Sunday, February 22, 2015

चमचम करता बैतूल रेलवे स्टेशन -पातालकोट से वापसी


बैतूल का रेलवे स्टेशन काफी साफ सुथरा है। रेलवे स्टेशन के बाहर खूबसूरत उद्यान बना है जिसमें तरह तरह के फूल हैं। दूसरे दर्जे का प्रतीक्षालय भी एक दम चमचमाता हुआ साफ सुथरा है। शौचालय की सफाई भी अति उत्तम है। देश में ऐसे साफ सुथरे रेलवे स्टेशन कम ही दिखाई देते हैं। लोग बता रहे हैं अगला रेलवे स्टेशन आमला भी काफी साफ-सुथरा है। प्लेटफार्म पर भी ज्यादा भीड़भाड़ नहीं है। स्टेशन परिसर में बड़ी बड़ी तस्वीरें लगी है जिसमें बैतूल जिले के आदिपासी डंडा नृत्य, आदिवासी गायकी नृत्य, तेजपत्ता के जंगल, सागवान के जंगल और दूसरे तरह के जंगलों के बारे में जानकारी दी गई है।

एक बार फिर तांगे का सफर - बिहार में राजगीर के बाद बैतूल में एक बार फिर तांगे पर सफर का मौका मिला। कोठी बाजार से बेतूल रेलवे स्टेशन के लिए आटो वाले 10 रुपये लेते हैं, तो तांगे वाले 5 रुपये में पहुंचाते हैं। एक तांगे वाला 20 रुपये में मुझे रिजर्व पहुंचाने को तुरंत तैयार हो गया। उसने बताया कि बैतूल में अभी भी 40-45 तांगे चलते हैं।

रास्ते में एक भोपाल के अधिकारी मिले। वे भी हमारे साथ तांगे में बैठकर खुश हुए। पर जब उन्होंने सुना कि किराया महज 5 रुपये है तो उन्होंने कहा नहीं मैं भी कम से कम दस रुपये ही दूंगा। तांगे वाले की खुशी का ठिकाना नहीं था। चलते-चलते बातों ही बातों में तांगे वाले ने बताया कि घोड़े को खिलाने में 70 रुपये रोज खर्च हो जाते हैं। कभी कभी दिन भर में इतनी भी कमाई नहीं हो पाती है कि घोड़े को खिला सकूं।

रेलवे स्टेशन पर कचौरी की प्रसिद्ध दुकान है। शेगांव कचौरी सेंटर। ये शेगांव तो महाराष्ट्र के अकोला जिले का शहर है। पर ये कैंटीन उसी शहर के नाम पर है।  ये 10 रुपये मे एक कचौरी बेचते हैं हरी वाली चटनी के साथ। कचौरी की स्वाद लाजवाब है। कैंटीन की साफ सफाई भी अति उत्तम है। आम तौर पर रेलवे स्टेशनों पर इतनी अच्छी और किफायती खाने पीने की दुकानें नहीं दिखाई देती हैं। पर ये कचौरी सेंटर उसका अपवाद है। 

पर आईआरसीटीसी द्वारा आवंटित बेतूल रेलवे स्टेशन की इस कैंटीन के मैनेजर की शिकायत है बैतूल रेलवे स्टेशन पर रेलगाड़ियां सिर्फ दो मिनट के लिए रूकती है। ऐसे में कचौरियों की बिक्री ज्यादा नहीं हो पाती। किसी ट्रेन के रुकने पर जो डिब्बे इस कचौरी सेंटर के आसपास पड़ते हैं सिर्फ वही लोग कचौरी खरीद पाते हैं। दो मिनट के ठहराव में कोई ट्रेन से उतर कर दुकान तक भी नहीं आ सकता। पर स्वाद का ये सुनहरा सफर जारी है। 







बेतूल मेरी वापसी की ट्रेन है 14623 - पातालकोट एक्सप्रेस। यह ट्रेन छिंदवाड़ा से आती है। पर रेलगाड़ी का रनिंग स्टेट्स देख रहा हूं तो पता चलता है कि ट्रेन लेट चल रही है तो कई घंटे प्लेटफार्म पर बैठकर पातालकोट एक्सप्रेस का इंतजार करना पड़ा। इस बीच स्टेशन पर किताबें पढ़ते हुए और स्थानीय लोगों से बातचीत में वक्त गुजारा। पर इतने साफ सुथरे स्टेशन पर वक्त काटना बोरियत भरा बिल्कुल नहीं लगा।  

छोटे से शहर बेतूल में लड़के लडकियों में कंप्टिशन की तैयारी करने का जुनून खूब दिखा। पर शहर में ज्यादातर लड़कियां हिजाब लगाकर चलती हैं। ऐसा क्यों पता नहीं। शायद असुरक्षा का भाव हो। पांच घंटे लेट चल रही पातालकोट एक्सप्रेस प्लेटफार्म नंबर दो पर पहुंच गई है। शाम होने से पहले ट्रेन बेतूल से चल पड़ी है। हमारे डिब्बे में छिंदवाड़ा के युवाओं का एक बड़ा समूह है जो किसी नेटवर्क मार्केेटिंग के सेमिनार में शामिल होने दिल्ली जा रहा है। अगले दोपहर दिल्ली के सफदरजंग रेलवे स्टेशन पर ट्रेन ने पहुंचाया। 

( BETUL RAILWAY STATION, MP, TANGA RIDE, SHEGAON KACHORI CENTER, PATALKOT EXPRESS   ) 

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