Thursday, December 31, 2015

गुरुद्वारा किला आनंदगढ़ साहिब - यहां दशमेश पिता ने गुजारे 25 साल

आनंदपुर साहिब में रेलवे स्टेशन से बाहर निकलने के बाद सबसे पहले किला आनंद गढ़ साहिब में पहुंचा जा सकता है। यह किला आनंदपुर साहिब शहर के बीच में स्थित है। दसवें गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी ने इलाके में पांच किलों की स्थापना की थी, आनंद गढ़ साहिब उनमें से एक है। यह मुख्य गुरुद्वारा केशगढ़ साहिब से 800 मीटर की दूरी पर स्थित है। गुरु गोबिंद सिंह जी को 1689 से 1705 के बीच मुगलों और पहाड़ के राजाओं से कई युद्ध लड़ने पड़े थे।
गुरुद्वरा किला आनंदगढ़ साहिब के अंदर बाउली साहिब को देखा जा सकता है। यह गुरु गोबिंद सिंह जी के समय की है। किला आनंदगढ़ साहिब को बाद में भव्य रुप प्रदान किया गया है। गुरु गोबिंद सिंह ने इसी किले में अपने जीवन के 25 साल गुजारे थे।

पांच किलों का निर्माण -  केशगढ़, आनंदगढ़, लोहगढ़, होलगढ़ और फतेहगढ़, इन पांच किलों की स्थापना गुरु साहिब ने की थी। इनमें केशगढ़ साहिब अब तख्त बन चुका है। इन पांचो किलों को आपस में जमीन के अंदर बनी सुरंगों से जोड़ा गया था। इन किलों का निर्माण 1689 में शुरू हुआ और इसके निर्माण में दस साल लगे थे। वर्तमान में आनंदगढ़ साहिब को भव्य रुप प्रदान करने का श्रेय संत सेवा सिंह को जाता है। यह काम 1970 में आरंभ हुआ था। इससे पहले 1930 में संत करतार सिंह ने किला नुमा भवन का निर्माण यहां कराया था जिसे अभी भी देखा जा सकता है।

मुख्य भवन के बगल में यहां सीढ़ियां चढ़कर ऊपर जाने पर विशाल गुरुद्वारा का निर्माण कराया गया है। इसका हॉल 15 वर्ग मीटर का है। इसके साथ ही परिसर में गुरु का लंगर और श्रद्धालुओं के रहने के लिए 300 कमरों का भी निर्माण कराया गया है। आनंदपुर साहिब में होला महल्ला के समय पूरे शहर की रौनक देखने लायक होती है।

किला आनंदगढ़ में होला महला - वास्तव में 17वीं शताब्दी में गुरु की लाडली फौज की  सथापना की  गई। इसके साथ ही निहेंग सिंघो की फौज भी तैयार की गई थी। इसमें दो दल बनाए गए थे। इसमें वस्त्रों का रंग सफेद और पीला रखा गया। एक तरफ तो सफेद वस्त्रों वाली फौज और दूसरी तरफ पीले वस्त्रों की फौज होती थी। 

इसमें एक का नाम होला रखा गया तो दूसरे का नाम महला। इसे बनावटी हल्ला भी कहते हैं। यह बहादुरी दिखाने और रियाज कायम रखने के लिए एक युद्धाभ्यास है। ये फौज किला आनंदगढ़ से ले कर लोहगढ़ के स्थान पर पहुंच कर आपस में मुकाबला करती थी। ये रिवायत आज भी उसी प्रकार जारी है। इसे आप होली के बाद आनंदपुर साहिब में पहुंचने पर देख सकते हैं।


लाइट एंड साउंड शो - आनंदपुर साहिब का इतिहास दिखाने के लिए किला आनंदगढ़ साहिब में नियमित तौर पर लाइट एंड साउंड शो खा बी आयोजन किया जाता है। यह शो शाम को गरमी में 8 बजे से नौ बजे के बीच होता है। वहीं सरदी के दिनों में शाम 6.30 बजे आरंभ होता है।शो की भाषा पंजाबी है। अंगरेजी भी मांग पर शो दिखाया जाता है।

किला आनंदगढ़ साहिब से केशगढ़ साहिब तक के मार्ग में चौड़ी सड़क के दोनों तरफ बाजार हैं जहां आप सिख धर्म से जुडे प्रतीक खरीद सकते हैं। शहर का बस स्टैंड और बाजार केशगढ़ साहिब गुरुद्वारा के नीचे स्थित है। यहां से आप पंजाब हिमाचल के विभिन्न ठिकानों के लिए बसें ले सकते हैं।
- विद्युत प्रकाश मौर्य -         vidyutp@gmail.com 
( KILA ANAND GARH SAHIB, ANANDPUR PUNJAB ) 

Tuesday, December 29, 2015

तख्त श्री केशगढ़ साहिब- यहां हुई खालसा पंथ की स्थापना

सिखों के पांच तख्त हैं देश में। इनमें  आनंदपुर साहिब का खास महत्व है। पंजाब के रुपनगर जिले में स्थित आनंदपुर साहिब  सिखों में अत्यंत पवित्र शहर माना जाता है। इस शहर की स्थापना 1665 में नौंवे गुरु गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने की थी। यह सिख धर्म में अत्यंत पवित्र शहर इसलिए है क्योंकि यहीं पर खालसा पंथ की स्थापना हुई थी। साल 1699 में बैशाखी के दिन आनंदपुर साहिब में खालसा पंथ की स्थापना दसवें गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी ने की। इस दिन उन्होंने पांच प्यारों को सबसे पहले अमृत छकवा कर सिख बनाया। आमतौर पर तलवार और केश तो सिख पहले से ही रखते थे।अब उनके लिए कड़ा, कंघा और कच्छा भी जरूरी कर दिया गया।

जब गुरु जी ने जब कहा कि मुझे एक शीश चाहिए तो कई लोग चौंके, पर सबसे पहले आगे आए भाई दया सिंह जी। इसके बाद जो पांच लोग सामने आए. उन्हें गुरु जी ने अमृत छकवा कर अमृतधारी सिख बनाया। तन, मन धन सब कुछ परमेश्वर को सौंप कर सिर्फ सच के प्रचार का संकल्प लिया पंज प्यारों ने।

होला महल्ला - आनंदपुर साहिब पंजाब और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर स्थित है। हर साल होली के अगले दिन से यहां विशाल मेला लगता है जिसे होला महल्ला कहते हैं। यह उत्सव आनंदपुर साहिब में छह दिनों तक चलता है।  इस पर्व की शुरुआत गुरु गोबिंद सिंह जी ने की थी। यह होली का ही बदला हुआ रूप है। यह त्योहार सिख धर्म में पौरूष का प्रतीक है। इस दौरान यहां वीरता दिखाने वाले कई तरह के करतब देखने को मिलते हैं।

गुरुद्वारा केशगढ़ साहिब – आनंदपुर साहिब के कई गुरुद्वारों के बीच  इसका खास महत्व है। इस ऐतिहासिक गुरुद्वारे का निर्माण 1699 में हुआ। यह  शिवालिक रेंज की पहाड़ियों पर स्थित है। इस गुरुघर का ऐतिहासिक महत्व है क्योंकि यहां गुरु गोबिंद सिंह ने भाई दया सिंह, धरम सिंह, हिम्मत सिंह, मोहकम सिंह और साहिब सिंह को अमृत छकाकर सिख बनाया। यहां गुरु गोबिंद सिंह जी की निजी कटार और बंदूक आदि देखी जा सकती है। दसम गुरु गोबिंद सिंह ने पटना साहिब से आने के बाद यहां अपने जीवन के 25 साल गुजारे। गुरुद्वारे का आकार बहुत विशाल नहीं है। पर यहां सारी सुविधाएं पहुंचाई गई हैं। टोकन लेकर आप मंदिर का हलवा  प्रसाद ले सकते हैं।

गुरुद्वारे से नीचे विशाल लंगर हाल है। मैं जिस दिन पहुंचा, लंगर में दाल, चावल, कड़ी और खीर बनी थी। गुरुद्वार के पास ही सिख धर्म से जुड़ी पुस्तकों की अच्छी दुकाने हैं। यहां पर आप गुरमत साहित्य और दूसरे सामान यादगारी में खरीद सकते हैं।

साल 1820 के बाद केशगढ़ साहिब की व्यवस्था में नियमित तौर पर ग्रंथियों की नियुक्ति होने लगी। यहां सबसे पहले ग्रंथी भाई करम सिंह जी थे। उसके बाद भाई बुध सिंह, भाई पूरन सिंह, भाई अमर सिंह के नाम आते हैं जिन्होंने अपनी सेवाएं गुरुघर में दीं। 1920 से 1925 के दौर में गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के बाद यहां जत्थेदार की नियुक्ति होने लगी। तब ज्ञानी रेशम सिंह, ज्ञानी प्रताप सिंह मालेवाल, जत्थेदार बीर सिंह, मास्टर अजीत सिंह अंबालवी, ज्ञानी फौजा सिंह, ज्ञानी बचितर सिंह, जत्थेदार गुरुदयाल सिंह अजनोहा, जत्थेदार हरचरण सिंह महलोवाल, भाई सविंदर सिंह, भाई बलबीर सिंह, भाई प्रो.मनजीत सिंह ने अपनी सेवाएं दीं। 

350 साला जश्न -  साल 2015 मेंआनंदपुर साहिब की स्थापना के 350 साल पूरे  होने पर विशाल उत्सव मनाया गया। इस दौरान यहां दुनिया भर से लोग पहुंचे।  रूपनगर मुख्यालय से केशगढ़ साहिब की दूरी 40 किलोमीटर है। यहां चंडीगढ़, अंबाला, लुधियाना जैसे शहरों से आसानी से पहुंचा जा सकता है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com
(TAKHT SRI KESHGARH SAHIB. ANANDPUR SAHIB PUNJAB HOLA MAHALLA)

Sunday, December 27, 2015

पंजाब के आनंदपुर साहिब की ओर

सुबह-सुबह हरियाणा के प्रसिद्ध अंबाला रेलवे स्टेशन पर पहुंचा हूं। दिल्ली से रात भर बस का सफर तय करके। चार घंटे लगे हैं यहां तक बस से पहुंचने में। दफ्तर का काम खत्म करके दिसंबर की ठंड में सीधे कश्मीरी गेट बस अड्डे से बस में बैठ गया था। अंबाला का रेलवे स्टेशन बस स्टैंड के बिल्कुल सामने ही है। यहां से मुझे जाना है आनंदपुर साहिब। अभी उजाला नहीं हुआ है। 

सिख धर्म के पांच पवित्र तख्त में से एक है श्री केशगढ़ साहिब यानी आनंदपुर साहिब।अंबाला कैंट रेलवे स्टेशन से सुबह छह बजकर 10 मिनट पर नंगल डैम के लिए मेमू ट्रेन खुलती है। यह ट्रेन आनंदपुर साहिब या नैना देवी जाने के लिए आदर्श और सस्ता तरीका है। हालांकि टिकट खिड़की से आधा किलोमीटर दूर प्लेटफार्म नंबर1ए  से ये ट्रेन हर रोज रवाना होती है।

मैं टिकट लेकर मेमू में सवार हो जाता हूं। मेमू ट्रेन में जगह आसानी से मिल जाती है। ट्रेन चल पड़ती है। अंबाला सिटी के बाद शंभू, राजपुरा जंक्शन, सराय बंजारा, साधूगढ रेलवे स्टेशन आते हैं। इसके बाद सरहिंद जंक्शन आता है। लुधियाना जालंधर जाते समय सैकड़ों बार इस मार्ग से गुजरा हूं। पर सरहिंद जंक्शन क्यों हैं। इतिहास में हम सरहिंद के युद्ध और संधि के बारे में पढ़ते हैं। पर अब सरहिंद से एक लाइन जाती है नंगल की तरफ इसलिए सरहिंद जंक्शन है।

मेमू ट्रेन में सुबह-सुबह अच्छी ठंड लग रही है। सरहिंद रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर पकौड़े तले जा रहे हैं। उसकी गर्माहट महसूस कर रहा हूं। पर मैं पकौड़े नहीं खा पाता। क्यों अभी तो ब्रश भी नहीं किया है। इस ठंड में ट्रेन में टीटीई साहब नजर आते हैं जो अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद है। बिना किसी मुरौव्वत के बेटिकट यात्रियों पर फाइन करते रसीद थमाते जाते हैं। मेरे पड़ोस में बैठे एक बीएसएफ के जवान भी बे-टिकट हैं। उन्हें भी दो सौ रुपये जुर्माना भरना पड़ता है। 

हमारी ट्रेन सरहिंद से निकलते ही फतेहगढ़ साहिब में रूकती है। स्टेशन के पास ही विशाल गुरुद्वारा है। दरअसल पंजाबी में जिन शहरों के नाम के आगे साहिब लगा है वहां विशाल गुरुद्वारे होते हैं और उनका संबंध सिख विरासत से होता है। फतेहगढ़ साहिब पंजाब का एक जिला है। ट्रेन आगे बढ़ती है। अगला स्टेशन है बस्सी पठाना। पंजाब में रहते हुए इस छोटे से कस्बे की खबरें हम अखबार में छापा करते थे। यह फतेहगढ़ साहिब जिले का ही एक कस्बा है। 



इसके बाद न्यू मोरिंडा जंक्शन आता है। यहां पर हमें सुबह के उगते हुए सूरज के दर्शन होते हैं। पर इससे सर्दी कम होती नजर नहीं आती। पर जब बाहर घूम रहे हों तो उतनी सर्दी नहीं लगती। रजाई में दुबके हुए हों तो सर्दी ज्यादा सताती है। रेल की खिड़की से ही उगते हुए सूरज को प्रणाम करता हूं। 

लुधियाना से चंडीगढ़ के बीच बनी नई रेलवे लाइन लुधियाना की तरफ से यहां आकर मिलती है। इसके बाद मोरिंडा आता है। मोरिंडा में हमें चंडीगढ़ से अमृतसर जाने वाली नई ट्रेन के दर्शन हुए। यहां से चमकौर साहिब जाने का रास्ता है। ऐतिहासिक गुरुद्वारा चमकौर साहिब यहां से 14किलोमीटर की दूरी पर है। इसके बाद हम पहुंच जाते हैं पंजाब के एक और जिले रुपनगर में। रुपनगर शहर चंडीगढ से नजदीक है। मेमू सिटी बजाती आगे बढती है। किरतपुर साहिब स्टेशन आता है। यहां भी ऐतिहासिक गुरुद्वारा है। 

किरतपुर साहिब से मंडी के लिए हाईवे का रास्ता बदलता है। सड़क मार्ग से मनाली जाने वाले लोग इस मार्ग का इस्तेमाल करते हैं। इसके बाद का अगला स्टेशन होगा आनंदपुर साहिब। यह नंगल से पहले का स्टेशन है। हालांकि ट्रेन हिमाचल प्रदेश के उना जिले मे स्थित अंब इंदौरा रेलवे स्टेशन तक जाती है। ट्रेन में बीएसएफ के जवान आरके शर्मा मिलते हैं। गुजरात के कच्छ से अपने घर मंडी जा रहे हैं। उनके साथ बातों बातों में सफर कट जाता है।


आनंदपुर साहिब रेलवे स्टेशन की इमारत भी किसी गुरुद्वारा यानी  धार्मिक प्रतीक जैसी ही बनी हुई है। स्टेशन बिल्कुल साफ सुथरा चमचमाता हुआ है। रेलवे स्टेशन पर ही टूथ ब्रश करने के बाद मैं निकल पड़ता हूं सिख गुरुओं के इस ऐतिहासिक शहर को और करीब से देखने के लिए। सुबह सुहानी है। सरदी की धूप दवा सरीखी लग रही है। और मैं आगे कदम बढ़ाता जाता हूं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य  
( AMBALA, SARHIND JN, FATEH GARH SAHIB, ANANDPUR SAHIB, PUNJAB ) 

Friday, December 25, 2015

सालों भर लुभाता है पश्चिमी घाट का सौंदर्य

Western Ghats - MATHERAN
पश्चिमी घाट यानी दिलकश नजारे। यह कोई एक जगह नहीं। इसका विस्तार कई राज्यों में हैं। सौंदर्य ऐसा है चप्पे चप्पे में कि इसे साल 2012 में में विश्व विरासत साइट का दर्जा मिला। इसके तहत कोई 1600 किलोमीटर लंबी पर्वत श्रंखला आती है।

 माना जाता है कि ये पर्वत हिमालय से भी ज्यादा पुराने हैं। अपने पारिस्थित विभिन्नता के कारण इसे अलग पहचान मिली है। इसका विस्तार गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु जैसे पांच राज्यों में है।

Western Ghats- MAHABALESWAR
इसकी सीमा में देश के कई बड़े हिल स्टेशन और नदियां और पहाड़ आते हैं। पश्चिम घाट में कुल 1 लाख 40 हजार वर्ग किलोमीटर के पहाड़ आते हैं। केरल में पालघाट के 30 किलोमीटर के दायरे को छोड़ दें तो ये पहाड़ कहीं न कहीं आपस में जुडे हुए हैं।

 इसलिए पश्चिमी घाट की एक वैश्विक पहचान है। इन घाटों का भारत के मानसून के गति से भी जुड़ाव है। बारिश के दिनों में इनका सौंदर्य और बढ़ जाता है। ये विश्व के सर्वाधिक हरे भरे इलाकों में गिने जाते हैं। इस क्षेत्र में पौधे के 650 के आसपास प्रजातियों की पहचान की गई है। वहीं 31 तरह के स्तनपायी जानवर इस क्षेत्र में हैं।

सबसे पहले महाराष्ट्र के सहयाद्रि रेंज की बात करें तो इसमें माथेरन, लोनावाला, खंडाला, महाबलेश्वर, पंचगनी जैसे इलाके आते हैं। बारिश के दिनों में माथेरन की यात्रा बंद करनी पड़ती है तो महाबलेश्वर में भी कुछ ऐसा ही होता है। पर महाबलेश्वर में तो बादलों का ऐसा डेरा होता है कि यहां बादलों पर शोध के लिए संस्थान खोला गया है। मुंबई से पुणे जाते समय आप लोनावाला और खंडाला का सौंदर्य देख सकते हैं। यह मुंबई के लोगों को खूब लुभाता है।
TABLE LAND OF PANCHGANI

कोंकण रेलवे से होकर गुजरते समय पश्चिमी घाट का सौंदर्य नजर आता है जो गोवा से गुजरते हुए भी दिखाई देता है। गोवा में दूध सागर के पास तो इसका अदभुत नजारा दिखाई देता है। 

इसके बाद आप कर्नाटक में प्रवेश कर जाते हैं। केरल का मुन्नार जैसा हिस्सा भी इसके तहत आता है। आप चलते जाइए इसका सौंदर्य खत्म होने का नाम नहीं लेता।

वहीं तमिलनाडु के नीलगिरी रेंज में ऊटी, कोटागिरी, कोडाइकनाल जैसे इलाके आते हैं। ऊटी सालों भर सैलानियों को मोहित करता है तो कोडइकनाल विदेशियों को भी हमेशा से लुभाता रहा है। पश्चिम भारत से लेकर दक्षिण भारत तक पश्चिमी घाट का विस्तार है।

NILGIRI HILLS- OOTY (TN) 
 हालांकि पांच राज्यों में विस्तारित क्षेत्र होने के कारण इनकी देखभाल दुष्कर कार्य है। केंद्र सरकार के पर्यावरण और वन मंत्रालय के तहत नेचुरल हेरिटेज मैनेजमेंट कमिटी का गठन किया गया  है। यह समिति सात अलग अलग कलस्टर में फैले इस क्षेत्र की देखभाल के लिए उत्तरदायी है।

बालीवुड के फिल्मकारों को भी इसका सौंदर्य खूब भाता है इसलिए तमाम फिल्मों में पश्चिमी घाट के पहाड़ों के नजारे आप देख सकते हैं। हिंदी फिल्मों में लोनावाला, खंडाला, वाई, पंचगनी, महाबलेश्वर, दूध सागर से लेकर ऊटी तक के नजारे खूब फिल्माए गए हैं। तो कभी वक्त मिले तो चलिए पश्चिमी घाट की ओर...
( WESTERN GHATS, NILGIRI, SAHYADRI, DOODH SAGAR) 


Thursday, December 24, 2015

बिना लहसुन प्याज वाली दिल्ली 6 की सुस्वादु थाली...

प्याज बहुत महंगा हो रहा है तो हाय तौबा क्यों मचा रहे हैं। क्या आपको पता नहीं है कि यूपी के पंडितों के परिवारों में सदियों से बिना लहसुन और प्याज के खाने का चलन है। मारवाड़ी भोजन की थाली भी बिना लहसुन प्याज के तैयार होती है। खाने की थाली में परोसे गए व्यंजन इतने स्वादिष्ट होते हैं कि आपको खाते वक्त एहसास नहीं होता कि आप बिना लहसुन और प्याज के खा रहे हैं। आप घर में भी बिना लहसुन प्याज के भोजन बना सकते हैं। दिल्ली में आपको ऐसे भोजन की थाली का स्वाद लेना है तो चांदनी चौक इलाके में आदर्श वेजिटेरियन पहुंचे। 


अगर आप दिल्ली में शाकाहारी थाली का स्वाद लेना चाहते हैं तो दिल्ली 6 यानी पुरानी दिल्ली का रूख कर सकते हैं। हाल में दिल्ली की सड़कों पर घूमते हुए हमलोग आदर्श वेजिटेरियन पहुंचे। यहां है 150 रुपये में शाकाहारी थाली। पर ये थाली है भरपेट थाली। यानी काफी कुछ दक्षिण भारतीय थाली की तरह। पर इस थाली का मीनू है शुद्ध राजस्थानी। खाने से हिंग की भीनी खुशबू।


क्या है थाली में  तीन तरह की सब्जियां, कोफ्ता, आलू शिमला मिर्च, बड़ियां और मटर, हिंग वाली दाल, चपाती घी लगी हुई, इसके साथ पराठे, पराठे भी अपनी पसंद के चुन सकते हैं- आलू पराठा,  मूली पराठा, पनीर पराठा और मिस्सी रोटी।
थाली में बासमती चावल भी होता है। साथ में सलाद, चटनी और इन सबके साथ पापड़ और मिठाई के तौर पर सुस्वादु खीर। इतना सब कुछ खाना वह भी उतना खाएं जितनी की आपकी पेट की क्षमता हो। तो भला इससे बढ़िया बात क्या हो सकती है।

स्वाद पुरानी दिल्ली का - आदर्श वेजीटेरियन में सुबह 10 बजे से रात 11 बजे तक लगातार भोजन उपलब्ध होता है। दिन में कभी छुट्टी नहीं। अगर आप चांदनी चौक इलाके में शापिंग के लिए पहुंचे हैं तो यहां के खाने का स्वाद ले सकते हैं।


पुरानी परंपरा - ये भोजनालय 1989 से चल रहा है। इसके संचालक रामबाबू शर्मा हैं , जो समय समय पर खुद ग्राहकों की भोजन पर प्रतिक्रिया लेते रहते हैं। उनका लक्ष्य भोजनालय में आने वालों को घर जैसा स्वाद और ऐसा खाना उपलब्ध कराने की है जिसे खाकर आपकी सेहत पर कोई बुरा असर नहीं पड़े। तो अगली बार आप पुरानी दिल्ली पहुंचे तो एक बार यहां खाने का स्वाद लेने की योजना बना सकते हैं।


कैसे पहुंचे- आदर्श वेजीटेरियन फव्वारा चौक से फतेहपुरी मस्जिद की तरफ जाते समय बल्लीमारान से थोड़ा आगे बायीं तरफ गली में है। नीचे भोजनालय और ऊपर आदर्श अतिथि निवास ( http://hoteladarshniwas.com/) भी है। यह पुरानी दिल्ली में रहने के लिए वाजिब दरों पर सुंदर व्यवस्था उपलब्ध कराता है। आदर्श वेजिटेरियन का वातानुकूलित डायनिंग हाल है। पीने का पानी तांबे के जग में परोसा जाता है। रसोई घर में साफ सफाई का पूरा ध्यान रखा जाता है। चांदनी चौक इलाके में ये रेस्टोरेंट होम डिलेवरी भी प्रदान करते हैं।

-  विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com

HOTEL ADARSH NIWAS, 483, Ist Floor, Haider Kuli Corner, Chandni Chowk, Delhi-110006 Telephone: +91(11) 23987576, 23929139, 23961667 Mobile +91 9013002160

Tuesday, December 22, 2015

दिल्ली में लें चेन्नई का सच्चा स्वाद

अगर आप दिल्ली में रहकर सच्चे दक्षिण भारतीय व्यंजनों का स्वाद लेना चाहतें और खासकर चेन्नई का तो पहुंचे सरवणभवन। सरवण भवन दिल्ली के दिल कनाट प्लेस में स्थित है। चेन्नई शहर में सरवण भवन के 20 के करीब ब्रांच हैं। पर अब चेन्नई का ये प्रसिद्ध रेस्टुरेंट न सिर्फ दिल्ली बल्कि दुनिया के कई देशों तक पहुंच चुका है।

दिल्ली में सरवण भवन में सुबह नास्ता, दोपहर का खाना या रात के डिनर के समय जा सकते हैं। मसाला डोसा  के अलावा आप यहां पर मिनी टिफिन का स्वाद लें। 125 रुपये की थाली में एक मिनी डोसा, चार मिनी इडली, उपमा और रवा केसरी ( यानी सूजी हलवा)। साथ में सांभर, चटनी तो होगी ही। ये एक टिकट में कई तमाशा जैसा डिश है। इसके अलावा यहां आप पारंपरिक तमिल थाली का भी आनंद ले सकते हैं जो 195 रुपये की है। मसाला डोसा 120 रुपये का है। 

डोसा का स्वाद बिल्कुल चेन्नई जैसा है। हालांकि दिल्ली में इसकी दरें चेन्नई से महंगी हैं। लेकिन उसी तरह प्लेट में परंपरागत केले के पत्ते पर व्यंजन परोसे जाते हैं। सभी दरों पर वैट और टैक्स अलग से लगता है। आप यहां पेमेंट क्रेडिट कार्ड से भी कर सकते हैं। सरवण भवन ने टेक अवे और होम डिलेवरी का भी यहां पर इंतजाम किया हुआ है। आमतौर पर दिल्ली के सरवण भवन में शाम को हमेशा भीड़ रहती है। खास तौर पर परिवार के साथ खाने वाले यहां खूब पहुंचते हैं। सरवण भवन के सांबर बनाने का अपना स्टाइल है जो उनके नाम से ही प्रसिद्ध है। यह ज्यादा तीखा नहीं होता,  इसलिए बच्चे भी आराम से खा लेते हैं।

दक्षिण भारत में सरवण भवन की 31 रेस्टोरेंट खुल चुके हैं जबकि उत्तर भारत में दो। दिल्ली में कनाट प्लेस में जनपथ और शिवाजी स्टेडियम के पास इनकी मौजूदगी है। वे साल 2003 से दिल्ली में हैं। तमिलनाडु में चेन्नई के अलावा कांचीपुरम, तूतीकोरीन में भी उनकी मौजूदगी है। विदेशों में दुबई, ओमान, मस्कट, हांगकांग समेत 12 देशों में 46 से ज्यादा आउटलेट फ्रेंचाइजी स्तर पर काम कर रहे हैं।

वैसे सरवण भवन का इतिहास ज्यादा पुराना नहीं है। इसकी शुरुआत 1981 में एक रेस्टोरेट के तौर पर हुई थी। इसकी शुरुआत तमिलनाडु के तूतीकोरीन के रहने वाले पी राजगोपाल ने की थी। अब उनकी दूसरी पीढ़ी रेस्टोरेंट का कारोबार देखती है। राजगोपाल के पिता किसान थे और प्याज का कारोबार करते थे। 1973 में चेन्नई आकर उन्होंने केके नगर में  एक जनरल स्टोर खोला। बाद में 1981 में इसी इलाके में पहला सरवण भवन नामक रेस्टोरेंट खोला जो आज दुनिया का बड़ा ब्रांड बन चुका है। लोकप्रियता का ये आलाम है कि कई शहरों  सरवण भवन नाम से रेस्टोरेंट खुल गए हैं जो मूल सरवण भवन के हिस्सा नहीं हैं।  ( http://www.saravanabhavan.com/)



Sunday, December 20, 2015

रेलवे की विरासत- मुजफ्फरपुर पहुंचा डेहरी-रोहतास का लोकोमोटिव

कभी डेहरी रोहतास लाइट रेलवे की मातृ कंपनी रोहतास इंडस्ट्रीज लिमिटेड को अपनी सेवाएं देने वाला लोकोमोटिव अब मुजफ्फरपुर जंक्शन रेलवे स्टेशन के बाहर शान से विराजमान है। ये लोकोमोटिव आते जाते लोगों को स्टीम इंजन ( भाप से चलने वाले) दौर की याद दिलाता है। जो लोग सन 2000 के बाद पैदा हुए हैं उन्होंने भारतीय रेलवे में स्टीम इंजन नहीं देखा होगा। क्योंकि आजकल ट्रैक पर डीजल या बिजली से संचालित इंजन ही दौड़ते हैं। वे इसे देखकर स्टीम इंजन के दौर को जान सकते हैं। कभी सिटी बजाता धुआं उड़ाया ये लोकोमोटिव अब शांत खड़ा है। पर मौन रहकर आपको इतिहास में ले जाता है।

पांच दिसंबर 2015 को पूर्व मध्य रेलवे के महाप्रबंधक एके मित्तल ने इसका लोकार्पण किया, जिससे आमजन को रेलवे के बारे में जानकारी मिल सके। पर यह 2005 से 2009 के मध्य रेलमंत्री रहे लालू प्रसाद यादव की संकल्पना थी जिन्होंने बंद पड़े रोहतास इंडस्ट्रीज का डालमियानगर से सारा कबाड़ खरीदने का फैसला किया। इस कबाड़ में कई लोकोमोटिव शामिल थे जिनमें से एक आरआईएल 06 भी था। अब इसे रंग रोगन करके रेलवे स्टेशन के बाहर लगा दिया गया है, जिसे आते जाते लोग कौतूहल से देखते हैं। हालांकि ऐसे लोकोमोटिव आप देश के कई बड़े शहरों के रेलवे स्टेशनों के बाहर देख सकते हैं, जो अपने क्षेत्र के रेलवे इतिहास की कहानी सुनाते हैं।



वाल्कन फाउंड्री का निर्मित लोकोमोटिव -  आरआईएल 06 नामक ये लोकोमोटिव ब्राडगेज ट्रैक ( 5 फीट 6 ईंच) का है जो रोहतास उद्योग समूह को 1967 से 1984 तक अपनी सेवाएं देता रहा। जब 1984 में रोहतास इंडस्ट्रीज पूरी तरह बंद हो गई तब से ये डालमियानगर के बीजी शेड में कबाड़ की तरह ही पड़ा था। लेकिन इसके पहले यह 1967 से 1983 तक रोहतास इंडस्ट्रीज को अपनी सेवाएं देता रहा।

इस लोकोमोटिव का निर्माण ब्रिटेन के लंकाशायर की कंपनी वालकन फाउंड्री ने 1908 में किया था। वालकन से ईस्ट इंडियन रेलवे ने कुल 10 लोकोमोटिव एक साथ खरीदे थे। यह पहियों के लिहाज से 0-6-4 टैंक मॉडल का स्टीम लोकोमोटिव है। इसने छह दशक तक ईस्ट इंडियन रेलवे को अपनी शानदार सेवाएं दीं।
(सभी फोटो - संतोष कुमार सारंग ) 

रोहतास इंडस्ट्रीज ने खरीदा -  कहते हैं लोहा कभी पुराना नहीं होता, अगर आप उसकी देखभाल करते रहें। इसलिए 60 साल पुराने लोकोमोटिव को रोहतास इंडस्ट्रीज ने अपने औद्योगिक इस्तेमाल के लिए खरीद लिया था। भले रोहतास इंडस्ट्रीज का कारोबार डालमियानगर में बंद हो गया और डेहरी रोहतास रेलवे भी बंद हो गया,  पर ये लोकोमोटिव अभी चालू हालत में थे। पर कई दशक तक शेड में पड़े पड़े ये कबाड़ में तब्दील होने लगे थे। बाद में ये सारा स्क्रैप रेलवे ने खरीद लिया। तो तकरीबन दो कंपनियों में आठ दशक तक धुआं उड़ाते हुए सफर करने वाला लोकोमोटिव अब मुजफ्फरपुर जंक्शन के बाहर लोगों के बीच कौतूहल बन कर खड़ा है।


( MUZAFFARPUR, VULCAN FOUNDRY LOCOMOTIVE, DEHRI ROHTAS LIGHT RAILWAY) 

Saturday, December 19, 2015

यादों में रचा बसा सोनपुर मेला

जब भी नवंबर महीना आता है देश के किसी भी कोने में रहूं, सोनपुर मेला जरूर याद आता है। कार्तिक गंगा स्नान के साथ ही सोनपुर मेले के तंबू गड़ जाते हैं। गंगा स्नान के लिए नारायणी (गंडक) और गंगा के संगम पर लाखों लोगों की भीड़ उमड़ती है। पश्चिम की तरफ सोनपुर और पूरब की तरफ हाजीपुर में नदी तट  पर कई किलोमीटर तक श्रद्धालुओं की स्नान का पुण्यलाभ पाने के लिए भीड़ उमड़ती है। इधर कई सालों से वैशाली और सारण जिला प्रशासन की ओर से स्नानार्थियों के लिए बेहतर इंतजाम भी किए जा रहे हैं। गंगा स्नान के साथ ही सोनपुर मेला शुरू हो जाता है जो अब एक महीने तक चलता है। पहले आधिकारिक तौर पर मेला सिर्फ 15 दिनों का होता था। लेकिन यह आगे भी 20 से 30 दिनों तक चलता रहता था। 

सोनपुर मेला उसी पौराणिक जगह पर लगता है जहां कभी गज और ग्राह में भयंकर युद्ध हुआ था। गज (हाथी) विष्णु का भक्त था, ऐसी मान्यता है कि उसे बचाने के लिए विष्णु स्वयं यहां आए थे। इसलिए ये हरिहर क्षेत्र है। इलाके में लोग उसे हरिहर क्षेत्र का मेला कहते हैं। तो वज्जिका के अपभ्रंश में गांव गांव के लोग छतर मेला कहते हैं।

वह साल 1978 था, जब मैं दूसरी कक्षा का छात्र था। पिता जी के साथ पहली बार सोनपुर मेले में गया था। वहां से मेरे लिए एक स्वेटर खरीदा गया था। 40 रुपये में। इसी मेले में पहली बार मैंने मसाला डोसा खाया था। पूर्वोत्तर रेलवे महिला समिति के स्टाल पर।

हाथी बाजार - तो जनाब सोनपुर मेले में जब हाजीपुर की ओर से पुराने लोहे पुल से गुजरते हैं तो सबसे पहले आता है हाथी बाजार। मेले में बिकने आए हाथियों को महावत गंडक नदी में नहलाने के बाद उन्हें रंग रोगन से सजाते हैं। उनकी पीठ पर रंगीन चंदोबे लगाए जाते हैं। हर साल ये खबर बनती है कि अमुक हाथी इतना महंगा बिका। हालांकि अब हाथी पालने शौक कम होता जा रहा है पर मेले में अभी हर साल सैकड़ो हाथी बिकने आते हैं। हाथी ही क्यों बैल, गाय भैंस, ऊंट सब कुछ बिकता है। चिड़ियों के लिए तो अलग से चिड़िया बाजार है यहां। भले मेला खत्म हो जाए चिड़िया बाजार सालों भर चिड़िया बाजार ही कहलाता है।

मीना बाजार - मेले का खास आकर्षण मीना बाजार होता है। इसमें कास्मेटिक के सामान बिकते हैं। लखनऊ का मीना बाजार, मुंबई का मीना बाजार तो दिल्ली का मीना बाजार घूमते जाइए। बिहार में एक शहर है लखीसराय। यह शहर सुहाग की निशानी सिंदूर बनाने के लिए जाना जाता है। 

सोनपुर मेले में कई सिंदूर कंपनियों को स्टाल आते हैं। इन स्टालों में पर अक्सर सिंदूर का पैकेट खरीदने पर कैलेंडर मुफ्त में मिलता था। ये सिंदूर कंपनियां ज्यादातर बिहार के लखीसराय की होती हैं। मेले में आने वाले लोग ठाकुर प्रसाद वाराणसी के स्टाल से भी पांचांग कैलेंडर ले जाना नहीं भूलते। मेले का प्रमुख आकर्षण होता है कश्मीर से आने वाली कश्मीरी शॉल की दुकानें। कश्मीरी शाल के कद्रदान यहां जरूर पहुंचते हैं। इसके साथ ही अलग अलग जिलों के खादी भंडार से स्टाल मेले में आते हैं।

थियेटर और कैबरे - एक समय तक सोनपुर मेले में थियेटर और कैबरे खास आकर्षण होते थे। कानपुर का गुलाब थियेटर, शोभा थियेटयर की खूब धूम रहती थी। पर बाद में अश्लीलता का आरोप लगने पर इनकी आवक बंद हो गई। बिहार सरकार का सूचना एवं जनसंपर्क विभाग और पर्यटन विभाग मेले के लिए खास इंतजाम करता है। सूचना जनसंपर्क विभाग के स्थायी पंडाल में रोज सांस्कृतिक आयोजन होते हैं। इसमें लोकगीतों की खूशबु महसूस की जा सकती है। अब मेला सरकारी तौर पर एक महीने का होता है। तो आप रोज मेले में संगीत का आनंद ले सकते हैं।

पर मेला इतना ही नहीं है। यहां लकड़ी के फर्नीचरों का भी बाजार होता है। मेला खत्म होने तक फर्नीचर सस्ते होने लगते हैं। कई लोग इंतजार करते हैं सस्ती खरीदारी का। पुरानी पीढ़ी के लोग बताते हैं कि कभी मेले में सब कुछ बिकता था। यहां तक की गुलाम भी बिकते थे। बदलते वक्त के साथ मेला बदल रहा है। मेले में आने वाले तमाम उत्पाद अब बाजार में भी मिलने लगे हैं। पर सोनपुर मेले का आकर्षण कम नहीं हुआ है। 

 साल 1978 के बाद अनगिनत साल मेले में लगातार जाने का मुझे मौका मिला और मेले की बदलती फिजां को महसूस भी किया। पर इन बदलाव के बीच मेले का का आकर्षण कम नहीं हुआ। सोनपुर से बहुत दूर रहता हूं। पर दिल के किसी कोने में तो सोनपुर मेले की खुशबू रची बसी रहती है।

 ( SONEPUR FAIR, HAJIPUR, BIHAR TOURISM, ELEPHANT, MEENA BAJAR, HARIHAR NATH TEMPLE, GANGA GANDAK RIVER) 

कुछ और खरीददारी हो जाए घर और परिवार के लिए....सोनपुर मेला आज भी गांव से आने वाले लोगों के लिए साथ ही शहरी लोगों के लिए बड़ा आकर्षण रखता है।
सिंदूर. चंदन और भी बहुत कुछ मिलता है मेले में...
चलो झूला झूलें....सोनपुर मेले में



Friday, December 18, 2015

चांदनी चौक की गलियों का स्वाद – जयतारा स्वीट्स

वैसे तो पुरानी दिल्ली की जिस गली से आप गुजरें उसकी कुछ खास बात जरूर है। पर हम जा पहुंचे सोने चांदी के गहने बेचने वाले पुराने दरीबा बाजार के पास गली पीपल में। मुहल्ले का नाम है धर्मपुरा। इस मुहल्ले में एक छोटी सी दुकान दिखाई देती है जयतारा स्वीट्स। वैसे तो दुकान देखने में छोटी है पर है कई दशकों पुरानी। महज कुछ चीजें रोज यहां बनती हैं। पर इसके स्वाद के दीवाने देश के बाहर तक हैं। विदेशी सैलानियों पुरानी दिल्ली की गलियां दिखाने वाले टूरिस्ट गाइड जब यहां पहुंचते हैं तो इस मिठाई और नमकीन की दुकान के स्वाद के बारे में बताते हैं। ये दुकान एक जैन परिवार द्वारा संचालित है। इसलिए खान पान की शुद्धता में जैन परंपराओं का काफी ख्याल रखा जाता है। इस दुकान को 1944 में ताराचंद जैन (सोनीपत वाले) ने अपने पिता बद्री प्रसाद जैन के साथ आरंभ किया था।


इस दुकान से जुड़े तीसरी पीढ़ी के सख्श सतीश भारती बताते हैं कि जैन धर्म के अनुसार छने हुए जल का अपना महत्व होता है तो जयतारा स्वीट्स में केवल छने हुए जल का ही इस्तेमाल किया जाता है। आपको दुकान के नल पर हमेशा जल को छानने के लिए छन्नी लगी दिखाई देगी। व्यवहार में शुद्धता का निर्वाह करना बहुत मुश्किल  काम है। पर ऊंचे धार्मिक मूल्यों के कारण जयतारा स्वीट्स में इन नियमों का पालन सात दशकों से करता आ रहा है।

मटर समोसा और घेवर - जयतारा स्वीट्स का मटर समोसा फेनी और घेवर काफी लोकप्रिय है। मौसम के बदलते मिजाज और त्योहारों की रंगत को ध्यान में रखते हुए यहां पर खास किस्मों की मिठाइयां बनाई जाती हैं। यहां की मसालेदार खस्ता कचौड़ी और मटर के समोसे मशहूर हैं, जिनके साथ आलू की सब्जी की बजाय खास तौर पर बनी मेथी की चटनी परोसी जाती है। इसके अलावा यहां आप लजीज कचौड़ी और नमकीन का भी स्वाद ले सकते हैं।

आलू जिमीकंद नहीं - जैन सिद्धांतों के मुताबिक जमीन के अंदर उगने वाले खाद्य पदार्थ जैसे आलू, गाजर मूली आदि खाने को वर्जित बताया गया है। इसलिए यहां समोसे में आलू नहीं डाला जाता। वे खास तौर पर मटर समोसा बनाते हैं। साल के उन दिनों भी जब मटर महंगा होता है यहां मटर समोसा ही बनता है। त्योहारों के मौसम में यहां घेवर की मांग खूब बढ़ जाती है। जो एक बार जयतारा की मिठाई खा लेता है उनके स्वाद का मुरीद हो जाता है। यहां बनी मिठाइयों में चांदी के वर्क का इस्तेमाल नहीं किया जाता। 2015 में ताराचंद जैन नहीं रहे पर उनके द्वारा खोली गई ये दुकान अपने स्वाद का जादू बिखेर रही है।

कैसे पहुंचे – पता है - 2283 धर्मपुरा, दरीबा, चांदनी चौक। जयतारा स्वीट्स तक पहुंचने के लिए आप लालकिला से फतेहपुरी मसजिद की तरफ चलते समय बायीं तरफ स्थित दरीबा कला बाजार में पहुंचकर गली पीपल पूछिए। संकरी गलियों से होते हुए आप यहां पहुंच जाएंगे। (फोन -9811008716,9811025210)

( CHANDNI CHAUK, JAITARA SWEETS, MATAR SAMOSA, GHEWAR, FENI, OLD DELHI, GALI PIPAL)

Thursday, December 17, 2015

आगरा का लालकिला- कभी था बादलगढ़

दिल्ली का लालकिला तो देश भर में प्रसिद्ध है पर एक लाल किला आगरा में भी है। लाल किला क्यों.. क्योंकि यह लाल पत्थरों से बना है। अगर आकार की बात करें तो आगरा का लालकिला दिल्ली से भी विशाल है। यह 1983 से ही यूनेस्को की विश्वदाय स्मारकों की सूची में शामिल है। पर ताजमहल देखने आने वाले सैलानी कम ही आगरा के किले में पहुंचते हैं। इसे किला ए अकबरी के नाम से भी जानते हैं।

कहा जाता है कि यह किला मूल रूप से 11वीं सदी का है। कभी इसका नाम बादलगढ़ हुआ करता था। क्योंकि इसका पुनर्निर्माण सिकरवार राजपूत राजा बादल सिंह बनवाया था। इस किले में दिल्ली के शासक सिकंदर लोदी ( 1488-1517) के रहने का भी प्रमाण मिलता है। सिंदकर लोदी के काल में आगरा को देश की दूसरी राजधानी बनने का गौरव प्राप्त हुआ। पानीपत की लड़ाई में पराजित होने तक उसका बेटे इब्राहिम लोदी के कब्जे में ये किला रहा। इसके बाद ये किला बाबर के कब्जे में आ गया।1530 में इसी किले में हिमायूं का राज्याभिषेक हुआ। 

1540 में हुमायूं के शेरशाह से पराजित होने के बाद यह किला सूरी वंश के कब्जे में आ गया। 1555 में हुमायूं इस किले पर दुबारा कब्जा कर सका। 1556 के पानीपत की दूसरी लड़ाई में हेमचंद्र विक्रमादित्य को पराजित करने के बाद अकबर इस किले में 1558 में आया। अकबर का समकालीन इतिहासकार अबुल फजल भी इस किले को बादलगढ कहता है। हालांकि तब यह बदहाल था, अकबर ने राजस्थान से लाल पत्थर मंगाकर इस किले को भव्य रूप में बनवाया। तकरीबन 4000 शिल्पी ने लगातार काम करके 8 साल में इस किले को नया रूप प्रदान किया। 1573 से यह किला अब इस रूप में दिखाई दे रहा है। बाद में यह किला मराठों के अधिकार में भी लंबे समय तक रहा। पर 1803 में यह किला ब्रिटानिया हुकुमत के अधीन आ गया।

आगरा का यह किला 94 एकड़ में विस्तारित है। यह अर्धवृताकार संरचना में है। इसमें कुल चार प्रवेश द्वार हैं जो चार तरफ खुलते हैं। खिजरी गेट यमुना नदी की तरफ खुलता है। पर इसमें दिल्ली गेट और लाहौर गेट प्रमुख हैं। चार दरवाजों में दिल्ली गेट सबसे विशाल है। इसके निर्माण में संगमरमर का इस्तेमाल हुआ है। इस गेट के अंदर जाने पर आपको हाथी गेट दिखाई देता है। यहां दो विशाल हाथी स्वागत द्वार पर बनाए गए हैं। हालांकि आगरा का किला देखने आने वाले सैलानी इसमें लाहौर गेट ( या अमर सिंह गेट) से प्रवेश करते हैं। दिल्ली गेट का इलाका सेना के कब्जे में है। इसलिए आप किले का पूरा हिस्सा नहीं घूम सकते हैं।

किले के अंदर देखी जाने वाली इमारतों में दीवान-ए-आम प्रसिद्ध है। यहां से राजा आम जनता को दर्शन देते थे और उनकी समस्याएं सुनते थे। इसके अलावा किला में दीवाने खास है जो राजा का आवास हुआ करता था। किले के जहांगीर महल है जिसका निर्माण अकबर के बेटे जहांगीर ने करवाया था। किले के अंदर शीश महल, खास महल, अंगूरी बाग, मीना मस्जिद, नगीना मस्जिद और मीना बाजार भी है। किले के अंदर मुसम्मन बुर्ज है जहां से ताजमहल का नजारा दिखाई देता है। पर यह बुर्ज सैलानियों के लिए बंद है। कहा जाता है औरगंजेब ने अपने पिता शाहजहां को इसी बुर्ज में कैद रखा था।

कैसे पहुंचे – आगरा का किला ताजमहल से ढाई किलोमीटर उत्तर पश्चिम की तरफ स्थित है। आप बस स्टैंड और आगरा के प्रसिद्ध घी मंडी से भी आगरा का किला आसानी से पहुंच सकते हैं।
प्रवेश -  किले में प्रवेश लाहौर गेट की ओर से होता है। आगरा का किला भारतीय पुरात्तव सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित इमारत है। किले में प्रवेश के लिए 20 रुपये का टिकट लेना पड़ता है। यह किला सैलानियों के लिए सातों दिन खुला रहता है।
vidyutp@gmail.com  
( REMEMBER IT IS A WORLD HERTAGE SITE, AGRA, RED FORT, BADALGARH, TAJ MAHAL, HUMAUN) 


Wednesday, December 16, 2015

तेलंगाना के जंगलों से होकर दूरंतो से दिल्ली...

हैदराबाद से दिल्ली का सफर न जाने कितनी बार किया है। पर खास तौर पर हैदराबाद शहर से ट्रेन के बाहर निकलने के बाद महाराष्ट्र में प्रवेश करने तक के कुछ घंटे निहायत सुहाने लगते हैं। क्योंकि इस दौरान ट्रेन तेलंगाना राज्य के कई जिलों से होकर गुजरती है। आबादी कम नजर आती हैं। मस्ती में बातें करते जंगल ज्यादा नजर आते हैं।
हैदाराबाद से काजीपेट तक का रास्ता मैदान और पहाड़ का मिलाजुला रूप नजर आता है। पर इसके बाद वन क्षेत्र की शुरुआत हो जाती है। कभी ये सारा इलाका आंध्र प्रदेश का हिस्सा था पर अब सब कुछ वैसा ही है पर राज्य के एपी की जगह तेलंगाना हो गया है। काजीपेट वारंगल शहर का बाहरी हिस्सा है। यहां से हैदराबाद के लिए रेलवे लाइन अलग हो जाती है। अगर आप दिल्ली की तरफ से हैदराबाद के लिए जा रहे हैं तो रेल वारंगल शहर से पहले काजीपेट जंक्शन से मार्ग बदल कर आगे बढ़ जाती है।


रामागुंडम - एनटीपीसी का सुपर थर्मल पावर स्टेशन  ( सौ- एनटीपीसी) 

ट्रेन आगे बढ़ती है और आता है रामागुंडम रेलवे स्टेशन। यह तेलंगाना के करीमनगर जिले में आता है। रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म का उदघोषणा हो रही है, रामागुंडम रेलवे स्टेशन वेलकम्स यू... यह तेलंगाना राज्य आबादी में पांचवा बड़ा शहर है। गोदावरी नदी के तट पर बसे इस शहर में एनटीपीसी का थर्मल पावर स्टेशन भी है। इसकी उत्पादन क्षमता 2600 मेगावाट है। यह एक सुपर थर्मल पावर स्टेशन है, जहां कोयला, हाइड्रो, गैस और नवीकरणीय ऊर्जा यानी चार तरीके से बिजली बनाई जाती है।


रामागुंडम से 14 किलोमीटर आगे आता है मंचरियाल। यह आदिलाबाद जिले में पड़ता है। यह भी गोदावरी नदी के तट पर दूसरी तरफ है। मंचरियाल से कोई 20  किलोमीटर आगे आता है बेलामपल्ली। बेलामपल्ली में कोयले की खाने हैं। इसके बाद 40 किलोमीटर बाद आता है सिरपुर कागजनगर। सिरपुर आदिलाबाद जिला में पड़ता है। कागज नगर नाम इसलिए हैं क्योंकि यहां पेपर मिल है। सिरपुर पेपर मिल्स को 1942 हैदराबाद के निजाम ने शुरू किया था। इससे साबित होता है कि निजाम राजकाज के साथ व्यापार में हाथ आजमा रहे थे। सिरपुर के बाद ट्रेन तेलंगाना के घने जंगलों के बीच दौड़ती है।
 
वर्धा नदी के पुल से हैदराबाद में घुसी थी भारतीय सेना
छोटे से स्टेशन मकुदी से महाराष्ट्र राज्य आरंभ हो जाता है। इन्ही घने जंगलों के बीच विरूर रेलवे स्टेशन आता है। विरूर महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले में पड़ता है। इसके बाद आता है विहिरगांव। यहां भी दोनों तरफ घने जंगल दिखाई देते हैं। इसके बाद आता है मानिकगढ़। चंद्रपुर जिले में स्थित मानिकगढ़ में सीमेंट और कपड़े के उद्योग हैं।


मानिकगढ़ के पास वर्धा नदी पर पुल आता है और ट्रेन महाराष्ट्र में प्रवेश कर जाती है। इसी वर्धा नदी के पुल से होकर भारतीय सेना ने आंध्र प्रदेश में 13 और 14 सितंबर के मध्य 1948 में प्रवेश किया था और निजाम की फौज से लोहा लिया था। इस पुल को पार कर सेना आदिलाबाद जिले में पहुंची जो तब हैदराबाद का हिस्सा था। पुराना रेल पुल एकमात्र जरिया था हैदराबाद प्रांत में प्रवेश करने का। हालांकि तब निजाम की ओर से इस पुल के नीचे विस्फोटक लगाए गए थे, जैसे ही भारतीय सेना पुल पर पहुंचे पुल को उड़ा दिया जाए। पर जिस इंजीनियर की पुल उड़ाने के लिए ड्यूटी लगी थी उसे कोई आदेश नहीं मिला निजाम की ओर से। यह संचार में असफलता थी और सेना सफलतापूर्वक हैदराबाद प्रांत में घुस गई। एक तरह से हम मानें तो वर्धा नदी का यह पुल केंद्रीय भारत और दक्षिण भारत की सीमा रेखा है।


इसके बाद आता है बड़ा स्टेशन बल्लारशाह। बल्लारशाह महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले में पड़ता है। मिनी इंडिया कहलाता है। यहां पर पेपर मिल है। बल्लारपुर इंडस्ट्रीज लिमिटेड। सबसे बड़ा राइटिंग और प्रिंटिंग पेपर बनाने वाला मिल। थापर समूह का मिल है ये । ये वर्धा नदी के किनारे है। पहले सिरपुर राजधानी थी बल्लारदेव की। बल्लार ने राजधानी परिवर्तन कर  बल्लारशाह नगर बसाया। वैसे बल्लारशाह में कुल 9 कोलफील्ड की ईकाइयां हैं।
 - विद्युत प्रकाश मौर्य   -vidyutp@gmail.com
(KAZIPET, WARANGAL, WARDHA RIVER, BALLARSHAH, RAMAGUNDAM, CHANDRAPUR, ADILABAD, SIRPUR KAGAZ NAGAR, PAPER MILL)