Thursday, January 15, 2015

अमरकंटक का दिगंबर जैन मंदिर और वापसी

अमरकंटक का एक और आकर्षण है भगवान आदिनाथ का जैन मंदिर। दूर से देखने में अमरकंटक का सर्वोदय जैन मंदिर काफी हद अक्षरधाम मंदिर गुजरात की तरह लगता है। चार एकड़ में फैला ये मंदिर जैन समाज का बड़ा प्रोजेक्ट है। इसके निर्माण पर 20 करोड़ से ज्यादा राशि खर्च की जा रही है। इसके डिजाइन और निर्माण में 300 कलाकार लगे हैं। मंदिर में भगवान आदिनात की 24 फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित की गई है। वे अष्टधातु के बने कमल सिंहासन पर विराजमान हैं।

इसे आचार्य श्री विद्यासागरजी ने 6 नवम्बर 2006 को विधि-विधान से स्थापति किया गया हैप्रतिमा 28 टन के कमल पुष्प पर विराजित है वो भी अष्टधातु  निर्मित है। मंदिर के गुंबद की ऊंचाई 144 फीट है। मंदिर अमरकंटक शहर में पहले से ही सबसे ऊंचे स्थल पर स्थित है। इसके निर्माण में गुलाबी रंग के बलुआ पत्थर का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस मंदिर को बनाने में सीमेंट और लोहे का इस्‍तेमाल नहीं किया गया है। मंदिर में स्‍थापित मूर्ति का वजन 24 टन के करीब है। 


श्री सर्वोदय दिगंबर जैन मंदिरअमरकंटकमध्य प्रदेश में निर्माणाधीन है।  यह भारत में बनने वाला सुंदर मंदिर दुनिया के सबसे बड़े अष्टधातु के मंदिरों में एक होगा। इस मंदिर का निर्माण विगत कई वर्षों से हो रहा है। मंदिर का सिंहद्वार 51 फीट ऊँचा 42 फीट लम्बा होगा। कहा जा रहा कि मंदिर का निर्माम कार्य 2015 तक पूरा हो जाएगा। जैन मंदिर में अतिथियों के रहने के लिए आवास का भी इंतजाम है।
अमरकंटक में भी है टेबल लैंड 



एक टेबल लैंड यहां भी -  हमने इससे पहले महाबलेश्वर में विशाल टेबल लैंड देखा था। टेबल लैंड पहाड़ पर एक समतल जमीन होती है। पर मुझे सुखद आश्चर्य हुआ कि अमरकंटक में भी एक विशाल टेबल लैंड है। ये स्थल जैन मंदिर के पास ही है। ये टेबल लैंड हालांकि महाबलेश्वर की तरह आकार में बड़ा नहीं है। पर है काफी सुंदर।  स्थानीय लोग बताते हैं यहां पर हेलीकाप्टर उतारा जाता है।

अमरकंटक से वापसी - तो अब हमारा अमरकंटक का सफर अब खत्म होने वाला था। अब बारी अमरकंटक से विदा होने की थी। मैंने बस स्टैंड से बस की तलाश शुरू की। 

वापस लौटने के लिए बस तो नहीं मिली पर छोटे चार पहिया ( टाटा आयरिश) वाले मिल गए। बोले हम आपको पेंड्रा रोड पहुंचा देंगे। आपकी ट्रेन से पहले ही। इस गाड़ी में एक बार फिर मेकाल पर्वत श्रंखला के जंगलों के बीच से सफर आरंभ हुआ। एक तरफ पहाड़ दूसरी तरफ गहरी खाई। 

उनके इस छोटी सी बस पर आगे लिखा था अमरकंटक दर्शन तो पीछे की ओर लिखा था बड़ा ही भावनात्मक संदेश - फिर कब आओगे अमरकंटक.... इतने शांत और प्राकृतिक माहौल वाले स्थल पर भला क्यों नहीं दुबारा आने को जी करेगा।  पढकर जी में यही विचार आया...हम तो बार बार आएंगे अमरकंटक... देखिए कब दुबारा आना होता है इस पवित्र शहर में। एक घंटे के सफर में इस नन्ही सी गाड़ी ने हमें पेंड्रा रोड रेलवे स्टेशन पर पहुंचा दिया है। जय मां नर्मदे। 
-     --- विद्युत प्रकाश मौर्य
( ( AMARKANTAK, SON, JAIN TEMPLE, HILL STATION ) 




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