Sunday, January 18, 2015

चांपा की कचौड़ी, चाट और जलेबी के साथ

पेंड्रा रोड से चलकर बिलासपुर होते हुए मैं चांपा जंक्शन पहुंच गया हूं। चांपा छतीसगढ़ के जांजगीर जिले का शहर है। मुंबई-कोलकाता मार्ग का यह प्रमुख रेलवे स्टेशन है। रेलवे स्टेशन के सामने वाली कालोनी में रहते हैं मेरे पुराने दोस्त प्रोफेसर भूपेंद्र पटेल। वे ट्रेन पहुंचते ही रेलवे स्टेशन पर ही मुझे लेने आ गए। उनसे 1992 के बाद दूसरी बार मुलाकात हो रही है। रेलवे स्टेशन पर सर्वोदय बुक स्टाल है। वहीं पर प्रोफेसर पटेल से मुलाकात हुई। 

सुबह प्रोफेसर पटेल साहब के साथ उनकी कालोनी के प्रवेश द्वार पर नास्ते में कचौड़ी खाई। दस रुपये की कचौडी में सब्जी, दही चटनी डालकर। अब कुछ कुछ ये चाट जैसी हो जाती है। बातों बातो में पता चलता है कि इस कचौडी को बनाने वाले दुकानदार बिहार के रहने वाले हैं। पिछले 40 सालों से यहां आकर दुकान चला रहा है। अब यहां दिल लग गया है तो चांपा ही उनका घर हो गया है। 


उनकी कचौडी का स्वाद तो याद रहेगा ही। पर  वे बताते हैं कि उनकी कचौड़ी की चांपा में इतनी मांग है पूरी कालोनी के लोग घर में पार्टी करने के लिए  उनकी दुकान से ही कचौड़ी मंगाते हैं। वाकई स्वाद का जवाब नहीं। दस रुपये में कचौडी की प्लेट। चाहो तो साथ में जलेबी या चाय भी ले सकते हो।


चांपा में कई साल बाद मिलना हुआ प्रोफेसर अश्वनी केशरवानी से। वैसे तो वे कॉलेज में विज्ञान के शिक्षक हैं पर उनकी रूचि धर्म संस्कृति और छतीसगढ़ के इतिहास में ज्यादा है। उनसे 1992 में दिल्ली में राष्ट्रीय युवा योजना के आर्गनाइजर्स मीट में मुलाकात हुई थी। प्रोफेेसर केसरवानी छत्तीसगढ़ के इतिहास और लोक संस्कृति पर कई पुस्तकें लिख चुके हैं। उनके घर कई दशक बाद की मुलाकात अविस्मरणीय रहेगी। मैं 1992 में बीए में पढ़ रहा था। अब मैं 40 पार कर रहा हूं तो वे 60 के करीब। केशरवानी जी ने छत्तीसगढ़ पर लिखी अपनी तीन किताबें मुझे भेंट की। 

चांपा से रायपुर का सफर - मेरी अगली मंजिल है रायपुर। सुबह मैंने गेवरा रोड गोंदिया जनशताब्दी एक्सप्रेस पकड़ी रायपुर जाने के लिए।  प्रोफेसर भूपेंद्र पटेल रेलवे स्टेशन तक छोड़ने आए।  जनशताब्दी में करेंट टिकट खरीदने के बाद भी बैठने की जगह बड़ी ही सुगमता से मिल गई।

ट्रेन में बगल वाली सीट पर बैठे सज्जन से बातचीत शुरू हुई। उनका नाम है प्रोफेसर रामायण पात्रे। वे कोरबा के मिनी माता महाविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर हैं। सफर के दौरान उनसे छत्तीसगढ़ी जुबान और भाषा पर वार्ता चलती रही। इसी दौरान कब रायपुर आ गया पता ही नहीं चला।




गोल्डेन रेस्टोरेंट की 50 रुपये की थाली -   रायपुर रेलवे स्टेशन चमचमाता हुआ साफ सुथरा है। स्टेशन के ठीक सामने रहने और खाने पीने के लिए कई होटल हैं जो देर रात का खुले रहते हैं। कई होटलों का मीनू देखने के बाद मैंने गोल्डेन रेस्टोरेंट की थाली खाना पसंद किया। 50 रुपये की थाली में 4 चपाती, दो सब्जियां, दाल और सलाद। सब्जियां भी थोडी नहीं भरपूर मात्रा में। 


तो भाई ये 50 रुपये में शानदार थाली है। रेस्टोरेंट में वेटरों की सर्विस बहुत तेज है। यहां रेस्टोरेंट में महिलाएं काम करती हैं। वह भी रात 10 बजे तक। वर्दी में तैनात महिलाएं ग्राहकों की सुविधाओं का पूरा ख्याल रखती हैं। रेलवे स्टेशन के सामने के होटलों में हर तरह का स्वाद उपलब्ध है। उत्तर भारतीय थाली, दक्षिण का मसाला डोसा, इडली सांभर और बिरयानी भी। तो ट्रेन पकड़ने वालों के लिए फटाफट पैंकिंग का भी पूरा इंतजाम है।



रेलगाड़ी का कोच नहीं जनाब रेस्टोरेंट -   रायपुर की सड़कों पर घूमते हुए नगर निगम के पास वाली सड़क पर शानदार चौपाटी नजर आती है। काफी कुछ इलाहाबाद के सिविल लाइंस की तरह। इस चौपाटी पर फुटपाथ पर एक रेस्टोरेंट है। बिल्कुल किसी रेलगाड़ी के कोच की तरह। पर इसके अंदर बैठकर खाने का सुंदर इंतजाम है। ये रेलवे द्वारा संचालित नहीं है पर जिसकी भी परिकल्पना हो, है काफी सुंदर।
विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( CHAMPA, JANJGIR, RAIPUR, JAN SHATABDI EXPRESS, BILASPUR ) 

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