Saturday, October 26, 2013

पिपली- हजारों साल पुराना शिल्पकारों का गांव

पुरी से भुवनेश्वर के मार्ग पर आता है पिपली गांव। पिपली ओडिशा का शिल्पकारों का गांव है। गांव से गुजरते ही कला शिल्प की खुशबू का एहसास होने लगता है। सड़क के किनारे विशाल बाजार लगा है। इस बाजार में खासतौर पर रंग बिरंगे लैंप शेड लोगो को खूब प्रभावित करते हैं। इन लैंपशेड की आप खरीददारी तो कर ही सकते हैं। इसके साथ ही आप पिपली से हैंड बैग और दूसरे तमाम तरह के हस्तशिल्प के बने उत्पाद खरीद सकते हैं। पिपली की खास बात है कि यहां शिल्पकार खुद अपना सामान बेचते हैं। बीच में कोई मिडलमैन यानी बिचौलिया नहीं होता। इसलिए आपको यहां हस्तशिल्प उत्पाद सस्ते में मिल सकते हैं।
पिपली के कलाकार रंग बिरंगी साड़ियों का भी निर्माण करते हैं। महिलाओं को ये साड़ियां खूब पसंद आती हैं। इस गांव में कुछ वक्त गुजरने के बाद ये लगता है कि पिपली जैसे गांव देश के दूसरे राज्यों में भी होना चाहिए। पिपली की प्रसिद्धी देश के बाहर दुनिया के कई देशों तक पहुंच चुकी है। 


यहां के कलाकार कपड़े के एक टुकड़े पर तरह तरह की कलाकृतियों का निर्माण करते हैं। ये कलाकृतियां आपका ड्राईंग रुम सजाने के काम भी आती हैं। दूर-दूर से आने वाले सैलानी यहां से कुछ न कुछ खरीद कर ले जाना पसंद करते हैं।पिपली के कलाकार रंग बिरंगी साड़ियों का भी निर्माण करते हैं। इस गांव में कुछ वक्त गुजरने के बाद ये लगता है कि पिपली जैसे गांव देश के दूसरे राज्यों में भी होना चाहिए। 


हजारों साल पुरानी परंपरा - पिपली गांव का इतिहास बहुत पुराना है। इस गांव में दसवीं सदी से ही शिल्पकार अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे हैं। तब गांव के लोग सालाना जगन्नाथ रथ यात्रा के लिए छाता और कैनोपी (छतरियां) का निर्माण किया करते थे। तब कलाकार जगन्नाथ मंदिर और राजा की जरूरतों के हिसाब से निर्माण कार्य में लगे रहते थे। 11वीं सदी में पिपली गांव का कलाशिल्प चरम पर था। गांव के कलाकारों को राजा का संरक्षण प्राप्त था। 

पिपली गांव के कलाकार पुरी में होने वाली रथयात्रा के दौरान भगवान कृष्ण, बलभद्र और शुभद्रा के रथों के सजावट के लिए तमाम कलाकृतियां तैयार किया करते थे। यह कलाकारों द्वारा भगवान जगन्नाथ को की जाने वाली एक सेवा हुआ करती थी। यहां आज भी आप कलाकारों को सुंदर कठपुतलियां और पपेट आदि का निर्माण करते हुए भी देख सकते हैं।
पिपली के कलाकार अपनी कलाकृतियों के लिए कोलकाता से सूता मंगाते हैं तो कई सामग्री गुजरात के सूरत से आती है। छतरियों के निर्माण में वाटरप्रूफ रंगों का इस्तेमाल इनकी खासियत है। पिपली में निर्मित कपड़े की कलाकारी में देवी देवताओं का चित्रांकन देखा जा सकता है। खास तौर पर आप इसमें सूरज, चांद और राहु आदि का चित्रण देख सकते हैं। पिपली के शिल्पी हाथ से काम के अलावा आजकल सिलाई मशीन का इस्तेमाल भी बड़े पैमाने पर करते हैं। पर वे दर्जी न होकर कलाकार हैं। 

कैसे पहुंचे - पिपली की दूरी पुरी से 40 किलोमीटर है। वहीं राजधानी भुवनेश्वर से पिपली 26 किलोमीटर की दूरी पर है। अक्सर पुरी-कोणार्क-भुवनेश्वर जाने वाली बसें पिपली गांव में जरूर रुकती हैं। इस ठहराव के दौरान आप वहां से शापिंग कर सकते हैं। अगर आप अपने वाहन से हैं तो पुरी या फिर भुवनेश्वर कहीं से भी पिपली जा सकते हैं।
vidyutp@gmail.com 
(PIPLI VILAGE, ODISHA, HANDICRAFTS )