हमलोग पिछली यात्राओं में नासिक और आसपास के इलाके  घूम चुके हैं।  जनशताब्दी  को औरंगाबाद, मनमाड, नासिक रोड,  कल्याण  जंक्शन, थाने और दादर  यही ठहराव हैं।  इसलिए सुबह-सुबह औरंगाबाद से मुंबई जाने के लिए ये बहुत अच्छी ट्रेन है। यह ट्रेन हमें दोपहर से पहले 11.30 बजे कल्याण स्टेशन पर पहुंचा देती है। हमलोगों ने कल्याण रेलवे स्टेशन पर ही उतरना तय किया है। 


दरअसल हमें पुणे मार्ग पर नेरल रेलवे स्टेशन जाना है, इसलिए छत्रपति शिवाजी टर्मिनस तक जाने की कोई जरूरत नहीं है। तो हमलोग कल्याण में ही उतर गए हैं। यह भी काफी बड़ा और भीड़ भाड़ वाला रेलवे स्टेशन है। यहां से नेरल के लिए लोकल ट्रेन हर वक्त मिलती है। इसलिए हमलोग  दोपहर के लंच के लिए अपने बैगेज के साथ कल्याण रेलवे स्टेशन से बाहर निकल आए।


एक होटल में खाने के लिए बैठ गए। इस दौरान अनादि अचानक बोले कि हमें टायलेट जाना है। तो होटल वाले ने बताया पड़ोस के बार में चले जाएं। जब हम बार घुसे तो देखा कि यहां दिन दहाड़े लोग पेग लगा रहे थे। मैं भी किसी मुंबई के बार में पहली बार दाखिल हुआ था। खैर हम टायलेट का इस्तेमाल कर बाहर आ गए। दोपहर का भोजन कल्याण में लेने के बाद हमने यहां से नेरल के लिए लोकल ट्रेन ले ली। करजत पुणे की तरफ जाने वाली हर लोकल ट्रेन नेरल में रूकती है।



पर नेरल से हमारी माथेरन की ट्रेन शाम को है। इसलिए हमें नेरल में कुछ घंटे इंतजार करना पड़ेगा। इस दौरान  रेलवे स्टेशन पर ही माधवी की तबीयत थोड़ी खराब हो गई। हमलोगों ने उन्हें प्लेटफार्म की बेंच पर ही सुला दिया और हवा करने लगे। इस दौरान नन्हें अनादि ने मां का खूब ख्याल रखा। फिर थोड़ी देर में उनकी तबीयत ठीक हुईं तो हमने आसपास में नेरल के बाजार का थोड़ा मुआयना किया।    रेलवे स्टेशन के बाहर से माथेरन के लिए टैक्सियां भी मिल रही हैं। शेयरिंग भी जाती हैं। अगर रेल का टिकट न मिल पाए तो टैक्सी से जा सकते हैं।

इस शहर में कोई डीजल वाहन नहीं जा सकता 

शून्य प्रदूषण वाला हिल स्टेशन है माथेरन   - नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने 8 अप्रैल 2015 को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में 10 साल से ज्यादा पुराने डीजल वाहनों पर प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया है । ऐसा आदेश शहर के पर्यावरण को बचाने को ध्यान में रखते हुए दिया गया है। वाहनों की लॉबी हाय तौबा मचा रही है। पर देश में एक ऐसा पर्वतीय शहर है जहां डीजल या पेट्रोल चलित किसी भी वाहन का प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित है। महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में है हिल स्टेशन माथेरन जहां किसी तरह का वाहन शहर के अंदर नहीं जाता। शहर की प्राकृतिक आबोहवा को बचाए रखने के लिए इस तरह का फैसला बहुत साल पहले लिया गया था।

पार्किंग से पैदल सफर  - माथेरन शहर की सीमा से बाहर अमन लाज के पास पार्किंग में वाहनों को पार्क करके आगे का सफर पैदल करना पड़ता है। माथेरन एशिया का एकमात्र हिल स्टेशन है जहां पर सिर्फ पदयात्रा करके ही चल सकते हैं। इसलिए इसे सैलानी जीरो पल्यूशन हिल स्टेशन कहते हैं। यहां तक की साइकिल भी यहां नहीं चलती। सामान ढुलाई के लिए घोड़े हैं ना। मुंबई से इस हिल स्टेशन की दूरी 100 किलोमीटर है। यहां स्थानीय लोग भी किसी तरह का डीजल पेट्रोल चलित वाहन नहीं रख सकते। इमरजेंसी के लिए सिर्फ शहर में दो एंबुलेंस हैं। अगर कोई नेता या वीआईपी भी शहर में आता है तो वह भी पदयात्रा ही करता है। बूढे और बीमारों के लिए हाथ रिक्शा का विकल्प मौजूद है। सामान ढोने के लिए लोग महिला और पुरुष कुलियों की सेवाएं लेते हैं।



हालांकि शहर के बीचों बीच बाजार तक खिलौना ट्रेन आती है। उसमें डीजल इंजन लगा है। पर्यावरणविद काफी समय से तर्क दे रहे हैं कि इस ट्रेन को बिजली या फिर सीएनजी इंजन से चलाया जाए, जिससे माथेरन में कोई डीजल लोको भी प्रवेश नहीं कर सके। अगर रेलवे ये सुझाव मान लेता है तो आने वाले दिनों में यहां डीजल लोको का आना भी बंद हो सकता है।    वास्तव में हमें इस नन्हें से शहर से सीख लेने की जरूरत है ताकि हम अपने शहर की आबोहवा बचा सकें। वरना हम आने वाली पीढ़ी को क्या जवाब देंगे।

डीजल   ईंजन या जनरेटर से जो धुआं निकलता है उसमें बारीक से बारीक ऐसे ऐसे तत्व होते हैं जो आपकी सांस की नली से होते हुए फेफड़े को ख़राब कर देते हैं।  दिल के आस पास दौड़ने वाली धमनियों को कमज़ोर कर देते हैंदिमाग की कोशिकाओं को बेकार कर देते हैं। कैंसर,   पार्किंसन,   अलझाईमर,   हार्ट अटैक,   सांस की   तकलीफ,   बिना बात की खांसी,   आंखों में जलन जैसी बीमारियां डीजल प्रदूषण से हो सकती है।

बढ़ता जा रहा है खतरा 

80 हजार   से भी ज्यादा डीज़ल वाले ट्रक दिल्ली में रोज रात को प्रवेश करते हैं और इसकी हवा खराब कर जाते हैं। 
16   गुना   ज़्यादा हो गई है दिल्ली में डीज़ल की खपत बढ़ने से  RSPM   यानी रेस्पिरेपल सस्पेंडेट पर्टिकुलेट मैटर की मात्रा तय मानकों से।

2020   तक    सभी डीज़ल कारों को बैन कर दिया जाएगा फ्रांस की राजधानी   पेरिस में

2019  तक   हटा देने की कवायद हो रही है हांगकांग में यूरो फोर डीजल गाड़ियों को। 

- विद्युत प्रकाश मौर्य 
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 PS -  मनाली के आगे डीजल वाहन नहीं
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटीके आदेश के मुताबिक पहली मई 2015 से मनाली से रोहतांग जाने वाले डीजल इंजन पर्यटक वाहनों पर प्रतिबंध लगा दिया है। अब पहली मई के बाद केवल पेट्रोल इंजन वाहनों में ही पर्यटक रोहतांग जा सकेंगे। एनजीटी ने यह आदेश रोहतांग दर्रे के आसपास बढ़ते हुए प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए जारी किए हैं।

हिमाचल प्रदेश का पर्यटक सीजन भी मई और जून में यौवन पर रहता है। उस समय मैदानी इलाकों की भीषण गर्मी से राहत पाने के लिए पर्यटक पहाड़ों का रुख करते हैं। एनजीटी के आदेशों से कुल्लू-मनाली के पर्यटन कारोबारियों में हड़कंप मच गया है। कुल्लू में 80 फीसद पर्यटक वाहन डीजल इंजन हैं और 20 फीसद पेट्रोल इंजन हैं। अकेले मनाली में ही पर्यटक वाहनों की संख्या आठ सौ के करीब है। मई व जून में रोजाना रोहतांग के लिए मनाली से ढाई से तीन हजार पर्यटक वाहन आते-जाते हैं। इन आदेशों के बाद डीजल इंजन वाहन संचालकों की चिंता बढ़ गई है।
 ( 21 अप्रैल 2015 को प्रकाशित एक खबर) 

( MATHERAN -1)

Sunday, April 26, 2015

भाप इंजन की विरासत की दास्तां सुनिए...

महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर का रेलवे स्टेशन। बाहर आने पर स्टेशन के भवन को देखकर ये एहसास हो जाता है कि आप अंजता और एलोरा के शहर में आ गए हैं। पर स्टेशन के बाहर एक और नायाब चीज आपका इंतजार कर रही है जो रेलवे के इतिहास से रूबरू कराता है। स्टेशन परिसर में खड़ा है मीटर गेज का स्टीम लोकोमोटिव। यह भारतीय रेलवे के स्टीम इंजन की गौरवशाली विरासत की कहानी चुपचाप खड़ा होकर सुना रहा है। 

औरंगाबाद रेलवे स्टेशन के बाहर खड़ा यह स्टीम लोकोमोटिव रेलवे को 1998 तक अपनी सेवाएं दे रहा था। हालांकि वह अभी थका भी नहीं था रिटायर भी नहीं हुआ था। पर इलाके में स्टीम इंजन का दौर खत्म हो रहा था इसलिए उसे मजबूरी में रिटायर होना पड़ा। ये लोकोमोटिव है वाईपी 2590 ( YP2590 ) 



यह एक स्वदेशी लोकोमोटिव है। इसका निर्माण टेल्को जमशेदपुर में किया गया था। 1965 में निर्मित यह लोकोमोटिव मीटर गेज पर लंबे समय तक अपनी सेवाएं देता रहा। यह 4-6-2 श्रेणी का लोकोमोटिव है जो मीटर के गेज रेलवे ट्रैक का पापुलर माडल हुआ करता था। 16 अगस्त 1998 को इसने अपना आखिरी सफर महाराष्ट्र क्षेत्र में किया। किसी समय में मनमाड से नांदेड़ का रेल मार्ग मीटर गेज का हुआ करता था। तब इस मार्ग पर यह लोकोमोटिव यात्री गाडियां को खींचा करता था। पर अब वह दौर इतिहास बन चुका है। 


अब न स्टीम इंजन हैं न ही मीटर गेज ट्रैक। पर लोग रेलवे का इतिहास जान सकें और देख सकें इसलिए इस लोकोमोटिव को औरंगाबाद रेलवे स्टेशन के बाहर लाकर स्थापित किया गया है।

वैसे स्टीम लोकोमोटिव की सबसे ब़ड़ी रेंज हरियाणा के रेवाड़ी में देखी जा सकती है। पर आप रेल से देश के अलग अलग हिस्सों में भ्रमण करते हुए कई जगह स्टीम लोकोमोटिव देखकर रेलवे की विरासत को याद कर सकते हैं। वैसे सन 2000 से पहले देश में सभी स्टीम लोकोमोटिव इतिहास का हिस्सा बन चुके थे।
( INDIAN RAIL, STEAM, LOCOMOTIVE, AURANGABAD, MAHARASTRA )


Saturday, April 25, 2015

अजंता - 26 गुफाओं में बुद्ध का जीवन और दर्शन

औरंगाबाद के करीब स्थित अजंता में आप एक नंबर गुफा से घूमते हुए आगे की ओर बढ़ते हैं। गुफा नंबर 26 अजंता की आखिरी देखने वाली गुफा है। इनमें कई गुफाओं में बौद्ध चैत्य गृह और स्तूप बने हैं तो कई में पेंटिंग हैं। 

गुफा नंबर 17 में बुद्ध की जातक कथाओं से संबंधित चित्र बने हैं। न सिर्फ दीवारों पर बल्कि छत पर भी चित्र बनाए गए हैं। आप सारी गुफाएं देखते हुए ही आगे बढ़ें। कोई छोड़ने का मतलब नहीं बनता। अजंता की गुफा नंबर 27 से 30 तक जाने के लिए कोई रास्ता मौजूद नहीं है। रास्ता बनाया ही नहीं गया। पुरातत्व सर्वेक्षण का स्टाफ इन गुफाओं में रस्सी के सहारे सफाई के लिए जाते हैं। आम दर्शकों के लिए वहां पहुंचना मुश्किल है।

 
अजंता की कई गुफाओं में प्राकृतिक रोशनी नहीं जाती। यहां पर किसी जमाने में धूप में बड़े बड़े आइने लगाकर रोशनी रिफ्लेक्टर के माध्यम से भेजी जाती थी। पर कुछ साल पहले जापान सरकार ने यहां पर ऐसी एलइडी लाइटें लगवा दी हैं जिनसे मूर्तियों को कोई नुकसान नहीं होता।
बुजुर्ग लोग जो पैदल चलने में थक जाते हैं उनके घूमने के लिए अजंता में पालकी भी मौजूद है। पालकी किराया 1400 रुपये प्रति व्यक्ति है।


 आपको प्रवेश द्वार पर अजंता के गाइड मिलते हैं तो 300 रुपये या अधिक राशि की मांग करते हैं। आप समूह में हैं तो गाइड कर सकते हैं। अन्यथा आप अजंता का ब्रोशर ले लें। इस ब्रोशर के सहारे भी घूम सकते हैं। हर गुफा के बाहर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से चौकीदार तैनात हैं वे भी गुफा के बारे में बताते हैं। पर बाद में वे आपसे थोड़ी बक्शीश की अपेक्षा रखते हैं।
अजंता की गुफाएं देखकर लौटने के बाद थक गए हों तो खाने पीने के लिए आपको यहां एमटीडीसी का रेस्टोरेंट नजर आता है। पर ये रेस्टोरेंट ठेके पर चलाया जाता है। यहां खाना काफी महंगा भी है। अगर आप यहां न खाना चाहें तो शटल बस सेवा से वापस आप जब शापिंग प्लाजा पहुंचेंगे तो वहां भी खाने-पीने के लिए दो समान्य से होटल हैं। यहां आप सरकारी होटल की तुलना में  सस्ते में पेट पूजा कर  सकते हैं।


यहां पर हमें मुरली कृष्ण होटल में सिर्फ 50 रुपये की थाली मिल गई, जिसका खाना संतोष जनक था।  अजंता में बने  शापिंग प्लाजा से आप मूर्तियां खरीद सकते हैं। थोड़ा मोलभाव करके यहां से सस्ते में मूर्तियां खरीदी जा सकती हैं।



अगर आप अजंता में एक दिन से ज्यादा वक्त गुजारना चाहते हैं तो अजंता की गुफाओं से 3 किलोमीटर आगे जलगांव मार्ग पर फर्दापुर गांव में एमटीडीसी का रेस्ट हाउस है, जहां ठहरा जा सकता है। इसके अलावा अजंता से आठ किलोमीटर आगे पहाड़ी पार करने के बाद अजंता गांव में भी एक दो गेस्ट हाउस हैं।

अजंता में गौतम बुद्ध 
अजंता घूमते समय सावधानियां
 
अजंता और एलोरा की गुफाओं में फोटोग्राफी करते समय फ्लैश का इस्तेमाल कत्तई नहीं करें। कलाकृतियों के संरक्षण के लिहाज से यहां फ्लैश का इस्तेमाल प्रतिबंधित है। अपने साथ पानी की बोतल लेकर चलें पर खाने पीने की सामग्री नहीं ले जाएं। ये पॉलीथीन मुक्त क्षेत्र है इसलिए यहां कचरा नहीं फैलाएं।



कर्मचारियों को महीनों से वेतन नहीं –   मैं 31 मार्च 2015 को अजंता पहुंचा। गुफाओं में घूमते हुए कई चौकीदारों से बात हुई, पता चला कि इन चौकीदारों की नौकरी अस्थायी है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने सालों से इन्हे स्थायी नहीं किया है।   ये भारत सरकार के दैनिक मजदूर  हैं। सबसे बुरी बात तो ये है कि इन्हे वेतन 5 से 6 माह बाद मिलता है।

चलों चलें अजंता की सैर करने..

हम यहां अप्रैल  माह में हैं। पर इन कर्मचारियों ने बताया कि दिसंबर के बाद से वेतन नहीं मिला है। इसी तरह यहां निजी कंपनी के सुरक्षा गार्ड लगाए गए हैं।   उन्हे भी छह माह बाद वेतन मिल पाता है। जब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इनकी कंपनी को चेक जारी करता तब जाकर सुरक्षा गार्डों को वेतन मिल पाता है। भारत सरकार की इस संस्था में जो हो रहा है वह शर्मनाक है।
अजंता - दीवारों पर चित्रकारी....

अजंता से वापसी के लिए हमें   टूरिस्ट सेंटर से चलकर मुख्य सड़क पर आना पड़ा। यहां से   औरंगाबाद जाने वाली बस मिल गई। बस में  जगह आसानी से मिल गई । तो वापसी का सफर भी  सुखद रहा।  तो आज की शाम औरंगाबाद शहर के नाम। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य - मुझे लिखें -    vidyutp@gmail.com
 (  WORLD HERITAGE SITE,   AJANTA, AURANGABAD, BUDDHA, CAVES, WORLD HERITAGE SITE )  



Friday, April 24, 2015

अजंता - गीत गाया पत्थरों ने



 अजंता में  आपको पत्थरों में सुनाई देता है संगीत। एक अनवरत संगीत। प्राणों को झंकृत कर देने वाला संगीत। जो अन्यत्र दुर्लभ है। सैकड़ो साल हजारों कलाकारों की अनवरत तपस्या की परिणति है अजंता की गुफाएं।   अजंता की गुफाओं में बनी कलाकृतियों में हजारों शिल्पियों के श्रम और साधना को महसूस किया जा सकता है। यहां पत्थरों से निकलने वाले संगीत को तो यहां पहुंचकर ही महसूस किया जा सकता है। तभी तो अजंता की गुफाएं विश्व के सर्वश्रेष्ठ दर्शनीय स्थलों में एक हैं। 


  
काफी लोग ताजमहल को देखकर अद्भुत कहते हैं, पर अजंता की गुफाओं को देखने के बाद ये लगता है कि देश का दुनिया में ऐसी नायाब कृति कहीं नहीं हो सकती। वर्गुना नदी के तीन तरफ पहाड़ों की 20 मीटर गहराई तक काट कर गुफाएं बनाई गई हैं जिसमें गौतम बुद्ध का जीवन दर्शन कलाकृतियों और मूर्ति शिल्प में उतारा गया है।

अजंता में विचरण करते हुए लगता है मानो पत्थरों से लगातार  संगीत  प्रतिध्वनित हो रहा हो। सारी गुफाएं देखते देखते आप आनंदित होते हैं
, रोमांचित होते हैं, अचरज करते हैं, कब शाम ढलने लगती है पता भी नहीं चलता। अजंता की इन 32 गुफाओं का निर्माण पहली शताब्दी से सातवीं शताब्दी के बीच हुआ है। ये पूरी तरह बुद्ध  के जीवन को समर्पित हैं। 


सैकड़ो साल लोगों की नजरों से ओझल रहीं -
सह्याद्रि की पहाडि़यों पर स्थित अजंता की इन
   32    गुफाओं में कुल    5   प्रार्थना भवन और   25   बौद्ध मठ हैं। पर साल 1819 से पहले ये गुफाएं सैकड़ो साल तक लोगों की नजरों से ओझल रही हैं। अभी भी आप सिर्फ 28 गुफाओं को ही देखने जा सकते हैं। चार के लिए रास्ता नहीं है। 

अजंता - गुफा नंबर 21 के इन स्तंभों पर थपकी देने से निकलता है संगीत। 

इन गुफाओं की खोज आर्मी ऑफिसर जॉन स्मिथ व उनके दल द्वारा सन्   1819   में की गई थी। वे यहाँ शिकार करने आए थे,   तभी उन्हें कतारबद्ध   29   गुफाओं की एक शृंखला नजर आई। इस खोज के बाद दुनिया भर में ये गुफाएं प्रसिद्ध हो गई। घोड़े की नाल के आकार में निर्मित ये गुफाएं अत्यन्त ही प्राचीन व ऐतिहासिक महत्त्व की है।

गीत गाया पत्थरों ने     अजंता की गुफाओं  को देखते हुए बस यही ख्याल मन में आता है - गीत गाया पत्थरों ने...
इन गुफाओं का इस्तेमाल भगवान बुद्ध की शिक्षाओं का अध्‍ययन करने के लिए किया जाता था। एक गुफा ऐसी है जिसके स्तंभ को थपकाने पर संगीत की धुन निकलती है। गुफाओं की दीवारों तथा छतों पर बनाई गई ये तस्‍वीरें भगवान बुद्ध के जीवन की विभिन्‍न घटनाओं और विभिन्‍न बौद्ध देवत्‍व की घटनाओं का चित्रण करती हैं। इसमें से सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण चित्रों में जातक कथाएं   हैं, जो   बोधिसत्व के रूप में बुद्ध के पिछले जन्‍म से संबंधित विविध कहानियों का चित्रण करते हैं। यूनेस्‍को   द्वारा   1983   में अजंता को विश्‍व विरासत स्‍थल   घोषित किया गया। यह देश का पहला विश्व विरासत स्थल है।
अजंता में बुद्ध। 

कैसे पहुंचे    औरंगाबाद से अजंता की दूरी 110 किलोमीटर है। औरंगाबाद सेंट्रल बस स्टैंड से नियमित तौर पर जलगांव की तरफ जाने वाली बसें अजंता में रूकती हैं। पर अगर आपको सिर्फ अजंता जाना हो तो जलगांव में रूक कर भी जा सकते हैं। जलगांव से अजंता की दूरी महज 65 किलोमीटर है। अजंता की गुफाओं से पहले अजंता नामक एक गांव आता है। यहां पर एक दो गेस्ट हाउस बने हैं। इस गांव में भी एक किला नजर आता है।
अजंता में एमटीडीसी का रेस्टोरेंट 

अजंता के प्रवेश द्वार के पास सड़क पर तो कोई मार्क बना हुआ नहीं दिखाई देता। पर जलगांव औरंगाबाद के बीच चलने वाली बसें यहां रूक जाती हैं। गुफा का स्वागत कक्ष शानदार बना है। यहां पर सुविधाओं के इस्तेमाल के लिए 15 रुपये का शुल्क देना पड़ता है। यहां एक छोटा सा सुंदर सा बाजार है। जहां खाने पीने और  प्रतीकात्मक उपहार आदि खरीदने की सुविधा है। 


इस बाजार को पार करने के बाद एक बस स्टैंड आता है। यहां से अजंता के दूसरे प्रवेश द्वार के लिए बसें चलती हैं। कुल 4 किलोमीटर की दूरी का किराया 15 रुपये है। एसी बस का किराया 20 रुपये है। मुख्य द्वार पर दुबारा प्रवेश का टिकट खरीदना पड़ता है। भारतीय लोगों का टिकट 10 रुपये का है। समूह में 5 रुपये का लाइटिंग का टिकट अलग से लेना पड़ता है। गुफाओं के बीच में जगह जगह पेयजल का इंतजाम किया गया है। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com

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और चलते चलते कुछ खरीददारी हो जाए....

 आगे पढ़िए - अजंता - 26 गुफाओं में गौतम बुद्ध के दर्शन