Thursday, January 22, 2015

पूरे छत्तीसगढ़ की झांकी यहां देखें - रायपुर का घासीदास संग्रहालय



अगर आप पूरे हरे-भरे छत्तीसगढ़ को नहीं देख सके हैं तो उसकी एक झांकी रायपुर के महंथ घासीदास संग्रहालय में देख सकते हैं। ये राज्य के बेहतरीन संग्रहालयों में से एक है। महंत   
 घासीदास संग्रहालय रायपुर का एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल हो सकता है। यह देश के प्राचीनतम  संग्रहालयों में से एक है। यह संग्रहालय सन   1875 में राजा महंत घासीदास ने बनवाया था।

किरारी से प्राप्त काष्ठ अभिलेख। 


किरारी से प्राप्त काष्ट स्तंभ  लेख  -   महंत घासीदास संग्रहालय में किरारी से प्राप्त काष्ट स्तंभ लेख भी विलक्षण है। आमतौर पर पत्थरों पर स्तंभ लेख देखने को मिलते हैं। पर लकड़ी पर बहुत कम देखने को में आता है। किरारी जांजगीर चांपा जिले के मालखरौदा तहसील में पड़ता है। दूसरी सदी का  अभिलेख  प्राकृत भाषा में ब्राह्मी लिपी  में लिखा गया है।  इसमें अनेक शासकीय अधिकारियों के नाम और पदनाम लिखे गए हैं। संग्रहालय में देवनागरी लिपि के विकास को भी सहज ढंग से दिखाया गया है।


यक्षिणी की विशाल प्रतिमा -  महंत घासी दास संग्रहालय में एक यक्षिणी की विशाल प्रतिमा भी दिखाई देती है। यह देखने  में काफी हद तक बिहार के पटना से प्राप्त दीदारगंज की यक्षिणी की प्रतिमा से मिलती जुलती  नजर आती है। 

महज एक रुपया  प्रवेश शुल्क -  संग्रहालय शहर के लोकप्रिय घड़ी चौक से पांच मिनट के पैदल चलकर पहुंचा जा सकता है। हालांकि महंत   घासीदास संग्रहालय   दर्शकों और पर्यटकों के लिए तरसता रहता है। प्रचार कम होने के कारण कम लोग ही यहां पहुंचते हैं। यहां प्रवेश शुल्क प्रति व्यक्ति महज एक रुपया है।   बावजूद इसके यहां रोज दर्शक बहुत कम आते हैं।


फोटोग्राफी शुल्क 5 रुपये -  अगर आंतरिक फोटोग्राफी करना चाहते हैं तो 5 रुपये शुल्क है। मैंने खुशी से फोटोग्राफी के लिए 5 रुपये का टिकट लिया। संग्रहालय के बाहर बड़ा ही खूबसूरत उद्यान है। उद्यान में बैठने के लिए बेंच बनी हुई है। इसके परिसर में एक मुक्ताकाश थियेटर भी है। 

तीन दीर्घाओं में देखें इतिहास -  संग्रहालय की कलाकृतियों को तीन दर्शक दीर्घाओं में विभक्त किया गया है। पुरातत्व दीर्घा में मृण्मूर्तियाँ, मिट्टी के बरतन, पत्थर और मिट्टी की मुद्राएं हैं। 

यहां सिरपुर और पसेवा की खुदाई में मिली आठवीं सदी की ईंटें व लगभग 2300   ईस्वी  पूर्व काल के मिट्टी के बरतन देखे जा सकते हैं।

सिरपुर की खुदाई में मिट्टी की कई मुद्राएं मिली हैं, जो सातवीं-आठवीं सदी की हैं। यहां तरह-तरह के उपकरण और औजार   भी हैं, जो आठवीं से लेकर 12वीं सदी तक के हैं। 

प्रतिमाओ में कारी तलाई जबलपुर से संबंधित विभिन्न देवी-देवताओं एवं नायक-नायिकाओं की कलाकृतिओं को प्रदर्शित किया गया है।

 सोमवंशी और कलचुरि काल की कलाकृतियां -  ये कलाकृतियाँ सोमवंशियों एवं कलचुरियों के काल की हैं। संग्रहालय की मानव शास्त्रीय दीर्घा में माड़िया, गोंड़, कोरकू, उरांव और बंजारा जनजातियों के उपयोग में आने वाले कपड़े, गहने, बरतन, शस्त्र, वाद्य एवं अन्य दैनिक उपयोग की वस्तुएं संग्रहित हैं।



उमा महेश्वर की अदभुत प्रतिमाएं – यहां उमा महेश्वर की  सुंदर प्रतिमाएं देखी जा सकती हैं। शिव और पार्वती के एक साथ होने की ऐसी  प्रेमाशक्त भाव भंगिमा वाली प्रतिमाएं बहुत कम ही देखने को मिलती हैं। दसवीं सदी में जबलपुर से प्राप्त उमा  पर यहां एक नहीं तीन उमा महेश्वर की प्रतिमाएं है।


संग्रहालय  में मौजूद ये प्रतिमाएं रति मुद्रा में हैं।  इनका सौंदर्य  और भाव भंगिमाएं देखने लायक हैं। कहा जाता है कि उमा महेश्वर का व्रत करने से इच्छित वस्तुएं प्राप्त होती हैं। उमा महेश्वर स्तोत्र -   नमः शिवाभ्यां नवयौवनाभ्यां परस्पराश्लिष्टवपुर्धराभ्याम् । 
नगॆन्द्र कन्या वृषकॆतनाभ्यां नमॊ नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥ 1

घासीदास संग्रहालय में प्रदर्शित आदिवासी समुदाय के लोगों के वाद्य यंत्र । - फोटो - विद्युत


कैसे पहुंचे -     संग्रहालय रायपुर नगर में जिला न्यायालय और कमिश्नर दफ्तर के बीच जीई रोड पर स्थित है।   इसका नामकरण नांदगांव रियासत के राजा महंत    घासीदास   के नाम से किया गया है। यह सन   1953    से संस्कृति एवं पुरातत्व के संचालनालय में स्थापित है । साल   1953 में   21   मार्च   को देश के प्रथम राष्ट्रपति डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद ने इसका लोकार्पण किया।  




मददगार सरकारी कर्मचारी -  सबसे अच्छी बात है कि इस संग्रहालय में कार्यरत सरकारी कर्मचारियों का  व्यवहार काफी अच्छा है। वे दर्शकों को संग्रह के बारे में बताने में काफी मदद करते हैं।   ऐसा बहुत कम   जगह देखने को मिलता है।  मैंने यहां कुछ घंटे गुजारकर काफी कुछ समझने की कोशिश की। 
(MAHANT GHASIDAS MUSEUM, RAIPUR ) 


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