Saturday, January 31, 2015

पत्रकार माधवराव सप्रे का शहर पेंड्रा

एक बार फिर पेंड्रा रोड पर था। बिलासपुर पैसेंजर का इंतजार। सोचा थोड़ा पेंड्रा के बाजार में टहल आता हूं। एक मिठाई की दुकान नजर आती है। लिखा है- बेहतरीन गुणवत्ता वाली चीजें कभी सस्ते में नहीं मिल सकतीं। बिल्कुल सही बात है। गुणवत्ता हमेशा कीमत चुकाने से ही मिलती है।

पेंड्रा छोटा सा लेकिन ऐतिहासिक बाजार है। लेकिन पत्रकारिता में इसका अवदान बहुत बड़ा है। महान साहित्यकार और पत्रकार माधवराव सप्रे ने सन 1900 में जब समूचे  छत्तीसगढ़ एक भी प्रिंटिंग प्रेस नही था तब उन्होंने बिलासपुर जिले के एक छोटे से कस्बे पेंड्रा से छत्तीसगढ़ मित्रनामक मासिक पत्रिका निकाली यह पत्रिका  तीन साल तक सफलतापूर्वक चली। सप्रे का जन्म दामोह जिले में हुआ था आज उनके नाम पर भोपाल में विशाल संग्रहालय  है।  माधवराव सप्रे संग्रहालय।  http://www.sapresangrahalaya.com/index.htm उस महान आत्मा को नमन करते हुए फिर स्टेशन वापस आ जाता हूं। हमारी ट्रेन का समय हो गया है। पेंड्रा रोड से ट्रेन चलने के बाद ट्रेन खोडरी, भांवर टोंक, तेंगानमाडा,  बेलगहना, सालका रोड, करगीरोड, कलमीटार, घुटकू और उसलपुर में रूकती है। उसलपुर तो बिलासपुर शहर का बाहरी इलाका है। पेंड्रा के बाद खोडरी के आसपास वन क्षेत्र आता है। बताते हैं कि यहां सड़कों पर भालू आदि जंगलों से निकल कर आ जाते हैं।

जारी है लकड़ी की तस्करी


पेंड्रा के आसपास के जंगलों से लकड़ी की तस्करी का खेल सालों भर बदस्तूर चलता है। गरीब लोग जंगल से लकड़ियां तोड़कर लाते हैं। लकड़ियों के गट्ठर बनाकर शहर के होटलों को ढाबों के बेचते हैं। ये उनकी रोजी रोटी का साधन है। पर है तो वन विभाग के कानून के मुताबिक वनोपज की तस्करी। इसलिए वन विभाग ऐसे लोगों को गाहे बगाहे पकड़ता रहता है। मैंने अमरकंटक में देखा वहां सारे होटल और चाय की दुकानों की भट्ठी लकड़ी से ही चलती है। आसपास के जंगलों से लकड़ियां सस्ती मिल जाती हैं। अमरकंटक के होटल वाले लकड़ी का एक गट्ठर 50 रुपये में खरीदते हैं। बिलासपुर पैसेंजर में खोडरी और उसके बाद महिलाएं लकड़ी के गट्ठर लेकर ट्रेन में चढ़ने लगीं। पैसेंजर के दरवाजे और सभी टायलेट को अंदर बाहर लकड़ियों के गट्ठर से भर दिया। एक महिला ने बताया कि वह जंगल में दूसरे लोगों से लकड़ियां खरीदती है। एक गट्ठर 35 रुपये में। बिलासपुर शहर में होटलों को बेच आती हैं 70 रुपये में। पर हर गट्ठर पर 35 रुपये कमाई में काफी मेहनत है।

जंगल में जो लोग लकड़ियां तोड़ते हैं उन्हें जंगली जानवरों भालू आदि से खतरा रहता है। वहीं ट्रेन में लकड़ी की तस्करी में हमेशा सावधानी बरतनी पड़ती है। एक महिला ट्रेन में सारी लकड़ियां चढ़ा लेने के बाद घूम घूम कर मूंगफली बेचने लगी। यानी एक साथ दो दो कारोबार। पापी पेट के लिए सब कुछ करना पड़ता है। बताने लगी जब वन विभाग वाले लकड़ी पकड़ लेते हैं जो जुर्माना तो नहीं होता पर लकड़ी जब्त हो जाती है। महीने में तीन चार बार ऐसा हो ही जाता है। बिलासपुर आने पहले ये महिलाएं लकड़ियों को ताबडतोड़ रेल से सड़कों पर फेंकने लगीं। वहां उनके साथी इन बंडलों को उठाने से लिए पहले से ही मौजूद रहते हैं। ये रोज का कारोबार है। पर इस तस्करी के कारोबार में में मेहनत भी है और खतरा भी। पर पेट की आग बुझाने के लिए लकड़ी की आग तो जलानी ही पड़ती है।

---- विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com ( MADHAV RAO SAPRE, PENDRA ROAD, WOOD CUTTING FROM FOREST ) 



Friday, January 30, 2015

चांपा की कचौड़ी चाट जलेबी के साथ

चांपा छतीसगढ़ के जांजगीर जिले का शहर। मुंबई-कोलकाता मार्ग का प्रमुख रेलवे स्टेशन है। रेलवे स्टेशन के सामने वाली कालोनी में रहते हैं मेरे पुराने दोस्त प्रो. भूपेंद्र पटेल।

 सुबह कालोनी के प्रवेश द्वार पर नास्ते में कचौड़ी खाई। 10 रुपये की कचौडी में सब्जी, दही चटनी डालकर। ये चाट जैसी हो जाती है। इस कचौडी को बनाने वाले बिहार के रहने वाले हैं। पिछले 40 सालों से यहां आकर दुकान चला रहा है। बताते हैं कि उनकी कचौड़ी की इतनी मांग है पूरी कालोनी के लोग घर में पार्टी करने के लिए हमारी दुकान से ही कचौड़ी मंगाते हैं। वाकई स्वाद का जवाब नहीं। दस रुपये मे कचौडी की प्लेट। चाहो तो साथ में जलेबी या चाय भी ले लो।



चांपा में कई साल बाद मिलना हुआ प्रो अश्वनी केशरवानी से। वैसे तो वे कालेज में विज्ञान के शिक्षक हैं पर उनकी रूचि धर्म संस्कृति और छतीसगढ़ के इतिहास में ज्यादा है। उनसे 1992 में दिल्ली में राष्ट्रीय युवा योजना के आर्गनाइजर्स मीट में मुलाकात हुई थी। प्रो केसरवानी छत्तीसगढ़ के इतिहास और लोक संस्कृति पर कई पुस्तकें लिख चुके हैं। उनके घर कई दशक बाद की मुलाकात अविस्मरणीय रहेगी। मैं 1992 में बीए में पढ़ रहा था। अब मैं 40 पार कर रहा हूं तो वे 60 के करीब। केशरवानी जी ने छत्तीसगढ़ पर लिखी अपनी तीन किताबें मुझे भेंट की। 

सुबह मैंने गेवरा रोड गोंदिया जनशताब्दी एक्सप्रेस पकड़ी रायपुर के लिए। जनशताब्दी में करेंट टिकट खरीदने के बाद भी बैठने की जगह बड़ी ही सुगमता से मिल गई। ट्रेन में मेरी बगल वाली सीट पर बैठे थे प्रो रामायण पात्रे जो कोरबा के मिनी माता महाविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर हैं। उनसे छत्तीसगढ़ी भाषा पर वार्ता करते हुए कब रायपुर आ गया पता ही नहीं चला।


गोल्डेन रेस्टोरेंट की 50 रुपये की थाली
रायपुर रेलवे स्टेशन चमचमाता हुआ साफ सुथरा है। स्टेशन के ठीक सामने रहने और खाने पीने के लिए कई होटल हैं जो देर रात का खुले रहते हैं। कई होटलों का मीनू देखने के बाद मैंने गोल्डेन रेस्टोरेंट की थाली खाना पसंद किया। 50 रुपये की थाली में 4 चपाती, दो सब्जियां, दाल और सलाद। सब्जियां भी थोडी नहीं भरपूर मात्रा में। 


भाई 50 रुपये में शानदार थाली है। वेटरों की सर्विस बहुत तेज है। रेस्टोरेंट में महिलाएं काम करती हैं। वह भी रात 10 बजे तक। वर्दी में तैनात महिलाएं ग्राहकों का का पूरा ख्याल रखती हैं। रेलवे स्टेशन के सामने के होटलों में हर तरह का स्वाद उपलब्ध है। उत्तर भारतीय थाली, दक्षिण का मसाला डोसा, इडली सांभर और बिरयानी भी। ट्रेन पकड़ने वालों के लिए फटाफट पैंकिंग का भी इंतजाम है।



रेलगाड़ी का कोच नहीं जनाब रेस्टोरेंट
 रायपुर की सड़कों पर घूमते हुए नगर निगम के पास वाली सड़क पर शानदार चौपाटी नजर आती है। काफी कुछ इलाहाबाद के सिविल लाइंस की तरह। इस चौपाटी पर फुटपाथ पर एक रेस्टोरेंट है। बिल्कुल किसी रेलगाड़ी के कोच की तरह। पर इसके अंदर बैठकर खाने का सुंदर इंतजाम है। ये रेलवे द्वारा संचालित नहीं है पर जिसकी भी परिकल्पना हो, है काफी सुंदर।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com

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Wednesday, January 28, 2015

अमरकंटक का दिगंबर जैन मंदिर

अमरकंटक का एक और आकर्षण है भगवान आदिनाथ का जैन मंदिर। दूर से देखने में अमरकंटक का सर्वोदय जैन मंदिर काफी हद अक्षरधाम मंदिर गुजरात की तरह लगता है। चार एकड़ में फैला ये मंदिर जैन समाज का बड़ा प्रोजेक्ट है। इसके निर्माण पर 20 करोड़ से ज्यादा राशि खर्च की जा रही है। इसके डिजाइन और निर्माण में 300 कलाकार लगे हैं। मंदिर में भगवान आदिनात की 24 फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित की गई है। वे अष्टधातु के बने कमल सिंहासन पर विराजमान हैं।  इसे आचार्य श्री विद्यासागरजी ने 6 नवम्बर 2006 को विधि-विधान से स्थापति किया गया हैप्रतिमा 28 टन के कमल पुष्प पर विराजित है वो भी अष्टधातु  निर्मित है।  मंदिर के गुंबद की ऊंचाई 144 फीट है।

मंदिर अमरकंटक शहर में पहले से ही सबसे ऊंचे स्थल पर स्थित है। इसके निर्माण में गुलाबी रंग के बलुआ पत्थर का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस मंदिर को बनाने में सीमेंट और लोहे का इस्‍तेमाल नहीं किया गया है। मंदिर में स्‍थापित मूर्ति का वजन 24 टन के करीब है। 

अमरकंटक में भी है टेबल लैंड 
श्री सर्वोदय दिगंबर जैन मंदिर, अमरकंटकमध्य प्रदेश में निर्माणाधीन है।  यह भारत में बनने वाला सुंदर मंदिर दुनिया के सबसे बड़े अष्टधातु के मंदिरों में एक होगा। इस मंदिर का निर्माण विगत कई वर्षों से हो रहा है। मंदिर का सिंहद्वार 51 फीट ऊँचा 42 फीट लम्बा होगा। कहा जा रहा कि मंदिर का निर्माम कार्य 2015 तक पूरा हो जाएगा। जैन मंदिर में अतिथियों के रहने के लिए आवास का भी इंतजाम है।

एक टेबल लैंड यहां भी -  हमने इससे पहले महाबलेश्वर में विशाल टेबल लैंड देखा था। टेबल लैंड पहाड़ पर एक समतल जमीन होती है। पर मुझे सुखद आश्चर्य हुआ कि अमरकंटक में भी एक विशाल टेबल लैंड है। ये स्थल जैन मंदिर के पास ही है। ये टेबल लैंड हालांकि महाबलेश्वर की तरह आकार में बड़ा नहीं है। पर है काफी सुंदर।  स्थानीय लोग बताते हैं यहां पर हेलीकाप्टर उतारा जाता है।

तो अब हमारा अमरकंटक का सफर अब खत्म होने वाला था। अब बारी अमरकंटक से विदा होने की थी। मैंने बस स्टैंड से बस की तलाश शुरू की। बस तो नहीं मिली पर छोटे चार पहिया ( टाटा आयरिश) वाले मिल गए। बोले हम आपको पेंड्रा रोड पहुंचा देंगे। आपकी ट्रेन से पहले ही। इस गाड़ी में एक बार फिर मेकाल पर्वत श्रंखला के जंगलों के बीच से सफर आरंभ हुआ। एक तरफ पहाड़ दूसरी तरफ गहरी खाई। 

उनके इस छोटी सी बस पर आगे लिखा था अमरकंटक दर्शन तो पीछे की ओर लिखा था बड़ा ही भावनात्मक संदेश - फिर कब आओगे अमरकंटक....
पढकर जी में यही विचार आया...हम तो बार बार आएंगे अमरकंटक... देखिए कब दुबारा आना होता है इस पवित्र शहर में। 

-     --- विद्युत प्रकाश मौर्य
(AMARKANTAK, SON, JAIN TEMPLE, HILL STATION ) 



Tuesday, January 27, 2015

अमरकंटक का गुरुद्वारा - यहां का संदेश प्यारा

अमरकंटक का रिश्ता सिख धर्म से भी है। सिखों के पहले गुरू गुरुनानक देव जी अमरकंटक आए थे। पहले गुरू ने देश दुनिया में अनंत यात्राएं की थी। उन्होंने मां नर्मदा के साथ साथ भी लंबी यात्रा की थी। नर्मदा के उदगम वाले शहर में उनकी याद में एक गुरुद्वारा भी बना है। ये गुरुवादारा नर्मदा कुंड से बस स्टैंड जाने वाली सड़क पर स्थित है। अमरकंटक का गुरुद्वारा प्रसिद्ध कल्याण आश्रम के ठीक बाद स्थित है। गुरुद्वारे में श्रद्धालुओं के रहने के लिए आवास का भी इंतजाम है। हर रोज यहां गुरु का लंगर चलता है। गुरुद्वारा के ठीक सामने मध्य प्रदेश शासन ने खूबसूरत पार्क बनवा दिया है। इस पार्क में बोटिंग का भी इंतजाम है।


अमरंकटक गुरुद्वारे के सेवादार हैं सरदार एचएस गरेवाल। उनकी उम्र 82 साल है पर उत्साह नौजवानों जैसा है। वे अति आशावादी हैं। रेलवे से अवकाश प्राप्त करने के बाद खुद को गुरु घर की सेवा में लगा दिया। पर उनके विचार जाति धर्म से उपर उठकर मानवतावादी और सर्व धर्म समभाव के हैं। सिर्फ विचार नहीं वे उसे अपनी जिंदगी में जीते भी हैं।

रेलवे के गार्ड पद से रिटायर हुए गरेवाल अपने पेंशन के पूरे 15 हजार समाज को समर्पित कर देते हैं। कहते हैं- बेटे तो कमा ही रहे हैं। भला उन्हें देने की क्या जरूरत है। मेरा पैसा जरूरतमंदों के काम आना चाहिए। एक मई 1933 को लुधियाना में जन्मे गरेवाल ने पंजाब कृषि विश्वविद्यालय से पढ़ाई की। पढ़ाई के दौरान खेल में रूचि थी। फुटबाल पृथ्वीपाल के साथ खूब फुटबाल भी खेला। बाद में रेलवे की सेवा में आए। पर समय से पहले वीआरएस लेकर समाज सेवा में जुट गए। वे 1993 से अमरकंटक गुरुद्वारे की सेवा में हैं। गरेवाल साहब के विचारों के दर्शन अमरकंटक गुरुद्वारे के प्रवेश द्वार से ही होने लगते हैं। प्रवेश द्वार और उसके आसपास राष्ट्रीय एकता और विश्वबंधुत्व के नारे सहज भाषा में लिखे गए हैं।
गुरुद्वारे में कई दर्जन स्थानीय बच्चे शिक्षा पाते हैं। उनका जीवन, दानापानी यहीं से चलता है। अब आईए जानते हैं गरेवाल साहब के संदेश क्या हैं।

हम सदा  सच बोलेंगे 

हम चोरी नहीं करेंगे
हम देश और संसार को  खूबसूरत बनाएंगे
सब इंसान भाई भाई हैं
बड़ों ने दुनिया बिगाड़ी है
अब बच्चों की बारी है
हम सब मुल्कों की हद मिटाएंगे
सब दुनिया को एक बनाएंगे
ना हम हिंदू ना हम मुसलमान
हम सब हैं बस इंसान
हम सब तरफ प्यार ही प्यार फैलाएंगे
इन सबके बाद होता है सत श्री अकाल

इतना ही नहीं समाज को सुधारने के लिए गरेवाल साहब के और भी सपने हैं... वे बढ़ती आबादी को लेकर काफी चिंतित हैं। उनका संदेश है कि आबादी को रोकने के लिए दो बच्चे नहीं बल्कि हर व्यक्ति को सिर्फ एक ही बच्चा करना चाहिए।

अगर चाहते हो देश का कल्याण – बढती आबादी पर दो ध्यान
दो के दो भी हैं ज्यादा- इससे भी नहीं होगा फायदा
बस एक ही हो बच्चा – जो है सबसे अच्छा
लड़की हो या लड़का...इनमें फर्क न हो तिनका

हमारे ऐसे हैं सपने .... सब बच्चों को समझे अपने
मगर अफसोस इंसान हो गया खुदगर्ज
नहीं समझ रहा है अपना फर्ज।

गरेवाल साहब के इस संदेश से आज के नेताओं को सीख लेनी चाहिए जो कभी चार तो कभी दस बच्चे पैदा करने का फरमान बिना सोचे समझे जारी कर देते हैं।

-    ---------- विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
गुरुद्वारा अमरकंटक की वेबसाइट - http://amarkantakgurudwara.org/contact.aspx


Monday, January 26, 2015

सोन नदी का सुनहला पानी, सुनहला बालू

अमरकंट - सोनमुडा की वादियां।
सोन नदी का पानी सुनहले रंग का होता है और उसका बालू भी सुनहले रंग का होता है। सोन का उदगम मध्य प्रदेश के अमरकंटक से हुआ है पर वह सबसे ज्यादा बिहार और झारखंड प्रदेश के खेतों को सींचित करती है। पटना से ठीक पहले सोन गंगा नदी मे जाकर मिल जाती है। सोन नदी की कुल लंबाई 784 किलोमीटर है। रोहतास जिले के शहर डेहरी का पूरा नाम डेहरी ओन सोन है क्योंकि वह सोन नदी के किनारे है। मध्य प्रदेश का सीधी जिला भी सोन की जद में है। वहीं उत्तर प्रदेश में एक जिले का नाम ही रखा गया है सोनभद्र। बिहार में सोन नदी भोजपुरी और मगही भाषा के बीच सांस्कृतिक विभाजन भी करती है। सोन के पश्चिम तट के लोग भोजपुरी बोलते हैं तो पूरब के लोग मगही।
सोनमुडा जाने का रास्ता। 


डेहरी ओन सोन में सोन पर रेल और सड़क पुल बना है तो पटना आरा के बीच कोईलवर में सोन पर ऐतिहासिक रेल सह सड़क पुल है। सोन पर अब्दुल बारी सेतु का निर्माण 1861 में हुआ था। 2008 में सोन नदी पर अरवल और सहार के बीच एक सड़क पुल का निर्माण हुआ। बिहार मे सिंचाई के लिए सोन पर 1874 में बांध बना कर नहरें निकाली गईं। वहीं 1968 में यहां से 8 किलोमीटर आगे इंद्रपुरी बैराज का निर्माण कराया गया। सोन नदी भोजपुर रोहतास जिले की जीवनधारा है। सोन के जल से शाहाबाद, गया और पटना जिलों के लगभग सात लाख एकड़ भूमि की सिंचाई होती है।

अमरकंटक में है सोन का उदगम

सोन की धारा। 
मैं बचपन से अपने गांव में सोन नदी से आते हुए नहर को देखता आया हूं। इस नहर के पानी से ही हमारे खेत लहलहाते हैं। सोन नहर में पानी न आए तो हमारे खेत बंजर रह जाएं। सोन का पानी ही है जो हमारी मिट्टी से सोना उगाता  है। तो भला मैं अमरकंट पहुंचा था तो सोन के उदगम स्थल को देखे बिना कैसे लौट आता है। 11 जनवरी की सुबह मैंने स्थानीय लोगों से जानकारी ली। नर्मदा कुंड से सोनमुडा ( सोन के उदगम स्थल) की दूरी डेढ किलोमीटर है।  नर्मदा नदी यहां से पश्चिम की तरफ तो सोन नदी पूर्व दिशा में बहती है।

बर्फानी आश्रम में रुकने से पहले हमारे टैक्सी वाले ने अगले दिन अमरकंटक के सभी दर्शनीय स्थलों को घूमाने के लिए कहा था पर वह सुबह 10 बजे से पहले जाने को तैयार नहीं था। इसलिए मैंने सुबह सुबह ही पदयात्रा करने की ठानी। वैसे भी मैं हर शहर में सुबह सुबह घूमना पसंद करता हूं। मुझे उस सोन नदी का उदगम देखने जाना था जिसके पानी के साथ मैंने बचपन में खूब अटखेलियां जो की थीं... नर्मदा कुंड से सोनमुडा का रास्ता जंगलों से होकर जाता है। पक्की सड़क बनी है। यह रास्ता अत्यंत ही मनोरम है।

अदभुत है सोनमुडा में सूर्योदय देखना

अमरकंटक - सोनमुडा की सुबह। 
सोनमुडा जाकर पता चला कि यहां बड़ी संख्या में लोग सूर्योदय देखने आते हैं। यानी सोनमुडा सन राइज प्वांट है। वहां कई गाड़ियां पहले से ही पहुंची हुई थीं। लोग पहुंचे हुए थे। सोनमुडा में बडी संख्या में बंदर हैं, काले मुंह वाले। इनके लिए अगर आप चना लेकर नहीं जाएंगे तो वे आपके ऊपर हमला कर सकते हैं। 

सावधानी से चलते हुए मैं सनराइज प्वाइंट पर पहुंचा। यहां सोन की जल धारा जल प्रपात के तौर पर कई सौ मीटर नीचे घाटी में गिरती हुई दिखाई देती है। नजारा अत्यंत मनोरम है। जल प्रपात से पहले सोन और भद्र की धाराएं मिलती हैं। इसलिए सोन का पूरा नाम सोनभद्र है। सोनमुडा में एक मंदिर भी है। यहां अमरंकटक की घाटियों से मिलने वाली जड़ी बूटियों की का केंद्र भी है। इन जड़ी बूटियों से कई तरह की बीमारियों का उपचार होता है।

चाय वाले भी पत्रकार भी- सोनमुड़ा में कैंटीन चलाने वाले गजानन गर्ग से मेरी मुलाकात होती है। गजानन बताते हैं कि उनके पुरखे यूपी के उन्नाव से आए थे। तीन पीढ़ी पहले। पंडिताई करने। पर अब पंडिताई में इतना लाभ नहीं है। इसलिए चाय की यह कैंटीन खोल ली है। 

गजानन जी चाय बेचने के साथ ही पत्रकारिता भी करते हैं। वे अपना प्रेस कार्ड दिखाते हैं। पत्रकारिता के साथ चाय की कैंटीन को वे बड़े सम्मान से लेते हैं। अब तो उनका गर्व और बढ़ गया है क्योंकि एक चायवाला देश का प्रधानमंत्री बन चुका है। जब मैंने उनसे कहा कि आपकी एक फोटो खींच लूं तो उन्होंने गर्व से कहां हां जरूर लिजिए। 

सीधी जिले में सोन के किनारे मकर संक्रांति का मेला। 
अब बात सोन नदी की। कन्हर, रिहंद, बनास, गोपद, बीजल, सोप जैसी छतीसगढ़ की नदियां सोन में आगे आकर मिल जाती हैं। सोन अमरकंटक से निकलने के बाद मध्य प्रदेश के सीधी जिले से होकर गुजरती है। सीधी जिले के चुरहट शहर से 14 किलोमीटर की दूरी पर नदी का तट है। यहां पर हर साल मकर संक्रांति के मौके पर बड़ा मेला लगता है।

 मध्य प्रदेश के सीधी जिले के लाखों श्रद्धालु सोन नदी मे डुबकी लगा कर मकर संक्रांति पर्व का फल प्राप्त करते हैं। जिले के रामपुर नैकिन थाना के शिकारगंज के भंवरसेन घाट, खैरा घाट, महेशन घाट,  भितरी, कोल्दह, चुरहट, गऊघाट, पिपरोहर पर नदी तट पर मेले का आयोजन होता है।

-    -----विद्युत प्रकाश मौर्य 

( ( AMARKANTAK, SON RIVER, SONMUDA, SUNRISE POINT. SIDHI DISTRICT ) 

Sunday, January 25, 2015

कलचुरि शासन का अमरकंटक का प्राचीन मंदिर समूह

अमरकंटक में नर्मदा कुंड के ठीक सामने अति सुंदर मंदिरों का समूह दिखाई देता है। यह एक प्राचीन मंदिर समूह का परिसर है। इस परिसर की देखरेख भारतीय पुरात्तव सर्वेक्षण के अधीन है। सुबह की सूर्य की पहली किरण के साथ ये मंदिर समूह दमकते हुए दिखाई देते हैं।

इस परिसर में स्थित मंदिरों का निर्माण कलचुरि शासन काल में दसवीं से 12वीं सदी के बीच हुआ है। इन मंदिरों को देखकर लगता है कि उस काल खंड में अमरकंट अत्यंत प्रसिद्ध धार्मिक क्षेत्र रहा होगा। इन मंदिरों को देखने के लिए सुबह 6 बजे से सूर्यास्त तक देखा जा सकता है। यह पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से कर्मचारी तैनात किए गए हैं। इस परिसर में सबसे प्रमुख मंदिर है पतालेश्वर मंदिर है जो भगवान शिव का मंदिर है। 



इन मंदिरों का निर्माण कलचुरि शासक कर्णदेव ने कराया था। कर्णदेव का काल 1041 से 1073 ईश्वी का रहा है। मंदिर के निर्माण में बलुआ पत्थरों का इस्तेमाल हुआ है। कलचुरि शासक कर्णदेव के काल को स्थापत्य कला की दृष्टि से समृद्ध काल माना जाता है। मुखमंडप, मंडप और गृभगृहों का बनावट अदभुत है। मंडप की बाहरी दीवारें खुली हुई हैं और छतें अलंकृत स्तंभों पर खड़ी हैं।

पतालेश्वर मंदिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण मूल रूप से शंकराचार्य ने आठवीं सदी में कराया था। बाद में राजा कर्णदेव ने उसे शानदार वास्तुकला का रूप प्रदान किया। इस मंदिर में शिवलिंग धरती से 10 फीट नीचे स्थापित है। कहा जाता है कि श्रावण मास के अंतिम सोमवार को शिवलिंग के ऊपर तक जल भर जाता है। कहा जाता है मां नर्मदा खुद भगवान शिव को तब स्नान कराने आती हैं।

यहां दूसरा प्रमुख मंदिर रंग महला है कहा जाता है मां नर्मदा के जब शिशु रूप में थी तब उनके आमोद प्रमोद और खेलने के लिए रंग महल का निर्माण कराया गया। इन मंदिरों को संयुक्त तौर पर कर्ण मठ के नाम से भी जाना जाता है। वैसे पूरे अमरकंटक में नए पुराने मिलाकर कुल 30 मंदिर हैं। 



नर्मदा कुंड से थोड़ी दूरी पर मार्कंडेय आश्रम, गायत्री शक्तिपीठ भी स्थित है। नर्मदा मंदिर से एक किलोमीटर आगे सोनमुडा के रास्ते में शुकदेवानंद जी द्वारा निर्मित श्रीयंत्र महामेरू मंदिर स्थित है। मंदिर का गुंबद 52 फीट ऊंचा है। हालांकि इस मंदिर में जाने पर वीरानगी नजर आती है। मंदिर के अंदर फोटोग्राफी निषेध, मूर्तियों को छूना मना है जैसे कई बोर्ड लगे हुए हैं।

- विद्युत प्रकाश मौर्य  

(AMARKANTAK, OLD TEMPLE, RANG MAHLA, KALCHURI EMPIRE ) 




Saturday, January 24, 2015

जन जन की आस्था का प्रतीक मां नर्मदा

भारतीय संस्कृति में नर्मदा नदी का विशेष महत्त्व है। मध्य भारतमें नर्मदा नदी जन-जन की आस्था से जुडी हुई है। नर्मदा मध्य भारत के मध्य प्रदेश और गुजरात राज्य में बहने वाली एक प्रमुख नदी है। यह भारत की पांचवी बड़ी नदी है। महाकाल पर्वत के अमरकंटक शिखर से निकली नर्मदा की लम्बाई 1310 किलोमीटर है। यह नदी पश्चिम की तरफ जाकर खम्बात की खाड़ी में समंदर में गिरती है।

स्कंद पुराणके रेवाखंड में नर्मदाके माहात्म्य और इसके तटवर्ती तीर्थोंका वर्णन है । स्कंद पुराण के रेवा खण्ड के अनुसार, प्राचीन काल में चंद्रवंश में हिरण्यतेजा एक प्रसिद्ध राजर्षि ऋषितुल्य राजा हुए। उन्होंने पितरों की मुक्ति और भूलोक के कल्याण के लिए नर्मदा को पृथ्वी पर लानेका निश्चय किया। राजर्षि ने कठोर तप कर भगवान शंकर को प्रसन्न कर लिया। महादेव ने उन्हें नर्मदाके पृथ्वीपर अवतरण का वरदान दे दिया। इसके बाद नर्मदा धरा पर पधारीं। राजा हिरण्यतेजा ने नर्मदा में स्नान कर विधिपूर्वक अपने पितरोंका तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान किया।

नर्मदा के पत्थर के शिवलिंग नर्मदेश्वर के नाम से विख्यात हैं। शास्त्रों में नर्मदा में पाए जाने वाले नर्मदेश्वर को बाणलिंग भी कहा गया है। इसकी मुख्य विशेषता यह है कि नर्मदेश्वर को स्थापित करते समय इसमें प्राण-प्रतिष्ठा करने की आवश्यकता नहीं पडती। नर्मदेश्वर बाणलिंगको साक्षात शिव माना जाता है।

नर्मदा परिक्रमा -  देश में नर्मदा एकमात्र नदी है जिसकी परिक्रमा की जाती है। नर्मदा परिक्रमा किसी भी तीर्थ यात्रा कि तुलना में अत्यंत दुश्कर कार्य है। नर्मदा का परिक्रमा मार्ग अत्यंत सुंदर पहाड़ों और मैदानी इलाकों से होकर जाता है। मान्यता है कि नर्मदा परिक्रमा से जीवन में सुख- शांति आती है क्योंकि भगवान शिव प्रसन्न होते हैं। मां नर्मदा को भगवान शिव की पुत्री कहा गया है।

नर्मदा जी की कुल लम्बाई तो लगभग 1310 किलोमीटर है जिससे परिक्रमा मार्ग करीब 2600 किलोमीटर का हुआ करता है। परिक्रमा मतलब है नदी को बिना उलांघे पूरा फेरा लगाना और नदी के किनारे किनारे ही पदयात्रा करना। ये परिक्रमा अमरकंटक से आरंभ होकर खंभात जाकर वापसी में अमरकंटक में ही पूर्ण होती है। यात्रा के दौरान श्रद्धालु गांव के लोगों से श्रद्धापूर्वक भोजन ग्रहण करते हैं। कहीं भोजन नहीं मिलता तो यूं ही सो जाते हैं। यात्रा के दौरान नदी तट से 10 किलोमीटर से ज्यादा दूर नहीं जाना होता है।


गांव से जब श्रद्धालु नर्मदा परिक्रमा के लिए निकलते हैं तो अपने सरपंच से प्रमाण पत्र बनवाकर चलते हैं। इस प्रमाण पत्र के आधार पर अमरकंटक के कई आश्रमों में उन्हें आवास और भोजन की सुविधा मिलती है। साथ ही ये प्रमाण पत्र उन्हें मार्ग में भी काम आता है। कल्याण आश्रम के सेवक ने बताया कि हमारे यहां नर्मदा परिक्रमा करने वालों के लिए मुफ्त में भोजन और आवास का इंतजाम है।

व्रत और निष्ठापूर्वक की जाने वाली नर्मदा परिक्रमा 3 वर्ष 3 माह और 13 दिन में पूरा करने का विधान है, परन्तु कुछ लोग इसे 108 दिनों में भी पूरा कर लेते हैं । हर साल बड़ी संख्या में आस्थावान लोग नर्मदा परिक्रमा पर निकलते हैं। अमरंकटक कई आश्रमों में परिक्रमा पर जाने वालों के लिए आश्रम में रहने और भोजन का निशुल्क इंतजाम रहता है। वहीं परिक्रमा मार्ग में पड़ने वाले गांव के लोग ऐसे श्रद्धालुओं को सम्मान के निगाह से देखते हैं जो परिक्रमा पर निकलते हैं। आजकल सडक मार्ग से वाहन द्वारा काफी कम समय में भी परिक्रमा करने का चलन हो गया है।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य
( MAA NARMADA, AMARKANTAK, TEMPLE ) 


Friday, January 23, 2015

मां नर्मदा का उदगम – अमरकंटक

गंगा के बाद देश में नर्मदा दूसरी सबसे बड़ी पूज्य नदी है। मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र के करोड़ों आस्थावान लोगों के लिए नर्मदा माई हैं। नर्मदा नदी मध्य प्रदेश के अमरकंटक से निकलती है। यह समुद्र तल से 1070 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।

नदी के उदगम स्थल पर नर्मदा माई और शिव का सुंदर मंदिर बना है। महान संस्कृत कवि कालिदास के साहित्य में अमरकंटक की सुंदरता का वर्णन आता है।प्राचीन ग्रंथों में वर्णित है कि नर्मदा सात कल्पों तक अमर है। प्रलयकाल में शंकर भगवान अपना तीसरा नेत्र इसी के तट पर खोलते हैं। कहा जाता है कि भगवान शिव और उनकी पुत्री नर्मदा यहां निवास करते थे। माना जाता है कि नर्मदा उदगम की उत्‍पत्ति शिव की जटाओं से हुई है, इसीलिए शिव को जटाशंकर भी कहा जाता है।

'नमामि देवि नर्मदे - अमरकंटक में नर्मदा कुंड स्थित मां नर्मदा मां का मुख्य मंदिर सफेद रंग का है। यह कुंड के बिल्कुल बगल में स्थित है। कहा जाता है नर्मदा कुंड का निर्माण आठवीं सदी में आदि शंकराचार्य ( 788- 820ई )  ने करवाया। यहां नर्मदा माई के मंदिर का निर्माण उसके बाद हुआ। आदि शंकराचार्य ने यहां पतालेश्वर मंदिर का निर्माण कराया। 18वीं सदी में यहां यहां नागपुर के भोंसले शासकों ने केशव नारायण मंदिर का निर्माण कराया। नर्मदा मंदिर के बाहर एक हाथी की प्रतिमा स्थापित है। भक्त इसके पांव के अंदर से आरपार जाने की कोशिश करते हैं। कहा जाता है ऐसा करने से पाप कट जाते हैं। यह भी कहा जाता है कि मां नर्मदा का मंदिर रेवा नायक ने बनवाया। नर्मदा कुंड के बीच में रेवा नायक की प्रतिमा स्थापित है। वर्तमान मंदिर का जीर्णोद्धार रीवा के राजा गुलाब सिंह द्वारा 1939 में कराया गया। उन्होंने अपने मुस्लिम कारीगर से उद्गम स्थल, परिसर आदि का सौंदर्यीकरण कराया।



मां नर्मदा का मंदिर सुबह 6 बजे खुलता है। शाम को 7 बजे मंदिर में मां नर्मदा की आरती होती है। अब मंदिर की देखरेख प्रशासन करता है। दानपात्र का चढ़ावा ट्र्स्ट के पास जाता है। पर पुजारियों के पास दी गई नकद राशि पूजारी की संपत्ति हो जाती है। नर्मदा कुंड में भक्तों के स्नान की अनुमति नहीं है। भक्तों के स्नान के लिए मंदिर के बगल मं अलग से कुंड का निर्माण किया गया है। नर्मदा माई के दर्शन के लिए सालों भर यहां श्रद्धालु पहुंचते हैं।

नर्मदा कुंड के चारों ओर कई मंदिर बने हुए हैं। इन मंदिरों में नर्मदा और शिव मंदिर,  कार्तिकेय मंदिर, श्रीराम जानकी मंदिर,  अन्‍नपूर्णा मंदिर, गुरू गोरखनाथ मंदिर, श्री सूर्यनारायण मंदिर, वंगेश्‍वर महादेव मंदिर, दुर्गा मंदिर, शिव परिवार, सिद्धेश्‍वर महादेव मंदिर, श्रीराधा कृष्‍ण मंदिर और ग्‍यारह रूद्र मंदिर आदि प्रमुख हैं।

नर्मदा जयंती - 'नर्मदा जयंती' का त्योहार इस पवित्र नदी के लिए मध्य प्रदेश और छतीसगढ के लोगों की श्रद्धा का प्रतीक है।
हर साल माघ शुक्ल पक्ष सप्तमी को नर्मदा जयंती मनाई जाती है। इस उत्सव की सबसे उल्लेखनीय बात ये है की यहां लोग प्रार्थना के रूप में इस पवित्र नदी में रोशन दीपक नदी में छोड़ते है। वहीं महाराशिवरात्रि और नाग पंचमी जैसे त्योहारों के दिन भी यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।

-      -- विद्युत प्रकाश मौर्य  ( MAA NARMADA, AMARKANTAK, RIVER ) 


Thursday, January 22, 2015

पेंड्रा रोड से अमरकंटक का सफर

पेंड्रा रोड रेलवे स्टेशन से अमरकंटक जाने का रास्ता बिल्कुल ग्रामीण माहौल का आभास देता है। सड़कें महज 12 फीट चौड़ी हैं जो प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत बनाई गई हैं। कई जगह सड़के टूटी हैं तो कई जगह बारिश के कारण भू स्खल हो गया है। आप छतीसगढ़ से मध्य प्रदेश में प्रवेश कर रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि अमरकंटक के मध्य प्रदेश में होने के कारण छतीसगढ़ सरकार संपर्क सड़क बनवाने  को लेकर उदासीन है। हालांकि अमरकंटक में मध्य प्रदेश से ज्यादा छतीसगढ़ के लोग रोज भ्रमण करने आते हैं।

पेंड्रा से अमरकंटक की दूरी 45 किलोमीटर है। जलेश्वर महादेव के बाद मध्य प्रदेश का हाईवे आ जाता है, जो अपेक्षाकृत चौड़ी सड़क है। वैसे पेंड्रा से अमरकंटक जाने के तीन रास्ते हैं। दूसरा रास्ता पाकरिया होकर जाता है। रास्ते गंवई हैं पर मनोरम हैं। आसपास में देखकर आनंद आता है। सुकुन मिलता है।

मैं एक शेयरिंग जीप में हूं। शहर से पांच किलोमीटर बाहर निकलने के बाद हमारी जीप रूक जाती है क्योंकि दो यात्रियों का सामान इस जीप में रह गया है और वे यात्री वहीं छूट गए हैं। अब उऩका इंतजार हो रहा है। वे दूसरे टैक्सी वालों की मदद से लिफ्ट लेकर आते हैं। पता चला कि दोनों अमरकंटक में फोटोग्राफी का काम करते हैं। आधे घंटे के बाद फिर से आगे का सफर आरंभ हुआ। 

समुद्र तल से 1065 मीटर ऊंचाई पर स्थित अमरकंटक में मध्‍य भारत के विंध्य और सतपुड़ा की पहाडि़यों का मेल होता है। सर्दियों में अमरकंटक का तापमान कई बार शून्य डिग्री तक गिर जाता है। यहां के लोग बताते हैं कि किसी जमाने में यहां गर्मियों में भी पंखे नहीं चलाने पड़ते थे। पर अब जंगलों को कटाव के कारण तापमान बढ़ा है। फिर भी ये धार्मिक स्थल होने के साथ मध्य प्रदेश का लोकप्रिय हिल स्टेशन है। सात हजार के आसपास आबादी वाले अमरकंटक तक पहुंचने के लिए सड़क धीरे धीरे ऊपर की ओर चढ़ती नजर आती है। यहां की सरकार को आखिर पेंड्रा रोड से अमरकंटक तक नैरो गेज रेल लाइन बिछाने का ख्याल क्यों नहीं आया।

अमरकंटक में सुबह की चाय...
इस खूबसूरत हिल स्टेशन पर अमरकंटक सालों भर पहुंचा जा सकता है। चाहे आप धार्मिक भावना से आएं या फिर एक सैलानी की तरह प्राकृतिक नजारों को देखने, निराश नहीं होंगे। ये न सिर्फ हिंदू बल्कि जैन, सिक्ख और कबीरपंथी मतावलंबियों की आस्था का भी बड़ा केंद्र है। अमरकंटक में नर्मदा सोन और जोहिला नदी का उद्गम स्थान है। तो यहां गुरुनानक देवजी की याद में गुरूद्वारा और प्रसिद्ध जैन मंदिर है। यहां के खूबसूरत झरने, पवित्र तालाब, ऊंची पहाडि़यों और शांत वातावरण सैलानियों को मंत्रमुग्‍ध कर देते हैं। अमरकंटक बहुत से आयुर्वेदिक पौधों मे लिए भी प्रसिद्ध है‍, जिन्‍हें किंवदंतियों के अनुसार जीवनदायी गुणों से भरपूर माना जाता है।

अमरकंटक- बर्फानी आश्रम। 
अमरकंटक जाने वाली टैक्सियां नर्मदा कुंड के पास पहुंचती हैं तो बस स्टैंड यहां से एक किलोमीटर आगे है। अमरकंटक में रहने के लिए नर्मदा कुंड के कई विकल्प मौजूद हैं। मैंने अपना ठिकाना बनाया कुंड के ठीक पीछे बर्फानी आश्रम में।
( बर्फानी आश्रम का संपर्क - 9425344759) इस विशाल आश्रम में रहने के लिए बड़ी संख्या में किफायती कमरे मौजूद हैं। चारों तरफ कमरे। बीच में विशाल आंगन। हालांकि रात में खूब ठंड लगी। इस आश्रम में मंदिर भी है। साथ ही यहां कई तरह की आयुर्वेदिक दवाओं का निर्माण भी होता है। यहां ठहरने वालों के लिए कैंटीन की सुविधा भी उपलब्ध है। अगर कम लोग हों तो आपको खाने के लिए पहले से कहना होगा। वैसे यहां जैन धर्मशाला, गुरुद्वारा गुरुनानक समेत कई और आश्रमों में ठहरा जा सकता है। अमरकंटक में शाकाहारी खाने की थाली 60 से 80 रुपये में उपलब्ध है।

-    ----  विद्युत प्रकाश मौर्य

( PENDRA ROAD, AMARKANTAK, MADHYA PRADESH, BARFANI ASHRAM  )



Wednesday, January 21, 2015

पेंड्रा रोड – अमरकंटक का प्रवेश द्वार

कटनी बिलासपुर रेल मार्ग पर पेंड्रा रोड छतीसगढ़ राज्य का पहला बड़ा रेलवे स्टेशन है। पेंड्रा रोड बिलासपुर जिले की तहसील है। आमतौर पर रोड नाम से जो रेलवे स्टेशन होते हैं वे शहर से दूर होते हैं। पर पेंड्रा रोड के साथ ऐसा नहीं है। स्टेशन के सामने पेंड्रा बाजार है। खाने पीने के लिए छोटे छोटे भोजनालय हैं। अगर आप देर से रेलवे स्टेशन पर उतरे हैं तो रहने के लिए लॉज भी हैं।

वास्तव में पेंड्रा छतीसगढ़ का बहुत ही पुराना शहर है। भले ही ये बिलासपुर जिले की तहसील है पर इसे अब पुलिस जिला और राजस्व जिला बनाने की मांग की जा रही है। बिलासपुर से पेंड्रा की दूरी 100 किलोमीटर है। पर पेंड्रा का महत्व आजकल इस मायने में है कि यह ऐतिहासिक तीर्थ और मध्य प्रदेश के बड़े हिल स्टेशन अमरकंटक का प्रवेश द्वार है। भले ही अमरकंटक मध्य प्रदेश में है पर यह तीन तरफ से छतीसगढ़ से घिरा हुआ है।
 रेल मार्ग से यहां पहुंचने का एकमात्र रास्ता पेंड्रा रोड से होकर ही है। पेंड्रा रोड से अमरकंटक की सड़क मार्ग से दूरी 45 किलोमीटर है। 

पेंड्रा बाजार में परंपरागत दुकानें हैं। कपड़े, अनाज और सब्जियों के अलावा मशीनरी सामानों की खूब दुकानें हैं। आसपास के 40 किलोमीटर की दूरी तक के लोगों के लिए खरीददारी के लिए बाजार है पेंड्रा। पेंड्रा और गौरेला वास्तव में टि्वन सिटी की तरह हैं। अब गेवरा रोड और पेंड्रा रोड के बीच नई रेललाइन परियोजना पर काम चल रहा है। इससे भविष्य में पेंड्रा रोड जंक्शन में तब्दील हो जाएगा।


पेंड्रा गोरेला की आबादी 20 हजार के आसपास है। पेंड्रा अच्छे मौसम के लिए जाना जाता है। रेलवे स्टेशन की समुद्र तल से ऊंचाई 618.4 मीटर है। स्टेशन बिल्कुल साफ सुथरा है। स्टेशन पर रिटायरिंग रूम की सुविधा भी उपलब्ध है। कटनी से बिलासपुर जाने वाली सभी प्रमुख रेलगाड़ियां इस स्टेशन पर रूकती हैं। 

छतीसगढ़ संपर्क क्रांति, अमरकंट सुपरफास्ट, हीराकुंड एक्सप्रेस, सारनाथ एक्सप्रेस, जैसी ट्रेनें यहां रुकती हैं।

अगर आप अमरकंटक जा रहे हैं तो अपने जरूरत के कई सामान यहीं से खरीद लें। क्योंकि अमरकंटक में छोटा सा बाजार है। वहां कई चीजें नहीं मिलतीं।
पेंड्रा रोड से अमरकंटक के लिए बसें और टैक्सियां उपलब्ध रहती हैं। पर शाम हो जाने के बाद बसें और टैक्सियां कम हो जाती हैं। वैसे अगर आप समूह में यात्रा कर रहे हैं तो आरक्षित टैक्सी करके भी अमरकंटक जा सकते हैं।

-   -  विद्युत प्रकाश मौर्य

( PENDRA ROAD, AMARKANTAK, RAILWAY STATION ) 

Tuesday, January 20, 2015

बांधवगढ़ - चलो बाघ देखें

अगर बाघ देखने की तमन्ना है तो मध्य प्रदेश के बांधवगढ़ नेशनल पार्क में पहुंचे। कटनी शहडोल मार्ग पर उमरिया जिले में बांधवगढ़ का प्रवेश द्वार है। यहां 45 के करीब बाघ हैं।

बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान मध्य प्रदेश में विंध्य पर्वतमाला के पूर्वी क्षेत्र में स्थित है। 

पहले बांधवगढ़ के चारों ओर फैले जंगल का रख-रखाव रीवा के महाराजा देखा करते थे। पर 1968 में महाराजा ने इसे राज्य सरकार को सौंप दिया। अब यह भारत का एक प्रमुख राष्ट्रीय उद्यान हैं। बाघों का गढ़ बांधवगढ 450 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला है। उमरिया जिले में स्थित इस राष्ट्रीय उद्यान में एक मुख्य पहाड़ है जो बांधवगढ़ कहलाता है। शेर, चीते, तेंदुआ और भालू यहां आप खुले आसमान में विचरण करते हैं।

वर्ष 1968 बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया था, तब इसका दायरा 105 वर्ग किलोमीटर था। 1982 में इसका दायरा बढ़कर 450 वर्ग किलोमीटर हो गया।
बांधवगढ़ में बाघों का अनुपात भारत में किसी भी और टाइगर रिजर्व की तुलना में सबसे ज्यादा है। जाहिर है, इसलिए यहां बाघ को देखने की संभावना भी लगभग तय रहती है।  प्रदेश के जबलपुर और शहडोल जिले में फैले इस राष्ट्रीय उद्यान में मुख्य पहाड़ बांधवगढ़ है। पार्क में बांस के वृक्ष प्राकृतिक सुंदरता को मनोरम बना देते हैं। यहां पक्षियों की 250 प्रजातियां देखी जा सकती हैं।

भारतीय इतिहास और पौराणिक कथाओं में भी यह स्थान अपना विशेष महत्व रखता है। बांधवगढ़ के किले का संबंध रामायण काल से जोड़कर देखा जाता है। कहा जाता है कि भगवान राम ने वानवास से लौटने के बाद अपने भाई लक्षमण को ये किला तोहफे में दिया था इसी लिए इसका नाम बांधवगढ़ यानी भाई का किला रखा गया है।


कैसे पहुंचे – निकटतम रेलवे  स्टेशन उमरिया है। जो कटनी शहडोल खंड पर स्थित है। जबलपुर ( 135 किमी) से टैक्सी करके भी पहुंचा जा सकता है। उमरिया जिले में छोटी हवाई पट्टी भी उपलब्ध है। कलेक्टर की अनुमति से यहां छोटे विमान उतर सकते हैं। ताला प्रवेश द्वार की दूरी उमरिया से 32 किलोमीटर है। उमरिया रीवा हाईवे पर स्थित ताला तक बस से भी जाया जा सकता है। ताला में चार कमरों को फारेस्ट रेस्ट हाउस उपलब्ध है। कुछ निजी गेस्ट हाउस भी हैं पर वे काफी महंगे हैं। आप उमरिया में रूक कर भी बांधवगढ़ घूमने का कार्यक्रम बना सकते हैं।

कब जाएं - अक्तूबर मध्य से जून तक सैलानियों के लिए खुला रहता है। बारिश के दिनों में पार्क बंद रहता है। हर बुधवार को दोपहर के बाद पार्क बंद रहता है। सुबह की सफारी 6 बजे से 10.30 तक और शाम की सफारी में 3 बजे से 6 बजे के बीच में जा सकते हैं। पार्क के अंदर जाने के लिए एक गाइड और परमिट जरूरी है। गाइड पार्क के गेट पर मौजूद रहते हैं। सफारी के लिए जीप का किराया 4500 रुपये से आरंभ होता है।

-    --- विद्युत प्रकाश मौर्य  
   ( BANDHAVGARH, TIGER, UMARIA, KATNI, TALA GATE ) 



Monday, January 19, 2015

छतीसगढ़ - यानी धान का कटोरा की ओर

रायपुर के गुरुघासीदास संग्रहालय के पार्क में कलाकृति
सन 2000 में मध्य प्रदेश से अलग होकर छतीसगढ नया राज्य बना। पर मुझे छतीसगढ जिसे धान का कटोरा भी कहते हैं, वहां की धरती पर कदम रखने का मौका मिला जाकर 2015 में।
छतीसगढ़ हिन्दुस्तान के नक्शे में दिल की तरह है। 

अकूत वन संपदा और खनिज संपदा वाला ये ये राज्य मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र से घिरा हुआ है।
दिल्ली से चलती है छतीसगढ संपर्क क्रांति एक्सप्रेस। इस ट्रेन का नंबर है 12824, निजामुद्दीन से खुलने का समय है शाम को 5.25 बजे। इसमें मैं जनवरी की ठंड के बीच हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन से सवार हुआ। ट्रेन समय से ही चली पर कुहरे के कारण रास्ते में लेट होती चली गई। सहयात्रियों से बातें करता हुआ छत्तीसगढ के बारे में ज्ञान बढ़ा रहा था। 

रास्ते में मिला मध्य प्रदेश का सागर रेलवे स्टेशन. इसके नाम की अंगरेजी की बिगडी हुई स्पेलिंग को अब तक सुधारा नहीं गया है। हालांकि देश के तमाम शहरों के नामों की स्पेलिंग सुधार दी गई है। रेलवे स्टेशनों के नामों की स्पेलिंग भी सुधारी गई है। कभी हमारे बिहार के ऐतिहासिक शहर आरा की अंग्रेजी में स्पेलिंग ARRAH होती थी, पर अब उसकी स्पेलिंग ठीक करके ARA कर दी गई है। इसी तरह सागर की स्पेलिंग SAUGOR को ठीक करके SAGAR  किया जाना चाहिए।

सागर से आगे आता है कटनी मुडवारा। ये कटनी जंक्शन से एक किलोमीटर पहले का स्टेशन है। वास्तव में कटनी में कुल चार रेलवे स्टेशन हैं। सागर से शहडोल वाली लाइन पर कटनी मुरवारा पडता है। सतना कटनी जबलपुर लाइन पर पडता है कटनी जंक्शन रेलवे स्टेशन। वहीं नार्थ कटनी और साउथ कटनी स्टेशन भी हैं। कटनी से अब एक नई लाइन सिंगरौली जाती है। वैसे कटनी शहर बेहतरीन मार्बल के लिए जाना जाता है। मैं 1995 में एक बार कटनी आया था। तब अखबारों के जाने माने पत्र लेखक मिश्रीलाल जायसवाल से मिलने का सौभाग्य मिला था।


अब कटनी से छतीसगढ के लिए रास्ता कटता है। उमरिया, शहडोल के बाद अनूपपुर। मध्य प्रदेश का आखिरी जिला है अनूपपुर। वेंकटनगर के बाद शुरू हो जाता है छतीसगढ। पेंड्रा रोड राज्य का पहला बडा स्टेशन है। हालांकि दिल्ली से छतीसगढ़ जाने का दूसरा रास्ता नागपुर होकर भी है। इसमें नागपुर के बाद गोंदिया जंक्शन और उसके बाद छतीसगढ़ राज्य का पहला जिला आता है राजनांदगांव। अगर दुर्ग और रायपुर पहुंचने के लिहाज से देखें तो ये रास्ता निकट का है और अगर बिलासपुर के लिहाज से देखें तो ये कटनी शहडोल वाला रास्ता निकट का है।
-       विद्युत प्रकाश मौर्य 
  (KATNI JN, CG SAMPARK KRANTI EXPRESS ) 

छत्तीसगढ़ सरकार की अधिकृत वेबसाइट पर जाएं।