Wednesday, December 31, 2014

मनाली में घर है अटल बिहारी वाजपेयी का

मनाली में अपने आवास में अटल जी ( 2002 पीआईबी फोटो) 
मनाली  से अटल बिहारी वाजपेयी को खास लगाव था। उन्हें ये हिल स्टेशन काफी पसंद आ गया था। लिहाजा व्यास नदी के दरिया के उस पार भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का स्थायी घर है। प्रिनी के लोग इस बात का गर्व करते हैं कि वे अटल जी के पड़ोसी हैं। जब तक स्वस्थ रहे अटल बिहारी वाजपेयी हर साल यहां छुट्टियां मनाने आते थे। टूरिस्ट गाइड  मनाली की सैर करने आने वाले लोगों को  शान से वह घर भी दिखाते हैं  जिसमें कभी अटल जी छुट्टियों में रहे के लिए आते थे।  इस घर  से व्यास दरिया का  बड़ा ही खूबसूरत नजारा दिखाई देता है। साथ का चित्र साल 2002 का जब  छुट्टियों के दौरान अटल जी मनाली में अपने मंत्री मंडल के सहयोगी जार्ज फर्नाडिज से बातें करते हुए दिखाई दे रहे हैं। प्रधानमंत्री रहने के दौरान भी हर साल वाजपेयी मनाली में छुट्टियां मनाने आते थे। वाजपेयी अंतिम बार इस गांव में स्थित घर में जून 2006 में आए थे। उसके बाद से इस घर में कोई नहीं आया। मनाली के इसी आवास में प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने आजतक के पत्रकार दीपक चौरसिया को एक इंटरव्यू दिया था। हालांकि वे मनाली में छुट्टियां बीताने के दौरान निहायत अकेले रहना पसंद करते थे। 


उड़ने की तमन्ना भला किसे नहीं होती....
मनाली का एक खूबसूरत हिस्सा है सोलांग वैली। यहां का नजारा कई हिंदी फिल्मों में दिखाया जा चुका है। हर भरी घाटी का लैंडस्केप काफी शानदार दिखाई देता है। इस वैली  में काफी लोग पारा ग्लाइडिंग का मजा भी लेते हैं। जब हम सोलांग वैली पहुंचे तो कई पारा ग्लाइडिंग वाले हमारे पीछे पड़ गए। बोला 400 रुपये में आपको उडा देंगे। जब हमने रूचि नहीं दिखाई तो वे थोड़ी रियायत करने को भी तैयार हो गए। एक एजेंट ने कहा, एक बार कोशिश करो, हवा में उडऩे की तमन्ना भला किसकी नहीं होती। मन अंदर के कुलबुला रहा था। पर डर भी था। सामने मदमस्त व्यास दरिया कुलांचे मार रही थी। हमारा ग्लाइडर अगर सीधे दरिया में जाकर गिरा तो। भला हवा के रुख को कौन जानता है। हमें याराना फिल्म की याद आई। इसमें अमिताभ बच्चन के दोस्त अमजद खान एक ग्लाइडर लेकर गांव में आते हैं।

 अमिताभ इसमें उड़ते हैं पर थोड़ी देर बाद वे एक पेड़ पर लटके पाए जाते हैं। हमने वही दृश्य याद कर सोलांग वैली में हवा में उडने का इरादा त्याग दिया। पर उस गाइड की लाइने हमेशा याद आती हैं – उड़ने की तमन्ना भला किसे नहीं होती। बाद में सुश्मिता सेन की फिल्म जोर समेत कई फिल्मों की शूटिंग मनाली में हुई।


सोलांग वैली से दूसरी तरफ मनाली से तीन किलोमीटर की दूरी पर एक इलाका वशिष्ठ है। यहां पर एक गर्म पानी का झरना है। कहा जाता है यहां के कुंड का पानी सल्फरयुक्त है जिसमें स्नान करने से कई तरह के चर्म रोग दूर हो जाते हैं। अगर आपको मनाली के सारे होटल भरे हुए मिलें तो आप वशिष्ट में भी जाकर ठहर सकते हैं।


मनाली में एचपीडीसी का होटल व्यास। 
मनाली शहर की भोर अलसाई हुई होती है तो शाम जवां और रंगीन। शाम होते होते मनाली शहर के मुख्य बाजार में रौनक बढ़ने लगती है। यह शिमला के माल की तरह फैशन स्ट्रीट में तब्दील हो जाता है। लोग स्ट्रीट फूड का मजा लेते हैं। हनीमून युगल से सड़कें गुलजार हो जाती हैं। सुर्ख लाल लिपिस्टक में नव यौवनाएं सड़क को रौंदती हुई चलती हैं मानो सारी कयानात उन्ही की हो। देवदार के घने जंगलों के बीच चारों तरफ यौवन फूट पड़ता हुआ दिखाई देता है। रोशनी में नहाया शहर हर रोज दीवाली मनाता दिखाई देता है।

हम घूमते घूमते मनाली पहुंच तो गए थे। पर जुलाई में ठंड इतनी ज्यादो होगी इसका एहसास नहीं था। लिहाजा शाम गहराने पर हम कांपने लगे। खैर मनाली की सड़कों से लुधियाना के बने वूलेन स्वेटर की खरीद की गई और खुद को बचाने का इंतजाम किया गया।

-        ----  विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com

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Sunday, December 28, 2014

मनाली की वादियों में हिंदी फिल्में

हिमाचल के सुंदरतम पर्यटन स्थलों में शुमार मनाली में कई हिंदी और दक्षिण भारतीय भाषा के फिल्मों की शूटिंग हुई है। साल 2014 में आई प्रियंका चोपड़ा की फिल्म 'मेरी कॉम' की शूटिंग मनाली में हुई। वास्तव में इसके सीन मणिपुर में फिल्माए जाने थे। पर सुरक्षा कारणों से इसकी शूटिंग मनाली में की गई।
ह्रितिक रोशन और कटरीना कैफ की जोड़ी वाली फिल्म बैंग बैंग की 2014 में काफी शूटिंग मनाली में हुई। इस फिल्म के प्रोडूसर फॉक्स स्टार स्टूडियोज है। वहीं निखिल आडवाणी भी अपनी आने वाली फिल्म हीरो (2015) की शूटिंग मनाली की वादियों में कर रहे हैं।

मनाली में करन जौहर की फिल्म `ये जवानी है दीवानी  की शूटिंग हुई है। फिल्म की अभिनेत्री दीपिका पादुकोन अपनी पढाई से ब्रेक के लिए इत्तेफाक से मनाली के उसी ट्रिप पर जाती है। मनाली की सड़कों पर हास्य के पुट के साथ एक लंबा एक्शन सीक्वेंस रखा गया है।
 फिल्म 'नॉटी एट फोर्टी' की कहानी के अंतिम चरण में कॉमेडी किंग गोविंदा व अनुपम ने सगाई की इस रस्म को कॉमेडी अंदाज के साथ बड़े ही अनोखे ढ़ंग से निभाया। इस दृश्य को मनाली में फिल्माया गया है।

जब वी मेट ( 2007)  की एक हिंदी रोमांटिक कॉमेडी फिल्म है जिसे इम्तियाज अली ने लिखा और निर्देशित किया। फिल्म में करीना मनाली में अंशुमन से शादी करने के लिए आदित्य के साथ घर से भाग जाती है।

थोड़ा पीछे चलें तो सलमान खान की तेरे नाम 1999 में निर्मित तमिल फिल्म 'सेतु' की रीमेक है| दिलचस्प बात यह है कि इस कहानी पर पहले कुल तीन कामयाब ... और इसके गाने टॉप टेन में छाए रहे| सुपरहिट गाना 'ओढनीओढ़ के' और 'तुमसे मिलनामनाली की घाटियों में फिल्माया गया  है सुष्मिता सेन और सन्नी दयोल की फिल्म 1997 में आई जोर के एक बड़े हिस्से की शूटिंग भी मनाली में की गई। जिंदगी ना मिलेगी दोबारा में सब कुछ स्पेन में होता हैं और इस फिल्म में मनाली और उदयपुर भी शामिल हैं।

पुरानी फिल्म पराया धन (1971 में बनी)  की शूटिंग मनाली में हुई। इस फिल्म में हेमा मालिनी, राकेश रोशन हैं। फिल्म का एक गाना था - आज उन से पहली मुलाकात होगी, फिर आमने सामने बात होगी, फिर होगा क्या, क्या पता, क्या खबर.... अनदेखा अन्जाना मुखड़ा कैसा होगा? ना जाने वो चाँद का टूकड़ा कैसा होगा? मिलते ही उन से नज़र, हाय दिल में एक बेकरारी सी दिनरात होगी.....इस गाने में व्यास दरिया और हरी भरी वादियां दिखाई जेती हैं। गाने में देवदार के जंगलों का भी सुंदर नजारा है।

राजेश खन्ना की फिल्म आपकी कसम (1974 ) के काफी सीन मनाली में शूट किए गए। राजकपूर की आखिरी फिल्म हीना (1991) के काफी दृश्य मनाली में शूट किए गए। राजकपूर ने हीना के लिए मनाली में ही पाकिस्तान रच डाला। 

-    विद्युत प्रकाश मौर्य
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Thursday, December 18, 2014

रोरिक का नग्गर और देविका रानी

मनाली में हमारी तीसरी सुबह थी। माता जी और पिताजी को घूम घूम कर थक चुके थे। वे अलसा रहे थे। पर हम लोग मनाली के चप्पा चप्पा घूम लेना चाहते थे। वैसे तो मनाली का पूरा रसास्वादन करने के लिए तीन दिन काफी नहीं है। सुबह की धूम खिली थी। हमारे सामने दो विकल्प थे, वशिष्ठ और नग्गर। हमने नग्गर जाने की योजना बनाई। नास्ते के बाद हम लोकल बस में बैटे। ये बस नग्गर होते हुए जाती थी कुल्लू की ओर।

खालिस दूध की चाय - हमारी बगल वाली सीट पर एक सज्जन बैठे थे वे दूध बेचकर अपने गांव लौट रहे थे। बताया कि यहां मैं रोज सुबह बस से दूध बेचने आता हूं और लौटते समय अपना प्रिय अखबार अमर उजाला लेकर लौटता हूं। वे दूध 6 रुपये किलो बेचते हैं। साल 2001 में दूध का जालंधर में भाव 20 रुपये के आसपास था। मनाली में इतना सस्ता दूध। हां जी हां। यहां दूध का उत्पादन तो है पर खपत नहीं। दूर भेजने में खर्च ज्यादा है। इसलिए दूध सस्ता है।

हमलोग नग्गर जाने वाले स्टाप पर बस से उतर गए। यहां से नग्गर के किले तक जाने के लिए रास्ता पदयात्रा करने वाला था क्योंकि हम कोई आरक्षित वैन लेकर नहीं आए थे। नग्गर किले की ओर पैदल चलते चलते चाय पीने की इच्छा हुई। एक चाय की दुकान में रूके। तीन निहायत खूबसूरत बालिकाएं चाय की दुकान चला रही थीं। उन्होंने बताया चाय 2 रुपये कप है। जब उन्होंने चाय बनाई तो खालिश दूध की। यानी दूध पत्नी 2 रुपये कप। अरे भाई उपर बताया था न यहां दूध काफी सस्ता है। चाय की चुस्की साथ उन बालिकाओं ने बताया आजकल यहां किसी दक्षिण भारत के फिल्म की शूटिंग चल रही है। हमें उसमें एक्सट्रा का रोल करने का मौका भी मिला है। हम आगे बढ़े। सामने बोर्ड लगा था – उरूस्वाति हिमालयन रिसर्च इंस्टीट्यूट। और हम आ चुके थे महान पेंटर, दार्शनिक, कवि और मानवधर्मी रोरिक की दुनिया में।  उरुस्वाति संस्कृत का शब्द है जिसका मतलब है सुबह के तारे की रोशनी। रोरिक को भारतीय संस्कृति से अद्भुत लगाव था जो उसके पूरे जीवन और कार्यों में दिखाई देता है।
नग्गर केसल- जो अब हिमाचल टूरिज्म का होटल है।

रोरिक और मनाली - सुदूर रूस से आए एक कलाकार ने मनाली को अपनी साधना स्थली बनाया। 9 अक्तूबर 1874  को रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में जन्मे निकोलस के. रोरिक ने कई देशों में भटकने के बाद कुल्लू में अपना ठिकाना बनाया।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी रोरिक न केवल एक महान चित्रकार ही थे बल्कि पुरातत्ववेत्ता, कवि, लेखक, दार्शनिक और शिक्षाविद् थे। वे हिमालय में एक इंस्टीट्यूट स्थापित करना चाहते थे। इस उद्देश्य से उन्होंने राजा मण्डी से 1928 में हॉल एस्टेंट नग्गर  खरीदा।
कुल्लू की प्राचीन राजधानी नग्गर है और नग्गर किले के ऊपर है रोरिक आर्ट गैलरी ।  ये गैलरी मंगलवार से रविवार तक खुली होती है सुबह 10 से 5 बजे तक। सोमवार बंद।  संग्रह इतना शानदार है देखने में घंटों लग जाएं। यहां रोरिक का साहित्य भी उपलब्ध है। रोरिक नेहरू जी और राजकपूर के दोस्त थे।
निकोलस के रोरिक। 
 नग्गर किला जो प्राचीन काठकूणी  शैली का एक अद्भुत नमूना है। अब यह हिमाचल पर्यटन निगम का होटल है। होटल के ऊपर त्रिपुरा सुंदरी का पैगोडा शैली के मंदिर बना है। इसके ऊपर रोरिक की गैलरी। इसमें रोरिक के अद्भुत चित्र उसी पुरातन घर में प्रदर्शित हैं जिस में वे कभी वे रहा करते थे। इस छोटे से घर में निचली मंजिल में आर्ट गैलरी है । ऊपर की मंजिल में रोरिक का आवास है जिसे संरक्षित किया गया है। रोरिक ने 13 दिसम्बर 1947 को यहीं अंतिम सांस ली।

रोरिक की पत्नी एलीना लेवानोवना  भी लेखिका थीं। उनके बड़े बेटे यूरी निकोलेविच (1902-1960) प्रोफेसर थे। दूसरे बेटे स्वेतोस्लेव रोरिक भी चित्रकार रहे हैं जिनके बनाए जवाहर लाल नेहरू तथा इन्दिरा गांधी के पोट्रेट संसद भवन दिल्ली में लगे हैं। वे बेंगलुरू में रहते थे। उन्होंने हिंदी फिल्मों की नामचीन अभिनेत्री देविका रानी से विवाह किया था। उन दोनों की बेंगलुरू में सैकडो एकड़ जायदाद और  अन्य संपत्तियां थीं। स्वेतोस्लेव और देविका रानी की कोई संतान नहीं थी। देविका रानी की 9 मार्च 1994 को मृत्यु की बाद उनकी अकूत धन संपदा को लेकर काफी विवाद हुआ।

नग्गर से लौटते हुए हमें कई सेब के बाग मिले। कौतूहल था सेब देखकर। हम करीब गए। पेड़ों पर लदे सेब को छूकर देखा। पता चला रायल और गोल्डेन वेराइटी के सेब की खेती यहां होती है। बाग की मालकिन ने हमें कुछ सेब उपहार में दिए। जिन्हें लेकर हमें अतीव प्रसन्नता हुई।

हम रोरिक की तमाम यादें और उनकी कुछ पुस्तके वहां से लेने के बाद वापस मनाली अपने होटल में लौटे। ये सफर यादगार रहा। इस बीच पिता जी शिमला जाने वाली रात्रि बस में हम सबकी टिकटें बुक करा चुके थे। रात का डिनर मनाली में लेने के बाद हमलोग बस में बैठ गए। दिन भर के थकान के बाद नींद आ गई। सुबह हुई तो हमारी बस शिमला बस स्टैंड में खड़ी थी।

- विद्युत प्रकाश मौर्य ( जुलाई 2001)

Abhay Kumar I liked the place Naggar very much..a very beautiful place and the work done is simply unbelievable...

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Tuesday, December 16, 2014

रोहतांग – यहां व्यास मुनि ने किया था तप

रोहतांग के रास्ते में नास्ता ( जुलाई 2001)
मनाली में हमारा दूसरा दिन था और हमारी पूरी योजना रोहतांग दर्रे तक जाने की थी। रोहतांग को लेकर हमारे पास तरह-तरह की कहानियां मौजूद थीं। सो अब उसे पास से देखने का वक्त आ गया था। मनाली से रोहतांग 55 किलोमीटर आगे है। व्यास नदी का उदगम स्थल। हमने कई टैक्सी वालों से मोल भाव किया। हमारे परिवार के ले मारूति वैन उपयुक्त थी। पर वैन वालों ने बुकिंग ले ली साथ ही कहा कि जुलाई का महीना है अगर बारिश हो गई तो टूर कैंसिल हो जाएगा। हम भगवान से कामना कर रहे थे कि बारिश न हो।

संयोग से अगले दिन मौसम खिला खिला था। मनाली बस स्टैंड के पास गली में एक धर्मशाला है। यह मनाली में रहने की सबसे सस्ती जगह है। इस धर्मशाला में एक भोजनालय है जहां सबसे किफायती दरों पर भोजन और नास्ता मिल जाता है। हम जितने दिन मनाली में रहे, सुबह के नास्ते में यहीं पर पराठे खाते रहे। आठ रुपये में एक पराठा।

हमारी रोहतांग के लिए यात्रा सुबह नौ बजे आरंभ हो गई। व्यास नदी को पार करने के बाद चढ़ाई भरा रास्ता। यही रास्ता केलांग और लेह की ओर चला जाता है। जैसे जैसे सफर आगे बढ़ा चढाई बढ़ती गई और साथ में ठंड भी बढ़ती गई। थोड़ी दूर जाने के बाद जूते और वर्दियों की दुकाने आईं। हमारे टैक्सी ड्राइवर ने वहां गाड़ी रोक दी।  हम सबने अपने अपने नाप के बूट किराए पर लिए। साथ ही लंबे लंबे ओवरकोट भी। रोहतांग में ठंड बढ़ जाती है बर्फ भी गिरती है इसलिए पूरी तैयारी से जाना पड़ता है। बूट और ओवरकोट धारण करने के बाद हम सबका रंग रूप बदल गया। आगे व्यास नाला आया। यह रोहतांग से 20 किलोमीटर पहले है। ठंड बढ़ चुकी थी। पर कहीं बर्फ नहीं दिखाई दे रही थी।

 हमने एक रेस्टोरेंट में बैठकर नास्ता किया। आसपास की वादियां मनोरम थीं। फिर शुरू हुआ आगे का सफर। वैन वाले ने आराम से घुमाते हुए रोहतांग पहुंचा दिया। हालांकि रोहतांग में हमें दूर दूर तक बर्फ नहीं दिखाई दी। यहां गोलाकार बना हुआ व्यास कुंड जरूर दिखाई दिया। तमाम महिलाएं रंग बिरंगे हिमाचली ड्रेस लेकर घूम रही थीं। इन परिधानों को किराये पर लेकर लोग रोहतांग में तस्वीरें खिंचवाते हैं।

 रोहतांग दर्रा हिमालय पर्वत का एक प्रमुख दर्रा हैं। यह मनाली से लेह जाने के मार्ग में भी पड़ता है। 13,050 फीट (समुद्र तल से 3978 मीटर) की ऊंचाई पर स्थित रोहतांग दर्रे का पुराना नाम 'भृगु-तुंग' था, 'रोहतांग' नया नाम है। मेरी बहन ने बताया कि रोहतांग में रात में बस ट्रक या वाहन नहीं चलते हैं। कहा जाता है यहां रात में मरे हुए लोगों आत्माएं भटकती हैं। इसलिए यहां रात में रुकना खतरनाक माना जाता है। रोहतांग का रास्ता मई से नवंबर तक ही खुला रहता है। इस दौरान हिमाचल रोडवेज की बसें केलांग तक जाती हैं। नेशनल हाईवे घोषित मनाली केलांग मार्ग का रख रखाव सीमा सड़क संगठन ( बीआरओ) के जिम्मे है। भारी बर्फबारी, तेज बर्फीली हवाएं और शून्य से नीचे तापमान के कारण सड़क की देखभाल मुश्किल है। 
रोहतांग में व्यास कुंड के सामने पिताजी के साथ।

रोहतांग दर्रे से ब्यास नदी का उदगम हुआ है। हिन्दू ग्रंथ महाभारत लिखने वाले महर्षि वेद व्यास जी ने यहां लंबे समय तक तपस्या की थी। इसी लिए इस स्थान पर व्यास मंदिर बना हुआ है। रोहतांग में यहां पर व्यास नदी का उदगम स्थल है और यहीं पर वेद ब्यास ऋषि का मंदिर भी बना हुआ है।

कैसे पहुंचे - रोहतांग पास जाने के लिए मनाली-रोहतांग रास्ते में से सर्दी में पहनने वाले कोट और जूते किराये पर ले लेना चाहिए क्योंकि वहां बर्फ होगी तो आप को बिना इनके वहां घूमने में परेशानी आएगी। आप स्पेशल टैक्सी किराये पर करने की बजाय केलांग की तरफ जाने वाले बसों में बैठकर भी रोहतांग जा सकते हैं।

 रोहतांग में दिन भर अस्थायी दुकानें चलाने वाले लोग इसी तरह बस में बैठकर रोज आते जाते हैं। शाम को वापस घर लौट जाते हैं। लोग यहां रंग बिरंगे हिमाचली परिधान में तसवीरें भी खिंचवाते हैं। इन ड्रेस के किराये से उनके घर का चूल्हा जलता है। गरीब महिलाएं महज 10 रुपये में ड्रेस किराये पर देने की आरजू मिन्नत करती नजर आईं। 

रैला फॉल और नेहरु कुंड - रोहतांग से लौटते समय रास्ते में हम रैला फॉल के पास रुके। ये एक छोटा सा झरना है पर नजारा बड़ा दिलकश  है। मनाली से रोहतांग के रास्ते में एक नेहरू कुंड नामक जगह है। कहा जाता है कि यहां के सोते का पानी पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु पीने के लिए मंगवाते थे।


-         ----  विद्युत प्रकाश मौर्य ( जुलाई 2001 का सफर) 
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Sunday, December 14, 2014

पूरे कुल्लू में होती है हिडिंबा की पूजा

मनाली के आसपास हिडिंबा मंदिर, सोलंग घाटी, नग्गर किला, रोहतांग दर्रा और रहला जलप्रपात बहुत आकर्षक स्थान हैं। हमने अपने तीन दिन के मनाली प्रवास में पहले दिन की शाम हिडिंबा देवी मंदिर जाने को तय किया। मनाली बाजार से हिडिंबा मंदिर तक पैदल चलें तो पहाड़ों पर ट्रैकिंग का अच्छा अभ्यास हो जाता है।

घने देवदार के जंगलों के बीच मां हिडिंबा का मंदिर पैगोडा शैली में बना है। मंदिर मनाली बस स्टैंड से एक किलोमीटर से थोड़ा ज्यादा है। हिमाचल प्रदेश के मनाली शहर से कुछ ऊपर ढूंगरी नाम के स्थान में हिंडिबा देवी का मंदिर है। एक तो हिडिंबा जो राक्षसी थी और उसका मंदिर बना हुआ है। मनाली में ही नहीं, पूरे कुल्लू में हिडिंबा की पूजा होती है। मंदिर के अंदर काठ पर उकेरी गई देवी देवताओं की मूर्तियां है।


चढ़ाई जाती थी बलि - यहां जाने के लिए चढ़ाई चढ़नी पड़ती है। हिमाचल का ये एक ऐसा मंदिर है जहां बलि चढ़ाई जाती है। मंदिर परिसर में लटके जानवरों के सिंग इसकी गवाही देते हैं। यहां बकरे, मेंढे और भैंसे के सींग तो हैं ही, साथ ही यामू,टंगरोल और बारहसींगे के सींग भी टांगे दिखाई देते हैं। कुल्लू दशहरा में शरीक होने के लिए देवी हिडिंबा पशु बलि चढ़ाए जाने पर ही आगे बढ़ती हैं।  कुल्लू दशहरा का शुभारंभ देवी हिडिंबा को अष्टांगबलि देने के बाद होता है। ये प्रथा सदियों से चली आ रही है। हालांकि कुछ सालों से इस परंपरा रोक लगाई गई है।

महाभारत काल की हिडिंबा राक्षसी ने भीम के साथ विवाह किया था। मंदिर का निर्माण कुल्लू के शासक बहादुर सिंह (1546-1569 ई.) ने 1553 में करवाया था। दीवारें परंपरागत पहाड़ी शैली में बनी हैं। प्रवेश द्वार काठ नक्काशी का शानदार नमूना है। ये मंदिर भारतीय पुरातत्व विभाग की ओर से संरक्षित है। अप्रैल-मई में माता हिडिंबा मंदिर परिसर में छोटा दशहरा का मेला लगता है।


बलशाली घटोत्कच की मां हैं हिंडिंबा-  महाभारत काल में जब वनवास काल में जब पांडवों का घर (लाक्षागृह) जला दिया गया तो विदुर के परामर्श पर वे वहां से भागकर एक दूसरे वन में पहुंचे। वहां पीली आंखों वाला हिडिंब राक्षस अपनी बहन हिंडिबा के साथ रहता था। एक दिन हिडिंब ने अपनी बहन हिंडिबा से वन में भोजन की तलाश करने के लिये भेजा परन्तु वहां हिंडिबा ने पांचों पाण्डवों सहित उनकी माता कुंती को देखा।

भीम पर मोहित हो गईं हिडिंबा - यह राक्षसी को भीम को देखते ही उस पर मोहित हो गई। इस कारण इसने उन सबको नहीं मारा जो हिडिंब को बहुत बुरा लगा। फिर क्रोधित होकर हिडिंब ने पाण्डवों पर हमला किया, इस युद्ध में भीम ने हिडिंब को मार डाला और फिर वहां जंगल में कुंती की आज्ञा से हिंडिबा एवं भीम का विवाह हुआ। इनसे घटोत्कच नामक पुत्र हुआ। जिसने महाभारत की लड़ाई में अत्यंत वीरता दिखाई थी।

तो यह कहानी थी हिडिंबा देवी की। हिडिंबा देवी का मंदिर हिमाचल प्रदेश के उन चंद मंदिरों में है जिससे हिमाचल प्रदेश की पहचान है। साल 2008 मे दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले में हिमाचल पेवेलियन में घूमते हुए मनाली के इस हिडिंबा देवी मंदिर की प्रतिकृति दिखाई देती है। हालांकि बेटे अनादि मनाली नहीं गए पर इस मंदिर की प्रतिकृति के साथ फोटो खिंचवाने के लिए मचल उठे। बर्फबारी के दिनों में देवी का मंदिर श्वेत बर्फ की चादर से ढका हुआ बड़ा ही खूबसूरत दिखाई देता है।   


-          विद्युत प्रकाश मौर्य  vidyutp@gmail.com

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Friday, December 12, 2014

चंबा का चुक - अरे इतना तीखा


साडे चिडिए दा चंबा वे बाबुल अस उड़ जाना... जैसे गीत में चंबा का नाम आता है। पर चंबा और भी कई चीजों के लिए जाना जाता है। अपने सर्द मौसम के साथ ही बड़े ही तीखे मिर्च के अचार के लिए चंबा की पहचान है।

चंबा का चुक। यानी इतना तीखा की खाते ही जान निकल जाए. आपने कई तरह की मिर्च खाई होगी. कुछ मिर्च इतनी तीखी होती है कि आप देर तक सी सी करते हैं. कई लोगों को मिर्च का भरवां अचार पसंद है. पर आप कभी हिमाचल के चंबा का बना चुक चख कर तो देखना। नानी न याद आ जाए तो कहना।
वास्तव में चुक एक तरह का अचार ही है जो मिर्च को कूट कर बनता है. इसमें लहसून. अदरक समेत कई दूसरे मसाले मिलाए जाते हैं. पर ये इतना तीखा कैसे हो जाता है. एक बूंद जीभ पर गया नहीं कि दिमाग झन्ना उठता है। 




चुक बनाने वाली चंबा की ममता शर्मा सवाल सुनकर हंसने लगती हैं। वास्तव में चंबा के चुक जैसा तीखा अचार हमने पूरे देश में कहीं नहीं खाया। इतना तीखा अचार बनाने में खर्च भी बहुत आता है। तभी 200 ग्राम के चुक की बोतल वे 130 रुपये  में बेचती हैं। देश भर में ग्रामीण विकास मंत्रालय की ओर से लगाए जाने वाले सरस मेले में उनके चुक की खूब मांग रहती है। दिल्ली के प्रगति मैदान में नवंबर में लगने वाले अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले में वे हर साल आती हैं।

ममता से मेरी मुलाकात श्रीनगर में हुई जब वे सैलाब में होटल रिट्ज में फंसी हुई थीं। तब वहां वे अपना स्टाक नहीं बेच सकीं। पर दो माह बाद वे प्रगति मैदान के व्यापार मेले में पहुंची। यहां पर उनका स्टाक की खूब मांग रही।

ममता हर्बल ढंग से तैयार राजमा, शहद  और बेसन भी तैयार करती हैं। पर उनकी पहचान चुक को लेकर ही है। आपने भरवां मिर्च का अचार तो खाया होगा, पर कभी मौका मिले तो ये चुक भी चख कर जरूर देखिए।

- विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com

( CHAMBA,  CHUK,  PICKLE RED CHILLY  )



Wednesday, December 10, 2014

जोगिंदरनगर से मनाली वाया मंडी

कांगड़ा के मंदिरों के दर्शन के बाद हमारा सफर शुरू हुआ मनाली के लिए। हमने बैजनाथ पपरोला से मनाली के लिए बस पकड़ी। पता चला कि ये बस मंडी होकर जाती है। कैसा और कितने घंटे का सफर होगा इसको लेकर हम अनजान थे। जुलाई 2001 का समय कभी भी कहीं भी पहाड़ों में बारिश हो सकती है। हालांकि मनाली तक बारिश नहीं हुई। नेशनल हाईवे नंबर 20 पर मंडी तक का सफर 77 किलोमीटर का है। हम हिमाचल रोडवेज की समान्य किस्म की बस में हैं। बस पीछे पठानकोट से आ रही है। सुबह के दस बजे हैं। जोगिंदरनगर जो कांगड़ा घाटी रेलवे का आखिरी रेलवे स्टेशन है वहां से आगे निकलने के बाद बस एक लाइन होटल पर खाने के लिए रूक गई। मैं, मम्मी, पापा, स्वंय प्रकाश और मेरी एक बहन सभी पेट पूजा में लग गए। दोपहर थी, भूख थी खाना अच्छा था सो टूट पड़े। हालांकि भरपेट खाने के  बाद बस का सफर ठीक नहीं होता।
जोगिंदर नगर से मंडी के बीच हाईवे का सफर खतरनाक माना जाता है। रास्ते में कई तीखे मोड़ आते हैं। मोड पर सामने से आ रही गाड़ी को पास देने के लिए बस को कई बार रुकना पड़ता था। कहने का मतलब है मार्ग इतना चौड़ा नहीं था। रास्ते में मंडी से पहले कोई बड़ा बाजार नहीं आता। मंडी पहुंचने पर पता चला कि ये रास्ता अत्यंत खतरनाक पहाड़ी रास्तों में शुमार किया जाता है। इसमें चलने वाले ट्रक का एक पहिया तो हमेशा हवा में ही टंगा रहता है। खैर हम संकट पार कर चुके थे। बस मंडी बस डिपो में थोड़ी देर रूकी रही। मंडी वही शहर है जिसके नाम पर दिल्ली में मंडी हाउस है जिसमें आजकल दूरदर्शन का मुख्यालय है। मंडी कभी हिमाचल का प्रमुख राजघराना हुआ करता था।


पठानकोट-मंडी राष्ट्रीय राजमार्ग सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इसी हाईवे से धर्मशाला, योल कैंट, लेह-लद्दाख, पालमपुर होल्टा कैंप को सेना के सामान की आपूर्ति होती है। वहीं हजारों की तादाद में मंडी, मनाली, मैक्लोडगंज, कांगड़ा मंदिर, ज्वालामुखी व चामुंडा देवी में देश और विदेशी से पर्यटक व श्रद्धालु आते हैं।

मंडी से चलने पर बस ने व्यास दरिया का पुल पार किया और व्यास नदी के समांतर चलने लगी। एक तरफ व्यास दरिया की तेज धार तो दूसरी तरफ ऊंचे पहाड़। रास्ता मनोरम होने के साथ डरवाना भी लगता है। रास्ते में एक सुरंग भी आती है। 
कुछ घंटे बाद हम कुल्लू शहर में थे। पर हमे कुल्लू  में रुकना नहीं था। शाम गहराने से पहले हमारी बस मनाली में प्रवेश कर गई। मनाली यानी हमारी ड्रिम डेस्टिनेशन। हम उछल पड़े। बस स्टैंड में उतरते ही तमाम एजेंटों ने हमें घेर लिया। पर हमें किसी ऐसे किफायती होटल की तलाश थी जिसमें दो कमरे साथ मिल जाएं। मैं और भाई साथ चले होटल ढूंढने। थोड़ी खोजबीन के बाद हमें मिल गया होटल ल्हासा में फेमिली सूट। होटल के कमरे से पहाड़ों की रंग बिरंगी रोशनी दिखाई दे रही थी। अगले तीन दिन हम इसी होटल में रहे। वैसे मनाली में 300 से ज्यादा होटल हैं। आप अपने बजट और पसंद के अनुसार होटल चुन सकते हैं।

-        -  विद्युत प्रकाश मौर्य ( जुलाई 2001) 

HOTEL LHASA 
Near telephone exchange,Model Town, Manali 
Phone no. : 01902-252134

(MANALI, HIMACHAL, KULLU, VYAS RIVER, HIDIMBA DEVI )


Monday, December 8, 2014

आगरा का मिलन बैंड – बंटी और बबली वाले

आगरा किन चीजों के लिए प्रसिद्ध है। क्या ताजमहल, जूते या फिर पेठा जैसी मिठाई के लिए। नहीं जी कई और चीजें हैं जो आगरा को खास बनाती हैं। एक शादी में आगरा जाना हुआ तो पता चला कि आगरा का मिलन बैंड जो फिल्मों में भी अपना जलवा दिखा चुका है। अभिषेक बच्चन और रानी मुखर्जी की फिल्म बंटी और बबली  में अपने बैंड का जलवा दिखा चुके मिलन बैंड का बाजार भाव इस फिल्म के बाद बढ़ चुका है। वे गर्व से कहते हैं कि वे इस फिल्म में अमिताभ बच्चन के साथ बैंड बजा चुके हैं। फिल्म के एक दृश्य में आगरा का मिलन बैंड अमिताभ बच्चन के साथ बैंड बजाता नजर आता है। फिल्म में उनके बैंड की कारीगरी लंबे समय तक दिखाई देती है। इस फिल्म के बाद आगरा के इस प्राचीन बैंड का बाजार भाव बढ़ गया है। 

 वे अपने बिल बुक और लिफाफे और विजटिंग कार्ड पर शान से लिखते हैं मिलन बैंड फिल्म बंटी और बबली वाले। अब उन्होंने अपनी टैग लाइन बनाई है रायल बैंड फॉर रायल मैरेजेज। हालांकि कई बार मिलन बैंड की धुन में बाकी बैंड से अलग करती हुई कोई खास बात नजर नहीं आती।



मिलन बैंड की स्थापना 1960 में हरिराम शर्मा ने की थी। उनकी पढ़ाई गुरूकुल करनाल में हुई थी लेकिन उन्होंने बैंड पार्टी को पेशे के तौर पर अपनाया। हालांकि उस दौर में शादियों में नाचने का रिवाज नहीं था। तब बैंड टीम के लोग भी वाद्य यंत्रों की धुन पर नाचते थे। आजकल मिलन बैंड के MD भरत शर्मा हैं जो अपने परिवार की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। बदलते जमाने के हिसाब से वे डिजिटल साउंड ट्राली और शादियो में हेलीकाप्टर से फूलों की बारिश जैसे आईटम की सुविधा भी प्रदान करते हैं।

मिलन बैंड वाले पिछले 17 सालों से श्रीराम बारात में अपने बैंड का जलवा दिखा रहे हैं। वे दुबई में इंटरनेशनल बैंड फेस्टिवल में भी अपने हुनर का जलवा दिखा चुके हैं। वहीं देश के अलग अलग शहरों में भी अपनी बैंड की धुन पर लोगों को थिरकने का मौका दे चुके हैं।

- विद्युत प्रकाश मौर्य 

http://milanband.in/contact.htm  मिलन बैंड, कालामहल, आगरा। फोन - 09412721423

Saturday, December 6, 2014

शहंशाह-ए-हिन्दुस्तान जलालउद्दीन मोहम्मद अकबर सो रहे हैं यहां

आपने दिल्ली में हुमायूं का मकबरा देखा होगा। आगरा के ताजमहल को उसकी प्रतिकृति माना जाता है। पर हुमायूं के बेटे और मध्यकालीन भारत के सबसे महान शासक की मजार है आगरा के सिकंदरा में। हालांकि आगारा में ताजमहल देखने पहुंचने वाले सैलानियों में से कम ही लोग होते हैं जो सिकंदरा में इस महान शासक की मजार को देखने पहुंचते हैं। अपने मकबरे निर्माण खुद अकबर ने शुरू करवाया था। 119 एकड़ में फैला हुआ ये मकबरा 8 साल में बनकर तैयार हुआ। ताजमहल और हुमायूं के मकबरे की तरह ही ये चार बाग शैली में बना है।

यह मकबरा हिंदू, ईसाई, इस्‍लामिक, बौद्ध और जैन कला का सर्वोत्‍तम मिश्रण है। लेकिन इसके पूरा होने से पहले ही अकबर की मृत्‍यु हो गई। बाद में उनके पुत्र जहांगीर ने इसे पूरा करवाया। जहांगीर ने मूल वास्तु योजना में कई बदलाव करवाए। इस इमारत को देखकर पता चलता है कि मुगल वास्तु कला कैसे विकसित हुई।

पांच मंजिला है मकबरे की मुख्य इमारत - वर्गाकार योजना का यह मकबरा पांच तल ऊंचा है जिसका प्रत्येक तल क्रमशः छोटा होता जाता है जो इसे पिरामिडनुमा आकार देता है। अकबर के मकबरे पास खड़े होकर जब आप किसी शब्द का उच्चारण करते हैं तो 30 सकेंड तक प्रतिध्वनित होता रहता है।

मकबरे के चारों कोनों पर तीन मंजिला चार मीनारें हैं। ये मीनारें लाल पत्‍थरों से बनी हैं जिन पर संगमरमर का सुंदर काम किया गया है। मकबरे के चारों ओर खूबसूरत बगीचे हैं। मुख्य दरवाजा जिससे आप प्रवेश करते हैं उसका नाम जहांगीरी दरवाजा है। मकबरे के बीच में बरादी महल है जिसका निर्माण सिकंदर लोदी ने करवाया था। सिकंदरा से आगरा के बीच में अनेक मकबरे हैं। पांच मंजिला इस मकबरे की खूबसूरती आज भी बरकरार है। सिकंदरा का नाम सिकंदर लोदी के नाम पर पड़ा।

नसीरुद्दीन हुमायूं और हमीदा बानो के पुत्र जलालउद्दीन मोहम्मद अकबर का जन्म 15 अक्तूबर 1542 को पूर्णिमा के दिन हुआ था। इसलिए उनका नाम बदरुद्दीन मोहम्मद अकबर रखा गया था। बद्र का अर्थ होता है पूर्ण चंद्रमा और अकबर उनके नाना शेख अली अकबर जामी के नाम से लिया गया था। हर साल उसके जन्मदिन पर मकबरे में उर्स लगता है। उसकी मृत्यु 27 अक्तूबर 1605 को आगरा में हुई। मात्र 14 साल की उम्र में 1556 में वे शासक बन गए। अकबर के राजनीतिक गुरु सूफी संत सलीम चिश्ती थे जिनकी मजार फतेहपुर सीकरी में है।

उत्तरी और मध्य भारत के सभी क्षेत्रों को एकछत्र अधिकार में लाने में अकबर को दो दशक लग गये थे। उसका प्रभाव लगभग पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर था और इस क्षेत्र के एक बड़े भूभाग पर सम्राट के रूप में उसने शासन किया।

दीन ए इलाही का संस्थापक -  कहा जाता है अकबर की रूचि पढ़ने में ज्यादा नहीं थी। उसकी रूचि कबूतरबाजी, घुड़सवारी, और कुत्ते पालने में अधिक थी।  किन्तु ज्ञानोपार्जन में उसकी रुचि थी। कहा जाता है, कि जब वह सोने जाता था, एक व्यक्ति उसे कुछ पढ़ कर सुनाता रह्ता था।  अकबर ने एक नए धर्म दीन-ए- इलाही की भी स्थापना की, जिसमें विश्व के सभी प्रधान धर्मों की नीतियों व शिक्षाओं का समावेश था।


कैसे पहुंचे- आगरा मथुरा मार्ग पर सिकंदरा में स्थित है अकबर का मकबरा। बस स्टैंड से महज 5 किलोमीटर। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण मकबरे की देखभाल करता है।

पदयात्रियों से टोल टैक्स -  भारतीय लोगों के लिए प्रवेश टिकट 10 रुपये है। 5 रुपये प्रवेश के लिए 5 रुपये टोल टैक्स है मकबरे के अंदर पदयात्रा के लिए जो आगरा विकास प्राधिकरण के खाते में जाता है। शुक्रवार को ये एडीए ये टोल नहीं वसूलता। 15 साल तक के बच्चों का प्रवेश निःशुल्क है। निजी वाहनों से आने वालों के लिए यहां पार्किंग का इंतजाम है।

vidyutp@gmail.com



Thursday, December 4, 2014

ताजमहल - आह ताज वाह ताज

एक ताजमहल और हजार अफसाने। कोई इसे मुहब्बत की निशानी कहता है तो कोई गरीबों की गरीबी का मजाक। देश का सबसे ज्यादा देखा जाने वाला पर्यटक स्थल। मुहब्बत करने वाले ताज के साथ तस्वीरें खींचवाते हैं। तो बीवी बच्चों और कुनबे के साथ पहुंचने वाले भी तस्वीरें खींचवाते हैं। यहां आने वाले अपने साथ स्मृति के तौर पर छोटे छोटे ताज लेकर जाते हैं।


बदरंग होता ताज- भारतीय एवं अमेरिकी अनुसंधानकर्ताओं ने एक अध्ययन में पाया है कि हवा में तैरते कार्बन कणों एवं धूलकणों के चलते ताजमहल बदरंग होता जा रहा है और उसका चमचमाता सफेद रंग भूरा होता जा रहा है। जार्जिया इंस्टीटयूट ऑफ टेक्नॉलोजी के स्कूल ऑफ अर्थ एंड एटमोसफेरिक साइंसेज के प्रोफेसर माइकल बर्गिन की टीम ने यह पाया है कि ताजमहल को बदरंग कर रहे प्रदूषक बायोमास, अपशिष्ट, जीवाश्म ईंधन के जलने से निकलने वाले कार्बन कण और धूलकण हैं। अबतक माना जा रहा था कि बदरंग होने के लिए वायु प्रदूषण जिम्मेदार है लेकिन उसके लिए कोई व्यवस्थित अध्ययन नहीं किया गया था।

 अनुसंधानकर्ताओं को उपकरण के फिल्टर और मार्बल सैम्पलों पर भूरे आर्गेनिक कार्बन और काले कार्बन के कण मिले। बदरंग होने की वजह जानने के लिए अनुसंधानकर्ताओं ने नवंबर, 2011 से जून, 2012 के बीच एयर सैम्पलिंग उपकरण का इस्तेमाल किया ताकि यह पता चल पाया कि ताजमहल परिसर के वायु में क्या है।

बेपनाह मुहब्बत की इस निशानी को सोलहवीं शताब्दी में मुगल शासक शाहजहां ने अपनी तीसरी बीवी मुमताज महल की याद में 1632 में बनवाया। संगमरमर का ताज 115 फीट उंचा है। इसके चारों तरफ 130 फीट उंचे चार मीनार हैं। कहते हैं कि उसने इसके मुख्य शिल्पी मुहम्मद ईशा खां के हाथ इसलिए कटवा लिए थे कि कोई दूसरा ताज कहीं और जाकर न बनवा दे। पर औरंगाबाद स्थित बीवी का मकबरा भी इसी की नकल लगता है। 1983 में यूनेस्को ने ताज को वैश्विक धरोहर स्थलों में शामिल किया।  ताज मुगल शैली  में चार बाग की डिजाइन में बना है। यानी इमारत के चारों तरफ बाग हैं।

तुमने जब भी पुकारा हमको आना पड़ेगा - कहते हैं शाहजहां को उसके बेटे जहांगीर ने बुढापे में कैद कर दिया और सल्तनत की गद्दी हथिया ली। पिता ने बेटे से इल्तिजा की ऐसी जगह कैद रखो जहां से हमेशा ताज दिखाई दे। तो शाहजहां ने आखिरी दिन कैद में मुमताज के ताज के देखते हुए गुजारे। उनकी कथा पर बनी फिल्म का गीत प्रसिद्ध है- जो वादा किया निभाना पडेगा...तुमने जब भी पुकारा हमें आना पड़ेगा। कहते हैं शाहजहां और मुमताज के बीच अमर प्रेम था। मुमताज शाहजहां की यादों में हमेशा रची बसी थी। मुमताज की मौत पर शाहजहां अर्धविक्षिप्त-सा हो गया था। वह सफ़ेद कपड़े पहनने लगा था। उसने तब ताज बनवाने का प्रण किया। कहते हैं कि मुहब्बत के प्रतीक विश्व विख्यात ताजमहल में मुमताज की कब्र पर आज भी शाहजहां के आंसू गिरते हैं। अब शाहजहां की कब्र भी ताजमहल में मुमताज के बगल में ही है।

ताज के साथ फोटो - हर किसी की तमन्ना ताज के साथ फोटो खिंचवाने की की होती है। मैं 1991 के सितंबर में पहली बार ताज महल पहुंचा। तह हम अलीगढ़ के राष्ट्रीय युवा योजना के शिविरार्थियों के साथ थे। तब ताज के साथ तस्वीर नहीं खिंचवा सका। गर्मी भीषण थी हमारे पैसा कैमरा भी नहीं था। तब मन मसोस कर रह गया। दुबारा मौका आया 2008 के मार्च में तब मेरी जीवन संगिनी और बाल गोपाल भी साथ थे। तब तो फोटो बनती ही थी न...
-          vidyutp@gmail.com

ताज की आफिशियल वेबसाइट-  http://www.tajmahal.gov.in/