Tuesday, February 24, 2015

देश की पहली नैरोगेज लाइन गुजरात में – बैल खींचते थे रेलगाड़ी

डभोई का स्टीम शेड ( एक ब्रिटिश फोटोग्राफर के कैमरे से) 
नैरो गेज रेलवे नेटवर्क की बात करें तो इसका मतलब होता है 2 फीट 6 ईंच ( 762 एमएम) पटरियों के बीच की चौड़ाई वाली रेलवे लाइन। हालांकि कुछ नैरो गेज लाइनों की चौड़ाई दो फीट भी होती है। मतलब नैरोगेज लाईन मीटरगेज से भी कम चौड़ाई वाली होती है।

भारत में पहली नैरो गेज लाइन गुजरात में 1862 में डभोई से मियागाम के बीच बिछाई गई। ये 762 एमएम की नैरो गेज लाइन गायकवाड बडौदा स्टेट रेलवे ने बिछाई। इस रेलवे लाइन की योजना बनाई थी बड़ौदा के महाराजा सर खांडेराव गायकवाड ने। यह रेलवे बड़ौदा के गायकवाड रियासत के अंतर्गत आती थी।

इस लाइन को बिछाने का ठेका नीलसन एंड कंपनी ने लिया था। वडोदरा जिले के डभोई से मियागाम के बीच बिछाई गई इस रेलवे लाइन की कुल लंबाई 20 मील ( 30 किलोमीटर ) थी। हालांकि यहां रेलगाड़ी की बोगियों को खींचने के लिए बैलों को इस्तेमाल किया जाता था। अगले एक दशक तक बैल ही इस्तेमाल किए जाते रहे। बाद बैलों की अलोकप्रियता को देखते हुए 1873 रेल की पटरियों में बदलाव कर यहां भारी पटरियां बिछाई गईं तब इन्हें लोको ( इंजन) से खींचने के लिए स्टीम इंजन लाए गए।


 पहले बिछाई गई पटरियां हल्की थींलिहाजा वे स्टीम इंजन चलाए जाने के अनुकूल नहीं थीं। स्टीम इंजन से चलने वाली रेलवे के लिहाज से भी 1873 में ये देश की पहली नैरो गेज रेलवे लाइन थी।

कभी गुजरात में था नैरोगेज रेलवे का बड़ा नेटवर्क


कभी गुजरात में था सबसे लंबा ढाई फीट का नैरो गेज नेटवर्क। 
बड़ौदा के महाराजा गायकवाड ने अपनी कंपनी जीबीएसआर ( गायकवाड बडौदा स्टेट रेलवे) के तहत नैरो गेज रेलों का एक बड़ा जाल बिछाया। उनका उद्देश्य राज्य के सभी प्रमुख शहरों को बड़ी लाइन के नेटवर्क ( बांबे बड़ौदा सेंट्रल रेलवे) से नैरो गेज के संपर्क मार्गों से जोड़ने का था। इस मार्ग डभोई नैरो गेज का बड़ा केंद्र बन गया। बाद में इस नैरो गेज मार्ग का विस्तार चांदोद, जांबुसार, छोटा उदयपुर, टिंबा जैसे शहरों तक किया गया। जीबीएसआर के नेटवर्क के तहत पेटलाड से दूसरे नैरो गेज लाइन का भी निर्माण कराया गया। वहीं नवसारी में दूसरे नैरो गेज लाइन का निर्माण कराया गया। यहां कोसांबा से उमरपाडा और बिलीमोरा से वघई के बीच नैरो गेज लाइनें बिछाई गईं। 

वहीं बोदेली छोटा उदयपुर रेलवे कंपनी गायकवाड और छोटा उदयपुर महाराजा की संयुक्त स्वामीत्व वाली कंपनी थी। एक फरवरी 1917 को बोदेली और छोटा उदयपुर के बीच रेलवे लाइन का संचालन शुरू हुआ। 36.48 किलोमीटर लंबी लाइन के निर्माण में तब 10 लाख रुपये का खर्च आया था। अब इस क्षेत्र के कई रेल मार्ग ब्राड गेज में बदले जा चुके हैं फिर भी 2013 में गुजरात में 260 किलोमीटर से ज्यादा लंबा नैरो गेज रेलमार्ग संचालन में था।  



- vidyutp@gmail.com 

( GUJRAT NARROW GAUGE, DABHOI   1)