Thursday, February 5, 2015

राइस सिटी गोंदिया - मतलब चावल का शहर


गोंदिया शहर की आबादी दो लाख है। कभी राइस सिटी के नाम से मशहूर इस शहर में 300 से ज्यादा राइस मिलें थीं। लेकिन अब राइस का कारोबार कमजोर हो रहा है। फिर भी आजकल यहां 75 राइस मिलें बची हैं। यहां कभी बिहार झारखंड से व्यापारी सालों भर चावल खरीदने आते थे। अब कम आते हैं। जैन भोजनालय वाले प्रवीण जैन बताते हैं कि तब बिहार के व्यापारियों की मांग पर वे चावल और आलू का चोखा बनवाया करते थे।
गोंदिया शहर में अभी भी कई चावल का कारोबार करने वाले एजेंट के दफ्तर नजर आते हैं। इनके साइन बोर्ड पर लिखा है - ग्रेन कनावसिंग एजेंट। एक दूसरे बोर्ड पर लिखा है - धान चावल और कनकी के कनावसिंग एजेंट। एक तो होटल का नाम ही है राइस सिटी। कई सौ सालों से गोंदिया को राइस सिटी के नाम से ही जाना जाता है। 

सुबह पांच रुपये की चाय - सुबह में शहर में टहलने निकलता हूं। 5 रुपये में एक कप चाय पीता हूं। महाराष्ट्र के कई शहरों में चाय 10 रुपये की हो चुकी है। यहां अभी राहत है। गोंदिया शहर के बीचों बीच विशाल मां शारदा वाचनालय मेरी नजरों के सामने है। शहर में मुझे एक भी साइनबोर्ड मराठी में नहीं दिखाई देता है। सब जगह हिंदी का बोलबाला है।

एक साइनबोर्ड पर गौर फरमाता हूं। मुख्य बाजार में बोर्ड पर लिखा है- यात्री सुविधा लॉजठहरने की उत्तम व्यवस्था। लॉज मालिक का नाम है नंद किशोर शर्मा। परिचय के लिए कोष्ठक में गर्व से लिखा है- राजस्थानी ब्राह्मण। ये साफ होता है कि गोंदिया में बड़ी संख्या में राजस्थानी लोग भी हैं। और साईन बोर्ड सिंधी लोगों के भी होने का सबूत देते हैं। पर लॉज मालिक को अपनी जाति बताने की जरूरत क्यों है आखिर... ये नहीं समझ में आया।
गोंदिया शहर का एक साइन बोर्ड।  
गोंदिया जंक्शन के बाजार में सुबह की सैर करके लौट आया हूं। करीब दो किलोमीटर से ज्यादा की सैर में मुख्य बाजार सब्जी मंडी आदि का दौरा कर लिया। हालांकि सुबह-सुबह बाजार नहीं खुला है। पर शहर के मूड का थोड़ा एहसास तो हो ही जाता है। ये देखिए गोंदिया शहर में हिंदी का एक और सुंदर नमूना दुकान का नाम है - कामधेनु दुग्धालय। 

गुजरात लॉज में लकड़ी से चलने वाले देसी गीजर के गरम पानी से स्नान करने के बाद होटल से चेकआउट करके रेलवे स्टेशन की ओर बढ़ चला हूं। आगे की मंजिल पर। मैंने गुजरात लॉज के बुजुर्ग प्रोपराइट को धन्यवाद किया। जीवन में कई बड़े बड़े होटलों में भी ठहरा हूं, पर यहां का छोटा सा प्रवास भी यादगार है।

सामने लगी रेलवे स्टेशन की घडी सुबह के आठ बजा रही है। तो मेरे पास आधे घंटे का समय है नास्ता करने के लिए। तो देखता हूं कि हमारे गुजरात लॉज के ठीक बगल में जलसा रेस्टोरेंट है। रेस्टोरेंट खुल चुका है तो सुबह का नास्ता यहीं पर कर लिया जाए। हल्का नास्ता कर लेने के बाद दोपहर तक की छुट्टी। 
गोंदिया जंक्शन विदर्भ क्षेत्र का बड़ा रेलवे स्टेशन है। यहां से बालाघाट लाइनबल्लारशाह लाइनदुर्ग लाइननागपुर लाइन के लिए ट्रेनें चलती हैं। बालाघाट जाने के लिए हमारी ट्रेन बालाघाट डेमू सुबह 8.40 बजे है। मैं टिकट लेकर ट्रेन में बैठ गया हूंं। भीड़ नहीं है ट्रेन में। ये बिल्कुल साफ सुथरी ट्रेन है। सुबह सुबह ट्रेन समय पर चल पड़ी है।  
 
रास्ते में हाटा रोड नामक छोटा स्टेशन दिखाई देता है। वैसे तो ये डेमू कटंगी तक जाती है। गोंदिया बालाघाट कंटगी लाइन के ब्राडगेज में बदले जाने के बाद ये डेमू चली है। सीटें आरामदायक हैं। इसमें टायलेट भी है। 40 किलोमीटर दूर बालाघाट का किराया 10 रुपये। ट्रेन समय पर खुली और बिल्कुल समय पर बालाघाट जंक्शन के प्लेटफार्म नंबर दो पर पहुंच गई।
-विद्युत प्रकाश मौर्य -  vidyutp@gmail.com

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