Wednesday, February 4, 2015

महाराष्ट्र का शहर जहां कोई मराठी नहीं बोलता

रायपुर रेलवे स्टेशन पर नीलकंठ महाराज। ( तस्वीर थोड़ी धुंधली आई है )
रायपुर से शाम को 17.55 बजे चलने वाली नागपुर इंटरसिटी एक्सप्रेस कुछ मिनट लेट थी। इसी ट्रेन से मुझे गोंदिया जाना है। रायपुर रेलवे प्लेटफार्म पर इस दौरान मुझे दुर्लभ पक्षी नीलकंठ के दर्शन हुए। हमारे साथ ट्रेन का इंतजार कर रहे भंडारा जाने वाले बुजुर्ग मराठी नीलकंठ देव को बार बार प्रणाम कर रहे थे। पर थोड़ी देर में नीलकंठ महाराज दर्शन देने के बाद उड़ गए। हमारी ट्रेन नागपुर इंटरसिटी एक्सप्रेस रायपुर में प्लेटफार्म पर लग गई। 
ट्रेन अपनी गति से चल पड़ी है। भिलाई, दुर्ग के बाद आया राजनांदगांव। इसके बाद डोंगरगढ़ आया। यह छत्तीसगढ़ का आखिरी रेलवे स्टेशन है। महाराष्ट्र के पहले स्टेशन आमगांव के बाद ट्रेन पहुंच गई है गोंदिया जंक्शन।

रात के साढ़े नौ बज चुके हैं। छोटे शहरों इस समय तक बाजार बंद होने लगते हैं। मेरी चिंता जल्द किसी होटल में ठिकाना बनाने की और उसके बाद रात का खाना खाने की है। मैं प्लेटफार्म नंबर एक से बाईं तरफ बाहर निकलता हूं। पतली सी सड़क शहर में प्रवेश कर रही है। आपको पता है कि महाराष्ट्र में एक ऐसा शहर भी है जहां कोई मराठी नहीं बोलता। शहर के सारे साइनबोर्ड हिंदी में दिखाई देते हैं। यह सौ फीसदी सच है। थोड़ा दिमाग दौड़ाइए। हम पहुंच गए हैं राइस सिटी के नाम से मशहूर गोंदिया में। गोंदिया विदर्भ क्षेत्र का जिला मुख्यालय है। एक बड़ा व्यापारिक शहर है। पर शहर की सीमा मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ के काफी करीब है।

गोंदिया से मध्य प्रदेश की सीमा 22 किलोमीटर और छत्तीसगढ़ की सीमा 46 किलोमीटर है। दोनों राज्यों के लोग यहां बड़ी संख्या में व्यापार करने आते हैं।
यहां मुझे गुजरात लॉज नजर आता है। मैं सीढ़िया चढ़ उपर पहुंचता हूं। एक कमरा 150 रुपये का। लकड़ी की दीवारें हैं। पुराने बड़े से घर को लॉज में तब्दील किया गया है। पहली मंजिल पर भोजनालय भी है, लेकिन आजकल बंद है। उपर वाली मंजिल पर कमरा है लेकिन शौचालय नीचे वाली मंजिल पर।

अच्छी बात ये रही कि गुजरात लॉज वाले ने सुबह नहाने के लिए गर्म पानी भी उपलब्ध करा दिया। पानी गर्म करने के लिए यहां देशी गीजर लगा था। स्टील का बड़ा सा लंबा बरतन जिसमें नीचे से लकड़ी की आग जलाकर गर्म पानी तैयार कर दी गई।

गोंदिया में हिंदी और सिंधी - रात गोंदिया शहर में बड़ी संख्या में सिंधी समाज के लोग रहते हैं। वहीं शहर में हिंदी का बोलबाला है। तो यूं कहें कि यह हिंदी और सिंधी का शहर है तो गलत नहीं होगा। शहर का 80 फीसदी व्यापार सिंधी कारोबारियों के हवाले है। यहां पर पंजाबी और मारवाड़ी भी हैं। 

होटल के कमरे में अपना सामान रखने के बाद मैं रात को भोजन के लिए मैं पड़ोस के जैन भोजनालय में जाता हूं। इसके प्रोपराइटर प्रवीण जैन हैं। वे बताते हैं कि उनका यह भोजनालय 75 साल से चल रहा है। दादाजी के जमाने से। तब दादा जी सवा रुपये में भरपेट खाना खिलाते थे। पर आज 70 रुपये में खिलाते हैं। खाने में ढेर सारी वेराइटी भी है।
जैन भोजनालय की थाली में है तीन सब्जियां, दाल, 6 चपाती, ढेर सारा चावल और सलाद। इतना कुछ की कम खाने वाला आदमी तो पूरी थाली खा भी नहीं सकता। इस भोजनालय में कुछ पटना के लोग मिले। वे व्यापार के सिलसिले में यहां आए हुए हैं।

प्रवीण जैन बताते हैं कि महाराष्ट्र का यह गोंदिया शहर पूरी तरह हिंदी भाषी है। यहां के ज्यादातर स्थानीय लोगों को भी मराठी नहीं आती। 35 साल के प्रवीण जैन बताते हैं कि मैं जब व्यापार के सिलसिले में नागपुर जाता हूं और वहां के दुकानदारों से मराठी में नहीं बात कर पाता तब  वे लोग मुझे आश्चर्य से देखते हैं। पर यही सच है कि गोंदिया हिंदी बोलता है। और हमलोग भाषा के नाम पर कई बार झगड़ पड़ते हैं। गोंदिया शहर में चौक पर गांधी जी की प्रतिमा भी है, जिन्होंने गुजराती होकर भी हिंदी को महत्व दिया था। 
-विद्युत प्रकाश मौर्य -  vidyutp@gmail.com

No comments:

Post a Comment