Saturday, January 31, 2015

छत्तीसगढ़ के गांधी पंडित सुंदर लाल शर्मा

राजिम शहर के चौराहे पर महान पत्रकार और स्वतंत्रता सेना पंडित सुंदरलाल शर्मा की प्रतिमा लगी है। इस प्रतिमा ने मुझे सहज रूप से उनके अवदान के बारे में जानने के लिए प्रेरित किया। वास्तव में पंडित सुंदरलाल शर्मा छत्तीसगढ़ के गांधी थे। 21 दिसंबर 1881 को जन्मे पंडित सुंदरलाल शर्मा  छत्तीसगढ़ में जन जागरण तथा सामाजिक क्रांति के अगुवा थे। सुंदरलाल शर्मा एक कविसमाजसेवक, इतिहासकार, स्वतंत्रता-संग्राम सेनानी थे। उनके सम्मान में बिलासपुर में पंडित सुंदर लाल शर्मा मुक्त विश्वविद्यालय की स्थापना की गई है। उनका निधन 28 दिसंबर 1940 में हुआ। सुंदरलाल शर्मा असहयोग आंदोलन के समय जेल जाने वाले प्रमुख सेनानियों में एक थे। शर्मा जी के प्रयासों से ही महात्मा गांधी 20 दिसंबर 1920 को पहली बार रायपुर पधारे थे।

श्यामसुंदर शर्मा को छत्तीसगढ़ी का अग्रणी कवि माना जाता है। उन्होंने हिंदी तथा छत्तीसगढ़ी में लगभग 18 ग्रंथों की रचना की, जिसमें छत्तीसगढ़ी दान-लीला चर्चित कृति है। छत्तीसगढ़ सरकार ने उनकी स्मृति में साहित्य/आंचिलेक साहित्य के लिए पं. सुंदरलाल शर्मा सम्मान स्थापित किया है।

राजीव लोचन मंदिर में अछूतों को दिलाया प्रवेश
1925 में पंडित सुंदर लाल शर्मा ने छत्तीसगढ़ के मंदिरों में अछूतों के प्रवेश को लेकर आंदोलन चलाया। इसके तहत राजिम के प्रसिद्ध राजीव लोचन मंदिर में अछूते के प्रवेश को लेकर योजना बनाई गई। यह बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर द्वारा नासिक के प्रसिद्ध कालेराम मंदिर में दलितों के प्रवेश के आंदोलन से पहले की घटना है। इस आंदोलन से तत्कालीन ब्राह्मण समाज में खलबली मच गई। हालांकि पंडित सुंदर लाल शर्मा स्वंय ब्राह्मण थे लेकिन वे जाति के आधार पर छूआछूत के प्रबल विरोधी थे।

आठ नवंबर 1925 को अछूतोद्धार हिंदू सभा की एक विशाल बैठक राजिम में हुई। इसकी अध्यक्षता नारायण राव मेघावले कर रहे थे। बैठक में संत, महात्मा, राजनेता, समाजसुधारक मौजूद थे। कई घंटे चले मंथन के बाद ये प्रस्ताव पास किया गया कि मंदिर में अछूतों को प्रवेश का अधिकार दिया जाए। ये ऐलान हुआ कि 15 दिन के अंदर अछूत जातियों के लोग राजीव लोचन मंदिर में प्रवेश करेंगे।

25 नवंबर 1925 को पंडित सुंदरलाल शर्मा की अगुवाई में 1500 अछूत श्रद्धालु राजीव लोचन मंदिर पहुंचे। अछूतों ने 12 तोले के स्वर्णाभूषण भी बनवाए थे भगवान को अर्पित करने के लिए। लेकिन मंदिर प्रबंधन और अंग्रेज पुलिस ने उन्हें मंदिर में प्रवेश से रोका। पास के रामचंद्र मंदिर के पुजारी ने अछूतो के लिए अपने मंदिर का द्वार खोल दिया। सुंदरलाल शर्मा आर्य समाज के स्वामी श्रध्दानंद के कार्य से प्रभावित थे। उनकी प्रेरणा से ही उन्होंने हरिजनोध्दार एवं अस्पृश्यता निवारण को कार्यक्षेत्र बनाया।पंडित शर्मा पाराशर गोत्र के ब्राह्मण होते हुए भी दलित वर्ग के अधिकारों के हिमायती रहे। गुरु घासीदास के बताए सैनिक निष्ठा के नियमों के पालन व उपदेश देने एवं समाज के सभी दलित वर्गों में स्वाभिमान जगाने के लिए उन्होंने सतनामी पुराण नामक ग्रंथ की रचना की। 

गांधी जी ने भी की थी तारीफ - महात्मा गांधी जब सन् 1933 में दूसरी बार छत्तीसगढ़ की यात्रा पर आये तब राजिम के पास नवापारा की सभा को संबोधित करते हुए कहा था कि सुंदरलाल शर्मा उम्र में तो मुझसे छोटे हैं परंतु हरिजनोध्दार के कार्य में मुझसे बड़े हैं।
-विद्युत प्रकाश मौर्य -    vidyutp@gmail.com 
( RAJIM, GANDHI, SUNDER LAL SHARMA) 

Thursday, January 29, 2015

राजीव लोचन मंदिर - यहां सिंहासन पर विराजते हैं भगवान विष्णु

महानदी के तट पर बसा छोटा सा शहर राजिम कभी छत्तीसगढ़ का महत्वपूर्ण सांस्कृतिक केंद्र हुआ करता था। आज भी राज्य में यह आस्था का बड़ा केंद्र है। हर साल माघ पूर्णिमा से महाशिवरात्रि के बीच यहां विशाल मेला लगता है जिसे राजिम कुंभ के नाम से जाना जाता है। माघ पूर्णिमा को भगवान राजीव लोचन का जन्मदिन माना जाता है। लोगों का मानना है कि माघ पूर्णिमा के सुबह इस संगम में स्नान करने से लोगों की व्याघ्र-बाधाओं एवं पापों से मुक्ति मिल जाती है।  राजिम कुंभ के समापन अवसर पर महाशिवरात्रि को भव्य शाही स्नान का आयोजन होता है। वास्तव में महानदी, पैरी और सोंढूर नदी के संगम पर स्थित राजिम को छत्तीसगढ़ का प्रयाग कहा जाता है। महानदी को चित्रत्पला गंगा भी कहते है, ये शिव का प्रतीक है।


राजिम में कई मंदिर हैं, जो आठवीं से 14वीं सदी के मध्य बने हुए हैं। इनमें राजीव लोचन मंदिर प्रमुख है। यह महानदी के पूर्वी तट पर बना है। इसका निर्माण नलवंशी नरेश विलासतुंग द्वारा आठवीं सदी में करवाया गया था। यह भगवान विष्णु का मंदिर है। यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है। राजीव लोचन का मंदिर चतुर्थाकार में बनाया गया है। इसके उत्तर में और दक्षिण में प्रवेश द्वार बने हुए हैं। एक प्रवेश द्वार नदी के तट की तरफ से है। महामंडप के बीच में गरुड़ हाथ जोड़े खड़े हैं।

गर्भगृह में राजीव लोचन यानी विष्णु की मूर्ति सिंहासन पर स्थित है। यह प्रतिमा काले पत्थर की बनी चतुर्भुज आकार की है। इसके हाथों में शंक, चक्र, गदा और पद्म है। इसकी लोचन के नाम से पूजा होती है। मंदिर के दोनों दिशाओं में परिक्रमा पथ और भंडार गृह बना हुआ है। महामंडप को 12 प्रस्तर खंभों के सहारे बनाया गया है। गर्भगृह के द्वार पर दाएं  बाएं और ऊपर चित्र हैं। इनपर सर्पाकार मानव आकृति अंकित है और मिथुन की मूर्तियां हैं। मंदिर में आकर्षक मिथुन मूर्तियां दीवारों पर उकेरी गई हैं। इनके वस्त्र अलंकरण भी आकर्षक हैं।


यहां क्षत्रिय पुजारी कराते हैं पूजा - वैसे तो मंदिर का इंतजाम देखने के लिए ट्रस्ट बना हुआ है पर राजा रत्नाकर से समय से ही राजीव लोचन मंदिर में क्षत्रिय पुजारी मंदिर में तैनात हैं। ये जनेउ धारण करते हैं। स्तुति पाठ के लिए ब्राह्मण पुजारी भी तैनात किए जाते हैं। पर मुख्य पूजा क्षत्रिय पुजारी ही कराते हैं। मंदिर में प्रसाद के तौर पर चावल का निर्मित पीड़िया भी उपलब्ध होता है।  

राजीव लोचन मंदिर के उत्तर दिशा में जो द्वार है वहां से बाहर निकलने पर साक्षी गोपाल का मंदिर है। मुख्य मंदिर के चारों ओर नृसिंह अवतार, बद्री अवतार, वामनावतार, वराह अवतार के मंदिर हैं।  मंदिर के आयताकार महामंडप में कई सुंदर मूर्तियां सजी हैं।

राजीव लोचन मंदिर के चारों कोनों पर वामन, वराह, नृसिंह और ब्रदीनाथ जी के मंदिर बने हैं।  राजिम के दूसरे दर्शनीय मंदिर हैं राजेश्वर मंदिर, दानेश्वर मंदिर, रामचंद्र मंदिर, पंचेश्वर महादेव मंदिर, जगन्नाथ मंदिर, भूतेश्वर मंदिर, राजिम तेलिन मंदिर एवं सोमेश्वर महादेव मंदिर।

राजीव लोचन मंदिर के अंदर दो शिलालेख भी हैं। शिलालेख में रतनपुर के कलचुरी नरेश जाजल्यदेव प्रथम और रत्नदेव द्वितीय की कुछ विजयों का उल्लेख है। उनके सामंत (सेनापति) जगतपालदेव ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। शिलालेख में पंचहंस कुल रंजक राजमाल कुलामलंतिलक जगपाल देव द्वारा राजिम में निर्मित स्थानीय रामचंद्र देवल का निर्माण करने एवं भगवान के नेवैद्य हेतु शाल्मलीय ग्राम के दान का ज्ञापन है। लेख संस्कृत भाषा एवं देवनागरी लिपि में है। इसका आरंभ 'ओम नमो नारायणाय' से हुआ है।

कुलेश्वर महादेव मंदिर – महानदी, पैरी और सोंढूर नदियों के संगम स्थल पर एक छोटा-सा टापू है। वहां स्थित कुलेश्वर मंदिर भगवान शिव का देवालय है। कहते हैं ये यहां शिव आपरूपि प्रकट हुए थे। लोगों का मानना है कि माघ पूर्णिमा के सुबह इस संगम में स्नान करने से लोगों की व्याघ्र-बाधाओं एवं पापों से मुक्ति मिल जाती है।

लोमश ऋषि का आश्रम - राजिम में कुलेश्वर मंदिर से लगभग 100 गज की दूरी पर दक्षिण की ओर लोमश ॠषि का आश्रम है। यहां बेल के बहुत सारे पेड़ हैं, इसीलिए यह जगह बेलहारी के नाम से जानी जाती है।

पंचकोशी परिक्रमा - राजिम में पंचकोसी की यात्रा हर साल कार्तिक अग्राहन से पौष माघ तक चलती रहती है। इसके तहत श्रद्धालु पटेश्वर महादेव, चम्पकेश्वर महादेव, ब्रह्मकेश्वर महादेव, फणिकेश्वर महादेव का मंदिर और कोपरा गांव स्थित कर्पूरेश्वर महादेव के मंदिरों की यात्रा और दर्शन करते हैं।



Tuesday, January 27, 2015

सड़क पर बने हर फाटक पर रूक जाती है ये ट्रेन ((04 ))

देश मे एक ऐसी ट्रेन भी चलती है जो सडक पर आते जाते वाहनों को देखकर रूक जाती है। यहां समपार फाटक पर कोई गार्ड नहीं दिखाई देता। ऐसा नजारा दिखाई देता है रायपुर धमतरी नैरो गेज पर।  रायपुर राजिम की इस छोटी लाइन की इस ट्रेन में अमूमन सात डिब्बे होते हैं। ट्रेन पूरे सफर में रायपुर शहर की सीमा में सात तथा कुल मिलाकर 23 सड़कों की क्रॉसिंग पार करती है। ये ट्रेन सभी क्रॉसिंग पर रुकती है। इन क्रासिंग से रेलवे ने गार्ड हटा लिए हैं, क्योंकि ये काफी खर्चीला सौदा साबित हो रहा था। पूरे देश में ये एकमात्र ऐसी रेलवे लाइन है जो हर फाटक पर रुकती है। रुकने के बाद गार्ड का सहयोगी रेलवे का खलासी ट्रेन से उतरकर फाटक को बंद करता है या फिर सड़क पर चलने वाले वाहनों को रोकता है।

इस खालसी के पास लाल और हरी झंडियां होती हैं। जब पूरी ट्रेन फाटक को पार कर जाती है तो ड्राइवर एक बार फिर ट्रेन को रोक देता है। खालासी ट्रेन में सवार होता है। इसके बाद गार्ड सिग्नल देता और ट्रेन अपने सफर के लिए आगे बढती है। हालांकि सड़कों पर वाहन चलाने वाले लोग इस नैरो गेज ट्रेन को परेशान नहीं करते। जैसी ट्रेन आती देखते हैं बड़े सम्मान से रूक जाते हैं।

रायपुर राजिम धमतरी रेलमार्ग का भविष्य 




साल 1991-92 में रेल बजट में चर्चा के दौरान कांकेर के सांसद अरविंद नेताम ने रायपुर धमतरी रेलवे लाइन को ब्राड गेज में बदले जाने का मामला उठाया था। इससे पहले 1997 में रायपुर-राजिम-धमतरी 89 किलोमीटर नैरो गेज रेलवे लाइन को बड़ी लाइन में परिवर्तन करने हेतु प्रारंभिक इंजीनियरिंग एवं यातायात रिपोर्ट (68.76 करोड का प्रोजेक्ट ) रेलवे बोर्ड को प्रस्तुत किया गया था। 
जुलाई-अगस्त 2001 के सत्र में छत्तीसगढ़ राज्य की विधानसभा द्वारा 3 अगस्त 2001 को तत्कालीन विधायक अजय चंद्राकर द्वारा प्रस्तुत रायपुर-धमतरी एवं रायपुर-नयापारा राजिम की छोटी रेल लाइन को बड़े रेल लाइन में परिवर्तित करते हुए रायपुर से जगदलपुर को जोड़ने हेतु अशासकीय संकल्प सर्वसम्मति से स्वीकृत किया गया था।
मुख्य सचिव, छत्तीसगढ़ शासन द्वारा एक बार फिर अगस्त 2007 में रायपुर धमतरी नैरो गेज रेलवे लाइन को बड़ी लाइन में परिवर्तित करने के लिए अनुरोध किया गया।


RAJIM RALWAY STATION 

तेलीबांधा रायपुर से धमतरी तक छोटी लाइन को बड़ी लाइन में बदलने के लिए छत्तीसगढ़ राज्य शासन ने 31 मार्च 2008 को अध्यक्ष रेलवे बोर्ड नई दिल्ली को प्रस्ताव भेज दिया था। इसके अलावा महाप्रबंधक दपूमरे बिलासपुर एवं मंडल प्रबंधक दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे रायपुर को भी आवश्यक कार्रवाई हेतु प्रेषित कर दिया गया था। 
उप महाप्रबंधक (सामान्य), दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे बिलासपुर द्वारा 16 मई 2008  को सूचित किया गया कि रायपुर धमतरी एवं अभनपुर राजिम तक चलने वाली छोटी रेल लाइन को ब्राडगेज लाइन में परिवर्तन करने हेतु सर्वेक्षण किया गया है। इस नई रेल लाइन से संबंधी सर्वेक्षण रिपोर्ट को 8 दिसंबर 2007 को रेलवे बोर्ड को प्रेषित किया गया है।



रायपुर धमतरी रेल मार्ग पर चूंकि इस मार्ग पर कोई बड़ा पुल नहीं है। सारा इलाका समतल और मैदानी है इसलिए आमान परिवर्तन में कहीं कोई परेशानी नहीं है।

पर रेलवे ने इस मार्ग को बड़ी लाइन में बदलने की परियोजना पर काम शुरू नहीं किया है। रायपुर शहर से 25 किलोमीटर आगे नया रायपुर शहर बसाया जा रहा है जहां छत्तीसगढ़ की राजधानी बनाई गई है। नया रायपुर नैरोगेज रेल मार्ग के
 केंद्री रेलवे स्टेशन के करीब है। अब नया रायपुर को रायपुर जंक्शन से ब्राडगेज मार्ग से जोड़ने की तैयारी है। 
 थम गया रायपुर से केंद्री तक का सफर
राजिम और धमतरी के लिए चलने वाली छोटी रेललाइन (नैरो गेज) का 117 साल का रायपुर से सफर 1 मई 2017 से थम गया। 30 अप्रैल को आखिरी बार तेलीबांधा स्टेशन से रेलगाड़ी का संचालन हुआ। इसके बाद एक मई से रोज केंद्री स्टेशन से ही ट्रेनों का संचालन हो रहा है। दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के बिलासपुर मुख्यालय से इसका नोटिफिकेशन जारी कर दिया गया है। केन्द्री में शेड बनकर तैयार हो गया है।

दरअसल रायपुर से केंद्री तक का नैरो गेज रेल मार्ग छत्तीसगढ़ सरकार ने रेलवे से खरीद लिया है। इस मार्ग पर रायपुर और नया रायपुर को जोड़ने वाला एक्सप्रेस वे बनाया जा रहा है। हालांकि रायपुर और केंद्री के बीच ऐसी सड़क न बनाकर इसी मार्ग पर रैपिड रेल या मेट्रो नेटवर्क स्थापित किया जा सकता था। वह ज्यादा इको फ्रेंडली साबित होता। पर विकास की अंधी दौड़ कई तरह की शहादत लेकर भी आती है। 
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( RAIPUR RAJIM DHAMTARI NARROW GAUGE  RAIL- 4 , KENDRI )

Monday, January 26, 2015

रायपुर राजिम - बंगाल-नागपुर रेलवे की पहली नैरो गेज रेल ((03))

रायपुर धमतरी खंड बंगाल नागपुर रेलवे की ओर से संचालित पहली नैरो गेज रेलवे लाइन थी। 1887 में बंगाल नागपुर रेलवे की स्थापना हुई तभी इस क्षेत्र में रेलवे लाइन बिछाने की योजना बनी। रायपुर राजिम धमतरी खंड के लिए ढाई फीट चौड़ाई वाली नैरोगेज रेलवे तकनीक का चयन किया गया।

1901 में रायपुर से धमतरी के बीच 45.7 मील और अभनपुर से राजिम 10.50 मील की नैरोगेज रेलवे लाइन आम जनता के लिए खोला गया। 14 अप्रैल 1952 को रायपुर धमतरी रेल खंड पूर्व रेलवे के अधीन आ गया। इससे पूर्व एक अक्तूबर 1944 में ही बंगाल नागपुर रेलवे का प्रबंधन भारतीय रेलवे के अधीन हो चुका था। सरकार ने अपने हाथों में ले लिया। इस तरह से ये रेल मार्ग भारतीय रेलवे के प्रबंधन में आ गया।



उस समय 66 लाख रुपए में बनी थी पूरी लाइन 
रायपुर-धमतरी नैरोगेज लाइन बनाने की योजना उन्नीसवीं सदी के आखिरी दौर में बनी। स्थानीय परिवहन की जरूरतों को देखते हुए बेंगाल नागपुर रेलवे ने 17 अप्रैल 1886 को रायपुर-राजिम-धमतरी रेल खण्ड पर स्टीम ट्राम वे निर्माण की स्वीकृति दी थी। सन 1891-92 में रायपुर से धमतरी के बीच 44 मील लाइन के लिए सर्वे शुरू हुआ। करीब पांच साल बाद बेंगाल-नागपुर रेलवे के पहले नैरागेज के लिए अक्टूबर 1896 में पटरियां बिछाने का काम शुरू हुआ। तब इस प्रोजेक्ट की लागत 65 हजार स्टर्लिंग पाउंड ( करीब 66 लाख रुपये लागात आई थी)
सितंबर 1900 में पहला खंड चालू हुआ - रायपुर से कुरुद तक के 49 किलोमीटर के इस लाइन के पहले खंड को 10 सितंबर 1900 को आवाजाही के लिए खोला गया। वहीं कुरुद से धमतरी के 14 मील के खंड को 17 दिसंबर 1900 को आवाजाही के लिए खोल दिया गया। वहीं अभनपुर जंक्शन से राजिम के 16 किलोमीटर के खंड को 15 अक्तूबर 1900 को आवाजाही के लिए खोला गया। बाद इस खंड का राजिम से राजिम टाउन तक एक मील का और विस्तार दिया गया। इस विस्तार को 13 मई 1906 को आम जनता के लिए खोला गया।



गुजराती ठेकेदारों ने बनवाई लाइन - रायपुर धमतरी रेल खंड के निर्माण का ठेका गुजराती ठेकेदार राजा रुद्रा ने लिया था। दिलचस्प बात ये है कि देश भर में रेल लाइनों के बिछाने का ज्यादातर काम गुजरात के ठेकेदारों ने किया है। इसमें भी कच्छ के गुर्जर क्षत्रिय बिरादरी के ठेकेदारों की खास भूमिका रही है। इस बिरादरी से रेलवे के ठेकेदार बड़ी संख्या में हुए, जिन्होंने देश भर में रेल लाइनें बिछाने के लिए ठेका लिया।

गुजरात के गुर्जर क्षत्रिय ठेकेदारों ने 1850 से ही देश के अलग अलग हिस्सों में रेल लाइनें बिछाने के काम में हिस्सेदारी की। राजा रुद्रा ने 1898 में रायपुर धमतरी रेलवे लाइन बिछाने का काम शुरू किया। रिकार्ड दो सालों में इस लाइन पर काम चालू कर दिया गया। ब्रिटिश राज में हम तमाम रेल लाइनों के बिछाए जाने की गति को देखते हैं तो लगता है कि तब काम पूरा करने की गति बहुत तेज थी।

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( RAIPUR RAJIM DHAMTARI NARROW GAUGE  RAIL-3 )


Sunday, January 25, 2015

तेलीबांधा से धमतरी और राजिम का सफर ((02))


मैदानी इलाकों की रायपुर राजिम नैरो गेज ट्रेन का सफर बड़ा रोमांचक है। तेलीबंधा के बाद माना हाल्ट, भाटगांव, केंद्री और इसके बाद अभनपुर जंक्शन रेलवे स्टेशन आते हैं। अभनपुर जंक्शन से राजिम के लिए बाईं तरफ दूसरी लाइन चली जाती है। अभनपुर में हर ट्रेन कम से कम 10 मिनट रुकती है।

अभनपुर से राजिम के मार्ग पर मानिक चौरी हाल्ट के बाद राजिम आखिरी रेलवे स्टेशन आ जाता है। ये रेलमार्ग बिल्कुल समतल इलाके से गुजरता है। दोनों तरफ धान के खेत लहलहाते नजर आते हैं।
अभनपुर से आगे धमतरी लाइन पर चटौद, सिरी, कुरुद, सरसोंपुरी, सांकरा के बाद धमतरी रेलवे स्टेशन आता है। तेलीबंधा से धमतरी के लिए 68 किलोमीटर की दूरी का पैसेंजर किराया महज 20 रुपये है। जबकि इतनी दूरी बस से तय करने पर 60 रुपये तक लग जाते हैं। लिहाजा बड़ी संख्या में धमतरी मार्ग पर जाने वाले लोग ट्रेन से सफर करना पसंद करते हैं। वहीं अभनपुर, सिर्री तक का किराया सिर्फ 10 रुपये है। 2014 में इस रेल मार्ग पर सफर के दौरान मैंने देखा कि इस मार्ग पर चलने वाली सभी ट्रेनें पैसेंजर हैं। इनमें सारे डिब्बे द्वितीय श्रेणी के हैं। कोई आरक्षित डिब्बा नहीं है।




तेलीबंधा धमतरी नैरोगेज का लोको
इस मार्ग पर सवारी गाडियों को खिंचने के लिए जेडडीएम सीरीज के पांच लोको (इंजन) मौजूद हैं। मैंने तेलीबंधा से अभनपुर तक जिस पैसेंजर ट्रेन में सफर किया उस ट्रेन को जेडडीएम4ए 232 लोको खींच रहा था। तेलीबंधा में इंजन के रखरखाव का कोई इंतजाम नहीं है। अभी भी इंजन को मरम्मत और मेनटेंनेंस के लिए रायपुर जंक्शन ही लाना पड़ता है। रायपुर जंक्शन से एक किलोमीटर आगे नैरो गेज का यार्ड बना है। सिग्नल के लिए मैनुअल सिस्टम चलाया जा रहा है। पटरियों को जोड़ने के लिए लकड़ी फिश प्लेटें लोहे की हैं। पर अभी भी कई जगह लकड़ी की फिश प्लेंटे लगी हुई दिखाई देती हैं। गार्ड के हाथ में वाकी टाकी और मोबाइल फोन दिखाई दे रहे हैं।



ट्रेन के सवारी डिब्बे 1990 से 1996 के बीच के बने हुए हैं। इन डिब्बों में 44 लोगों के बैठने की जगह है। सभ डिब्बों में टायलेट भी हैं। पंखे लगे हुए हैं। ये गर्मियों में चलते भी हैं। तेलीबंधा रेलवे स्टेशन पर नैरोगेज के कोच को ट्रैक के साथ ताले लगाकर सुरक्षित रखा हुआ देखा। शायद स्थानीय लोगों की कोच के साथ छेड़छाड़ को रोकने के लिए ऐसा किया गया होगा। वास्तव में नन्ही ट्रेन के कोच इतने हल्के हैं कि कुछ लोग मिलकर उसे धक्का देकर सरका सकते हैं। तेलीबंधा स्टेशन पर बड़े बडे बोर्ड लगे हैं। स्टेशन पर साइकिल चलाना मना है। पर प्लेटफार्म तक लोग साइकिल और मोटरसाइकिल लेकर आ जाते हैं।


अभनपुर जंक्शन रेलवे स्टेशन पर उदघोषणा के लिए माइक लगे हुए दिखाई दिए। आमतौर इस ट्रेन में ज्यादातर लोग टिकट खरीदकर सफर करते दिखाई देते हैं। लोग बताते हैं कि कभी कभी इस मार्ग पर मजिस्ट्रेट चेकिंग भी हो जाती है। हमारी एक सहयात्री महिला बताती हैं कि शाम को तेलीबंधा से खुलने वाली ट्रेन में कम लोग ही टिकट खरीदते हैं, क्योंकि शाम वाली ट्रेन में चेकिंग नहीं होती है।  


तेलीबंधा से पहली ट्रेन -  58711 तेलीबंधा धमतरी पैसेंजर सुबह 7 बजे रवाना होती है। इसके बाद दोपहर में 58713 तेलीबंधा धमतरी पैसेंजर दोपहर 12.40 बजे रवाना होती है। 58715 धमतरी पैसेंजर शाम को 6.35 बजे चलती है। शाम को 4.35 बजे राजिम के लिए 58717 पैसेंजर रवाना होती है। आमतौर पर सभी ट्रेनें समय से खुलती हैं।

राजिम रेलवे स्टेशन राजिम के पहले नयापारा बाजार से एक किलोमीटर आगे है। ये रेलवे स्टेशन महानदी के बिल्कुल तट पर बना है। स्टेशन प्लेटफार्म के पास स्टेशन की 100 साल से ज्यादा पुरानी इमारत दिखाई देती है। हालांकि अब ज्यादातर स्टेशनों की नई इमारतें बन चुकी हैं। 
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( RAIPUR RAJIM DHAMTARI NARROW GAUGE  RAIL-2 )


Saturday, January 24, 2015

छत्तीसगढ़ की नैरो गेज रेल- रायपुर-राजिम धमतरी ((01))


सन 2000 में बने राज्य छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर। रायपुर से राज्य के धार्मिक स्थल राजिम को जोड़ती है एक नैरो गेज लाइन।
वास्तव में ये रेलवे लाइन रायपुर से अभनपुर जंक्शन होते हुए धमतरी तक जाती है। अभनपुर से एक लाइन महानदी के तट पर बसे शहर राजिम तक जाती है। सौ साल से ज्यादा वक्त गुजर चुका है और ये रेलवे लाइन क्षेत्र वासियों को अपनी अनवरत सेवाएं दे रही है। कभी स्टीम इंजन से चलने वाली ये नैरो गेज ट्रेन अब डीजल इंजन से चलती है।

साल 2010 के बाद से अब ये नैरो गेज लाइन रायपुर जंक्शन से न शुरू होकर छह किलोमीटर आगे तेलीबंधा नामक स्टेशन से आरंभ होती है। हालांकि रायपुर जंक्शन से तेलीबंधा के बीच पटरियों को हटाया नहीं गया है। दरअसल रायपुर शहर की बढ़ती आबादी के कारण लोगों को इस नैरोगेज ट्रेन से परेशानी होती थी। रायपुर और तेलीबंधा के बीच कई मुख्य सड़कों की क्रासिंग पड़ती थी। यहां ट्रेन के गुजरने के कारण जाम लग जाता था। नैरो गेज लाइन होने के कारण दिन भर में कुछ ही ट्रेनें इस ट्रैक से गुजरती थीं, इसलिए कई ओवर ब्रिज बनाने की योजना महंगी लगी। फिर ये फैसला हुआ कि धमतरी और राजिम जाने वाली ट्रेनों को तेलीबंधा से शुरू किया जाए। 2010 में तेलीबंधा में नए रेलवे स्टेशन का निर्माण किया गया। इसलिए धमतरी नैरो गेज लाइन का आजकल तेलीबंधा पहला स्टेशन है। पर अभी इस नैरोगेज के लोको को मरम्मत और तेल आदि लेने के लिए रायपुर जंक्शन आना पड़ता है।




रायपुर धमतरी नैरोगेज लाइन छत्तीसगढ़ के कई पीढ़ी के लोगों के लिए महबूब ट्रेन है। 1990 के बाद से कई बार इस रेलवे लाइन को उखाड़कर इसकी जगह बड़ी लाइन बिछाने की मांग स्थानीय सांसदों और राज्य सरकार ने भी की है। पर इस लाइन का गेज परिवर्तन अभी रेलवे के प्राथमिकता में नहीं है। 

सबसे दुखद खबर ये है कि 2014 के आखिरी दिनों में स्थानीय अखबारों में ये खबर आई कि रेल मंत्रालय ने रायपुर धमतरी रेल खंड पर रेलों के संचालन के बंद करने का फैसला ले लिया है। क्योंकि रेलवे के मुताबिक यात्रियों की कम संख्या के कारण इस मार्ग पर रेलों के संचालन में लगातार घाटा हो रहा है। अगर ऐसा हो गया तो रायपुर धमतरी-राजिम नैरो गेज इतिहास के पन्नों में समा जाएगी। 

आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपैय्या - रायपुर-धमतरी सहित दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे जोन की सात रेल लाइनें रेलवे के लिए आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपैय्या साबित हो रही हैं। रेलवे ने राज्य सरकारों को इसके संचालन में आने वाला खर्च साझा करने का प्रस्ताव दिया। इसके लिए राज्य सरकारें नहीं तैयार हुईं। रेलवे की सेंट्रल की पब्लिक एकाउंट्स कमेटी ने देशभर की उन लाइनों की रिपोर्ट तैयार की है, जिन पर आय से ज्यादा खर्चा हो रहा है। रेलवे बोर्ड ने इन लाइनों की सूची संबंधित जोन को भेजी है। दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे की ऐसी 7 लाइनें हैं। इस मामले में पहल नहीं की गई तो 88.46 किलोमीटर लंबी रेल लाइन पर रेलवे की सिटी हमेशा के लिए बंद हो सकती है। रेलवे का तर्क है कि इस मार्ग पर ट्रेन दौड़ाने के लिए रेलवे को साल में 18.38 करोड़ रुपये खर्च करना पड़ रहा है, जबकि आमदनी महज चार करोड़ रुपये प्रति वर्ष ही है।



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रायपुर के तेलीबंधा से चलने को तैयार रेलवे लोकोमोटिव, जेडडीएम 4ए- 232

रायपुर राजिम रेल मार्ग -
1 तेलीबंधा (TBD)  00 किमी
2 माना (MANA)   6 किमी
3 भाटगांव (BOV) 10 किमी
4 केंद्री (KDRI)  17 किमी
5 अभनपुर (AVP)  23 किमी
6 मानिकचौरी  (MCF) 29 किमी
7 राजिम (RIM)  39 किमी

( RAIPUR RAJIM DHAMTARI NARROW GAUGE  RAIL-1)

Thursday, January 22, 2015

पूरे छत्तीसगढ़ की झांकी यहां देखें - रायपुर का घासीदास संग्रहालय

अगर आप पूरे हरे भरे छत्तीसगढ़ को नहीं देख सके हैं तो उसकी एक झांकी रायपुर के महंथ घासीदास संग्रहालय में देख सकते हैं। ये राज्य के बेहतरीन संग्रहालयों में से एक है। महंत घासीदास संग्रहालय रायपुर का एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल हो सकता है। यह संग्रहालय 1875 में राजा महंत घासीदास ने बनवाया था।

इसका नामकरण नांदगांव रियासत के राजा महंत घासीदास के नाम से किया गया है। यह सन 1953 से संस्कृति एवं पुरातत्व के संचालनालय में स्थापित है । 21 मार्च 1953 को देस के प्रथम राष्ट्रपति डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद ने इसका लोकार्पण किया। संग्रहालय रायपुर नगर में जिला न्यायालय और कमिश्नर दफ्तर के बीच जीई रोड पर स्थित है। 

संग्रहालय शहर के लोकप्रिय घड़ी चौक से पांच मिनट के पैदल चलकर पहुंचा जा सकता है। हालांकि महंत घासीदास संग्रहालय दर्शकों और पर्यटकों के लिए तरसता रहता है। प्रचार कम होने के कारण कम लोग ही यहां पहुंचते हैं। यहां प्रवेश शुल्क प्रति व्यक्ति महज एक रुपया है। बावजूद इसके दर्शक बहुत कम आते हैं। अगर आंतरिक फोटोग्राफी करना चाहते हैं तो 5 रुपये शुल्क है। मैंने खुशी से फोटोग्राफी के लिए 5 रुपये का टिकट लिया। संग्रहालय के बाहर बड़ा ही खूबसूरत उद्यान है। उद्यान में बैठने के लिए बेंच है। परिसर में एक मुक्ताकाश थियेटर भी है। 

संग्रहालय की कलाकृतियों को तीन दर्शक दीर्घाओं में विभक्त किया गया है। पुरातत्व दीर्घा में मृण्मूर्तियाँ, मिट्टी के बरतन, पत्थर और मिट्टी की मुद्राएं हैं। 

यहां सिरपुर और पसेवा की खुदाई में मिली 8वीं सदी की ईंटें व लगभग 2300 ईस्वी  पूर्व काल के मिट्टी के बरतन देखे जा सकते हैं। सिरपुर की खुदाई में मिट्टी की कई मुद्राएं मिली हैं, जो 7वीं-8वी सदी की हैं। यहां तरह-तरह के उपकरण और औजार भी हैं, जो 8वीं से लेकर 12वीं सदी तक के हैं। प्रतिमाओ में कारीतलाई जबलपुर से संबंधित विभिन्न देवी-देवताओं एवं नायक-नायिकाओं की कलाकृतिओं को प्रदर्शित किया गया है।

 सोमवंशी और कलचुरि काल की कलाकृतियां-  ये कलाकृतियाँ सोमवंशियों एवं कलचुरियों के काल की हैं। संग्रहालय की मानव शास्त्रीय दीर्घा में माड़िया, गोंड़, कोरकू, उरांव और बंजारा जनजातियों के उपयोग में आने वाले कपड़े, गहने, बरतन, शस्त्र, वाद्य एवं अन्य दैनिक उपयोग की वस्तुएं संग्रहित हैं।



उमा महेश्वर की अदभुत प्रतिमा – यहां उमा महेश्वर की तीन प्रतिमाएं देखी जा सकती हैं। शिव और पार्वती के एक साथ होने की ऐसी भाव भंगिमा वाली प्रतिमाएं बहुत कम ही देखने को मिलती हैं। दसवीं सदी में जबलपुर से प्राप्त उमा  पर यहां एक नहीं तीन उमा महेश्वर की प्रतिमाएं है। ये प्रतिमाएं रति मुद्रा में हैं।  कहा जाता है कि उमा महेश्वर का व्रत करने से इच्छित वस्तुएं प्राप्त होती हैं। उमा महेश्वर स्तोत्र - 
नमः शिवाभ्यां नवयौवनाभ्यां परस्पराश्लिष्टवपुर्धराभ्याम् । 
नगॆन्द्रकन्यावृषकॆतनाभ्यां नमॊ नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥ 1

घासीदास संग्रहालय में प्रदर्शित आदिवासी समुदाय के लोगों के वाद्य यंत्र । - फोटो - विद्युत
घासीदास संग्रहालय में किरारी से प्राप्त काष्ट स्तंभ लेख भी विलक्षण है। आमतौर पर पत्थरों पर स्तंभ लेख देखने को मिलते हैं। पर लकड़ी पर बहुत कम देखने को में आता है। संग्रहालय में देवनागरी लिपि के विकास को भी सहज ढंग से दिखाया गया है। संग्रहालय में कार्यरत लोगों का व्यवहार काफी अच्छा है। वे दर्शकों को संग्रह के बारे में बताने में काफी मदद करते हैं।  
(GURU GHASIDAS MUSEUM, RAIPUR ) 
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Wednesday, January 21, 2015

रायपुर में टैक्सी में दौड़ने लगी नैनो

टाटा की नन्ही कार नैनो अब टैक्सी में दौड़ने लगी है।  इसकी शुरूआत हो रही है छतीसगढ़ की राजधानी रायपुर से। रायपुर की रेडियो टैक्सी सेवा में नैनो दौड़ने लगी है। इसके लिए कुछ नैनो टैक्सियां तो रायपुर की सड़कों पर प्रयोग के तौर पर उतर चुकी हैं वहीं 40 टैक्सियां नैनो प्लांट की ओर से बनकर रायपुर में उतर रही हैं। ये सभी नैनो टैक्सियां पेट्रोल चलित हैं। रायपुर शहर का गुरूकृपा मोटर्स इन्हे टैक्सी सेवा में संचालित कर रहा है। इसके लिए राज्य सरकार से अनुमति ले ली गई है।

पूरे देश में रायपुर ऐसा पहला शहर है जहां पर नैनो कार टैक्सी सेवा में दौड़ती हुई नजर आएगी। इसका शुरुआती किराया 50 रुपये है जो एक किलोमीटर के लिए है। इसके बाद 5 किलोमीटर के लिए 98 रुपये वहीं 10 किलोमीटर के लिए 158 रुपये किराया तय किया गया है। नैनो टैक्सी की ये खास बात है कि इसके अंदर सीसीटीवी कैमरा लगा है। यात्रियों की बातचीत की वीडियो और आडियो रिकार्डिंग होगी। साथ ही टैक्सी में पैनिक बटन भी लगाया गया है। इसे महिलाओं के लिए भी पूरी तरह सुरक्षित बनाया गया है। रेडियो टैक्सी में जीपीएस सिस्टम लगा हुआ है। हर टैक्सी की लोकेशन कंट्रोल रूम को लगातार दिखाई देती रहती है। टैक्सी बुलाने के लिए आपको काल सेंटर के नंबर पर फोन घुमाना होगा। सभी नैनो टैक्सियां वातानुकूलित हैं। इनका किराया इतना कम रखा गया है कि यह आटो रिक्शा बुक कराने के बराबर सस्ती हों। हालांकि दिल्ली की सस्ती कैब सेवा से तुलना करें तो इसका प्रारंभिक किराया ज्यादा है। टैक्सी फार श्योर 49 रुपये किराया शुरुआती 4 किलोमीटर के लिए वसूल करती है।

 
रायपुर की नैनो टैक्सी के साथ ड्राइवरों को रोजगार देने और स्वावलंबी बनाने की भी योजना है। कंपनी के साथ अनुबंध पर लगातार 3 साल टैक्सी चलाने के बाद नैनो कार ड्राइवर की अपनी हो जाएगा। इस तीन साल के दौरान एक निश्चित रकम ड्राइवर को हर माह कंपनी को अदा करना है। हालांकि श्रीलंका में साल 2011 से ही नैनो कार टैक्सी के रूप में संचालित की जा रही है। वहां मध्यम वर्ग के लोगों में नैनो टैक्सी काफी लोकप्रिय है।

निर्भया टैक्सी सेवा -  रायपुर नगर निगम के सामने लगे आटो एक्सपो में 13 जनवरी को नैनो टैक्सियां मुझे डिस्प्ले में लगीं दिखाई दे गईं। बाद में समाचार पत्रों से मालूम हुआ कि 26 जनवरी को रायपुर शहर में निर्भया टैक्सी सेवा के नाम से इनका संचालन शुरू हो गया है।  ( PS- मार्च 2009 में पेश देश की सबसे सस्ती कार नैनो का उत्पादन और बिक्री 2019 में पूरी तरह बंद हो गया। बाद के सालों में इस कार को लोगों का अच्छा रेसपांस नहीं मिल रहा था। ) 
- विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com  (RAIPUR, CG ) 






Tuesday, January 20, 2015

रायपुर में स्वामी विवेकानंद ने गुजारे थे डेढ़ साल

विवेकानंद सरोवर शहर के बीचो-बीच स्थित है। बूढापारा तालाब का नया नाम विवेकानंद सरोवर है। कहा जाता है कि यह झील इस शहर के जितनी ही पुरानी है। इसे बूढा झील भी कहा जाता है जिसका मतलब है पुरानी झील। यह रायपुर की सबसे बड़ी झील भी है। तालाब को 600 वर्ष पहले कल्चुरी वंश के राजाओं द्वारा खुदवाया गया था। इतिहासकारों के मुताबिक यह पहले 150 एकड़ में था जो अब मात्र लगभग 60 एकड़ में ही सीमित हो गया है।

इस झील में स्वामी विवेकानंद की 37 फीट ऊँची प्रतिमा बनी हुई है जिसका नाम मूर्तियों का सबसे बड़ा नमूना होने के कारण लिम्का बुक में दर्ज किया गया है। इसका निर्माण 2004 से 2006 के बीच हुआ। इसके वास्तुकार हैं पद्मश्री जे एस नेल्सन।

झील में बोटिंग का मजा
यहां तालाब में आप नौका विहार का आनंद भी ले सकते हैं। नौका विहार की दरें भी काफी सस्ती हैं। महज 40 रुपये में आधे घंटे। एक बोट पर सवार हो सकते हैं चार लोग। शाम के समय तालाब में उभरती दूधिया रोशनी यहां की सुंदरता को बढ़ा देती है। वैसे रायपुर शहर में और भी कई तालाब हैं। शहर में तेलीबंधा तालाब, राजा तालाब, पुराना तालाब, टीकापारा तालाब, महाराजाबंद तालाब हैं। पर इन सबका दायरा अब सिकुड़ता जा रहा है।



विवेकानंद ने गुजारे थे यहां डेढ साल - रायपुर इस बात का गौरव अनुभव करता है कि स्वामी विवेकानंद ने यहां डेढ़ वर्ष से अधिक का समय गुजारे।  हालांकि तब वे स्वामी विवेकानंद नहीं थे बल्कि किशोरवय के नरेन्द्रनाथ दत्त थे जो अपने परिवार के साथ रायपुर आये थे. यहां रहते हुये उनके भीतर जो संस्कार उत्पन्न हुये और उनके ज्ञान का लोहा माना गया जिसने बाद में उन्हें स्वामी विवेकानंद के रूप में संसार में प्रतिष्ठापित किया। 



विवेकानंद के कुछ जीवनीकारों ने लिखा है कि नरेन्द्र एवं उनके घर के लोग नागपुर से बैलगाड़ी द्वारा रायपुर गये, पर नरेन्द्र को इस यात्रा में जो एक अलौकिक अनुभव हुआ। तब रायपुर में अच्छा विद्यालय नहीं था। इसलिए नरेन्द्रनाथ पिता से ही पढ़ा करते थे।डेढ़ वर्ष रायपुर में रहकर विश्वनाथ सपरिवार कलकत्ता लौट आये। तब तक नरेन्द्र का शरीर स्वस्थ, सबल और हृष्ट-पुष्ट हो गया और मन उन्नत। यानी नरेंद्र के विवेकानंद बनने में रायपुर की बड़ी भूमिका है। स्वामी विवेकानंद की याद में रायपुर के एयरपोर्ट का नाम स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट रखा गया है।


 - vidyutp@gmail.com ( RAIPUR, SWAMI VIVEKANAND ) 


Monday, January 19, 2015

घड़ी चौक से धड़कता है रायपुर का दिल

चांपा से चलकर रायपुर पहुंच गया हूं। मतलब छत्तीसगढ़ की राजधानी। रायपुर रेलवे स्टेशन की बाह्य नजारा काफी खूबसूरत दिखाई देता है। स्टील के फ्रेम से सजी स्टेशन की इमारत इस बात का संदेश देती है कि राज्य में बड़े स्टील प्लांट हैं। स्टेशन परिसर से शहर के कोने कोने में जाने के लिए सिटी बसें और आटो रिक्शा मिलते हैं। स्टेशन के बाहर देर रात तक चहल पहल रहती है। वहीं स्टेशन के प्लेट फार्म नंबर के एक के आसपास कई अच्छे फूट ज्वाएंट्स भी बन गए हैं। पर शहर का दिल धड़कता है घड़ी चौक से। रायपुर शहर के बीचों बीच स्थित है नगर घड़ी चौक। शहर के हर इलाके से घड़ी चौक के लिए आटो रिक्शा मिलते हैं। इसी तरह घड़ी चौक से शहर के दूसरे सभी कोनों के लिए वाहन मिल जाते हैं।


वैसे तो घड़ी चौक का असली नाम गुरु घासी दास चौक है पर यहां लोग इसे घड़ी चौक ही कहने लगे हैं। घड़ी चौक चौक पर कोने में विशाल घड़ी लगी है जिसके चारों तरफ समय देखा जा सकता है। इस घडी की खास बात ये है कि हर घंटे पर जो ध्वनि सुनाई देती है उसमें छत्तीसगढ़ी संस्कृति की खूशबु महसूस की जा सकती है। घंटे के साथ लोकसंगीत की धुन सुनाई दे जाती है। ये है इस घड़ी की खास बात। रायपुर शहर के लोगों के लिए घड़ी चौक उनके जीवन में रचा बसा है पर बाहर से आए लोगों के लिए ये कौतूहल की बात हो सकती है। घड़ी चौक से थोड़ी दूरी पर ही राज्यपाल का निवास है।

रायपुर शहर के पुराने मुहल्लों के नाम में पारा लगा हुआ है। बंगाल के शहरों  पाड़ा लगता रहता है। रायपुर के पुराने मुहल्लों में है रामसागर पारा जहां लोकप्रिय समाचार पत्र देशबंधु का दफ्तर है। इसके अलावा नर्मदा पारा,  लोधी पारा , नवा पारा जैसे मुहल्ले शहर में हैं।

अब रायपुर शहर से बाहर राजिम मार्ग पर नई राजधानी बसाई गई है। रायपुर से 25 किलोमीटर आगे बस रही नई राजधानी का का नाम नया रायपुर दिया गया है। इसे चंडीगढ़ और गांधीनगर की तरह प्लांड सिटी के तौर पर बसाया जा रहा है। शहर को जोड़ने के लिए अच्छी सड़कें और रेलवे लाइन भी बिछाई जाने वाली है।


पांच रुपये में दाल भात - रेलवे स्टेशन से एक किलोमीटर की दूरी पर है रायपुर की सेंट्रल जेल। जेल के मुख्य द्वार के पास माता का मंदिर है। वहीं दूसरी तरफ सरकार की ओर चलाया जाने वाला एक फूड स्टाल है। दाल भात का स्टाल। यहां पांच रुपये में दाल भात मिलती है। यह सबके लिए है। छत्तीसगढ़ सरकार ने 2005 में दाल भात योजना आरंभ की थी। छत्तीसगढ़ की राज्य सरकार की दो रुपये किलो की दर से बीपीएल परिवार को चावल देने की योजना के कारण राज्य के दाल भात सेंटर ज्यादा लोकप्रिय नहीं हो सके।

मेरे इस लेख को पढ़ कर साल 2017 में इस दाल भात सेंटर के संचालक मोहन चोपड़ा लिखते हैं - यह दाल-भात सेंटर छत्तीसगढ का सबसे अच्छा चलने वाला सेंटर है।पूरी तरह से सुसज्जित,और स्वच्छ है। इसकी दीवारों में सेरामिक टाइल्स, फर्श में विट्री फाइड टाइल्स और ग्रेनाइट लगे हुए हैं। खाने के लिए टेबल कुर्सी की व्यवस्था है।पंखे कूलर और वाटर कूलर भी लगे हुए हैं। पांच रुपये में भरपेट दाल भात मिलता है।रूचि के अनुसार रोटी सब्जी अचार पापड़ भी कम दाम में उपलब्ध है। रोज लगभग 800 से 1000 आदमी खाना खाते हैं।

जेल परिसर में होने से कैदियों के और सामने अंबेडकर आल होने से मरीजों के परिजन इसका लाभ उठाते हैं। इसके अतिरिक्त राहगीर, वाहन चालक, मजदूर वर्ग भी यहां आते हैं। व्यवस्था से प्रभावित माध्यम आमदानी के लोग भी बड़ी संख्या में आते हैं। मैं मोहन चोपड़ा इसका संचालन विगत 12 वर्षों से कर रहा हूं। आप अवलोकनार्थ आमत्रित हैं। आपका धन्यवाद, मोहन चोपड़ा जी। 
रायपुर रेलवे स्टेशन पर सफाई। 
मुझे तमिलनाडु में चलाए जाने वाले अम्मा किचेन की याद आ गई जहां सबके लिए इडली सांभर और चावल रियायती मूल्य पर उपलब्ध कराया जाता है। तो छत्तीसगढ़ में चाउर वाले बाबा रमन सिंह की योजना है पांच रुपये में दाल भात। हालांकि ये भरपेट नहीं है, फिर भी गरीबों को राहत तो देती है। हालांकि राज्य के कई इलाके में शुरू किए गए अन्नपूर्णा दाल भात सेंटर बंद हो चुके हैं। कई जगह योजना लोकप्रिय नहीं हो सकी। वैसे झारखंड में अर्जुन मुंडा की सरकार ने भी 5 रुपये में दाल भात की योजना शुरू की थी। पर हेमंत सोरन की सरकार ने ऐसे सेंटरों को चावल उपलब्ध कराना बंद कर दिया। लिहाजा वहां भी योजना दम तोड़ रही है। 
-    -  विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( (RAIPUR, CG, GHADI CHAUK, DAL BHAT CENTER )