Saturday, February 28, 2015

नन्हा सा प्रदेश था - दादरा अणि नगर हवेली

भारत के एक केंद्र शासित प्रदेश दादरा नगर हवेली की राजधानी हुआ करता था सिलवासा। राजधानी सिलवासा के आसपास ही फैला हुआ है पूरा दादरा नगर हवेली राज्य। ये समुद्र तटीय राज्य मुंबई बड़ौदा लाइन पर वापी रेलवे स्टेशन से महज 18 किलोमीटर की दूरी पर है। वापी रेलवे स्टेशन से सिलवासा जाने के लिए हमेशा शेयरिंग आटो रिक्शा मिलते हैं। गुजरात के कुछ शहरों से सीधे बसें भी सिलवासा जाती हैं। कुछ किलोमीटर चलने पर दादरा नगर हवेली का प्रवेश द्वार नजर आता है। यहां बड़े अक्षरों मे लिखा है कि केंद्र शासित प्रदेश दादरा और नगर हवेली में आपका स्वागत है। इस गेट से सिलवासा शहर की दूरी कोई 7 किलोमीटर के आसपास है। 

भिलड से भी पहुंच सकते हैं सिलवासा - सिलवासा टाउन हाल के पास ही नगर का छोटा सा बस स्टैंड है। सारे आटो रिक्शा भी बस स्टैंड तक जाते हैं। दादरा नगर हवेली में स्थानीय परिवहन के लिए नगर बस सेवा चलती है। मिनी बसों की खेप सारथी बस सेवा स्थानीय लोगों मे काफी लोकप्रिय है। पर इसमें ज्यादा भीड़ नहीं होती। वैसे सिलवासा पहुंचने का एक दूसरा रास्ता भी है। आप वापी और मुंबई के बीच स्थित भिलड रेलवे स्टेशन से भी यहां पहुंच सकते हैं।

गुजरात के भिलड कस्बे से सिलवासा की दूरी सिर्फ 13 किलोमीटर है। राज्य की सीमा गुजरात के वलसाड और महाराष्ट्र के नासिक जिले से लगती है। वहीं इस नन्हें से राज्य का लंबा इलाका अरब सागर से भी लगा हुआ है। यह नन्हा सा राज्य कई मायने में अनूठा है। दादरा नगर हवेली का भौगोलिक तौर प विस्तार मात्र 491 वर्ग किलोमीटर में है। 2011 में राज्य की आबादी 3 लाख 42 हजार थी। यानी यह देश के कई राज्यों के एक जिले से भी काफी छोटा राज्य है।

लंबे समय तक पुर्तगाल के कब्जे में रहा-  मराठी में इस राज्य को दादरा अणि नगर हवेली कहते हैं। अरब सागर के किनारे स्थित ये राज्य 1779 तक मराठा शासकों के कब्जे में था।  पर 17 दिसंबर 1779 को इस प्रदेश के 79 गांव पुर्तगालियों के कब्जे में चले गए। उसके बाद 1954 तक पुर्तगालियों के कब्जे में रहा। यानी देश आजाद होने के कई साल बाद ये भारत का हिस्सा बना।  1954 से 1961 तक ये प्रदेश लगभग आजाद हाल में रहा। 11 अगस्त 1961 को दादरा नगर हवेली संघीय भारत का हिस्सा बना। हर साल 2 अगस्त को यहां मुक्ति दिवस मनाया जाता है। इसी दिन सिलवासा को आजाद कराया गया था। यहां के निवासियों में 79 फीसदी लोग आदिवासी हैं जिनकी परंपराएं आज भी बची हुई हैं।

बड़ा औद्योगिक केंद्र -  पर्यटन स्थल होने के साथ साथ दादरा नगर हवेली महत्वपूर्ण ओद्योगिक केंद्र भी है। टैक्स फ्री जोन होने के कारण यहां उद्योग खूब लगे हैं। इस छोटे से प्रदेश में कुल तीन उद्योगिक व्ययस्थापन क्षेत्र हैं जिनमें 300 के आसपास प्लांट हैं।

पिछले कुछ सालों से यहां गन्ने की खेती में वृद्धि हुई है। सिंचित क्षेत्रों में बहु-फसल पद्दति के उपाय किए जा रहे हैं। राज्य के दुधानी तथा मंडोनी में ऑर्गेनिक फार्मिंग को बढ़ावा देने की भी कोशिश की जा रही है।

घने जंगल तथा अनुकूल जलवायु को देखते हुए दादरा नगर हवेली में पर्यटन क्षेत्र को उच्‍च प्राथमिकता दी गई है। यहां मुंबई से बड़ी संख्या में सैलानी हमेशा घूमने के लिए आते हैं। अगर आप देश के किसी कोने से भी सिलवासा पहुंचते हैं तो यहां की रंगीनियां आपका स्वागत करने को तैयार हैं।

दादरा नगर हवेली मे सैलानियों के ठहरने के लिए यहां बड़ी संख्या में होटल्स और रेसोर्ट्स मौजूद हैं। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए हर साल तारपा उत्सव, पतंग उत्सव और विश्व पर्यटन दिवस आदि आयोजन किए जाते हैं। पर 2020 में दादरा नगर हवेली अलग प्रदेश नहीं रहा। 26 जनवरी 2020 को दादरा नगर हवेली का दमन दीव के साथ विलय कर एक प्रदेश बना दिया गया। ) 

Friday, February 27, 2015

दमन और सिलवासा का प्रवेश द्वार है वापी शहर

बिलिमोरा से चलकर वापी मैं सड़क मार्ग से पहुंचा हूं। रास्ते में गुजरात का वलसाड शहर आया। गुजरात के ही वलसाड जिले का एक शहर है वापी। वैसे तो यह जिला मुख्यालय भी नहीं है, पर इसका अपना महत्व है। यह केंद्र शासित प्रदेश के दो प्रमुख शहरों दमन और सिलवासा का प्रवेश द्वार है। यह 2019 तक तो हमारे देश के दो केंद्र शासित प्रदेशों का प्रवेश द्वार रहा है। पर 2020 के 26 जनवरी को दादरा नगर हवेली और दवन दीव प्रदेश का विलय करके एक प्रदेश बना दिया गया।

अगर आप वापी रेलवे स्टेशन से एक तरफ निकलें तो दादरा नगर हवेली के शहर सिलवासा ओर जा सकते हैं वहीं दूसरी ओर निकलें तो दमन  की ओर जा सकते हैं। अगर आप मुंबई की ओर से आ रहे हैं तो बाईं तरफ यानी प्लेटफार्म नंबर एक की तरफ से दमन की तरफ रास्ता जाता है। वहीं बाईं तरफ से बाहर निकलें तो सिलवासा के लिए रास्ता जाता है।

वापी एक व्यस्त रेलवे स्टेशन है। तमाम एक्सप्रेस रेलगाड़ियां यहां पर रुकती हैं। वापी से इन दोनों ही शहरों के लिए दिन भर शेयरिंग आटो रिक्शा मिलते हैं। वापी से सिलवासा के गेट तक के लिए आटो वाले 20 रुपये लेते हैं जबकि सिलवासा तक के 35 रुपये। वहीं वापी से दमन के सोमनाथ जंक्शन तक आटो से आप 10 रुपये में जा सकते हैं। बड़ा औद्योगिक शहर होने के कारण वापी में बड़ी संख्या में श्रमिक वर्ग के लोग रहते हैं। यहां सड़क पर आपको यूपी बिहार के भोजपुरी बोलने वाले लोग बड़ी संख्या में मिल जाएंगे। 


गुजरात का औद्योगिक शहर है वापी - वापी गुजरात के वलसाड जिले का एक बड़ा औद्योगिक शहर है। बड़ौदा मुंबई लाइन पर वापी मुंबई से 170 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। शहर की आबादी 1.63 लाख है। पर इस शहर में 1400 से ज्यादा छोटे-बड़े उद्योग हैं। वापी टेक्सटाइल और केमिकल इंडस्ट्रीज के लिए जाना जाता है। यहां पर रेमंड, सेंचुरी टेक्सटाइल और वेलस्पन जैसी कंपनियों की इकाइयां उत्पादन में लगी हैं। केमिकल क्षेत्र से बायर, सुप्रीम केमिकल जैसी कंपनियों की इकाइयां हैं। विंबलडन जैसे लोकप्रिय टेनिस में खेलने वाले खिलाड़ी एक खास तरह के टावेल का इस्तेमाल करते हैं, वह वापी से बनकर जाता है।

पर इन उद्योगों ने वापी शहर की आबोहवा को खराब कर दिया है। गुजरात के वापी को दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में गिना जाता है। राज्य के सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में अंकलेश्वर पहले नंबर पर और वापी दूसरे नंबर पर है। वापी शहर के माथे पर दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों शामिल होने का दाग लग गया है। अब इस दाग को धोने के लिए ही उद्योगों ने मिलकर यहां एशिया का सबसे बड़ा एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट भी लगाया है।

हाल में वापी शहर के प्लास्टिक उद्योग में कौशल विकास और रोजगार सृजन के लिए गुजरात सरकार ने वापी में एक अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय बनाने की घोषणा की है। गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन ने इस आशय का ऐलान किया है।

मैली हो गई दमन गंगा - वापी शहर से पास से होकर गुजरती दमन गंगा नदी जिसे पश्चिम की गंगा कहते हैं। पर अब ये नदी औद्योगिक कचरा ढोने वाली नाले की तरह नजर आती है। प्रदूषण के कारण नदी में अब मछलियां नजर नहीं आतीं। यह नदी अरब सागर में गिरती है। नासिक जिले में सह्याद्रि की पहाड़ियों से निकलने वाली इस नदी के तट पर वापी, दादरा, सिलवासा, दमन जैसे शहर बसे हुए हैं। नदी की कुल लंबाई 131 किलोमीटर है। नदी के उपरी इलाके में कोई उद्योग नहीं है। वह निर्मल जल लेकर आगे बढ़ती है, पर लोअर बेसिन में नदी के दायरे में 5000 से ज्यादा छोटे बड़े उद्योग अपना कचरा इस नदी में उडेलते हैं।

वापी के सिनेमा घरों में लगी रहती है भोजपुरी फिल्में। 

जब दमन गंगा ने दिखाया था कहर - दमन गंगा नदी दमन की जीवन रेखा है। पर नानी दमन और मोटी दमन के बीच बहने वाली दमन गंगा नदी में वैसे तो औद्योगिक कचरा बहता है पर ये नदी कई बार अपना कहर भी दिखाती है। अगस्त 2004 में दमन गंगा नदी में भारी बाढ़ आई थी। तब पूरा दमन शहर डूब गया था। हमेशा शांत रहने वाली दमन गंगा नदी ने तब अपना रौद्र रूप दिखाया था। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य  -vidyutp@gmail.com

( VAPI, GUJRAT, DAMAN, DADRA NAGAR HAWELI, SILWASA )

Thursday, February 26, 2015

पर्यावरण बचाने का संदेश देती है बिलिमोरा वघई लाइन

अंबिका नदी के तट पर बसे नवसारी जिले के शहर बिलिमोरा से दिन भर में दो ही नैरोगेज रेलगाड़ियां वघई के लिए खुलती हैं जो आपको गुजरात के एकमात्र हिल स्टेशन सापूतारा की ओर ले जाती हैं। बिलिमोरा के मुख्य रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर ये जानकारी दी गई है कि सापूतारा जाने के लिए गाड़ी यहां बदलें। हालांकि इन गाड़ियों में सीटों के आरक्षण का कोई इंतजाम नहीं है। छोटी लाइन का बिलिमोरा में जंक्शन के प्लेटफार्म वाले हिस्से में भीड़भाड़ नहीं दिखाई देती है। 

छोटी लाइन है तो स्टेशन की इमारत भी बड़ी लाइन की तुलना में छोटी सी है। इस लाइन के पास जेडीएम 5 सीरीज का 523 नंबर और 511 नंबर  का लोको इस मार्ग पर अपनी सेवाओं के लिए मौजूद है। हिल स्टेशन की ओर जाने वाली ट्रेन के कुछ कोच को नीले रंग से रंगा गया है जिस पर हरे भरे पौधों की आकृतियां हैं। हरियाली के संग हिचकोले खाते हुए मस्ती में चलते हैं। इन कोचों पर पर्यावरण और इंधर बचाने के संदेश भी लिखे गए हैं।

बिलिमोरा में नैरो गेज के लिए अलग से सिनियर सेक्सन इंजीनियर का दफ्तर है। यहां पर नैरो गेज ट्रेन का छोटा सा वर्कशाप भी है जो वघई के बीच चलने वाली ट्रेन की जरूरतें पूरी करता है। साथ ही यहां नैरो गेज रेलवे स्टाफ का बड़ी कालोनी है। इस कालोनी में काफी हरियाली दिखाई देती है। कालोनी के फ्लैटों के आसपास हरे भरे पेड़ लहलहा रहे हैं।

वघई लाइन पर शानदार सैलून - बिलिमोरा का नैरोगेज प्लेटफार्म ब्राडगेज के बगल में ही है। पर यहां पर कोई खास भीड़भाड़ नहीं दिखाई देती है। प्लेटफार्म पर एक टी स्टाल है जो बंद रहता है। इस नैरो गेज के स्टेशन पर शेड में नैरो गेज पर चलाया जाने वाला एक सैलून खड़ा दिखाई देता है। चमचमाते हुए इस सैलून को देखकर लगता है कि पश्चिम रेलवे ने इसे बिल्कुल मेनटेन करके रखा है। इसे देखकर लगता है कि इसमें कभी कभी अधिकारी और मेहमान वघई लाइन का दौरा करते होंगे।
1930 का बना हुआ मालगाड़ी का डिब्बा - यहां पर एक गुड्स ट्रेन का छोटा डिब्बा भी है जो समान्य मालगाड़ी के डिब्बे से भी आकार में आधा है। इस डिब्बे की छत पर किसी घर की छत की तरह टाइलें लगाई गई हैं। इसके निर्माण के बारे में जानकारी लिखी गई है उसके मुताबिक के 1930 का बना हुआ है। तब इसका इस्तेमाल स्क्रैप सामग्री की ढुलाई के लिए किया जाता था।


यूटीएस प्रणाली से टिकट – बिलिमोरा के नैरोगेज टिकट के काउंटर के बाहर इस बात की घोषणा बड़े शान से की गई है कि ये भारत का पहला नैरो गेज नेटवर्क है जहां यूटीएस प्रणाली से टिकट मिलता है। रेलवे की यूटीएस प्रणाली में किसी भी स्टेशन से कहीं का भी साधारण टिकट तीन दिन पहले भी बुक कराया जा सकता है।

बिलिमोरा वघई के बीच के स्टेशन 1. बिलिमोरा जंक्शन, 2 गणदेवी, 3. चिखली रोड, ( चिखली बाईपास के पास है ये स्टेशन) 4. रानकुवा, 5 धोलीकुवा, 6 अनावल, 7 उनाई वसुंदा, 8. केवड़ी रोड, 9 डूंगरदा और 10. वघई ( आखिरी रेलवे स्टेशन )


कभी था सामरिक महत्व – 18वीं सदी में बड़ौदा स्टेट ने बिलिमोरा में अपना नौ सेना का स्टेशन बनाया था. यहां हमेशा 50 के करीब नावें तैयार रहती थीं जो  पुर्तगाली, डच और फ्रांसिसी कालोनियों के साथ कारोबार करती थीं। यहां से तिजारत में मिले सामानों के परिवहन में ये नैरोगेज काफी सहायक थी। किसी समय में बिलिमोरा में बड़ी संख्या में पारसी आबादी रहती थी।शहर के अगियारी मुहल्ला पारसी बहुल हुआ करता था।
बिलिमोरा शहर में पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की प्रतिमा। 

कभी था गुजरात का मैनेचेस्टर -  किसी समय में बिलिमोरा को गुजरात का मैनेचेस्टर कहा जाता था। पर अब कंपनियां कम हुई हैं। पर आज भी यहां 40 के करीब कंपनियां उत्पादन में लगी हैं।  आपको पता हो न हो, लोकप्रिय फिल्म मदर इंडिया के निर्देशक महबूब खान बिलिमोरा के रहने वाले थे। उन्होंने फिल्म मदर इंडिया के कई दृश्यों की शूटिंग भी बिलिमोरा के आसपास की थी। 
-vidyutp@gmail.com

( GUJRAT, NARROW GAUGE, BILIMORA, WAHGAI SECTION ) 

Wednesday, February 25, 2015

बंदरगाह को जोड़ती थी-बिलीमोरा-वघई नैरो गेज लाइन

गुजरात में एक और नैरो गेज रेल संचालन में है बिलीमोरा जंक्शन और वघई के बीच।ये लाइन इस मायने में ऐतिहासिक है कि ये बड़ौदा रियासत के एकमात्र बंदरगाह बिलीमोरा को शेष गुजरात से जोड़ती थी। दोनों स्टेशनों के बीच एक जोड़ी ट्रेनों का रोज संचालन होता है।

दोनों स्टेशनों के बीच कुल दूरी 63 किलोमीटर है। कुल 9 मध्यवर्ती स्टेशन हैं बिलीमोरा और वघई के बीच। गणदेवी, चिखली रोड, रानकुवा, ढोलीकुवा, आंवल, उनानी, केवडी रोड, काला अंब और डूंगरडा बीच के स्टेशन हैं जहां पैसेंजर ट्रेन रूकती हुई जाती है।

बिलीमोरा से 52001 पैसेंजर सुबह 10.20 बजे  चलकर 1.20 बजे वघई पहुंचती है। यानी तीन घंटे में 63 किलोमीटर का सफर। औसत गति की बात करें तो 20 किलोमीटर प्रति घंटे से थोड़ा सा ही ज्यादा है। वहीं शाम को 7.40 बजे 52003 बिलीमोरा से वघई के लिए दुबारा चलती है। इसी तरह दो जोड़ी रेलगाड़ियां वघई से बिलीमोरा की ओर वापस भी आती हैं। दोनों स्टेशनों के बीच किराया है 15 कुल रुपये।


बिलीमोरा गुजरात के नवसारी जिले का एक छोटा सा शहर है। ये शहर अंबिका नदी के किनारे स्थित है। यह गणदेवी तालुका का हिस्सा है। कभी ये क्षेत्र बडौदा रियासत का हिस्सा हुआ करता था। इस रेलवे लाइन का निर्माण भी बड़ौदा रियासत ने करवाया था। दरअसल बिलीमोरा बड़ौदा रियासत का प्रमुख नौसेना केंद्र हुआ करता था। यहां पर बिलीमोरा बंदर का निर्माण कराया गया था। इसलिए माल ढुलाई के लिए खास तौर पर नैरो गेज रेलवे लाइन का निर्माण कराया गया था। यानी ये रेलवे लाइन बड़ौदा रियासत के लिए सामरिक महत्व वाला था।


वहीं वघई गुजरात के डांग जिले का एक छोटा सा शहर है। यह शहर अपने बोटानिकल गार्डन और कृषि महाविद्यालय के लिए जाना जाता है। पर बिलीमोरा वघई नैरो गेज ट्रेन भी इस क्षेत्र का प्रमुख आकर्षण हो सकता है। 



हिल स्टेशन सापूतारा जाने का मार्ग -  वघई गुजरात के एकमात्र हिल स्टेशन सापूतारा जाने के लिए निकटतम रेलवे स्टेशन है। हालांकि सापूतारा जाने वाले लोग इस नैरो गेज का इस्तेमाल कम ही करते हैं क्योंकि ये हौले होले पहुंचाती है। वैसे सापूतारा आप महाराष्ट्र के नासिक रोड रेलवे स्टेशन से भी जा सकते हैं। नासिक रोड से सापूतारा का दूरी महज 70 किलोमीटर है। वहां से सापूतारा महज दो घंटे में पहुंचा जा सकता है। वहीं बिलीमोरा जंक्शन से सापूतारा जाने में अपेक्षाकृत ज्यादा वक्त लग जाता है।   
- vidyutp@gmail.com 

( GUJRAT NARROW GAUGE, BILIMORA WAGHAI SECTION -  5)


Tuesday, February 24, 2015

डबल डेकर ट्रेन फ्लाइंग रानी एक्सप्रेस के सेकेंड क्लास में सफर

मुंबई सूरत की लाइफ लाइन है ये डबल डेकर ट्रेन

नाम है फ्लाइंग रानी एक्सप्रेस। गुजरात के व्यासायिक शहर सूरत को देश की औद्योगिक राजधान मुंबई से जोड़ती है। इसलिए ट्रेन में भीड़ भी खूब होती है। फ्लाइंग रानी देश की पुरानी रेलगाड़ियों में से एक है। ये 1906 से भारतीय रेल की पटरियों पर उड़ान भर रही है। ये वाकई सूरत के लोगों के दिल की रानी है। विश्व युद्ध के दौरान इसका सफर कुछ दिनों के लिए बाधित जरूर रहा था। पर कई दशक से ये सूरत के लोगों को महबूब ट्रेन है।

सुबह सुबह मैं दिल्ली से चलकर सूरत रेलवे स्टेशन पर उतरा तो सामने के प्लेटफार्म पर फ्लाईंग रानी खड़ी थी। ट्रेन के खुलने में अभी 25 मिनट का समय था। सुबह 5.25 बजे फ्लाइंग रानी ( 12922) मुंबई के लिए टेक आफ करती है। मेरे पास समय था बुकिंग काउंटर पता करके वहां पहुंचा और फ्लाइंग रानी से बिलिमोरा जाने की टिकट ले आया। 


फ्लाइंग रानी की खास बात है कि ये देश की एकमात्र ऐसी रेलगाड़ी है जिसमें सेकेंड क्लास का डबल डेकर कोच लगा है। ट्रेन में कुल 12 डबल डेकर नान एसी कोच लगे हैं। इनमें हर कोच में 138 लोगों के बैठने की जगह है। यानी समान्य सीटिंग कोच से ज्यादा। पर इन डबल डेकर कोचों की बनावट कुछ अलग है। दोनों तरफ के दरवाजे जनरल डिब्बों की तरह बड़े हैं। दरवाजे के बाद स्टैंडिंग स्पेस काफी है। जहां लोकल सवारियां खड़े खड़े भी सफर करती हैं। इसके बाद नीचे के तल के लिए कुछ सीढ़ियां उतरनी पड़ती हैं। 

वहीं उपर के तल पर जाने के लिए कुछ सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। छतों की ऊंचाई थोड़ी कम है इसलिए लंबे लोगों को थोड़ी दिक्कत हो सकती है। भीड़ हो जाने पर फ्लाइंग मेल के कोच में थोड़ी घुटन सी महसूस होती है। 12 कोच में सीटिंग के लिए आरक्षण होता है। छोटी दूरी का सफर है इसलिए फ्लाइंग रानी के डबल डेकर डिब्बों को देखना और उसमें सफर करना सुखद है। ट्रेन के हर कोच में फ्लाइंग रानी का टाइम टेबल चस्पा किया गया है।


वैसे फ्लाइंग मेल में दो वातानुकूलित कोच, 1 फर्स्ट क्लास का कोच और तीन जनरल श्रेणी के कोच हैं। जनरल श्रेणी वाले कोच भी डबल डेकर हैं। मुंबई की ओर से चलने वाली फ्लाइंग रानी शाम को 5.35 में सूरत के लिए रवाना होती है। हालांकि फ्लाइंग रानी नाम की ही फ्लाइंग रानी है इसकी औसत स्पीड किसी मेमू ट्रेन के बराबर ही है। सूरत मुंबई के बीच 263 किलोमीटर का सफर ये 4 घंटा 40 मिनट मे तय करती है। रास्ते में ट्रेन के स्टापेज भी किसी पैसेंजर ट्रेन की तरह ही हैं।

आजकल देश में कई मार्गों पर एसी डबलडेकर ट्रेन चलाई जा रही है। दिल्ली जयपुर, चेन्नई बेंगलुरु, अहमदाबाद मुंबई मार्ग पर एसी डबल डेकर ट्रेनें चलती हैं। पर देश में डबल डेकर ट्रेन 1980 के दशक में मुंबई पुणे मार्ग पर चलाई गई थी। सिंहगाड एक्सप्रेस में सेकेंड क्लास के डबल डेकर कोच लगाए गए थे। पर कुछ सालों बाद इन कोचों को हटा लिया गया।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( FLYING RANI EXPRESS, SURAT, GUJRAT ) 


Sunday, February 22, 2015

चमचम करता बैतूल रेलवे स्टेशन -पातालकोट से वापसी


बैतूल का रेलवे स्टेशन काफी साफ सुथरा है। रेलवे स्टेशन के बाहर खूबसूरत उद्यान बना है जिसमें तरह तरह के फूल हैं। दूसरे दर्जे का प्रतीक्षालय भी एक दम चमचमाता हुआ साफ सुथरा है। शौचालय की सफाई भी अति उत्तम है। देश में ऐसे साफ सुथरे रेलवे स्टेशन कम ही दिखाई देते हैं। लोग बता रहे हैं अगला रेलवे स्टेशन आमला भी काफी साफ-सुथरा है। प्लेटफार्म पर भी ज्यादा भीड़भाड़ नहीं है। स्टेशन परिसर में बड़ी बड़ी तस्वीरें लगी है जिसमें बैतूल जिले के आदिपासी डंडा नृत्य, आदिवासी गायकी नृत्य, तेजपत्ता के जंगल, सागवान के जंगल और दूसरे तरह के जंगलों के बारे में जानकारी दी गई है।

एक बार फिर तांगे का सफर - बिहार में राजगीर के बाद बैतूल में एक बार फिर तांगे पर सफर का मौका मिला। कोठी बाजार से बेतूल रेलवे स्टेशन के लिए आटो वाले 10 रुपये लेते हैं, तो तांगे वाले 5 रुपये में पहुंचाते हैं। एक तांगे वाला 20 रुपये में मुझे रिजर्व पहुंचाने को तुरंत तैयार हो गया। उसने बताया कि बैतूल में अभी भी 40-45 तांगे चलते हैं।

रास्ते में एक भोपाल के अधिकारी मिले। वे भी हमारे साथ तांगे में बैठकर खुश हुए। पर जब उन्होंने सुना कि किराया महज 5 रुपये है तो उन्होंने कहा नहीं मैं भी कम से कम दस रुपये ही दूंगा। तांगे वाले की खुशी का ठिकाना नहीं था। चलते-चलते बातों ही बातों में तांगे वाले ने बताया कि घोड़े को खिलाने में 70 रुपये रोज खर्च हो जाते हैं। कभी कभी दिन भर में इतनी भी कमाई नहीं हो पाती है कि घोड़े को खिला सकूं।

रेलवे स्टेशन पर कचौरी की प्रसिद्ध दुकान है। शेगांव कचौरी सेंटर। ये शेगांव तो महाराष्ट्र के अकोला जिले का शहर है। पर ये कैंटीन उसी शहर के नाम पर है।  ये 10 रुपये मे एक कचौरी बेचते हैं हरी वाली चटनी के साथ। कचौरी की स्वाद लाजवाब है। कैंटीन की साफ सफाई भी अति उत्तम है। आम तौर पर रेलवे स्टेशनों पर इतनी अच्छी और किफायती खाने पीने की दुकानें नहीं दिखाई देती हैं। पर ये कचौरी सेंटर उसका अपवाद है। 

पर आईआरसीटीसी द्वारा आवंटित बेतूल रेलवे स्टेशन की इस कैंटीन के मैनेजर की शिकायत है बैतूल रेलवे स्टेशन पर रेलगाड़ियां सिर्फ दो मिनट के लिए रूकती है। ऐसे में कचौरियों की बिक्री ज्यादा नहीं हो पाती। किसी ट्रेन के रुकने पर जो डिब्बे इस कचौरी सेंटर के आसपास पड़ते हैं सिर्फ वही लोग कचौरी खरीद पाते हैं। दो मिनट के ठहराव में कोई ट्रेन से उतर कर दुकान तक भी नहीं आ सकता। पर स्वाद का ये सुनहरा सफर जारी है। 







बेतूल मेरी वापसी की ट्रेन है 14623 - पातालकोट एक्सप्रेस। यह ट्रेन छिंदवाड़ा से आती है। पर रेलगाड़ी का रनिंग स्टेट्स देख रहा हूं तो पता चलता है कि ट्रेन लेट चल रही है तो कई घंटे प्लेटफार्म पर बैठकर पातालकोट एक्सप्रेस का इंतजार करना पड़ा। इस बीच स्टेशन पर किताबें पढ़ते हुए और स्थानीय लोगों से बातचीत में वक्त गुजारा। पर इतने साफ सुथरे स्टेशन पर वक्त काटना बोरियत भरा बिल्कुल नहीं लगा।  

छोटे से शहर बेतूल में लड़के लडकियों में कंप्टिशन की तैयारी करने का जुनून खूब दिखा। पर शहर में ज्यादातर लड़कियां हिजाब लगाकर चलती हैं। ऐसा क्यों पता नहीं। शायद असुरक्षा का भाव हो। पांच घंटे लेट चल रही पातालकोट एक्सप्रेस प्लेटफार्म नंबर दो पर पहुंच गई है। शाम होने से पहले ट्रेन बेतूल से चल पड़ी है। हमारे डिब्बे में छिंदवाड़ा के युवाओं का एक बड़ा समूह है जो किसी नेटवर्क मार्केेटिंग के सेमिनार में शामिल होने दिल्ली जा रहा है। अगले दोपहर दिल्ली के सफदरजंग रेलवे स्टेशन पर ट्रेन ने पहुंचाया। 

( BETUL RAILWAY STATION, MP, TANGA RIDE, SHEGAON KACHORI CENTER, PATALKOT EXPRESS   ) 

Friday, February 20, 2015

बालाजीपुरम में है अनूठी अशोक वाटिका और मां वैष्णो मंदिर

बालाजीपुरम के मंदिर में अनूठी अशोक वाटिका बनाई गई है। इसके सैर के लिए अलग से टिकट है। करीब आधा किलोमीटर की पदयात्रा में दोनों तरफ हरे भरे पेड़ और अलग अलग वेष भूषा में मानवों की आकृति आपका स्वागत करती है। बालू बिछे हुए कच्चे मार्ग पर चलते हुए मार्ग में कई मंदिर बनाए गए हैं। इन मंदिरों के दर्शन करते हुए आगे बढ़ते जाना बड़ा ही भला लगता है। 

बैतूल के आसपास के रहने वाले लोग तो बार बार यहां सैर करने आते हैं। इन मंदिरों के बीच एक छिपकिली मंदिर और और विशाल मंदिर है जो शिवलिंग के आकार का है। इन मंदिरों में प्रवेश के लिए फिर अलग से टिकट लगाया गया है। लेकिन अशोक वाटिका के परिक्रमा मार्ग में वैष्णो देवी का मंदिर मुख्य आकर्षण है। कई मंजिले चढ़ने के बाद मंदिर के छत से आसपास का मनोरम नजारा दिखाई देता है। खास तौर पर बगल से गुजरता हुआ नागपुर इटारसी एक्सप्रेस वे।

अशोक वाटिका के आखिरी में भोजनालय है। यहां ग्रामीण परिवेश का ताजा भोजन वाजिब कीमत पर उपलब्ध है। अगर भूख लगी है तो पेटपूजा कर लिजिए। वर्ना बालाजी के मंदिर के बगल में लंबी गुफा में घूमने का आनंद लिजिए। मंदिर परिरस में दो और रेस्टोरेंट हैं जहां इडली डोसा भी उपलब्ध है। बालाजी मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं के रहने के लिए भी इंतजाम है। एसी और नॉन एसी कमरे यहां उपलब्ध हैं जिसकी अग्रिम बुकिंग कराई जा सकती है। हर साल वसंत पंचमी के आसपास बालाजीपुरम मंदिर में ब्रह्मोत्सव का आयोजन होता है। दस दिनों तक चलने वाले उत्सव में भक्ति संगीत का कार्यक्रम होता है।

हवाई सफर का मजा लिजिए - बैतूल के बालाजीपुरम मंदिर के संस्थापक सैम वर्मा एनआरआई हैं। उन्होंने इंजीनयरिंग की पढ़ाई की थी। बैतूल में उनका बैतूल टायर नाम से टायर बनाने की फैक्ट्री भी है। सैम वर्मा को हवाई जहाज उड़ाने का शौक है। उनके पास बैतूल में अपनी एयर स्ट्रिप भी है। वे निजी हवाई सेवाएं प्रदान करने के कारोबार से भी जुडे हुए हैं। बालाजी मंदिर से कुछ किलोमीटर आगे उनका निजी हवाई अड्डा बना हुआ है। मंदिर परिसर में भी एक पुराना जेट विमान लोगों को देखने के लिए प्रदर्शित किया गया है। मंदिर प्रबंधन की ओर से लोगों के लिए बैतूल शहर के ऊपर हवाई सैर की सुविधा भी उपलब्ध कराई जा सकती है। अगर आपकी शौकिया उडऩे की तमन्ना है तो आप ऐसी उडान बुक करा सकते हैं।

बालाजीपुरम का नजारा सुंदर है। पर ये एक कारपोरेट मंदिर जैसा नजर आता है। इस मंदिर के साथ जन सेवा की भी कुछ गतिविधियां चलती तो बेहतर होता। मुझे जालंधर का देवी तालाब मंदिर याद आता है जो फ्री और पेड रेस्टोरेंट का संचालन तो करता ही साथ ही मंदिर एक विशाल चैरिटेबल हास्पीटल का भी संचालन करता है।

दक्षिण के मंदिरों में भी ऐसा होता है। तिरूपति का बालाजी मंदिर भी इस तरह के कई प्रकल्प चलाता है। बैतूल के बालाजीपुरम में ऐसा कुछ दिखाई दे तो अच्छा रहेगा।

रुक्मणि बालाजी मंदिर के बाहर कई दुकाने हैं, यहां लकड़ी के खिलौने खूब मिलते हैं। यहां मुझे लकड़ी की तीन पहिया साइकिल दिखी जिसे हमने बचपन में गांव में खूब दौड़ाया था। पर ये साइकिल अब बदले हुए अंदाज में दिखाई दे रही है।
( BALAJEEPURAM, TEMPLE, ASHOK VATIKA, BETUL,  MP ) 

Wednesday, February 18, 2015

देश का पांचवा धाम बना बालाजीपुरम

मध्य प्रदेश का बैतूल जिले में सतपुड़ा की सुरम्मय वादियों के मध्य बने मंदिर बालाजीपुरम को भारत के पांचवें धाम के रुप में देखा जाने लगा है। इस मंदिर की सुंदरता देखते ही बनती है। कई सालों में तैयार इस मंदिर ने बैतूल शहर को एक नई पहचान दिलाई है। मंदिर में हर रोज हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ तो उमड़ती ही है। खास पर्व त्योहार के मौकों पर यहां भीड़ बढ़ जाती है। हरीतिमा के बीच बने इस मंदिर में आना सुखकर लगता है। इस मंदिर की स्थापना का श्रेय एक ऐसे व्यक्ति को है जो पेश से वैज्ञानिक हैं। हवाई जहाज उड़ाना उनका शौक है। टायर का कारोबार उनकी बिजनेस विभिन्नता है। पर एनआरआई सेम वर्मा ने अपने अकेले प्रयास से इस अनुपम अनुकृति को बैतूल की धरती पर उतारा है। 


सेमजी के पुरखे बिहार के एक पिछड़े इलाके से आकर बैतूल में बस गए थे। पढ़ाई में मेधावी सेमजी वर्मा 60 के दशक में इंजीनियर बनने के बाद अमेरिका चले गए। बचपन से ही हवाई जहाज को उड़ते देखकर इनके मन में भी एक दिन उड़ने की इच्छा होती थी। वे उड़कर अमेरिका गए पर अपने वतन व अपनी मिट्टी को नहीं भूले। उन्होंने बैतूल में एक ऐसे मंदिर का निर्माण करवा जिससे अब बैतूल शहर को जाना जाता है। सेमजी को हवाई जहाज उड़ाने का शौक है। वे अपने निजी विमानों के कारण अक्सर चर्चा में भी रहते हैं। 

सेम जी बताते हैं कि उनका परिवार सदियों से शिवभक्त रहा है। पर वे जब 1966 में भगवान बालाजी के दर्शन करने तिरुपति गए तब उनके मन में ख्याल आया कि क्यों न इस तरह का एक मंदिर बैतूल में स्थापित हो। इसके बाद कुछ तमिल लोगों से चर्चा हुई। उन्होंने मंदिर के लिए एक फोम का मॉडल गढ़ कर दिया। कई सालों में यह विशाल मंदिर बन कर तैयार हुआ। मंदिर के निर्माण में पैसा पानी की तरह बहाया गया है। पर सेमजी ने कभी इसका हिसाब नहीं लगाया कि इस पर कितना पैसा खर्च हुआ। मंदिर में पूजा पाठ कराने के लिए सारे पुजारी भी दक्षिण भारत से ही लाकर नियुक्त किए गए हैं।

बालाजीपुरम का मुख्य मंदिर 111 फीट ऊंचा है और साढ़े 10 एकड़ जमीन में फैला हुआ है। मंदिर में मुख्य रुप से रुक्मणी महादेव मंदिर के अलावा 40 से अधिक देवताओं की स्थापना की गई हैं। इस मंदिर का कोई तय डिजाइन नहीं बना न ही कोई मानचित्र है। बस कई सालों तक यह मंदिर बनता रहा। इस बीच मंदिर के कई शिल्पी भी बदले गए। पर अंत में यह एक अनुपम दर्शनीय स्थल बन गया। कई ऋषियों को यह स्थल इतना भाया का कि उन्होंने यहीं रहकर कई दिनों तक तपस्या भी की। कृष्ण भजन गाने वाले दंपति कैलाश अनुज  और पीयूषा अनुज कहते हैं कि उन्होंने दुनिया भर में कई मंदिर देखे पर वे बालीजीपुरम की छटा देखकर मोहित हैं। वे यहां पर अपना लाइव प्रोग्राम दे चुके हैं जिसकी वीसीडी भी जारी हो चुकी है।

आज बालाजीपुरम महत्वपूर्ण आस्था के केंद्र के साथ पर्यटक स्थल का रुप ले चुका है। यहां बच्चों के मनोरंजन के लिए निःशुल्क पार्क बनाए गए हैं। झूले, बालाजीपुरम रेलवे, कोलंबस, मेरिगो राउंड, आकाश मार्ग से चलने वाला हवाई जहाज लोगों को आकर्षण का केंद्र है। बालाजीपुरम में ठहरने के लिए उत्तम व्यवस्था मौजूद है। मंदिर परिसर में ही धर्मशाला भी है। समय समय पर बालाजीपुरम में धर्मगुरूओं और धार्मिक गायकों का आना जाना लगा रहता है। धीरे-धीरे यह स्थल देश विदेश में लोकप्रिय होता जा रहा है।

कैसे पहुंचे - यहां जाने के लिए साल का कोई भी मौसम ठीक है। बैतूल शहर को इंडिया का सेंटर प्वाइंट कहा जाता है। यह नागपुर तथा भोपाल के बीच स्थित है। बैतूल शहर के रेलवे स्टेशन से बालाजीपुरम महज सात किलोमीटर है। रेलवे स्टेशन से आपको आटो रिक्शा मिल जाते हैं। जैसे ही आप बालाजीपुरम पहुंचते हैं एक भव्य गेट आपका स्वागत करता है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com   ( सभी फोटो - विद्युत प्रकाश मौर्य) 
( BALAJEEPURAM, BATUL, MP, )