Wednesday, February 24, 2016

मेघालय का महान क्रांतिवीर शहीद कियांग नांगबा

शिलांग से गुवाहाटी के लिए वापस चल पड़ा हूं। टैक्सी की तलाश करते हुए एक चौराहे पर पहुंता हूं, वहां मेघालय के एक वीर सपूत की प्रतिमा स्थापित की गई है। सहज ही उस वीर सपूत के बारे में जानने की इच्छा होती है।

देश की आजादी की लड़ाई शुरुआती योद्धाओं में कई ऐसे वीर सपूत हैं जिन्हें इतिहास के पन्नों में कम जगह मिली है, लेकिन उनकी बहादुरी की दास्तां नमन करने योग्य है। ऐसा ही एक नाम कियांग नांगबा का है। मेघालय में जनजातीय वीर नांगबा का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है।

युवा अवस्था में ही  कियांग को अंग्रेजों ने 1862 में फांसी पर लटका दिया था। 30 दिसंबर को गिरफ्तारी की कुछ घंटे बाद ही सार्वजनिक स्थल पर उन्हें फांसी दे दी गई। नांगबा का नाम भी उन लोगों में शामिल है जो आजादी की लड़ाई के शुरुआती दिनों में शहीद हो गए। नांगबा की सही जन्मतिथि का पता नहीं है लेकिन ये कहा जाता है कि फांसी के समय उनकी उम्र 30 साल से ज्यादा नहीं थी। नांगबा ने खासी जनजाति के प्रमुख उत्सव बेडिनख्लाम पर अंग्रेजों द्वारा लगाए गए प्रतिबंध के खिलाफ आवाज उठाई थी। इसके साथ ही 1860 में ब्रिटिश सरकार द्वारा लगाए गए हाउस टैक्स का पुरजोर विरोध किया था। नांगबा और उनके साथियों ने ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह कर दिया।


खासी जनजाति के प्रमुख उत्सव बेडिनख्लाम पर अंग्रेजों द्वारा लगाए गए प्रतिबंध के खिलाफ आवाज उठाने के कारण नांगबा को ब्रितानिया जुल्म का शिकार होना पड़ा था। यह उत्सव उत्तर भारत की जगन्नाथ रथ यात्रा के समय बिल्कुल उसी अंदाज में मनाया जाता है। नांगबा की प्रतिष्ठा मेघालय में आजादी की लड़ाई के हीरो के साथ ही एक आध्यात्मिक व्यक्तित्व के तौर पर भी है। वह संगीत से भी काफी लगाव रखते थे। वे बांसुरी बजाने में सिद्धहस्त थे।

फांसी पर लटकाए जाने से पहले कियांग का लोगों को संबोधित किया हुआ आखिरी संदेश अदभुत था। उसने कहा था कि फांसी पर लटकने के बाद यदि उनकी गर्दन पूरब की ओर झुकेगी तो देश सौ साल में आजाद हो जाएगा। अगर पश्चिम की तरफ झुकेगी तो देश को लंबे समय तक गुलामी झेलनी पड़ेगी। फांसी के बाद कियांग का सिर पूरब की ओर ही झुका और उनके कहे अनुसार देश सौ साल के अंदर आजाद हुआ।

वीर सपूत नांगबा के शहादत के 152वें साल मे 30 दिसंबर 2014 को शिलांग के मुख्य चौराहे पर नांगबा की विशाल प्रतिमा खासी स्टूडेंट यूनियन द्वारा स्थापित की गई। इस प्रतिमा में वह तीर कमान और ढाल लिए हुए ब्रिटिश सरकार के खिलाफ आंदोलन करते हुए दिखाई दे रहे हैं। उनकी शहादत दिवस पर हर साल शिलांग में आयोजन होता है और लोग उनकी प्रतिमा के चरणों में श्रद्धा के फूल चढ़ाते हैं। भारत सरकार ने साल 2001 में मेघालय के इस वीर सपूत के सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया था।  


शहादत को सलाम 

1860 में ब्रिटिश सरकार के हाउस टैक्स लगाने का विरोध किया।

1862 में 30 दिसंबर को नांगबा को फांसी दी गई

2014 में शिलांग मे नांगबा की विशाल प्रतिमा स्थापित की गई


1967 में नांगबा की याद में मेघालय के जोवाई में एक सरकारी कॉलेज खोला गया। 


मेघालय के इस महान शहीद के नाम पर राज्य के वेस्ट जयंतिया हिल्स जिले में एक सरकारी कालेज भी है। वास्तव में 1967 में खुले कालेज का नाम 1983 में कियांग नांगबा के नाम पर रख कर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई।

मेघालय के महान शहीद नांगबा वास्तव में मणिपुर के पाओना ब्रजबासी, असम की किशोर वीरांगना कनकलता, कर्नाटक के क्रांतिवीर संगोली रायणा, बिहार के खुदीरामबोस की श्रेणी में आकर खड़े होते हैं। जिनके मन में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ शुरुआती दिनों से विरोध की ज्वाला थी। इन वीरों ने उग्र विरोध करते हुए युवा अवस्था में ही विदेशी शासन के खिलाफ क्रांति का बिगुल फूंकते हुए अपने प्राणों की आहूति दे दी। 

- vidyutp@gmail.com
( MEGHALYA, KIANG NANGBAH, FREEDOM FIGHTER  , JOWAI GOVT COLLEGE, WEST JAINTIA HILLS, SHILLONG )