Saturday, February 28, 2015

धन्य किहिन विक्टोरिया जिन्ह चलाईस रेल


धन्य किहिन विक्टोरिया जिन्ह चलाईस रेल, मानो जादू किहिस दिखाइस खेल... हिंदी के प्रसिद्ध कवि भारतेंदु हरिश्चंद्र की पंक्तियां गुजरात के प्रतापनगर रेल संग्रहालय के बाहर लिखी हुई नजर आती हैं।  और भारतेंदु हरिश्चंद्र की ही लिखी गई नए जमाने की मुकरी भी यहां नजर आती है - पैसे लेके पास भगावे, ले भागे मोहि खेले खेल, का सखि साजन,  ना सखि रेल।

वास्तव में दुनिया में रेलगाड़ियों के विकास की कहानी जादू भरी है। वडोदरा के प्रतापनगर में बना ये संग्रहालय नैरो गेज के विकास की दास्तां बयां करता है। इसका महत्व इसलिए बढ़ जाता है कि गुजरात में ही देश की पहली नैरो गेज रेल चली और कभी देश का सबसे बड़ा नैरो गेज नेटवर्क गुजरात में हुआ करता था।  प्रतापनगर में इस रेल संग्रहालय का उदघाटन 27 जनवरी 1997 को रेलवे बोर्ड के सदस्य कार्मिक (रेलवे) वीके अग्रवाल द्वारा किया गया।

यहां जानकारी दी गई है कि नैरो गेज ट्रेनों की शुरुआत यूरोप में कोयला के खानों में हुई। पर बाद में ये सवारी ढोने के लिए भी लोकप्रिय हो गई। भारत में नैरो गेज रेलवे लाइन बिछाने वाले बड़ौदा महाराजा पहले राजा थे। जब बड़ौदा के महाराजा ने डभोई और मियागाम के बीच पहली नैरो गेज रेलवे लाइन बिछाई तो देश के दूसरे महाराजाओं ने भी उनका अनुशरण किया। रेलवे ने आम जनमानस पर काफी प्रभाव डाला, जो रेलगाडियों पर लिखी गई कविताओं , लोकगीतों और कहानियों में दिखाई देता है। 




गुजरात का डभोई 19वीं सदी का महत्वपूर्ण व्यापारिक शहर था। वहां से महुआ, कपास, गल्ले आदि का व्यापार होता था। यह धातु के काम, बुनाई के काम और लकड़ी के सामानों के लिए भी जाना जाता था। महाराजा बड़ौदा को ख्याल आया कि इस शहर को बड़ौदा मुंबई रेल मार्ग से जोड़ा जाए। इसी को ध्यान मे रखते हुए डभोई मियागाम के बीच नैरो गेज रेलवे लाइन बिछाने की योजना बनी। 26 मार्च 1860 को बड़ौदा के रेजिडेंट ने गवर्नमेंट ऑफ मुंबई के चीफ सेक्रेटेरी को एक खत लिखा जिसमें उन्होंने बड़ौदा रियासत में रेलवे लाइन बिछाने की जरूरत बताई। पत्र में कहा गया कि महाराजा खंडोराव रेलवे लाइन बिछाने की इच्छा रखते हैं। इसके लिए 2 फीट 6 इंच वाले गेज का चयन किया गया। हालांकि पहला प्रस्ताव इंटौला को बडौदा से जोडने का था लेकिन 1862 में डभोई को मियागाम से जोडा गया। पर इस रेलवे लाइन पर कोच को बैल खींचते थे। 

1863 में लंदन टाइम्स ने अपने संस्करण में विशेष खबर प्रकाशित की
, जिसमें इस बात का जिक्र था कि भारत में बड़ौदा के प्रिंस ने अपने खर्च पर भारत में पहली नैरो गेज रेल नेटवर्क का निर्माण किया जिसे बैल खींचते हैं। बैल से खींचे जाने वाले यात्री कोच में 12 लोगों के बैठने का इंतजाम था। इसका कोच 4 पहियों वाला था। इसमें यात्री कोच के साथ मालगाड़ी के छोटे डिब्बे भी जोडे जाते थे। दो बैलों की जोड़ी चार कोच को आराम से खींचती थी। पर बैलों से चलने वाली ये रेलवे लाइन ज्यादा लंबा सफर नहीं कर सकी।

नैरो गेज ट्रेन के लोकोमोटिव के साथ महाराजा बड़ौदा। 

महाराजा मल्हार राव ने डभोई मियागाम लाइन को दुबारा नए सिरे से बनवाने का उपक्रम शुरू किया। इस बार इसे स्टीम इंजन से चलाने की योजना पर काम हुआ। इसके लिए पटरियां बदली गईं। यह भारत के नैरो गेज के इतिहास में ऐतिहासिक दिन था। 8 अप्रैल 1873 को स्टीम लोकोमोटिव से चलने वाले नैरो गेज रेल मार्ग का संचालन डभोई और मियागाम के बीच हुआ। पहले दिन दिनों में इस रेल मार्ग से महज 57 लोगों ने यात्रा की और 1267 मन माल की ढुलाई हुई। अगले हफ्ते यात्रियों की संख्या बढ़कर 244 हो गई। माल की लदान में भी बढ़ोत्तरी हुई। इस तरह रेलवे लाइन लोकप्रिय होने लगी और कमाई में भी इजाफा होने लगा।

तब निचले दर्जे का किराया 4 पाई प्रति मील और उपर के दर्जे का किराया 8 पैसे प्रति मील था। एक यात्री गाड़ी में कुल 212 लोग सवार हो सकते थे। गाड़ी की अधिकतम स्पीड 8 मील प्रति घंटा हुआ करती थी। वहीं माल ढुलाई की दर 8 पैसे से 40 पाई प्रति मील थी। माल ढुलाई की दर अलग अलग सामान के लिए अलग थी। सबसे कम दर गल्ले और नमक आदि के लिए रखी गई थी।


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Friday, February 27, 2015

प्रतापनगर - यहां देखिए नैरो गेज का इतिहास


प्रताप नगर  रेलवे स्टेशन की दूरी बड़ौदा रेलवे स्टेशन से 5 किलोमीटर है। हालांकि दोनों स्टेशन रेलवे लाइन से भी संपर्क में हैं। पर अगर आपको प्रताप नगर कभी भी पहुंचना हो तो वडोदरा रेलवे स्टेशन से आटो रिक्शा से जाना पड़ता है। सयाजीराव गायकवाड रेलवे ओवर ब्रिज के बाद लंबे लाल बाग उद्यान के बाद आता है प्रताप नगर रेलवे स्टेशन। इस रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर एक से नैरो गेज की रेलागाड़ियों का संचालन होता है। नैरो गेज यानी छोटी लाइन को गुजराती में नानी लाइन कहते हैं। जबकि प्लेटफार्म नंबर दो और तीन से बड़ी लाइन यानी मोटी लाइन की ट्रेन चलती हैं। प्रतापनगर में रेलवे स्टेशन के पास ही बडोदरा का डीआरएम आफिस और बड़ी रेलवे कालोनी है। प्लेटफार्म नंबर एक के पास ही बना है नैरो गेज का रोलिंग स्टाक पार्क। इस पार्क में गुजरात के नैरो गेज नेटवर्क से जुड़ी हुई ऐतिहासिक धरोहरों को सहेज कर रखा गया है।
  

इस पार्क में अलग अलग तरह के कोच, क्रेन, क्रांसिंग आदि के नमूने देखे जा सकते हैं। प्रतापनगर शेड में नैरो गेज पर चलने वाली रीलिफ वैन खड़ी दिखाई देती है। इसमें मेडिकल कंपार्टमेंट, स्टोर, स्ट्रेचर रखने की जगह और सहायता में जाने वाले स्टाफ के लिए बैठने की जगह होती थी। इस शेड में एक जेनरेटर वैन भी खड़ा है जो कभी इस्तेमाल में था।

किसी समय में गुजरात के नैरो गेज नेटवर्क पर मालगाड़ियां बड़ी संख्या में चलाई जाती थीं। बड़ी लाइन के नेटवर्क से आने वाले सामान को छोटी लाइन से गुजरात के तमाम शहरों तक पहुंचाया जाता था। यहां पुरानी मालगाड़ी के कोच भी संभाल कर रखा गया है। ये कोच 1961 का बना हुआ है। इसकी क्षमता 15.3 टन सामान ढोने की है। सिर्फ मालगाड़ियां ही नहीं नैरो गेज नेटवर्क डीजल पेट्रोल और दूसरे तेल को भी सप्लाई करने का काम ये नैरोगेज नेटवर्क करती थी। इस डिब्बे का निर्माण 1951 में हर्स्ट निल्सन एंड कंपनी ने किया था।


प्रतापनगर शेड में एक नैरोगेज का आयल टैंकर भी पटरियों पर आराम फरमा रहा है। कई बार ये डिब्बा पेयजल सप्लाई के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है। यहां पर प्रदर्शित किए गए इस डिब्बे का निर्माण 1907 में लीड्स फोर्स कंपनी लिमिटेड ने किया था। इसकी क्षमता 12 हजार लीटर पानी ढोने की है। यहां मालगाड़ी के साथ लगने वाला गार्ड का नन्हा सा डिब्बा भी देखा जा सकता है।

अनूठा हैंड क्रेन - प्रतापनगर शेड में 1883 का बना हुआ अनूठा हैंड क्रेन देखा जा सकता है। काउन शिल्डन एंड कंपनी, इंग्लैंड द्वारा निर्मित ये क्रेन 5 टन वजन का सामान इधर उधर कर सकता है। इसका दयारा 10 फीट का है। 1915 में इसे भरूच में लगाया गया था। यह ब्राड गेज और नैरो गेज के कोच से भारी सामान को उतारने का काम करता था।



इंजन के लिए रोटेटर - रेलगाड़ी के लोकोमोटिव को अपनी जगह पर घूमा कर वापस उल्टी दिशा में करने के लिए रोटेटर का इस्तेमाल किया जाता था। ऐसा ही एक रोटेटर प्रतापनगर में लगा हुआ दिखाई देता है। 

बीबी एंड सीआई रेलवे के लिए इस रोटेटर यंत्र का निर्माण 1874 में ओरेमरोड क्रिरेशन एंड कंपनी ने किया था। ये मैनचेस्टर
, लंदन का बना हुआ है। नैरोगेज के तमाम नेटवर्क पर लोकोमोटिव की दिशा बदलने के लिए इस तकनीक का खूब इस्तेमाल किया जाता था। इस रोटेटर पर इंजन को लाकर खड़ा कर देने के बाद कुछ लोग मिलकर पूरे इंजन को दूसरी दिशा में आसानी से घूमा देते थे। 




डायमंड क्रासिंग  रेल को एक पटरी से दूसरी पटरी के बीच क्रास कराने के लिए क्रासिंग बनाई जाती थी।  ऐसी क्रासिंग की जरूरत अक्सर रेलवे जंक्शन पर पड़ती हैजहां दो मार्ग एक दूसरे को क्रास करते हैं। यहां पर जिस क्रासिंग को प्रदर्शित किया गया है वह टिंबा रेलवे स्टेशन पर 1919 में बनाया गया था। 

क्रासिंग वाली जगह पर पटरी में एंगल और दो पटरियों के बीच जगह का ध्यान रखना पड़ता है। क्योंकि गर्मियों में लोहा गर्म होता है तब पटरियां फैलती हैं। प्रतापनगर शेड में नैरो गेज की डायमंड क्रासिंग भी देखी जा सकती है। डायमंड क्रासिंग में ब्राड गेज और नैरो गेज की दो पटरियां एक दूसरे को किसी सड़क के चौराहे की तरह क्रास कर जाती हैं। रोलिंग स्टाक पार्क के सामने सड़क की दूसरी तरफ रेलवे हेरिटेज संग्रहालय का निर्माण किया गया है जो गुजरात में नैरो गेज के विकास की कहानी बयां करता है।
 


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( GUJRAT, PRATAP NAGAR, NARROW GAUGE, RAIL ) 

Thursday, February 26, 2015

मस्ती भरा सफर- प्रतापनगर जंबुसर नैरो गेज

गुजरात में डभोई-मियागाम के अलावा  प्रतापनगर (वडोदरा) और जंबुसर जंक्शन (भरुच) और कोसांबा उमरपदा, बिलिमोरा वघई के बीच 2014 में भी नैरो गेज रेल नेटवर्क संचालित हो रहा था।
बड़ौदा के प्रतापनगर से जंबुसर के बीच नैरो गेज रेलवे लाइन की कुल लंबाई 51 किलोमीटर है। पहले ये लाइन सामनी तक जाती थी जिसकी कुल दूरी 75 किलोमीटर थी। पर अब यह प्रतापनगर तक ही सीमित हो गई है। प्रतापनगर और जंबुसर के बीच 13 रेलवे स्टेशन हैं।

रेलगाड़ी के साथ ही चलता है टिकट घर

मजे की बात है कि ये देश का अनूठा रेलवे नेटवर्क इस मायने में हैं कि इसमें रेलवे का टिकट घर साथ साथ ही चलता है। प्रताप नगर से जंबुसर के बीच पड़ने वाले रेलवे स्टेशनों पर टिकट बिक्री के लिए काउंटर नहीं हैं। सुबह शाम चलने वाली ट्रेन जब स्टेशन पर आती है तो रुकने पर चढ़ने वाले यात्री ट्रेन के ही एक कोच में मौजूद टिकट काउंटर से लोग टिकट खरीदते हैं। इन्हें पुराने आकार के पीले रंग के गत्ते वाले टिकट दिए जाते हैं। आमतौर पर बसों में टिकट बेचने वाला कंडक्टर बस के साथ साथ चलता है। पर ये एक ऐसी ट्रेन है जिसमें टिकट घर रेलगाड़ी के ही साथ साथ चलता है। 2012 में इस ट्रेन पर यात्रा करने वाली लिपिका हैदर अपने यात्रा के मजेदार संस्मरण साझा करती हैं। उन्होंने इसे दुनिया की सुस्त ट्रेन और सफर को बोरियत भरा करार दिया है। प्रतापनगर जंबुसर जंक्शन के बीच चलने वाली नैरो गेज ट्रेन के एक डिब्बे में 36 यात्रियों के बैठने की जगह है।

  
ये है दुनिया का सबसे सुस्त नेटवर्क

प्रतापनगर और जंबुसर के बीच दोनों स्टेशनों के बीच दो जोड़ी पैसेंजर ट्रेनों का संचालन होता है। 52036 पैसेंजर प्रतापनगर से सुबह 10 बजे चलती है जो 1 बजे जंबुसर पहुंचती है। वहीं 52034 पैसेंजर शाम 6.10 बजे जंबुसर के लिए चलती है जो रात को 9.10 बजे जंबुसर पहुंचती है। यानी 50 किलोमीटर के सफर के लिए तीन घंटे से ज्यादा का वक्त। औसत गति 15 से 17 किलोमीटर प्रति घंटा की। एक साइकिल वाला भी औसतन 20 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से साइकिल दौड़ाता है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि जेडीएम 5 लोको से चलने के बावजूद ये ट्रेन इतनी सुस्त क्यों है। वैसे जेडीएम 5 की अधिकतम स्पीड 50 किलोमीटर प्रति घंटे तक होती है। प्रताप नगर जंबुसर नैरो गेज लाइन पर भी रेलगाड़ियों को सीमित संसाधनों के बीच कम खर्च में चलाया जा रहा है। आसपास में सड़कों का बेहतर नेटवर्क मौजूद होने के कारण ये रेलवे लाइन स्थानीय लोगों के बीच ज्यादा लोकप्रिय नहीं है। लेकिन शाम को बड़ौदा से अपने गांव  की ओर जाने वाले लोग बड़ी संख्या में इस रेलवे लाइन का इस्तेमाल करते हैं।



इस मार्ग पर सफर के दौरान आपको गुजरात के गांव दिखाई देते हैं। कपास, तंबाकू और अलसी के हरे भरे खेतों के साथ चलता है 50 किलोमीटर का सफर। कहीं घर के आगे बंधी हुई भैंसे दिखाई देती हैं तो कहीं पेड़ों पर बंदर चहलकदमी करते तो राष्ट्रीय पक्षी मोर नाचते हुए दिखाई दे जाते हैं। सफर सुस्त है तो प्रकृति के नजारों का मजा लिजिए।

प्रतापनगर जंबुसर मार्ग पर भी रायपुर धमतरी की तरह ही हर सड़क पर आने वाली क्रासिंग से पहले रेलगाड़ी रूक जाती है। रेल से खलासी उतर कर जाता है गेट को बंद करता है। रेलगाड़ी चलती है गेट क्रास करने के बाद फिर रूक जाती है। खलासी वापस जाकर गेट को खोलता है फिर ट्रेन आगे बढ़ती है। खलासी के अलावा लोको पायलट, असिस्टेंट लोको पायलट और एक गार्ड ट्रेन में चलते हैं। 

प्रतापनगर जंबुसर के बीच चलने वाली नैरो गेज ट्रेन 1997 से पहले 45 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से भी दौड़ती थी। पर रेलवे क्रासिंग से गार्ड हटाए जाने के बाद इसकी गति सुस्त पड़ गई। वहीं दभाई के आसपास वाली नैरोगेज ट्रेनें आज भी 35 किलोमीटर तक की गति से चलती हैं। शाम को प्रतापनगर से जंबुसर के बीच चलने वाली ट्रेन में कोई सुरक्षा भी नहीं है।

कभी इस्तेमाल होती थी ऐसी क्रेन


प्रतापनगर (वडोदरा) में है नैरो गेज का विशाल वर्कशाप
नैरो गेज ट्रेनों के रख रखाव और मरम्मत के लिए बड़ौदा के पास प्रतापनगर में वर्कशाप की स्थापना की गई। स्टीम लोको के लिए इस वर्कशाप की स्थापना की गई थी। 25 मार्च 1919 को वायसराय लार्ड चेम्सफोर्ड ने प्रतापनगर वर्कशाप की आधारशिला रखी। 1922 में यहां नियमित तौर पर कामकाज शुरू हो गया था। 1949 तक यह गायकवाड बड़ौदा स्टेट रेलवे ( जीबीएसआर) का हिस्सा था। 1949 में भारतीय रेलवे में समाहित होने के बाद ये अब भारत सरकार के स्वामित्व में है। वडोदरा रेलवे स्टेशन से प्रतापनगर डीजल शेड की दूरी 4 किलोमीटर है।

गायकवाड वडोदरा स्टेट रेलवे (जीबीएसआर) के लिए लोको यानी इंजन की सप्लाई का काम शुरुआती दौर में डब्लू जी बागनाल लिमिटेड नामक कंपनी करती थी। जबकि सवारी डिब्बों और मालगाड़ी के डिब्बों के निर्माण गुजरात में ही स्थानीय स्तर पर किया जाता था। बडौदा स्टेट रेलवे के बाद देश में 1880 में दार्जिलिंग हिमालयन रेल दूसरी नैरो गेज लाइन बिछाई गई जिसके पटरियों की चौड़ाई दो फीट थी।


सन 1990 में बडौदा शहर के प्रतापनगर नैरो गेज शेड को पूरी तरह डीजल लोकोशेड में बदल दिया गया। आजकल ये देश का सबसे बड़ा नैरोगेज का डीजल लोकोशेड है। 25,600 वर्ग मीटर में फैले इस प्रतापनगर वर्कशाप के पास आज कुल 26 नैरोगेज के डीजल लोको हैं। ये जेडीएम- 5 सीरीज के हैं। हालांकि यहां 50 लोकोमोटिव को रखने की कुल क्षमता है। 


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( GUJRAT NARROW GAUGE, PRATAPNAGAR JAMBUSAR, DABHOI  ) 

Wednesday, February 25, 2015

कभी नैरो गेज का मक्का था डभोई जंक्शन

गुजरात में नैरो गेज नेटववर्क के विकास के क्रम में बडौदा जिले का शहर डभोई नैरो गेज रेलवे का प्रमुख जंक्शन बन गया। वास्तव में डभोई को नैरो गेज का मक्का कहें तो कुछ गलत नहीं होगा।

महाराजा गायकवाड के राज्य में डभोई प्रमुख व्यापारिक शहर था। इस शहर से मियागाम करजन के बीच 2 फीट 6 इंच चौड़ाई वाले नैरो गेज रेलवे लाइन की शुरुआत कर महाराजा ने इसे विश्व मानचित्र पर ला दिया। वास्तव में महाराजा ने 1860 में ही डभोई और बड़ौदा के नैरो गेज लाइन से जोड़ने के बारे में सर्वे शुरू करा दिया था। दो साल बाद 32 किलोमीटर के इस मार्ग का निर्माण किया गया।

डभोई से मोटी कोराल वाया मियागाम करजन

नैरो गेज के मक्का कहे जाने वाले डभोई से मियागाम होकर मोटी कोराल तक 2014 में नैरो गेज नेटवर्क संचालन में था। डभोई नेशनल हाईवे नंबर 8 पर स्थित वडोदरा जिले का छोटा सा व्यापारिक शहर है। वडोदरा से डभोई की दूरी 32 किलोमीटर है।



डभोई में ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण एक मन्दिर के प्राचीन अवशेष भी प्राप्त हुए हैं। डभोई वडोदरा जिले का एक कस्बा है, जिसे पहले दर्भावती नाम से जाना जाता था। इस प्रचीन शहर का गिरनार के जैन धर्मग्रथों में बहुत महत्व है। डभोई का किला हिंदू सेना की वास्तु शिल्प का एक दुर्लभ उदाहरण है, जिसे आज भी देखा जा सकता है। छोटे से शानदार किले के कारण भी डभोई शहर को जाना जाता है।
गुजरात में नैरो गेज का डभोई रेलवे स्टेशन की उम्र 150 साल से ज्यादा हो चुकी है। मालसर- मियागाम करजन- डभोई- चंदोद नैरो गेज मार्ग की कुल लंबाई 90 किलोमीटर है। मालसर नर्मदा नदी के किनारे एक छोटा सा शहर है। सुबह 6.10 में डभोई से चलने वाली 52046 पैसेंजर 12.15 बजे मोटी कोराल पहुंचती है। इस मार्ग पर कुल 15 रेलवे स्टेशन हैं। 
डभोई से मियागाम करजन होते हुए मालसर तक नैरो गेज रेल जाती है। वहीं डभोई से दूसरा नैरो गेज रेलमार्ग चंदोद तक जाता है। मियागाम करजन बड़ौदा मुंबई मुख्यमार्ग पर ब्राडगेज का रेलवे स्टेशन है। मियागाम करजन से डभोई की दूरी 32 किलोमीटर है। वहीं डभोई से चंदोद की दूरी 19 किलोमीटर है। अब वडोदरा से डभोई होते हुए छोटा उदयपुर के लिए ब्राडगेज रेलवे लाइन बन चुकी है।


दभोई से जुड़ा नैरो गेज नेटवर्क

चंदोद से डभोई - 19 किलोमीटर
डभोई से मियागाम करजन – 32 किलोमीटर

मियागाम करजन से मालसर – 38 किलोमीटर


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Tuesday, February 24, 2015

देश की पहली नैरोगेज लाइन गुजरात में – बैल खींचते थे रेलगाड़ी

डभोई का स्टीम शेड ( एक ब्रिटिश फोटोग्राफर के कैमरे से) 
नैरो गेज रेलवे नेटवर्क की बात करें तो इसका मतलब होता है 2 फीट 6 ईंच ( 762 एमएम) पटरियों के बीच की चौड़ाई वाली रेलवे लाइन। हालांकि कुछ नैरो गेज लाइनों की चौड़ाई दो फीट भी होती है। मतलब नैरोगेज लाईन मीटरगेज से भी कम चौड़ाई वाली होती है।

भारत में पहली नैरो गेज लाइन गुजरात में 1862 में डभोई से मियागाम के बीच बिछाई गई। ये 762 एमएम की नैरो गेज लाइन गायकवाड बडौदा स्टेट रेलवे ने बिछाई। इस रेलवे लाइन की योजना बनाई थी बड़ौदा के महाराजा सर खांडेराव गायकवाड ने। यह रेलवे बड़ौदा के गायकवाड रियासत के अंतर्गत आती थी।

इस लाइन को बिछाने का ठेका नीलसन एंड कंपनी ने लिया था। वडोदरा जिले के डभोई से मियागाम के बीच बिछाई गई इस रेलवे लाइन की कुल लंबाई 20 मील ( 30 किलोमीटर ) थी। हालांकि यहां रेलगाड़ी की बोगियों को खींचने के लिए बैलों को इस्तेमाल किया जाता था। अगले एक दशक तक बैल ही इस्तेमाल किए जाते रहे। बाद बैलों की अलोकप्रियता को देखते हुए 1873 रेल की पटरियों में बदलाव कर यहां भारी पटरियां बिछाई गईं तब इन्हें लोको ( इंजन) से खींचने के लिए स्टीम इंजन लाए गए। पहले बिछाई गई पटरियां हल्की थीं, लिहाजा वे स्टीम इंजन चलाए जाने के अनुकूल नहीं थीं। स्टीम इंजन से चलने वाली रेलवे के लिहाज से भी 1873 में ये देश की पहली नैरो गेज रेलवे लाइन थी।

कभी गुजरात में था नैरोगेज रेलवे का बड़ा नेटवर्क


कभी गुजरात में था सबसे लंबा ढाई फीट का नैरो गेज नेटवर्क। 
बड़ौदा के महाराजा गायकवाड ने अपनी कंपनी जीबीएसआर ( गायकवाड बडौदा स्टेट रेलवे) के तहत नैरो गेज रेलों का एक बड़ा जाल बिछाया। उनका उद्देश्य राज्य के सभी प्रमुख शहरों को बड़ी लाइन के नेटवर्क ( बांबे बड़ौदा सेंट्रल रेलवे) से नैरो गेज के संपर्क मार्गों से जोड़ने का था। इस मार्ग डभोई नैरो गेज का बड़ा केंद्र बन गया। बाद में इस नैरो गेज मार्ग का विस्तार चांदोद, जांबुसार, छोटा उदयपुर, टिंबा जैसे शहरों तक किया गया। जीबीएसआर के नेटवर्क के तहत पेटलाड से दूसरे नैरो गेज लाइन का भी निर्माण कराया गया। वहीं नवसारी में दूसरे नैरो गेज लाइन का निर्माण कराया गया। यहां कोसांबा से उमरपाडा और बिलीमोरा से वघई के बीच नैरो गेज लाइनें बिछाई गईं। 

वहीं बोदेली छोटा उदयपुर रेलवे कंपनी गायकवाड और छोटा उदयपुर महाराजा की संयुक्त स्वामीत्व वाली कंपनी थी। एक फरवरी 1917 को बोदेली और छोटा उदयपुर के बीच रेलवे लाइन का संचालन शुरू हुआ। 36.48 किलोमीटर लंबी लाइन के निर्माण में तब 10 लाख रुपये का खर्च आया था। अब इस क्षेत्र के कई रेल मार्ग ब्राड गेज में बदले जा चुके हैं फिर भी 2013 में गुजरात में 260 किलोमीटर से ज्यादा लंबा नैरो गेज रेलमार्ग संचालन में था।  



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Monday, February 23, 2015

जनशताब्दी एक्सप्रेस का सुहाना सफर – जबलपुर से इटारसी

मध्य प्रदेश का शहर जबलपुर। इसे मध्य प्रदेश के लोग संस्कार धानी कहते हैं। पर रेलवे स्टेशन के दोनों तरफ मुआयना करने पर कोई ऐसी बात नजर नहीं आती। रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर एक की तरफ बाहर निकलो तो काफी दूर जाकर बाजार है। वहीं प्लेटफार्म नंबर छह के बाहर की सड़क पर गंदगी का आलम है।

रेलवे स्टेशन के दोनों तरफ शराब की दुकानें और टूटी फूटी सड़के शहर को लेकर प्रथम दृष्टया प्रभाव को खराब करती हैं। रेलवे स्टेशन दोनों तरफ कोई आवासीय होटल लाज आदि नहीं है। अगर आपको शहर में रात गुजारनी है तो बस स्टैंड जाना होगा। 

बड़ी मुश्किल से प्लेटफार्म नंबर छह की तरफ बाहर आने पर एक होटल विक्रम नजर आया। पर होटल के कमरे बुरी हालत में थे। सुबह सुबह ट्रेन पकड़नी थी इसलिए मुझे इसी होटल में मजबूरी में ठिकाना बनाना पड़ा। होटल के कमरे का दरवाजा अंदर से बंद भी नहीं हो रहा था। पर रिसेप्शनिस्ट ने कहा कि आप चिंता न करें। खैर मैंने उनकी सलाह मान ली। 

अगले दिन सुबह सुबह जबलपुर से भोपाल जनशताब्दी एक्सप्रेस की टिकट लेने पहुंचा। एक खास काउंटर पर पीले रंगे के पुराने गत्ते वाले टिकट के दर्शन हुए। सबसे अच्छी बात की टिकट के पीछे कोच नंबर और बर्थ नंबर लिख कर दिया जा रहा था।

पता चला कि एक कोच की पूरी टिकटें रेलवे स्टेशन से करंट में मैनुअल तरीके से बुक की जाती हैं। ये बड़ी अच्छी बात रही मेरे हक में। मुझे इटारसी जाने के लिए तुरंत फुरंत आरक्षित टिकट मिल गया।

जनशताब्दी एक्सप्रेस ट्रेन प्लेटफार्म नंबर 5 से समय पर खुली। ट्रेन के आगे बढ़ने पर उगते हुए सूर्य के दर्शन हुए। नरसिंहपुर के पास सुहानी सुबह देखने को मिली। सरदी की सुबह का सूरज का सौंदर्य देखते ही बनता था। 
उगता सूरज...नरसिंहपुर मध्य प्रदेश - फोटो - विद्युत 

थोडी देर बाद पिपरिया स्टेशन आया। पिपरिया मध्य प्रदेश के खूबसूरत हिल स्टेशन पचमढ़ी जाने के लिए सबसे निकट का रेलवे स्टेशन है। यहां से पचमढी 55 किलोमीटर है। ट्रेन ने सही समय पर इटारसी पहुंचा दिया। इटारसी वह स्टेशन है जहां से मैं अनगिनत बार गुजर चुका हूं। सबसे अच्छा लगता है इस स्टेशन पर मिलने वाला सस्ता और अच्छा खाना। कभी यहां मैंने खाई थी 30 पैसे की रोटियां। अभी भी यहां 20 रुपये का खाना मिल जाता है।

इस बार मैं इटारसी स्टेशन से बाहर निकला। नास्त में लिया पोहा और जलेबी। मध्य प्रदेश का सदाबहार नास्ता। 15 रुपये में। वैसे यहां कई जगह 5 रुपये का पोहा भी मिलता है। मुझे लगता है ये देश का सबसे सस्ता और अच्छा नास्ता है।

अब मुझे जाना है बैतूल। पर वहां के लिए जाने वाली ट्रेन देर से है। मैंने इस सफर बस से करने की सोची। इटारसी रेलवे स्टेशन के बगल में ही बस स्टैंड है। मध्य प्रदेश में तो सरकारी बसें चलती ही नहीं है। बैतूल के लिए निजी बस जाने को तैयार थी। मिनी बस थी। जगह मिल गई।

हालांकि बस में काफी भीड़ थी, पर रास्ते में लोग उतरते जा रहे थे। 90 किलोमीटर का सफर। कसला, सुखतवा, भौरा, शाहपुर, बरठा, नीमपानी पाढर के बाद आ गया बैतूल। अब बैतूल की बातें अगले अध्याय में।



( JABALPUR TO ITARSI, JAN SHATABDI EX.  ) 

Saturday, February 21, 2015

नागपुर-नागभीड - 109 किलोमीटर लंबा नैरो गेज रेलमार्ग

महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में एक नैरो गेज लाइन संचालन में है। विदर्भ के सबसे बड़े शहर नागपुर से चंद्रपुर जिले के शहर नागभीड को यह लाइन जोड़ती है। कुल 109 किलोमीटर लंबे इस मार्ग पर 19 रेलवे स्टेशन हैं। ये महाराष्ट्र की सबसे लंबी नैरो गेज रेलवे लाइन है जो 1908 से संचालन में है।

रेलमार्ग का निर्माण -  नागपुर नागभीड नैरोगेज रेल खंड को 1904 में निर्माण की स्वीकृति मिली। इस पर काम 1905 में आरंभ हुआ। इस खंड को 9 नवंबर 1908 को ट्रैफिक संचालन के लिए खोल दिया गया।नागभीड से चंदा फोर्ट मार्ग पर काम फंड की कमी के कारण देरी से आरंभ हुआ। पर यह मार्ग भी 1 अप्रैल 1913 को आरंभ हो गया। अब नागभीड से चंदाफोर्ट (बल्लारशाह) तक का मार्ग ब्राडगेज हो चुका है। गोंदिया चंदाफोर्ट वाया नागभीड के 240 किलोमीटर मार्ग का 1992 में ब्राडगेज में बदलने की प्रक्रिया शुरू की गई। 13 जनवरी 1999 को ये मार्ग पूरी तरह ब्राडगेज मे बदला जा चुका था। 2 जुलाई 1999 को चंदाफोर्ट से बल्लारशाह के 10 किलोमीटर मार्ग को भी ब्राडगेज में बदल दिया गया।

नागभीड ब्राड गेज लाइन से गोंदिया जंक्शन और बल्लारशाह जंक्शन से जुड़ा हुआ है। गोंदिया से नागभीड़ की दूरी 131 किलोमीटर है। वही नागभीड से बल्लारशाह की दूरी 120 किलोमीटर है। नागभीड से नागपुर नैरोगेज लाइन के ब्राडगेज बन जान के बाद बाद नागभीड के बड़े जंक्शन में तब्दील हो जाएगा।


नागपुर नागभीड मार्ग के स्टेशन – इतवारी जंक्शन (नागपुर ),  भांडेवाडी, दिघोरी बुजुर्ग, केंपलसाड, तितुर, माहुली, कुही, मोहदारा, बामहानी, उमरेद, कारगांव हाल्ट,भिवापुर, भुवार, तेंपा, मांगली, कोटगांव, नागभीड जंक्शन।

नागपुर-नागभीड नैरो गेज लाइन सबसे ज्यादा उपेक्षा का शिकार है। साल 2015 के बाद इस नैरो गेज लाइन का संचालन नागपुर की बजाए नागपुर शहर के इतवारी जंक्शन से कर दिया गया। अब यह लाइन कुल 105 किलोमीटर की है।

इस मार्ग पर सुबह 6.10 में इतवारी जंक्शन से चलने वाली 58843 नागपुर नागभीड पैसेंजर सुबह 10.35 बजे नागभीड पहुंच जाती है। इसी तरह नागभीड से सुबह 6.15 में 58844 पैसेंजर नागपुर की ओर के लिए चलती है। दोनों स्टेशनों के बीच चार जोड़ी रेलगाड़ियां रोज चलाई जाती हैं। 

पर रेलवे के लिए ये घाटे का रेलवे नेटवर्क है। इसके आमान परिवर्तन की मांग इलाके लोग लंबे समय से करते आए हैं। नागभीड महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले में आता है। इलाके के लोग कई बार इस रेल मार्ग को भी बड़ी लाइन में बदलने की मांग कर चुके हैं। पर योजना आयोग ने इस पर कभी ध्यान ही नहीं दिया। हालांकि गोंदिया से नागभीड मार्ग के ब्राडगेज हो जाने के कारण नागभीड बड़ी लाइन पर आ चुका हैपर नागभीड से नागपुर की नैरो गेज लाइन उपेक्षित पड़ी है।


नागपुर में नैरो गेज रेल म्युजियम  साल 2002 में 14 दिसंबर को तत्कालीन रेलमंत्री नीतीश कुमार ने नागपुर में नैरोगेज के रेल म्युजियम का उदघाटन किया। यहां बंगाल नागपुर रेलवे द्वारा निर्मित कई नैरोगेज रेलगाड़ियों का इतिहास देखा जा सकता है। नागपुर के मोतीबाग में स्थित इस संग्रहालय में 3 अप्रैल 2005 को यहां पर टॉय ट्रेन का संचालन शुरू किया गया। साउथ इस्ट सेंट्रल रेलवे का यह प्रमुख संग्रहालय है जो नागपुर डिविजन के तहत आता है।
नागपुर - मोतीबाग नैरोगेज रेल म्युजियम का टिकट घर।

साल 2011 के रेल बजट के दौरान तत्कालीन रेल मंत्री ममता बनर्जी ने जिन 190 परियोजनाओं को 12वीं पंच वर्षीय योजना में शुरू करने की बात कही थी उसमें नागपुर नागभीड लाइन का भी नाम था। पर इस लाइन पर कोई प्रगति नहीं हो सकी। जुलाई 2014 में रेल बजट से पहले गोंदिया भंडारा के भाजपा सांसद नाना पटोले ने नागपुर नागभीड लाइन को ब्राडगेज में बदले जाने की मांग एक बार फिर उठाई थी।
पर इस लाइन को तब बड़ी लाइन में बदलने की सूची में शामिल नहीं किया गया। 
विरासत - बीएनआर के नैरोगेज का लोकोमोटिव 677 सीसी

ब्राड गेज में बदले जाने की उम्मीद - साल 2017 में इस रेल मार्ग के ब्राडगेज में बदले जाने की उम्मीद जगी। इस मार्ग के आमान परिवर्तन के लिए 708 करोड़ रुपये का बजट बनाया गया। हालांकि 2012-13 में इसका बजट 401करोड़ रुपये का था। अब इस परियोजना में नीति आयोग की नई नीतियों के मुताबिक इसमें रेल मंत्रालय के साथ ही राज्य सरकार की भी भागीदारी से योजना बनी। इस मार्ग को केंद्र और राज्य सरकार 50-50 फीसदी के सहयोग से निर्मित करेंगे।  राज्य सरकार 2018-19 के बजट में इस मार्ग के लिए धन का प्रबंध करने पर सहमत हुई।
- विद्युत प्रकाश मौर्य (vidyutp@gmail.com )
REF -

(NAGPUR NAGBHIR NARROW GAUGE RAIL ) 

Friday, February 20, 2015

बंद हुई जबलपुर –नैनपुर नैरोगेज - थमा सतपुड़ा एक्सप्रेस का सफर


एक दिन सतपुड़ा एक्सप्रेस का रोमांचक सफर हमेशा के लिए थम गया। एक अक्टूबर 2015 से जबलपुर-नैनपुर खंड छोटी लाइन को बंद कर दिया गया। ऐसे में इस पटरी पर रोजाना दौड़नेवाली 24 ट्रेनों का सफर हमेशा के लिए खत्म हो गया। इसके साथ ही 111 साल का शानदार सफर इतिहास बन गया। न सिर्फ सतपुड़ा एक्सप्रेस बल्कि तमाम ट्रेनें अब इतिहास के पन्नों का हिस्सा बन चुकी हैं। 

एशिया का सबसे बड़ा नैरोगेज का जंक्शन नैनपुर भी अब इतिहास बन चुका है। साल 2015 की जनवरी में मुझे सतपुड़ा एक्सप्रेस से सफर करने का सौभाग्य मिला था। तब रास्ते में जगह जगह आमान परिवर्तन का काम दिखाई
  दे रहा था। तब ये उम्मीद नहीं थी इतनी जल्दी एक सतपुड़ा के जंगलों के बीच से सबसे छोटी लाइन की छुक छुक बंद हो जाएगी।

सतपुड़ा एक्सप्रेस लोगों के बीच इतनी लोकप्रिय थी कि इलाके के लोग बड़ी लाइन में भी सतपुड़ा एक्सप्रेस देखना चाहते हैं इस तरह की मांग के समर्थन में अभियान चला रहे हैं। लोग चाहते हैं कि भविष्य में जब बड़ी लाइन चालू हो तो ट्रेन का नंबर भी वही रहे।


जुलाई 1904 को इस ट्रेन ने जबलपुर से अपने सफर की शुरुआत की थी। आखिरी दिनों में लोग बंद हो रही छोटी लाइन के सफर को अनुभव के रूप में लिए यात्रा की होड़ में लगे दिखाई दिए। लोग इस यादगार लम्हों को अपनी यादों में सहेज लेना चाहते थे।  

वहीं एक नवंबर 2015 से नैनपुर और बालाघाट के बीच भी छोटी लाइन बंद हो गई। इस लाइन पर आमान परिवर्तन करके बड़ी लाइन दौड़ने में दो साल लगने का अनुमान था। दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे में अब सिर्फ नागपुर नागभीर लाइन ही एक मात्र नैरो गेज लाइन के रूप में बची है।
नैनपुर जबलपुर के बीच चलने वाले लोगों के लिए 30 सितंबर 2015 का दिन भावनों से भरा हुआ था। लोग अपनी महबूब ट्रेन का आखिरी सफर देखर रहे थे। कोई सेल्फी ले रहा था तो कोई ड्राईवर से गले मिल कर  रो रहा था। मुश्किलें भी तो होंगी अगले कुछ साल इस मार्ग पर बिना रेल के सफर करना पड़ेगा।
और चल पड़ी बड़ी लाइन की रेल 
जबलपुर से नैनपुर जंक्शन के बीच 28 नवंबर 2017 को बड़ी लाइन की पैसेंजर ट्रेनों का संचालन शुरू हो गया। दो साल के ब्लाकेज के बाद इस रेल मार्ग पर आमान परिवर्तन करके के ब्राडगेज रेल मार्ग पर पैसेंजर ट्रेनों का संचालन आरंभ कर दिया गया। क्षेत्रवासी एक बार फिर रेल का सफर करके खुश हैं। पर उनके जेहन में सतपुड़ा एक्सप्रेस की यादें रची बसी रहेंगी।
नैनपुर में नैरोगेज रेल म्युजियम - भले ही नैनपुर जंक्शन पर अब बड़ी लाइन की रेलें दौड़ने लगी हैं, पर रेलवे ने एक शानदार काम किया है नैनपुर में नैरोगेज रेलवे का संग्रहालय बनाकर। शानदार भवन में स्टीम लोकोमोटिव, डीजल लोकोमोटिव, सवारी डिब्बे, नैरोगेज से जुड़े रेलवे के तकनीकी समानों को संग्रहालय में प्रदर्शित किया गया है। संग्राहलय में नैरोगेज से जुड़ी हुई पिक्चर गैलरी भी सजाई गई है, जिससे आने वाली पीढ़ियां रेलवे के इतिहास से रुबरू हो सकें। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com

Thursday, February 19, 2015

इतिहास के पन्नों में समा गया सतपुड़ा नैरो गेज

नागपुर से छिंदवाड़ा की इस ऐतिहासिक नैरो गेज रेलवे लाइन को ब्राडगेज में परिवर्तित करने का फैसला इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में लिया गया।  इसमें कुछ रेलवे स्टेशनों का स्थान बदला भी जा रहा है। 2007-08 में इस लाइन को ब्राडगेज में बदलने का काम शुरू हुआ था।

इसका लक्ष्य 2011 में इसे पूरा कर लेने का था। पर काम धीमी गति से चलता रहा। इससे प्रोजेक्ट की लागात में भी इजाफा हुआ। इस लाइन पर सौंसर के पास 69वें किलोमीटर पर एक सुरंग का भी निर्माण किया जा रहा है। इस मार्ग पर भिमालगोंडी और भंडाराकुंड के बीच काफी घने जंगल और घाटियां हैं। 

निर्माण में आ रही मुश्किलों और चुनौतियों के कारण इस परियोजना में कई साल की देरी हुई। इस मार्ग पर रामाकोना के पास कानहन नदी पर नए पुल का निर्माण किया गया है। जब 2007 में इस आमान परिवर्तन परियोजना की शुरुआत हुई तो इसकी लागात 663.66 करोड़ रुपये आंकी गई थी, पर अब देरी के कारण इसके लागात में इजाफा होता जा रहा है।

 इसी तरह जबलपुर से बालाघाट तक 177 किलोमीटर के मार्ग को ब्राडगेज में बदलने का काम जारी है। पर यह काम भी धीमी गति से चल रहा है। साल 2015 तक जबलपुर से नैनपुर रेल खंड पर शुरुआत के 40 किलोमीटर तक तो ब्राडगेज लाइन बिछाई भी जा चुकी थी।


इस रेल मार्ग में कई जगह पुराने मार्ग में बदलाव किया गया है। जबलपुर से आगे नर्मदा नदी के तट पर ग्वारीघाट का नया स्टेशन पुराने स्टेशन से एक किलोमीटर आगे बनाया गया है। इस मार्ग पर ब्राडगेज परिवर्तन के दौरान रेलवे को जमीन अधिग्रहण और वन विभाग से क्लियरेंस लेने में भी दिक्कते आईं। इन सब कारणों से परियोजना का समय आगे बढ़ता जा रहा है। इस मार्ग पर ब्राडगेज बनने के बाद जबलपुर और गोंदिया के बीच पुराने 29 रेलवे स्टेशनों की जगह 31 रेलवे स्टेशन बनाए जा रहे हैं। इनमें निधानी और गढ़ा दो नए स्टेशन बनाए गए हैं।
सतपुड़ा के जंगलों से होकर गुजरने वाले इस रेल मार्ग को ब्राडगेज करने में कई जगह पर वन विभाग से क्लियरेंस प्राप्त करने में दिक्कतें आने के कारण प्रोजेक्ट में काफी देरी हुई। पर इस रेलवे लाइन का सामरिक महत्व है। इस लाइन के ब्राडगेज हो जाने से उत्तर भारत से दक्षिण भारत की दूरी में 200 किलोमीटर से ज्यादा की कमी आ जाएगी, ऐसा रेलवे की योजना में है। जबलपुर से इटारसी होकर नागपुर जाने के बजाय जबलपुर-नैनपुर-बालाघाट गोंदिया होकर बल्लारशाह पहुंचा जा सकता है।
-vidyutp@gmail.com



Wednesday, February 18, 2015

सतपुड़ा एक्सप्रेस का रोमांचक सफर

सतपुड़ा की हरी भरी वादियों के बीच नैरोगेज की पटरियों पर चलने वाली कई ट्रेनों के बीच सतपुड़ा एक्सप्रेस इस क्षेत्र की सबसे लोकप्रिय ट्रेन है। ये एक्सप्रेस ट्रेन सात घंटे में आपको जबलपुर से बालाघाट पहुंचाती है। 10002 जबलपुर-बालाघाट सुबह 5.30 बजे चलने वाली ट्रेन दोपहर 12 बजे बालाघाट पहुंच जाती है। वहां से वही रैक वापसी में चलती है जबलपुर के लिए 10001 बनकर। बालाघाट से जबलपुर के बीच 187 किलोमीटर का सफर तय करती है सतपुड़ा एक्सप्रेस। आजकल सतपुड़ा एक्सप्रेस में जेडीएम सीरीज का लोको (इंजन) लगा हुआ है।
अतीत में सतपुड़ा एक्सप्रेस जबलपुर से गोंदिया के बीच जेडई सीरीज के स्टीम लोको से संचालित होती थी। पर अब बालाघाट से गोंदिया के बीच ब्राडगेज लाइन बिछाए जाने के बाद जबलपुर से बालाघाट के बीच ही चलती है।

इस नैरोगेज की एक्सप्रेस ट्रेन में कुल 10 कोच होते हैं। इसमें बीच में एक प्रथम श्रेणी का भी कोच लगा होता है। वास्तव में जिस कोच को फर्स्ट क्लास का डिब्बा बनाया गया है यह अतीत में अधिकारियों का इंस्पेक्सन कोच हुआ करता था। इसमें एक हिस्सा अधिकारियों का विश्रामालय था तो दूसरा हिस्सा रसोई घर। रसोई घर और विश्रामालय जाने के लिए अलग अलग दरवाजे होते थे। अब इनमें मामूली बदलाव कर यात्रियों के बैठने के लिए बना दिया गया है। लेकिन रसोई यान वाले हिस्से और मुख्य हिस्से के बीच अंदर से कोई संपर्क नहीं है। सातपुड़ा एक्सप्रेस में प्रथम श्रेणी का किराया 400 रुपये है। इसके प्रथम श्रेणी में बैठकर आपको ऐसा एहसास होता है मानो आप किसी घर के ड्राइंग रूम में बैठकर सफर कर रहे हों। इस श्रेणी में सफर के लिए रेलवे की वेबसाइट पर अग्रिम आरक्षण कराया जा सकता है। वहीं द्वितीय श्रेणी में सतपुड़ा एक्सप्रेस में बालाघाट से जबलपुर का किराया 70 रुपये है। बालाघाट से जबलपुर के बीच कुल 24 मध्यवर्ती स्टेशन हैं पर सतपुड़ा एक्सप्रेस सिर्फ 9 स्टेशनों पर रुकती है। पर पहाड़ों की ये रानी ट्रेन आपको 27 से 30 किलोमीटर प्रतिघंटे की औसत रफ्तार में जबलपुर पहुंचाती है। अगर आप सातपुड़ा के घने जंगलों को देखने की तमन्ना रखते हैं तो सतपुड़ा एक्सप्रेस में बैठकर सफर करने से बेहतरीन तरीका और कुछ नहीं हो सकता है।

सतपुड़ा एक्सप्रेस जबलपुर से निकलने के बाद ग्वारीघाट में नर्मदा नदी पर बने पुल से गुजरती है। ये लोहे का पुल 100 साल से ज्यादा पुराना है जो आज भी पूरी तरह से बेहतर हालत में है।
बालाघाट मध्य प्रदेश का ऐसा जिला है जो महाराष्ट्र की सीमा से लगा हुआ है। शहर बिल्कुल शांत नजर आता है। रेलवे स्टेशन कभी शहर के बाहर हुआ करता था। पर अब स्टेशन के बाहर वाली सड़क पर चाय नास्ता की दुकानें और ठहरने के लिए लॉज आदि उपलब्ध है। हालांकि ये छोटी लाइन और बड़ी लाइन का स्टेशन है पर स्टेशन पर भीड़भाड़ नजर नहीं आती। बालाघाट स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर एक पर कैंटीन है जिसे साफ सफाई और सज्जा के लिए रेलवे महाप्रबंधक की ओर से सम्मान पत्र मिल चुका है। इस कैंटीन में नास्ते के लिए 10 रुपये में पोहा और 5 रुपये प्रति पीस समोसे उपलब्ध हैं।
बालाघाट जंक्शन – बालाघाट जंक्शन का प्लेटफार्म नंबर एक नैरोगेज ट्रेन के लिए है, जबकि दो नंबर पर ब्राडगेज वाली ट्रेनें आती हैं। यहां से नैरोगेज पैसेंजर और एक्सप्रेस ट्रेनें आमतौर पर हर रोज समय पर खुलती हैं। स्टेशन पर रेलवे स्टाफ पूरे अनुशासन में दिखाई देते हैं।

समनपुर – सातपुड़ा एक्सप्रेस बालाघाट जंक्शन को छोड़ती है उसके बाद ही सतपुडा की हरी भरी वादियां मन मोहने लगती हैं। नदी, पहाड़, जंगल, खेत सब कुछ नजर आते हैं। कहीं कहीं रेलवे लाइन के साथ साथ सड़क भी कदमताल मिलाती नजर आती है। 17 वें किलोमीटर पर समनपुर रेलवे स्टेशन आता है जो सातपुड़ा एक्सप्रेस का पहला ठहराव है।

   
चारेगांव 30वें किलोमीटर पर चारेगांव रेलवे स्टेशन आता है। स्टेशन पर इन बीच के स्टेशनों पर बहुत बड़ी भीड़ चढती उतरती हुई नहीं दिखाई देती है। 

लामता – 40वें किलोमीटर पर लामता रेलवे स्टेशन है। ये बालाघाट जिले का आखिरी बड़ा रेलवे स्टेशन है। बरसात के दिनों में अगर आप सातपुड़ा एक्सप्रेस के सफर पर हैं तो बारिश और हरियाली के बीच आनंद और भी बढ़ जाता है।
नगरवारा – 357 मीटर की ऊंचाई पर स्थित नगरवारा रेलवे स्टेशन से मंडला जिले की शुरुआत हो जाती है। आप बालाघाट से 50 किलोमीटर की दूरी तय कर चुके हैं।

नैनपुर जंक्शन - बालाघाट से 77वें किलोमीटर पर नैनपुर जंक्शन आता है। यहां सतपुड़ा एक्सप्रेस 20 मिनट रुकती है। इस दौरान इसका लोको इंजन यहां कई बार बदला जाता है।
 
पिंडरई – समुद्र तल से 455 मीटर की ऊंचाई पर पिंडरई बालाघाट से 89वें किलोमीटर पर स्थित है। दूरी के लिहाज से ये बालाघाट और जबलपुर के बीच का स्टेशन हो सकता है।

घनसौर – 565 मीटर की ऊंचाई पर बना ये नैरोगेज नेटवर्क के सबसे ऊंचे रेलवे स्टेशनों में से है सतपुड़ा एक्सप्रेस के मार्ग पर। घनसौर सिवनी जिले में पड़ता है।

शिकारा – सतपुड़ा एक्सप्रेस शाम को 5.40 के आसपास शिकारा पहुंचती है। ये जबलपुर से 45 किलोमीटर की दूरी पर और बालाघाट की तरफ से 133 किलोमीटर की दूरी है। कहा जाता है कि यहां घने जंगलों में कभी जबलपुर से लोग शिकार करने आते थे। इसलिए इस जगह का नाम शिकारा पड़ गया। आजकल भी यह जबलपुर के निकट का पिकनिक स्पाट है। शिकारा रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर नारियल के सुस्वादु लड्डू बिकते हुए नजर आए। नास्ते के लिए समोसे और जलेबी भी यहां मिल जाती है।

बरगी – बालाघाट से 159 किलोमीटर की दूरी पर बरगी जबलपुर जिले का रेलवे स्टेशन है। यहां पास में नर्मदा नदी पर बांध बनाया गया है। बरगी के बाद ग्वारीघाट में नर्मदा नदी पर ऐतिहासिक पुल आता है। यहां नदी के तट पर गुरुद्वारा और आश्रम बने हैं। बड़ी संख्या में लोग यहां नर्मदा में स्नान के लिए आते हैं।

हाउबाग जबलपुर – ग्वारीघाट के बाद ट्रेन जबलपुर शहर में प्रवेश कर जाती है। हाउबाग जबलपुर वास्तव में जबलपुर शहर में नैरोगेज का बड़ा स्टेशन है। यहां मालगोदाम और ट्रेन के रखरखाव आदि की सुविधा उपलब्ध है। वास्तव में हाउबाग नैरोगेज नेटवर्क का बड़ा डिपो है। जबलपुर शहर जाने वाले यात्री बड़ी संख्या में हाउबाग में ही उतर जाते हैं। यहां से बस स्टैंड और अन्य इलाके में जाने की सुविधा भी उपलब्ध है।

जबलपुर  – सतपुड़ा एक्सप्रेस बड़ी ही शान से जबलपुर मुख्य रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर एक पर पहुंचती है। यहां वह रात भर आराम फरमाती है क्योंकि सुबह फिर उसी पुराने सफर पर जो निकल जाना है।

सतपुड़ा एक्सप्रेस के द्वितीय श्रेणी के कोच में बैठने के लिए कुल 44 सीटें हैं। सीटें आरामदायक हैं। हर कोच में टायलेट भी है। एक बैठने की सीट बिल्कुल टायलेट और कोच के प्रवेश द्वार के बीच बनाई गई है। कोच में लगेज रखने के लिए सीट के ऊपर प्रयाप्त जगह प्रदान की गई है।

सतपुडा एक्सप्रेस में जलपिहरी बेचते बच्चे। 
ये जलपिहरी क्या है - शिकारा रेलवे स्टेशन पर सतपुड़ा एक्सप्रेस के प्लेटफार्म पर ट्रेन के पहुंचते ही ढेर सारे बच्चों का हुजुम हर कोच के पास पहुंच गया। ये बच्चे चिल्ला चिल्ला कर जलपिहरी बेच रहे थे। मैंने कौतुहल वश जानना चाहा कि ये जल पिहरी क्या है.. बच्चों ने बताया नदी से ढूंढकर निकालते हैं। एक किस्म की जडी बूटी है। इसकी तासीर गर्म है। तवे पर भून कर पानी या शहर के साथ खा लें। सर्दी जुकाम खत्म हो जाएगा। मैंने भी जलपिहरी खरीद ली। पांच रुपये में दो पुडिया। बाद में दूसरे बच्चे आए वे पांच में तीन देने की बात कहने लगे। तो हमारे सहयात्री ने तीन जलपिहरी खरीद ली।