Tuesday, March 31, 2015

जानिए आखिर कैसे पड़ा दिल्ली नाम...

देश की राजधानी दिल्ली। पर कभी इसका नाम इंद्रप्रस्थ हुआ करता था। तो कभी शाहजहानाबाद। पर दिल्ली का नाम दिल्ली कैसे पड़ा, इस बारे में कई कहानियां हैं। यह भी कहा जाता है कि फारसी शब्द दहलीज से दिल्ली नाम पड़ा। विदेशी इसे भारत की दहलीज मानते रहे। कुछ मानते हैं कि मौर्य सम्राट राजा दिल्लू के नाम से दिल्ली का सफर शुरू हुआ। अंग्रेजों ने तो इसे बिगाड़कर डेल्ही नाम दिया। आज भी इसकी अंग्रेजी की स्पेलिंग बिगड़ी हुई है। दिल्ली के हिसाब से तो DILLI होना चाहिए पर लिखा जाता है DELHI क्यों भला...

कहा जाता है कि दिल्ली का नाम तो दिलेराम उर्फ दिल्लू से बिगड़कर दिल्ली पड़ा। दिलेराम विक्रमादित्य के शासन काल में लगभग 21 वर्षों तक लगातार दिल्ली के राज्यपाल रहे, उन्होंने इसका प्रशासन इतना सुचारु रूप से चलाया कि जनता उनके नाम की ही कायल हो गई। इसी कारण विक्रमादित्य ने खुश होकर इस दिलेराम जाट को दिलराजकी उपाधि से नवाजा था। इनका गोत्र भी ढिल्लों था। याद रहे कभी भी कोई ढिल्लों गोत्री जाट मुस्लिम धर्मी नहीं बना। अधिकतर सिख बने, शेष हिन्दू जाट हैं। हरियाणा में भिवानी जिले के कई गांवों में इस गोत्र के हिन्दू जाट हैं। इसी दिलेराज को लोग इन्हें प्यार और इज्जत से दिल्लू कहने लगे, जिस कारण यह दिल्लू की दिल्ली कहलाई। यह तथ्यों से परिपूर्ण इतिहास सर्व खाप पंचायत के रिकार्ड में भी दर्ज है।

एक अनुश्रुति है कि इसका नाम 'राजा ढीलू' के नाम पर पड़ा जिसका आधिपत्य ईशा पूर्व पहली शताब्दी में इस क्षेत्र पर था। बिजोला अभिलेखों (1170 ई.) में उल्लेखित ढिल्ली या ढिल्लिका सबसे पहला लिखित उद्धरण है। कुछ अन्य लोगों के मतानुसार आठवीं सदी में कन्नौज के राजा दिल्लू के नाम पर इसका नामांकन हुआ है।

वास्तव में इस दिल्ली के दिल्ली का दिल काफी बड़ा है, तभी तो ये हर जगह से आए लोगों को पनाह देती है। खुद में आत्मसात कर लेती है। और बाहरी लोग रंग जाते हैं दिल्ली के रंग में।

तभी तो शायर बोल पड़ते हैं – कौन जाए जौक दिल्ली की गलियां छोड़कर.... ( शेख इब्राहिम जौक बहादुर शाह जफर के समकालीन शायर थे) पूरा शेर कुछ इस तरह है-

इन दिनों गर्च-ए-दकन में है बड़ी कद्र-ए-सुखन,
कौन जाए 'जौक' पर दिल्ली की गलियां छोड़कर!

हालांकि कई बार लोग बार बार दिल्ली का नाम बदलकर फिर से इंद्रप्रस्थ किए जाने की मांग भी करते हैं पर बड़ा सवाल है कि दिल्ली नाम पूरी दुनिया में इस कदर फैल चुका है, लोकप्रिय हो चुका है कि अब इसे बदल पाना भला संभव है क्या...
-विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( DELHI, OLD NAME ) 

Monday, March 30, 2015

छत पर बना डाला हर्बल गार्डन


पूर्वी के दिल्ली के जीटीबी एनक्लेव के एक 40 गज के फ्लैट की छोटी सी छत। इस छत पर बना है भरा पूरा हर्बल गार्डन। छोटे से दायरे में 50 से ज्यादा किस्म के औषधीय पौधे लहलहा रहे हैं। इसके अलवा इन गमले में कई तरह की सब्जियां भी उगा लेते हैं सियाराम कुशवाहा।

इलाहाबाद के रहने वाले सियाराम दिल्ली एक स्कूल में संस्कृत शिक्षक हैं। इतने बड़े महानगर में रहने के लिए छोटा सा आशियाना मिला तो उसके छत औषधीय पौधों की खेती शुरू कर दी। कुछ सालों में मेहनत रंग लाई।

गमले लेमन ग्रास। 
आज उनके हर्बल गार्डन में डायबिटिज की दवा इंसुलीन, दर्द में काम आने वाली लेमनग्रास और पीपरमिंट, कई बीमारियों में काम आने वाली एलोवेरा, गिलोय,  करी पत्ता, वसाका, मरूआ, सफेद ओक, सतावर, अपराजिता, ब्रायोफिलम (पत्थरचूर), सिंदूर, पुदीना, नीम, नींबू, हल्दी करौंदा जैसे औषधीय पौधे छोटे बड़े गमलों में लहलहा रहे हैं।



सब्जियां और फल भी - इसी हर्बल गार्डन में वे कई तरह की सब्जियां भी उगा लेते हैं। यहां पर तोरी, बैंगन, टमाटर जैसी सब्जियां भी उगी हुई हमने देखी। तो यहां संतरा, करौंदा जैसे फल भी गमले में ही फलते हुए देखे जा सकते हैं। इस छत पर पाकड़, बरगद जैसे विशाल पेड़ों की बोनसाई भी देखी जा सकती है।

गमले में फल गया है संतरा। 
पौधों का साथ दूर करता है तनाव - सियाराम बताते हैं कि स्कूल के बाद अपना सारा वक्त इस गार्डन को देता हूं। गार्डन को हरा भरा बनाए रखने में उनकी पत्नी और दो बच्चे भी पूरा साथ देते हैं। बकौल सियाराम किचेन गार्डन एक ऐसा शौक है जो हर तरह का तनाव दूर करता है। साथ ही कई तरह की बीमारियों की दवा भी घर में ही मिल जाती है। तो आप भी तनाव दूर करना चाहते हैं तो पौधों से दोस्ती करने का शौक पाल सकते हैं। 

मुफ्त में बांटते हैं पौधे  अब उनकी पहचान मुहल्ले में हर्बल गार्डन वाले मास्टर जी के तौर पर बन चुकी है। घर के दरवाजे से लेकर सीढ़ियां और छत बाकी घरों से पूरी तरह अलग है। अपने हर्बल गार्डन से इच्छुक लोगों के वे पौधे मुफ्त में बांटते भी हैं। इसके साथ ही वे हर्बल गार्डन लगाने को लेकर लोगों को समय समय पर सलाह देते हैं। 
ये देखिए बोतल में लगाया है आजवाइन का पौधा। 

प्लास्टिक के डिब्बों का इस्तेमाल -  क्या आप जानते हैं कि जिन प्लास्टिक के डिब्बों को आप कचरा समझ कर फेंक देते हैं उनका इस्तेमाल भी तरह तरह के पौधे लगाने में हो सकता है। उनके हर्बल गार्डन में तमाम औषधीय पौधे बेकार समझ कर कचरे में फेंकी जानी वाली प्लास्टिक की शीतल पेय वाली बोतलें, पानी की बोतल, मिठाई के डिब्बे और दूसरे तरह के बोतलों में लगाई गई हैं।
जब आप जीटीबी एनक्लेव में सियाराम कुशवाहा जी का घर पूछते जाएंगे तो आसपास लोग हर्बल गार्डन वाले मास्टर जी घर आसानी बता देंगे भले ही आपको उनका फ्लैट नंबर याद न हो। घर की सीढ़ियां से ही आपको बोतलों में लगे औषधीय पौधे नजर आने लगेंगे। 

( ROOF TOP, HERBAL GARDEN, DELHI, SANSKRIT TEACHER, GTB ENCLAVE, SIYARAM KUSHWAHA  ) 

Sunday, March 29, 2015

अदभुत, अकल्पनीय, अनिंद्य, अभिराम - मुगल गार्डन

भारत के राष्ट्रपति के निवास स्थान राष्ट्रपति भवन के परिसर में स्थित है मुगल गार्डन। ये बागीचा साल में सिर्फ एक महीने ही आम जनता के लिए खोला जाता है। इसलिए मुगल गार्डन में घूमने का मौका आपको 14 फरवरी से 14 मार्च के बीच ही मिल पाता है। हालांकि वसंत के इस मौसम में फूल शबाब पर होते हैं। इस दौरान ये गार्डन अपने खूबसूरती के चरमोत्कर्ष पर रहता है।

मुगल गार्डन नाम इसलिए है क्योंकि ये मुगल शैली में बनाया गया है। बागों की लोकप्रिय चार बाग शैली। इस शैली का बाग हुमायूं का मकबरा, सफदरजंग का मकबरा, शालीमार बाग आदि में भी देखने को मिलता है। बाग के बीच में रास्ता और पानी की नहरें। मुगल गार्डन में 45 मीटर चौड़ाई वाले दो विशाल लॉन हैं। उद्यान की घास को हर मानसून के पहले हटा दिया जाता है। बारिश के साथ नई घास लगाई जाती है।

उद्यान में चारों तरफ मौलश्री और बकुल के पेड़,  चाइना आरेंज के पेड़, रात की रानी, मोगरा, मोतिया, जूही, गार्डेनिया, हर शिंगार, बागनबेलिया की खुशबू महसूस की जा सकती है।
जब आप मुगल उद्यान में प्रवेश करते हैं तो सबसे पहले आप पहुंचते हैं औषधीय उद्यान में। इस उद्यान में अलग अलग तरह के औषधीय पौधे लगाए गए हैं। यहां इन पौधे का किन बीमारियों में इस्तेमाल होता है इसकी भी जानकारी दी गई है। जैसे मेंथा ( दर्द में इस्तेमाल) लेमन ग्रास, तुलसी और तमाम तरह के पौधे इस उद्यान में लगाए गए हैं।
  
बोनसाई गार्डन – इसके बाद आप पहुंच जाते हैं बोनसाई गार्डन में। बोनसाई यानी विशाल पौधों को छोटा रखने की जापानी तकनीक। यहां पर 20 से 40 साल पुराने बोनसाई के पौधे देखे जा सकते हैं जो गमलों में लगे हैं।

म्यूजिकल फाउंटेन – उद्यान में जगह जगह फव्वारे लगे हैं जो शाम होते हैं लोकप्रिय फिल्मी गीतों की धुनों पर जल क्रीड़ा करते नजर आते हैं। हालांकि इन फव्वारों को वृंदावन गार्डन की तरह आप रात की रोशनी में नहीं देख सकते।
वृताकार गार्डन – राष्ट्रपति भवन के पृष्ठ भाग से आगे बढने पर वृताकार गार्डन में आप पहुंच जाते हैं। इस विशाल गोलाकार गार्डन में अलग अलग तरह के फूल लगाए गए हैं। इससे पहले बड़ी संख्या में चाइना संतरे के पेड़ आपका स्वागत करते हैं। इन पर संतरे खूब फले हुए दिखाई देते हैं पर आप इन्हे तोड़ नहीं सकते।


प्राकृतिक आबोहवा वाला नेचर पार्क – यहां पर अलग अलग तरह के पौधे और फूल लगाए गए हैं जिनकी आबोहवा स्वास्थ्यकर है। शरीर के लिए प्राणवायु प्रदान करती है। यहां की बेंच पर आप बैठ गए तो आगे जाने की इच्छा नहीं होती।
नीलम संजीव रेड्डी वीथि – बाहर निकलने वाले मार्ग का नाम दिया गया है नीलम संजीव रेड्डी वीथि। आंध्र प्रदेश के रहने वाले नीलम संजीव रेड्डी अस्सी के दशक में भारत के राष्ट्रपति थे।

प्रणब मुखर्जी पब्लिक लाइब्रेरी – बाहर निकलते समय सफेद रंग का छोटा सा भवन दिखाई देता है प्रणब मुखर्जी पब्लिक लाइब्रेरी। ये पुस्तकालय राष्ट्रपति भवन में रहने वाले परिवारों के लोगो को अध्ययन के लिए बनाया गया है।

यादगारी की खरीददारी – आर्गेनिक तरीके से उगाए गए मसाले यहां से खरीदे जा सकते हैं। महिलाओं के स्व सहायता समूह द्वारा तैयार किए गए इन उत्पादों में हल्दी पाउडर, धनिया पाउडर, मिर्च पाउडर, जीरा आदि उपलब्ध है। 

इसके अलावा आप राष्ट्रपति भवन की तस्वीरों वाली चाबी रिंग, मैगनेटिक तस्वीर आदि खरीद सकते हैं। राष्ट्रपति भवन की कढ़ाई वाली टोपियां, टी शर्ट और राउंड नेक वाले टी शर्ट भी यहां पर बहुत ही वाजिब दाम पर उपलब्ध हैं। इन उत्पादों को पूरा मुगल गार्डन घूम लेने के  बाद बाहर निकलने से पहले काउंटर पर खरीदा जा सकता है।

मुगल उद्यान का गीत – ये गीत खास तौर पर बच्चों के लिए समर्पित है। गीत की पंक्तियां उद्यान में बच्चों का स्वागत करती हैं।  मुगल उद्यान में अकेले गुलाब की ही 250 से भी अधिक किस्में हैं। मुगल गार्डन की परिकल्पना लेडी हार्डिंग की थी। उन्होंने श्रीनगर में निशात और शालीमार बाग देखे थे, जो उन्हें बहुत पसंद आए थे। वे ऐसा ही उद्यान वायसराय हाउस में बनवाना चाहती थीं।

कैसे पहुंचे - मुगल गार्डन पहुंचने के लिए आप कहीं से भी केंद्रीय टर्मिनल बस स्टैंड पहुंचे। ये गुरुद्वारा रकाब गंज के आगे है। यहां से चर्च रोड होते हुए नार्थ एवेन्यू पहुंचे। यहीं पर राष्ट्रपति भवन के गेट नंबर 35 से मुगल उद्यान के लिए प्रवेश द्वार है। यहां पर पार्किंग की सुविधा उपलब्ध है। अंदर बैगेज और कैमरा लेकर नहीं जा सकते। इन्हें रखने के लिए प्रापर्टी काउंटर यहां बना हुआ है। मुगल उद्यान के अंदर घूमते हुए जगह जगह पीने के पानी के लिए काउंटर और चिकित्सा सहायता के लिए काउंटर खोले गए हैं। प्रवेश के लिए कोई टिकट नहीं है।
 
मुगल गार्डन स्थित वृताकार गार्डन। 
अब सालों भर घूमे राष्ट्रपति भवन – राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने सालों भर राष्ट्रपति भवन के अंदर घूमने की सुविधा आरंभ करा दी है। इसके लिए आपको राष्ट्रपति भवन की वेबसाइट पर जाकर बुकिंग करानी पड़ती है। इसमें टाइम स्लाट और तारीख एलाट हो जाता है। प्रवेश शुल्क 25 रुपये है। इसके लिए प्रवेश गेट नंबर 2 या फिर गेट नंबर 37 से है। कई किलोमीटर के दायरे में फैले भारत के राष्ट्रपति भवन में 37 से ज्यादा प्रवेश द्वार हैं।


मुगल गार्डन की कुछ और तस्वीरें - 
हरी हरी घास पर फूलों की शानदार रंगोली 

 
फूल खिले हैं गुलशन गुलशन 

 
दिल को सुकून देते फूल। 



हाल में बना लोटस पौंड। 

Saturday, March 28, 2015

सरपट मंजिल तक पहुंचाती हैं मेमू और डेमू

शानदार सफर - गोंदिया कटंगी डेमू ट्रेन। 
महानगरों में चलने वाली ईएमयू यानी इलेक्ट्रिकल मल्टीपल यूनिट का बदला हुआ रूप है मेमू ट्रेन सेवा। मेमू यानी मेनलाइन इलेक्ट्रिक मल्टीपल यूनिट (Mainline Electric Multiple Unit ) । ऐसी रेलगाड़ियां महानगरों से छोटे शहरों के बीच चलाई गई हैं। मेमू ट्रेनों के कोच आपस में जुड़े रहते हैं साथ ही इसमें हर डिब्बे में टायलेट भी बना होता है। यानी ये ईएमयू का परिष्कृत रूप है। पहली मेमू ट्रेन देश में 1995 में बिलासपुर डिविजन में चलाई गई। ये ट्रेन रायपुर दुर्ग, भाटपारा, रायपुर बिलासपुर के बीच चली। अब देश के कई हिस्सों में मेमू ट्रेनें चलाई जा रही हैं। जिन इलाकों में मार्ग विद्युतीकृत नहीं हैं वहां डेमू ट्रेन चलाई जाती है।

डेमू डीएमयू ( डीजल मल्टीपल यूनिट ) का परिष्कृत रूप है। छोटी दूरी में सफर करने वाले लोगों के लिए मेमू और डेमू ट्रेनें सुविधाजनक और सस्ती और त्वरित यात्रा का विकल्प प्रदान करती हैं। मेमू डेमू ट्रेनें औसतन 40 किलोमीटर प्रतिघंटे की गति से लोगों को मंजिल तक पहुंचाती हैं। लिहाजा ये देश के जिन हिस्सों में भी चलती हैं काफी लोकप्रिय हैं। गोंदिया कटंगी डेमू गोंदिया से बालाघाट का 40 किलोमीटर का सफर 1 घंटे में पूरा करती है और किराया है 10 रुपये मात्र। वहीं बिलासपुर गेवरा रोड मेमू बिलासपुर से चांपा जंक्शन का 53 किलोमीटर का सफर महज 1 घंटे 3 मिनट में तय कर लेती है।

मेमू और डेमू के सभी कोच एक दूसरे से इंटरकनेक्ट होते हैं। इन ट्रेनों में लोकों चालित ट्रेनों की तुलना में कम ईंधन व्यय होता है। ट्रेनों के दोनों छोर पर पावर कार होने के कारण इंजन बदलने की आवश्यकता न होने से समय की बचत होती है। लोको पायलट के लिए फ्रंटल व्यू यानी सामने देखने का प्रबंध का प्रावधान होने से चालन अत्यंत संरक्षित होता है। 

क्या है डेमू – डेमू यानी डीजल इलेक्ट्रिक मल्टीपल यूनिट (DEMU, Diesel-Electric Multiple Unit ) में 1400 हार्स पावर क्षमता वाले दो पावर कार तथा छह ट्रेलर कार लगते हैं। स्पीड पकड़ने की क्षमता अधिक होती है। यात्रियों की क्षमता पारंपरिक कोचों के 90 की तुलना में 108 होती है। प्रत्येक पावर कार में भी यात्रियों के बैठने की सुविधा होती है।

अब सीएनडी डेमू भी - 13 जनवरी 2015 को देश की पहली सीएनजी डेमू ट्रेन हरियाणा राज्य के रेवाड़ी से 13 जनवरी 2015 को रवाना किया गया जो रोहतक तक चलती है। हरियाणा देश का पहला ऐसा राज्य बन गया जहां सीएनजी डेमू ट्रेन चलाई गई। कुल 8 डिब्बों वाली 74017 रेवाड़ी-रोहतक डेमू ट्रेनको रेलमंत्री सुरेश प्रभु ने हरी झंडी दिखाकार रवाना किया। यह ट्रेन डीजल और सीएनजी दोनों सिस्टम से लैस है। डीजल-सीएनजी ट्रेन के लिए रेलवे ने विशेष तौर पर एक 1400 हॉर्सपावर का इंजन तैयार करवाया। इस ट्रेन में दो पावर कोच और छह कोच लगाए गए हैं, जो चेन्नै स्थित कारखाने में बनाए गए हैं। भारतीय रेलवे में मेमू ट्रेनों का नंबर 6 से आरंभ होता है जबकि डेमू का 7 से आरंभ होता है।

Friday, March 27, 2015

कभी भारत से श्रीलंका तक थी रेल सेवा

रामेश्वरम के पास धनुष्कोडि का समुद्र। - फोटो - विद्युत
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 14 मार्च 2015 को कोलंबो से तालाईमनार तक जाने वाली रेल सेवा को हरी झंडी दिखाई। यानी 1964 में ध्वस्त हुई रेलवे लाइन को श्रीलंका ने इरकान की मदद से फिर से चालू कर दिया है। अब अगर भारत की ओर से भी रामेश्वरम धनुष्कोडि लाइन को दुबारा चालू कर दिया जाए तो भारत श्रीलंका के बीच एक बार फिर रेल लिंक चालू हो सकता है। 

आज भले ही श्रीलंका जाने के लिए हमें फ्लाइट की सेवा लेनी पड़ती हो पर कभी श्रीलंका जाना बहुत आसान हुआ करता था। चेन्नई से श्रीलंका के लिए ट्रेन और स्टीमर की शानदार कनेक्टिविटी हुआ करती थी।

1964 में तबाह हो गई रेलवे लाइन - चेन्नई के मद्रास इग्मोर स्टेशन से रामेश्वर द्वीप तक सफर करने के बाद लोगों को धनुष्कोडि जाना पड़ता था। आजकल रामेश्वरम तक ही रेल जाती है पर 1964 तक धनुष्कोडि तक रेल जाती थी। पर 18 दिसंबर 1964 को आए विनाशकारी तूफान में सब कुछ तबाह हो गया। 240 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से आए तूफान में रामेश्वरम से धनुष्कोडि की रेलवे लाइन तबाह हो गई। इस तूफान ने श्रीलंका में भी काफी तबाही मची। 115 पैसेंजरों को लेकर जा रही एक 653 पंबन पैसेंजर ट्रेन भी इस तूफान में यात्रियों समेत समुद्र में समा गई थी।

1964 तक यात्री धनुष्कोडि रेलवे स्टेशन पर उतरते थे। यहां से श्रीलंका ( तब सिलोन) जाने के लिए स्टीमर सेवा मिलती थी। सिलोन सरकार ने 1914 में एक मार्च को पोलगावाला से तालाईमनार (Polgahawela to Talaimannar ) तक रेलवे लाइन का विस्तार कर दिया था। वहीं भारत के धनुष्कोडि से तालाईमलार के लिए नियमित स्टीमर सेवा चलाई जाती थी। धनुष्कोडि से तालाईमलार की कुल दूरी महज 22 मील ( 35 किलोमीटर) ही है।

हम जब 1931 में प्रकाशित इंडियन ब्राडशॉ का राष्ट्रीय रेलवे टाइम टेबल देखते हैं तो उसमें मद्रास इगमोर से सिलोन के बीच रेल संपर्क का जिक्र देखते हैं। देश के कई हिस्सों में जहां नदियों पर पुल नहीं थे वहां भी स्टीमर सेवाओं को रेलवे से लिंक किया गया था। ये स्टीमर सेवाएं रेलगाड़ी के आने के साथ चलती थीं। इसी तरह का उदाहरण पटना और पहलेजाघाट के बीच गंगा नदी में स्टीमर सेवा का भी मिलता है। पर मद्रास इगमोर से सिलोन के बीच शानदार अंतरराष्ट्रीय रेल स्टीमर लिंक था। तब बहुत सस्ती दरों पर ही सिलोन ( श्रीलंका) पहुंचा जा सकता था। इस सेवा का इस्तेमाल करने के लिए भारत, सिलोन और ब्रिटेन के नागरिकों को कोई पासपोर्ट की जरूरत नहीं थी। पर जो लोग इन देशों के अलावा कहीं और से आए हों उनके लिए पासपोर्ट और वीजा की जरूरत थी।

सफर के लिए स्वास्थ्य जांच जरूरी था – सिलोन जाने वाले लोगों के लिए स्वास्थ्य जांच अनिवार्य था। पहले और दूसरे क्लास में सफर करने वाले लोगों की स्वास्थ्य जांच मंडपम ( सिलोन) में मेडिकल आफिसर करता था, जबकि तीसरे दर्जे में यात्रा करने वालों के स्वास्थ्य जांच मंडपम कैंप में की जाती थी।

सामानों की जांच – पहले दर्जे के यात्रियों के सामान की जांच मारादाना में, दूसरे दर्जे के यात्रियों के सामान की जांच तालाईमनार में और तीसरे दर्जे के लोगों को सामान की जांच मंडपम शिविर में की जाती थी।
रेलवे टाइम टेबल में मद्रास ते तालाईमनार की दूरी 493 किलोमीटर बताई गई है। जबकि धनुष्कोडि तक की दूरी 422 किलोमीटर है। मंडपम रेलवे स्टेशन धनुष्कोडि से 20 किलोमीटर पहले आता था।

मद्रास से किराया – 1931 में मद्रास से तालाईमनार ( सिलोन) का किराया पहले दर्ज में 42 रुपये, दूसरे दर्जे में 25 रुपये और तीसरे दर्जे में महज 9 रुपये 13 पैसे हुआ करता था।

मंडपम कैंप रेलवे स्टेशन रामेश्वरम ( आजकल आखिरी रेलवे स्टेशन) से 19 किलोमीटर पहले पड़ता है। वहीं रामनाथपुरम ( जिला मुख्यालय) रेलवे स्टेशन से मंडपम कैंप की दूरी 36 किलोमीटर है। वहीं मंडपम स्टेशन मंडपम कैंप से दो किलोमीटर पहले ही स्थित है। मंडपम के ठीक बाद ऐतिहासिक पंबन समुद्री पुल की शुरूआत होती है जो पंबन टापू ( रामेश्वरम) को भारत भूमि से जोड़ता है।
सिलोन और भारत के बीच स्टीमर और रेल मार्ग से अंग्रेजी राज में बड़ी संख्या में प्रवासी श्रमिक भारत में रोजगार के लिए आते थे। मंडपम रेलवे स्टेशन स्थित मंडपम कैंप ऐसे श्रमिकों के लिए ही जाना जाता था।


भारत से श्रीलंका के बीच तूतीकोरीन से भी स्टीमर सेवा चलती थी। पर यह सेवा धनुष्कोडि की तुलना में लंबी थी। धनुष्कोडि से सिलोन का सफर महज दो घंटे का था जबकि तूतीकोरीन से कोलंबो का सफर 12 घंटे का था। 150 मील दूरी के लिए हफ्ते में दो दिन ही फेरी सेवा चलाई जाती थी। हर बुधवार और शनिवार को तूतीकोरीन से फेरी सेवा चलती थी। इसलिए धनुष्कोडि वाली सेवा ज्यादा लोकप्रिय थी। कई बार धनुष्कोडि तक रेलवे लाइन को फिर से चालू करने की बात उठती है पर इसे अभी तक अंजाम नहीं दिया जा सका है।

-    -    --- विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com 

  ( SRILANKA, RAIL, MANDAPAM, DAHNUSHKODI, RAMESHWARAM ) 




Thursday, March 26, 2015

बड़ौदा शहर में भी है काशी विश्वनाथ मंदिर

वैसे तो काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी में है। पर इससे मिलते जुलते नाम के कई शहरों में और भी मंदिर बने हैं। गुजरात के बड़ौदा शहर में भी एक काशी विश्वनाथ मंदिर बना है। नाम है काशी विश्वनाथ मंदिर पर इसका डिजाइन पहले ज्योतिर्लिंगम वाले सोमनाथ मंदिर से अभिप्रेरित है। इस मंदिर का निर्माण बड़ौदा राजघराने की ओर से करावा गया। मंदिर की सबसे बड़ी खासियत है कि यहां शिव के साथ विष्णु की भी पूजा होती है। देश में ऐसे बहुत कम मंदिर हैं जहां शिव के साथ विष्णु की भी पूजा होती हो।

गायकवाड महाराजाओं की काशी विश्वनाथ में बड़ी आस्था थी इसलिए उन्होंने अपने राजमहल के पास काशी विश्वनाथ नाम से मंदिर का निर्माण कराया। बताया जाता है कि इस मंदिर का निर्माण बड़ौदा के महाराजा काशीराव गायकवाड (1832 – 1877) ने करवाया। वे महाराज सयाजीराव गायकवाड (तृतीय) के पिता थे। मंदिर पीले रंग में रंगा है। दीवारों पर नक्काशी अदभुत है। 

मुख्यद्वार के ऊपर शिव (नटराज) की नृत्य मुद्रा में सुंदर प्रतिमा लगी है। इसके नीचे गुजराती में ओम श्री काशी विश्वनाथ महादेवाय नमः लिखा है।  मंदिर के गर्भगृह के ऊपरी दीवार पर विष्णु की लेटी हुई प्रतिमा बनी है। उनकी नाभि से कमल का फूल निकल रहा है। पूरे परिसर में जगह जगह दीवारों पर नृत्यरत प्रतिमाएं बनीं हुई है।। मंदिर परिसर में शिव के सवारी नंदी की सुंदर प्रतिमा है। मंदिर को देखकर गायकवाड घराने के राजाओं की कलात्मक अभिरूचि का पता चलता है। मंदिर का परिसर सुंदर और मनोरम नजर आता है। जगह जगह श्रद्धालुओं के बैठने के लिए बेंच लगाई गई हैं।


गुजरात में भरूच के पास चांदोद में भी नर्मदा तट पर एक काशी विश्वनाथ का मंदिर बना है। वैसे काशी विश्वनाथ का एक मंदिर उत्तराखंड के गुप्त काशी में भी है। बड़ौदा के स्थानीय लोगों में काशी विश्वनाथ को लेकर गहरी आस्था है। सावन के सोमवार और महाशिवरात्रि के मौके पर मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।

कैसे पहुंचे – वडोदरा का काशी विश्वनाथ मंदिर नवापुरा में जवाहरलाल नेहरू मार्ग पर स्थित है। इसे लालबाग रोड के नाम से भी जाना जाता है। रेलवे स्टेशन से मंदिर की दूरी 4 किलोमीटर है।




वडोदरा से दिल्ली की वापसी की राह पर हूं। रात में गरीब रथ एक्सप्रेस के सिटिंग क्लास में आरक्षण है। इससे पहले बड़ौदा रेलवे स्टेशन के बाहर गायत्री भवन के बगल में स्थित इंद्र भवन में रात का खाना खाया। गुजराती थाली। गायत्री भवन में इससे पहले हमलोग भोजन कर चुके थे तो इस बार दूसरे भोजनालय का स्वाद लेने की सोची। इनकी थाली अच्छी है।

ट्रेन समय पर आई। चेयरकार में मतलब वडोदरा से दिल्ली तक का सफर बैठकर। पर पड़ोस मे एक युवा इंजीनियर मिल गए। वे उत्तराखंड से केमिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करके नौकरी की तलाश में गुजरात आए थे। बड़े दुखी थे कि कंपनियां इतनी पढ़ाई करने के बाद महज सात से आठ हजार रुपये मासिक की नौकरी ऑफर कर रही हैं। मैंने उन्हें सलाह दी, अभी जो मिल रही है स्वीकार कर लो। एक दो साल के अनुभव के बाद दूसरी नौकरी की तलाश करना ठीक रहेगा। खाली बैठोगे तो अनुभव भी नहीं होगा, साथ ही पढ़ी हुई चीजें भूलने भी लगोगे। उन्हें मेरी सलाह पसंद आई। सुबह नौ बजे हमलोग दिल्ली पहुंच चुके थे। 
-vidyutp@gmail.com
( JYOTIRLINGAM, TEMPLE, SHIVA, VADODRA, INDRA BHWAN ) 

Wednesday, March 25, 2015

गुजरात की एक और नैरो गेज - नाडियाद- भादरण


देश में सबसे ज्यादा नैरो गेज रेलवे का नेटवर्क गुजरात में रहा है। बिलीमोरा वघई, कोसांबा उमरपदा, प्रताप नगर जंबुसर के अलावा एक और नेटवर्क संचालन में थी। गुजरात में नाडियाद से भादरण के बीच एक और नैरो गेज रेलवे नेटवर्क पर गाड़ियां दौड़ती थी। साल 2016 के रेल बजट में इस नेटवर्क को बंद करके ब्राडगेज में बदलने की बात कही गई। फिर 2018 में इस मार्ग को बड़ी लाइन में बदलने के लिए बंद कर दिया गया। नाडियाद से भादरण के बीच में कुल आठ रेलवे स्टेशन हुआ करते थे। नाडियाद अहमदाबाद से बड़ौदा के बीच का एक रेलवे स्टेशन है। रेल मार्ग पर ट्रेनों का संचालन बंद होने के बाद इसके कुछ कोच नाडियाद रेलवे स्टेशन पर लंबे समय तक खड़े रहे। 

इस मार्ग के रेलवे स्टेशन
नाडियाद जंक्शन ( ND)
पीज (7.6 किमी पर)
वासो (12.3 किमी पर)
देवा (17.9 किमी पर)
सोजित्रा ( 26 किमी पर)
विरोल ( 30.4 किमी पर)
पेटलाद जंक्शन ( 36.8 किमी पर)
बोचासान जंक्शन (50.8 किमी पर)
भादरण (BDRN) (58.2 किलोमीटर पर)

नाडियाद खेडा जिले का एक व्यापारिक शहर है। यह ब्राडगेज लाइन पर है। अहमदाबाद से नाडियाद की दूरी 45 किलोमीटर है। सभी पैसेंजर और कई एक्सप्रेस ट्रेनें यहां रुकती हैं। कहा जाता है कि इस शहर को संपेरा नृत्य करने वालों ने बसाया था। कभी इसका नाम नटपुर या नंदगाम हुआ करता था। यह गुजरात में साक्षर भूमि यानी पढ़े लिखे लोगों के शहर के रूप में भी जाना जाता है। शहर के बीचों बीच झूलेलाल मंदिर स्थित है। साफ है कि शहर में सिंधी लोगों की अच्छी संख्या है।


एक जोड़ी ट्रेन हर रोज - सुबह 9.15 बजे चलने वाली नाडियाद भादरण पैसेंजर (ट्रेन नंबर 52037) दोपहर 12.25 बजे भादरण पहुंच जाती थी। यानी कुल 60 किलोमीटर के सफर के लिए 3 घंटे 10 मिनट का समय लेती थी। औसत देखें तो 20 किलोमीटर प्रति घंटा। ये स्पीड गुजरात के बाकी नैरोगेज ट्रेन से काफी अच्छा औसत माना जाएगा। पर दिन भर में एक ही ट्रेन चलती थी नाडियाद से भद्रण के बीच। यही ट्रेन उधर से 52038 नंबर बनकर वापस लौटती थी। यह भादरण से 14.10 बजे चलती थी और शाम को 17.25 बजे नाडियाद जंक्शन पहुंच जाती थी। दोनों स्टेशनों के बीच किराया 15 रुपये था। भादरण की बात करें तो यह आनंद जिले का छोटा सा कस्बा है। आमतौर पर तंबाकू खेती के लिए जाना जाता है।

वहीं शाम को 7.15 बजे नाडियाद से पेटलाद जंक्शन तक एक नैरो गेज ट्रेन (52039) चलती थी। यह रात में पेटलाद में ही रुक जाती थी। यही ट्रेन सुबह में 6.00 बजे 52040 नंबर से पेटलाद से नाडियाद के लिए चलती थी। बाद में यही ट्रेन 9.15 बजे भादरण के लिए सफर पर निकलती थी। नाडियाद से पेटलाड के बीच का सफर 37 किलोमीटर का था। पेटलाड में आनंद खंभात ब्राडगेज सेक्शन इस लाइन को क्रास करता है, इसलिए यह नैरोगेज और ब्राडगेज दोनों का स्टेशन है। वैसे पेटलादऔर भादरण के बीच कुल पांच स्टेशन हुआ करते थे। पर इनमें से चार स्टेशनों को बाद में बंद कर दिया गया। बंद किए गए स्टेशन हैं – विशरामपुरा, सुंदराना, धर्मज और झारोला। इन स्टेशनों पर कोई उतरता चढ़ता नहीं था, लिहाजा ये रेलवे के लिए घाटे का सौदा साबित हो रहे थे। इस नैरो गेज रेल मार्ग पर पेटलाद और भादरण के बीच काफी कम लोग सफर करते हैं।

1913 में हुआ था रेलमार्ग का निर्माण -
नाडियाद – भादरण रेल मार्ग का निर्माण 1913 में किया गया था। यानी इस  रेलमार्ग पर 100 साल से ज्यादा समय तक सफर जारी रहा।  1913 में यह लाइन पीज से भादरण के बीच निर्मित की गई थी। पर 1953 में पीज और नाडियाद के बीच 4 किलोमीटर की लाइन का निर्माण कर इसे नाडियाद तक विस्तारित किया गया। इस लाइन का निर्माण बांबे बड़ौदा सेंट्रल रेलवे (बीबीसीआईआर) के तहत किया गया था।


बाकी नैरो गेज की तरह ही इसकी पटरियों की चौड़ाई दो फीट 6 इंच थी। नैरो गेज ट्रैक पर जेडीएम 5 सीरीज लोकोमोटिव चार डिब्बों को आराम से खींचता हुआ चलता था। ट्रेन में स्थानीय लोगों की ज्यादा भीड़ नहीं होती। कभी कभी भीड़ देखने को मिलती है। कभी कभी तेज बारिश होने पर नैरो गेज मार्ग पर चलने वाली इकलौती ट्रेन को रद्द भी करना पड़ता है। नाडियाद भादरण के बीच का रेलवे ट्रैक बहुत बुरे हाल में है। अभी भी लकड़ी के स्लीपर लगे हैं।

नैरो गेज का भादरण रेलवे स्टेशन उजाड़ सा नजर आता था। स्थानीय लोग इस रेल मार्ग को बापू ट्रेन कहते थे , क्योंकि यह आराम से चलती है। वहीं काफी लोग इसमें टिकट भी नहीं लेते थे । साल 2018 में इस नैरोगेज रेल मार्ग को बड़ी लाइन में बदलने के लिए हमेशा के लिए बंद कर दिया गया।
- vidyutp@gmail.com
( NARROW GAUGE, RAIL, GUJRAT, NADIAD, BHADRAN, PETLAD JN, BBCIR ) 

Monday, March 23, 2015

धन्य किहिन विक्टोरिया जिन्ह चलाईस रेल


धन्य किहिन विक्टोरिया जिन्ह चलाईस रेल, मानो जादू किहिस दिखाइस खेल... हिंदी के प्रसिद्ध कवि भारतेंदु हरिश्चंद्र की पंक्तियां गुजरात के प्रतापनगर रेल संग्रहालय के बाहर लिखी हुई नजर आती हैं।  और भारतेंदु हरिश्चंद्र की ही लिखी गई नए जमाने की मुकरी भी यहां नजर आती है - पैसे लेके पास भगावे, ले भागे मोहि खेले खेल, का सखि साजन,  ना सखि रेल।

वास्तव में दुनिया में रेलगाड़ियों के विकास की कहानी जादू भरी है। वडोदरा के प्रतापनगर में बना ये संग्रहालय नैरो गेज के विकास की दास्तां बयां करता है। इसका महत्व इसलिए बढ़ जाता है कि गुजरात में ही देश की पहली नैरो गेज रेल चली और कभी देश का सबसे बड़ा नैरो गेज नेटवर्क गुजरात में हुआ करता था।  प्रतापनगर में इस रेल संग्रहालय का उदघाटन 27 जनवरी 1997 को रेलवे बोर्ड के सदस्य कार्मिक (रेलवे) वीके अग्रवाल द्वारा किया गया।

यहां जानकारी दी गई है कि नैरो गेज ट्रेनों की शुरुआत यूरोप में कोयला के खानों में हुई। पर बाद में ये सवारी ढोने के लिए भी लोकप्रिय हो गई। भारत में नैरो गेज रेलवे लाइन बिछाने वाले बड़ौदा महाराजा पहले राजा थे। जब बड़ौदा के महाराजा ने डभोई और मियागाम के बीच पहली नैरो गेज रेलवे लाइन बिछाई तो देश के दूसरे महाराजाओं ने भी उनका अनुशरण किया। रेलवे ने आम जनमानस पर काफी प्रभाव डाला, जो रेलगाडियों पर लिखी गई कविताओं , लोकगीतों और कहानियों में दिखाई देता है। 


गुजरात का डभोई 19वीं सदी का महत्वपूर्ण व्यापारिक शहर था। वहां से महुआ, कपास, गल्ले आदि का व्यापार होता था। यह धातु के काम, बुनाई के काम और लकड़ी के सामानों के लिए भी जाना जाता था। महाराजा बड़ौदा को ख्याल आया कि इस शहर को बड़ौदा मुंबई रेल मार्ग से जोड़ा जाए। इसी को ध्यान मे रखते हुए डभोई मियागाम के बीच नैरो गेज रेलवे लाइन बिछाने की योजना बनी। 26 मार्च 1860 को बड़ौदा के रेजिडेंट ने गवर्नमेंट ऑफ मुंबई के चीफ सेक्रेटेरी को एक खत लिखा जिसमें उन्होंने बड़ौदा रियासत में रेलवे लाइन बिछाने की जरूरत बताई। पत्र में कहा गया कि महाराजा खंडोराव रेलवे लाइन बिछाने की इच्छा रखते हैं। इसके लिए 2 फीट 6 इंच वाले गेज का चयन किया गया। हालांकि पहला प्रस्ताव इंटौला को बडौदा से जोडने का था लेकिन 1862 में डभोई को मियागाम से जोडा गया। पर इस रेलवे लाइन पर कोच को बैल खींचते थे। 
1863 में लंदन टाइम्स ने अपने संस्करण में विशेष खबर प्रकाशित की, जिसमें इस बात का जिक्र था कि भारत में बड़ौदा के प्रिंस ने अपने खर्च पर भारत में पहली नैरो गेज रेल नेटवर्क का निर्माण किया जिसे बैल खींचते हैं। बैल से खींचे जाने वाले यात्री कोच में 12 लोगों के बैठने का इंतजाम था। इसका कोच 4 पहियों वाला था। इसमें यात्री कोच के साथ मालगाड़ी के छोटे डिब्बे भी जोडे जाते थे। दो बैलों की जोड़ी चार कोच को आराम से खींचती थी। पर बैलों से चलने वाली ये रेलवे लाइन ज्यादा लंबा सफर नहीं कर सकी।


महाराजा मल्हार राव ने डभोई मियागाम लाइन को दुबारा नए सिरे से बनवाने का उपक्रम शुरू किया। इस बार इसे स्टीम इंजन से चलाने की योजना पर काम हुआ। इसके लिए पटरियां बदली गईं। यह भारत के नैरो गेज के इतिहास में ऐतिहासिक दिन था। 8 अप्रैल 1873 को स्टीम लोकोमोटिव से चलने वाले नैरो गेज रेल मार्ग का संचालन डभोई और मियागाम के बीच हुआ। पहले दिन दिनों में इस रेल मार्ग से महज 57 लोगों ने यात्रा की और 1267 मन माल की ढुलाई हुई। अगले हफ्ते यात्रियों की संख्या बढ़कर 244 हो गई। माल की लदान में भी बढ़ोत्तरी हुई। इस तरह रेलवे लाइन लोकप्रिय होने लगी और कमाई में भी इजाफा होने लगा।

तब निचले दर्जे का किराया 4 पाई प्रति मील और उपर के दर्जे का किराया 8 पैसे प्रति मील था। एक यात्री गाड़ी में कुल 212 लोग सवार हो सकते थे। गाड़ी की अधिकतम स्पीड 8 मील प्रति घंटा हुआ करती थी। वहीं माल ढुलाई की दर 8 पैसे से 40 पाई प्रति मील थी। माल ढुलाई की दर अलग अलग सामान के लिए अलग थी। सबसे कम दर गल्ले और नमक आदि के लिए रखी गई थी। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( NARROW GAUGE, RAIL IN GUJRAT ) 

Sunday, March 22, 2015

1940 में आठ लाख सालाना कमाई कर रहा था गुजरात का नैरो गेज


एक जुलाई 1880 को नैरो गेज लाइन डभोई से चलकर गोया गेट ( बड़ौदा) तक पहुंच गई। हालांकि इस लाइन के लिए सर्वे काफी पहले 1860 में ही कर लिया गया था। बीबी एंड सीआई कंपनी ने 1878 में गोया गेट तक लाइन बिछाने की तैयारी की। डभोई से बड़ौदा के बीच नैरो गेज लाइन बिछाने में 1 लाख 31 हजार 652 रुपये का खर्च आया। इस रेलवे लाइन को बिछाने की ठेका मोहनलाल बेचारदास एंड कंपनी को दिया गया। 

24 जनवरी 1881 को इस लाइन का विस्तार विश्वामित्री रेलवे स्टेशन तक किया गया। वहां पर ब्राड गेज और नैरो गेज की लाइनें आपस में मिलती थीं। तब गोया गेट कमाई वाला रेलवे स्टेशन हुआ करता था। पहले ही साल 1881 में इस स्टेशन से 51 हजार 164 रुपये की कमाई हुई।


25 मार्च 1919 को गोया गेट ( बड़ौदा) में नैरो गेज के लिए एक वर्कशाप की स्थापना की गई जिसका नींव पत्थर वायसराय लार्ड चेम्सफोर्ड ने रखा था। 1881 में इस नैरो गेज नेटवर्क पर 2 लाख 72 हजार लोग सफर कर रहे थे, जो उस समय के लिए शानदार उपलब्धि थी। 1923-24 में विश्वामित्री रेलवे स्टेशन ब्राडगेज से जुड गया। तब नैरो गेज और ब्राडगेज के बीच सामान और यात्रियों का आदान प्रदान आसान हो गया। एक समय आया जब बडौदा राजघराना देश का सबसे बड़ा नैरो गेज रेल ऑपरेटर बन गया था। 1930 में जीबीएसआर ( गायकवाड बड़ौदा स्टेट रेलवे) के पास 5927 नैरो गेज वैगन का स्टाक था।

गोया गेट ही बना प्रतापनगर - प्रतापनगर रेलवे स्टेशन का पुराना नाम गोया गेट हुआ करता था। 24 जनवरी 1881 को गोया गेट से विश्वामित्री खंड के बीच नैरो गेज की पटरियां बिछाई गईं। बड़ौदा शहर में पानी गेट की तरह गोया गेट दूसरा महत्वपूर्ण इलाका हुआ करता था। विश्वामित्री नदी शहर के बीचों बीच बहती है। गोया गेट और जंबुसर के बीच रेल मार्ग पर विश्वामित्री दूसरा स्टेशन है।

गायकवाड बड़ौदा स्टेट रेलवे (जीबीएसआर) - साल 1921 से पहले गुजरात में नैरो गेज नेटवर्क का संचालन बीबी एंड सीआई नामक कंपनी करती थी। बीबी सीआई यानी बांबे बड़ौदा सेंट्रल इंडिया रेलवे कंपनी का गठन 1855 में हुआ था। हालांकि रेलवे लाइन का निर्माण बड़ौदा स्टेट ने ही किया था पर संचालन और रख रखाव का काम बीबी एंड सीआई कंपनी देखती थी। ऐसा प्रतीत होता है कि कंपनी ऑपरेशन के नाम पर बड़ी राशि वसूलती थी। इसलिए कंपनी अक्सर घाटा दिखाती थी। बडौदा रियासत के अत्यंत प्रगतिशील और दूरदर्शी महाराजा सयाजी राव -3 ने नैरो गेज नेटवर्क में आमलूचल बदलाव का फैसला लिया। उनके समय में गोया गेट वर्कशाप, रेलवे कालोनी, जीबीएसआर का दफ्तर आदि का निर्माण हुआ।

एक अक्तूबर 1921 को इसका संचालन महाराजा बड़ौदा के संपूर्ण स्वामित्व वाली कंपनी गायकवाड बड़ौदा स्टेट रेलवे ( जीबीएसआर) ने ले लिया। बीबी एंड सीआई कंपनी जहां हर साल नैरो गेज नेटवर्क को घाटे में चला रही थी वहीं जीबीएसआर के हाथ में कमान आने के बाद आश्चर्यजनक बदलाव आया। छह हजार तक सालाना घाटे में चलने वाली रेलवे लाइन पहले ही साल 91 हजार के लाभ में आ गई। वहीं नैरो गेज सिस्टम का कुल लाभ बढ़कर 1.59 लाख सालाना हो गया। 1921 में जीबीएसआर के पास 267.83 मील का नैरो गेज रेल नेटवर्क था। पर 1922 में नैरो गेज नेटवर्क की लंबाई बढ़कर 341 मील हो गई। 1940 में जीबीएसआर के पास 355 मील का नैरो गेज नेटवर्क मौजूद था।



साल 1940 में गुजरात का ये नैरो गेज नेटवर्क 8 लाख 28 हजार का शुद्ध लाभ दे रहा था। स्टीम इंजन से चलने वाली नैरो गेज की ट्रेनों की औसत स्पीड 18 से 20 किलोमीटर प्रति घंटे हुआ करती थी।
कपास ढुलाई का बड़ा माध्यम  - 1930-40 के दशक में ये नैरो गेज नेटवर्क कपास ढुलाई का बहुत बड़ा माध्यम हुआ करता था। रेलवे की कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा कपास की ढुलाई से आता था। आजादी के बाद 1949 में जीबीएसआर का विलय बीबी एंड एसआई में दुबारा हो गया। 1951 में बीबी एंड सीआई कंपनी भारतीय रेल में समाहित हो गई। इसके बाद गुजरात का नैरो गेज नेटवर्क भारतीय रेलवे के पश्चिमी रेलवे जोन का हिस्सा बन गया।  
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Saturday, March 21, 2015

कभी नैरो गेज का मक्का हुआ करता था डभोई जंक्शन

गुजरात में नैरो गेज नेटववर्क के विकास के क्रम में बडौदा जिले का शहर डभोई नैरो गेज रेलवे का प्रमुख जंक्शन बन गया। वास्तव में डभोई को नैरो गेज का मक्का कहें तो कुछ गलत नहीं होगा। हालांकि 2019 में डभोई जंक्शन से नैरोगेज की सारी लाइने उखाड़ी जा चुकी थीं। डभोई को जोड़ने वाली तमाम नैरोगेज लाइनें ब्राडगेज में बदली जा रही थीं। पर डभोई रेलवे स्टेशन पर एक नैरोगेज हेरिटेज पार्क का निर्माण किया गया है। हालांकि इस हेरिटेज पार्क में कुछ सामग्री नहीं रखी गई है। 

साल 2019 के जनवरी महीने की एक सुबह जब मैं डभोई जंक्शन पर पहुंचा तो यहां से नैरोगेज की पटरियों को तेजी से उखाड़े जाने का काम जारी था। हालांकि समय सारणी में अब नैरोगेज रेलों का समय लिखा हुआ था। पर रेलगाड़ियों का संचालन ठप्प हो चुका था। अब इसी मार्ग से केवड़िया तक के लिए बड़ी लाइन बिछाने का काम जारी था।

महाराजा गायकवाड के राज्य में डभोई गुजरात का प्रमुख व्यापारिक शहर था। इस शहर से मियागाम करजन के बीच सन 1862 में ही 2 फीट 6 इंच चौड़ाई वाले नैरो गेज रेलवे लाइन की शुरुआत कर महाराजा ने इसे विश्व मानचित्र पर ला दिया। यह देश का पहला नैरो गेज नेटवर्क था। वास्तव में महाराजा ने 1860 में ही डभोई और बड़ौदा के नैरो गेज लाइन से जोड़ने के बारे में सर्वे शुरू करा दिया था। दो साल बाद 32 किलोमीटर के इस मार्ग का निर्माण किया गया। आठ अप्रैल 1873 को इस नेटवर्क पर लोकोमोटिव से संचालित रेलगाड़ियों का परिचालन होने लगा।


डभोई से मोटी कोराल वाया मियागाम करजन - नैरो गेज के मक्का कहे जाने वाले डभोई से मियागाम होकर मोटी कोराल तक नैरो गेज नेटवर्क 2014 तक संचालन में था। डभोई नेशनल हाईवे नंबर 8 पर स्थित वडोदरा जिले का छोटा सा व्यापारिक शहर है। वडोदरा से डभोई की दूरी 32 किलोमीटर है।




डभोई में ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण एक मन्दिर के प्राचीन अवशेष भी प्राप्त हुए हैं। डभोई वडोदरा जिले का एक कस्बा है, जिसे पहले दर्भावती नाम से जाना जाता था। इस प्रचीन शहर का गिरनार के जैन धर्मग्रथों में बहुत महत्व है। डभोई का किला हिंदू सेना की वास्तु शिल्प का एक दुर्लभ उदाहरण है, जिसे आज भी देखा जा सकता है। छोटे से शानदार किले के कारण भी डभोई शहर को जाना जाता है।
डभोई रेलवे स्टेशन एक नैरो गेज स्टेशन के तौर पर 150 साल से ज्यादा समय तक अपनी पहचान बनाए रखा। पर  सारी लाइनों के ब्राडगेज में बदले जाने के बाद डभोई से यह पहचान छिन गई।
डभोई के आसपास मालसर- मियागाम करजन- डभोई- चंदोद नैरो गेज मार्ग की कुल लंबाई 90 किलोमीटर हुआ करती थी। मालसर नर्मदा नदी के किनारे एक छोटा सा शहर है। सुबह 6.10 में डभोई से चलने वाली 52046 पैसेंजर 12.15 बजे मोटी कोराल पहुंचती थी। इस मार्ग पर कुल 15 रेलवे स्टेशन हुआ करते थे। 
वहीं डभोई से दूसरा नैरो गेज रेलमार्ग चंदोद तक जाता था। मियागाम करजन बड़ौदा मुंबई मुख्यमार्ग पर ब्राडगेज का रेलवे स्टेशन है। मियागाम करजन से डभोई की दूरी 32 किलोमीटर है। वहीं डभोई से चंदोद की दूरी 19 किलोमीटर है।

साल 1880 में 1 जुलाई को डभोई से गोया गेट (प्रताप नगर, वडोदरा) तक 32 किलोमीटर की नैरोगेज लाइन तैयार हो गई थी। अब यह लाइन ब्राडगेज में बदल चुकी है। अब वडोदरा से डभोई होते हुए छोटा उदयपुर तक आप ब्राडगेज रेलवे लाइन से जा सकते हैं। 2 अक्तूबर 2008 को प्रताप नगर डभोई नैरो गेज रेल मार्ग को ब्राड गेज में बदल दिया गया और इस पर बड़ी लाइन की ट्रेनों का संचालन होने लगा। इसके बाद डभोई अगले कुछ साल तक नैरो गेज और ब्राड गेज दोनों तरह की लाइनों का स्टेशन बना रहा। 


मैं जब जनवरी 2019 में डभोई रेलवे स्टेशन पर पहुंचा तो डभोई से चांदोद जाने वाली नैरो गेज लाइनों की पटरियों को उखाड़ने का काम तेजी से जारी था। इसे ब्राड गेज में बदला जा रहा है। डभोई चांदोद लाइन का विस्तार केवड़िया तक हो रहा है। यह बड़ोदा- डभोई- चांदोद केवड़िया ब्राड गेज लाइन हो जाएगी। तब स्टैच्यू ऑफ यूनिटी ( सरदार वल्लभ भाई पटेल) की मूर्ति तक जाना आसान हो सकेगा। 
डभोई से जुड़े थे ये नैरो गेज नेटवर्क
डभोई से चांदोद - 19 किलोमीटर
डभोई से मियागाम करजन – 32 किलोमीटर
मियागाम करजन से मालसर – 38 किलोमीटर
डभोई से गोया गेट ( प्रताप नगर ) - 27.36 किलोमीटर। 
डभाई से बहादरपुर - 15.32 किलोमीटर। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com
( GUJRAT NARROW GAUGE, DABHOI  )