Sunday, November 30, 2014

पेठा – आगरा की अनूठी मिठाई

आगरा शहर की पहचान ताजमहल के बाद वहां की प्रसिद्ध मिठाई पेठा के कारण भी है। पूरे आगरा में आपको हर ओर पेठा की दुकानें मिल जाएंगी। पर इन पेठा के बीच शहर की सबसे प्रसिद्ध दुकान है पंछी पेठा की। पंक्षी पेठा के आगरा में छह शो रूम हैं। इनका मुख्य स्टोर नूरी गेट एरिया में है। आगरा में भगवान टाकीज के पास भी पंछी पेठा की प्रसिद्ध दुकान है। कोई आगरा से आता है तो वहां का मशहूर पंछी पेठा लाना नहीं भूलता।

मुख्य रूप से पेठा आगरा में ही बनाया जाता है। अच्छे पके पेठे से ही पेठे पेठे की मिठाई बनाई जाती है। पके हुए फ़ल का छिलका सख्त होता है। वास्तव में पेठा एक पारदर्शी नरम कैंडी है। पेठा बनाने में घी या तेल का प्रयोग बिलकुल भी नहीं किया जाता। पेठे की मिठाई इतनी अधिक प्रसिद्ध है कि इसे पेठा नाम से ही पुकारते हैं। पेठा की खास बात है कि इसे एक महीने तक भी कंटेनर में संभाल कर रखा जा सकता है। किसी जमाने में पेठा मिट्टी के बरतनों में बेचा जाता था पर आज वह मिठाई के डिब्बे की तरह शानदार पैकिंग में उपलब्ध है।

आगरा के धौलपुर हाउस स्थित पंक्षी पेठा का स्टोर। 
आजादी के आसपास यानी 1950 से पहले के दशक में एक या दो प्रकार का पेठा आगरे के बाजार में मिलता था पर अब पेठे में इतने प्रयोग हुए हैं कि अब इसकी विभिन्न क़िस्में बाज़ार में उपलब्ध हैं। पर हम पेठे को दो हिस्सों में बांट सकते हैं। ड्राइ पेठा और अंगूरी पेठा। ड्राई पेठा लंबे वक्त तक खराब नहीं होता है, जबकि अंगूरी पेठा यानी रसीला पेठा को कुछ दिनों तक ही रखा जा सकता है।

कभी पेठा आयुर्वेदिक औषिधि के रूप में तैयार किया जाता था। इसका उपयोग वैद्य लोग अम्ल वित्त, रक्तविकार, वात प्रकोप और जिगर कि बीमारी के लिए करते थे। पेठा फल को अंग्रेजी में Ash Gourd or White gourd कहते हैं। पेठा या सफ़ेद कोहड़ा या कोड़ा कद्दू से थोड़ा छोटा सफेद रंग का फल होता है जिससे इसके कच्चे फल से सब्जी और पके हुए फल से हलवा और पेठा मिठाई (मुरब्बा) बनाई जाती है।

आगरा के प्रसिद्ध पंछी पेठा की दुकान में आप कई किस्म के पेठा खरीद सकते हैं। इनमें कांचा पेठा, केसर अंगूरी पेठा, केसर पेठा, ड्राई चेरी पेठा, लाल पेठा, कोकोनट पेठा, पान पेठा, रसभरी पेठा, सैंडविच पेठा,  संतरा पेठा, डोडा पेठा, चाकलेट पेठा, चेरी मैंगो पेठा जैसे स्वाद का आनंद ले सकते हैं।

पंछी पेठा की स्थापना पंचम लाल गोयल ने 1950 से पहले की थी। उन्हें पंछी गोयल नाम से जाना जाता है। वैसे तो पेठा बनाने की कोशिश आगरा के अलावा अन्य शहरों में भी की गई। पर आगरा जैसा स्वाद कहीं नहीं आता। आगरा मे 15 हजार से ज्यादा लोग पेठा बनाने के कारोबार से जुड़े हुए हैं। आगरा के बाजार में पेठा 60 रुपये किलो से लेकर 400 रुपये किलो तक उपलब्ध है।

- विद्युत प्रकाश मौर्य
http://www.panchipetha.com/    ( AGRA, PETHA, SWEET ) 

Friday, November 28, 2014

बन-मस्का और ईरानी चाय का लुत्फ

अपने देश भारत के कुछ शहरों में आप ईरानी चाय का लुत्फ ले सकते है। खास तौर पर तेलंगाना के हैदराबाद, तमिलनाडु के मदुरै, चेन्नई, मामल्लापुरम और रामेश्वरम जैसे शहरों में आपको ईरानी चाय के स्टाल देखने को मिल जाते हैं।

ईरान में चाय पीने का बहुत रिवाज है। चाय बनाने के लिए एक विशेष पात्र, 'समवार' का प्रयोग किया जाता है। वास्तव में यह रूसी सभ्यता की ईरान को देन है। अगर हम इतिहास में झांके तो ईरान में चाय का रिवाज 15वीं सदी में आया। इसके पहले वहां कॉफी पीने के रिवाज ज्यादा था। ईरानी में चाय का उच्चारण चा ई जैसा होता है। हिंदी भाषा में चाय शब्द ईरानी से ही आई है।
महाबलीपुरम में समवार में बनती है ईरानी चाय। ( फोटो- विद्युत)


अगर आप किसी ईरानी के घर में मिलने जाते हैं तो वह आपको वेलकम ड्रिंक के तौर पर चाय परोसता है। वैसे ईरानी न सिर्फ सुबह में बल्कि हर खाने के बाद चाय पीते हैं। ईरानियों के चाय बनाने का अपना स्टाइल है।

चाय बनाने का तरीका अलग -  ईरानी चाय खास तौर बरतन में बनाई जाती है जिसे समवार कहते हैं। ईरानी चाय के लिए चाय पत्ती, पानी, चीनी, दूध और गुलाब की पंखुडियां चाहिए।

पहले पानी में उबाल आने तक उसे गर्म किया जाता है। इसके बाद दूसरे टी पॉट में चाय पत्ती डाली जाती है फिर इसमें खौलता हुआ पानी डाला जाता है। इसके बाद चाय को 10 से 15 मिनट तक मद्धिम आंच पर पकाया जाता है। चाय बनाने वाले वेंडर इस खौलते हुए चाय को अपने अंदाज में बार बार घुमाते हैं। ईरानी चाय और समान्य चाय में बनाने के तरीके में अंतर है। ईरानी चाय में चाय अलग बरतन में और दूध को अलग बरतन में खौलाया जाता है। जब चाय परोसानी होती है उस समय दूध और चाय को मिलाया जाता है। पहले कप में दूध और चीनी डाली जाती है उसके बाद उसमें चाय छन्नी से चाय उड़ेली जाती है। आप अपनी मन मुताबिक चीनी ले सकते हैं। कुछ और जगहों पर इस स्टाइल में चाय बनाई जाती है। पर ये तरीका ईरानी चाय के तौर पर लोकप्रिय है। ईरानी चाय में स्वाद बढ़ाने के लिए ईरानी चाय में कई बार गुलाब की पंखुड़ियों का इस्तेमाल किया जाता है।

पुराने हैदराबाद में मिलती है ईरानी चाय - हैदराबाद शहर के पुराने ईलाके ( ओल्ड सिटी) में दर्जनों स्थानों पर आज भी ईरानी चाय बनाने वाले देखे जा सकते हैं। कहा जाता है कि ईरानी चाय बनाने का तरीका हैदराबाद में ईरान से वाया मुंबई और पुणे चल कर आया। यहां आने वाले ईरानी लोग चाय बनाने का तरीका भी लेकर आए। यहां से ये दक्षिण भारत के कुछ और शहरों तक फैल गया। ईरानी चाय को सुबह सुबह बन और मस्का के साथ लिया जाए तो इसका स्वाद और बढ़ जाता है।
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विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com
  ( IRANI TEA, MILK, ROSE, SAMWAR, HYDRABAD)   




Wednesday, November 26, 2014

प्रभु यीशू यहां भोजपुरी में सुनते हैं प्रार्थना

उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी वाराणसी में सौ साल से ज्यादा पुराना एक ऐसा गिरिजाघर है जहां प्रभु ईसा की प्रार्थना भोजपुरी में की जाती है। वाराणसी के छावनी क्षेत्र में लाल गिरिजाघर ( C.N.I . LAL GIRJA VARANASI 1879 )   की स्थापना सन् 1879 में रेव्हटन एलबर्ट ने की थी। 18वीं सदी के यूरोपीय शैली में बने गिरिजाघरों की तर्ज पर इस वेस्लेयन मेथोडिस्ट चर्च (Wesleyan Methodist church ) को बाद में चर्च नॉर्थ ऑफ इंडिया गिरजाघरों में शामिल किया गया। लाल रंग से रंगे होने के कारण इसका नाम लाल गिरजा पड़ा। हर साल गिरिजाघर की क्रिसमस के पहले लाल रंग से पुताई की जाती है।

लाल गिरिजाघर में आसपास के गांवों के लोगों को सहजता से समझाने के लिए सरल भोजपुरी भाषा में प्रार्थना की जाती है। फादर ने दलितों और समाज के पिछड़े लोगों के साथ काम करते हुए भोजपुरी भाषा अपना कर उनको मुख्य धारा से जोडऩे के लिए ये कदम उठाया था। हर रविवार को भोजपुरी में प्रार्थना सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग यहां आते हैं। इस गिरिजाघर के स्थापना के बाद से ही प्रार्थना तथा अन्य आयोजन भोजपुरी भाषा में ही किए जाते रहे। हर रविवार को ईसाई समुदाय के लोग यहां प्रार्थना के लिए आते हैं। रविवार को यहां प्रार्थना सुनने स्थानीय लोग भी जुटते हैं। प्रार्थना कुछ इस तरह से की जाती हैः 

प्रभु जी हम बेसराहा हंई,
हमनी का सहारा देई,
संसार में हमनी के लोग निर्बल समझेला,
 तोहार दृष्टि में हमनी के मूल्य अधिक होला..।

भले ही दुनिया भर में काशी की पहचान महादेव की नगरी के रूप में हो लेकिन अपने घाटों, पंडों,गलियों और अल्हड़ मस्ती के लिए मशहूर वाराणसी में यीशु के भक्तों के लिए कुछ न कुछ खास जरूर है। यहां का लाल गिरिजाघर वाराणसी के तमाम विशेषताओं में एक और अध्याय जोड़ता है।

हालांकि एक दौर ऐसा भी आया था जब लाल गिरिजाघर में भोजपुरी का चलन कम होने लगा था। चर्च की स्थापना के बाद से ही प्रार्थना और अन्य आयोजन भोजपुरी भाषा में ही किए जाते रहे थे। मगर बाद में बीच के दौर में लोगों का विरोध बढ़ा तो भोजपुरी का चलन भी कम होता गया। मगर 1991 में चर्च की 112 वीं सालगिरह के बाद फादर सैम जोशुआ सिंह के कार्यभार ग्रहण करते ही यहां हर रविवार और विशेष अवसर पर भोजपुरी कलीसिया (प्रार्थना) का आयोजन फिर से किया जाने लगा। फादर मानते हैं भोजपुरी में प्रार्थना के आयोजन से स्थानीय लोगों का जुड़ाव बढ़ता है।
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----विद्युत प्रकाश मौर्य

http://cniredchurch.com/about-us
( VARANASI, BANARAS, UTTRAR PRADESH)

Monday, November 24, 2014

बहुत याद आता है गांव का छठ

हर साल दिल्ली के रेलवे स्टेशनों पर छठ से पहले घर जाने के लिए रेलगाडियों में मारामारी होती है। मैं किसी साल अब छठ में गांव नहीं जा पाता। पर गांव का छठ तो जेहन में बसा हुआ है। गांव के पूरब मे बहता सोन नहर। नहर के किनारे पीपल का पेड़। पेड़ की छांव में बने घाट पर होता छठ। सारा गांव नहर के किनारे जुट जाता था। शाम को अर्घ्य देने के बाद हमलोग घर वापस नहीं जाते थे शहर की तरह। सारी रात वहीं गुजरती थी। सुबह का इंतजार और छठ के गीत।


कोई नाच गाना या संगीत कार्यक्रम नहीं, माई और चाची, दादी के कंठ से फूटता था छठ का गीत। एक समूह गाते गाते रूक गया तो दूसरा समूह शुरू हो जाता था। हमारी ड्यूटी थी दीपक में तेल भरने की। सारी रात जलता रहता था दीया। उम्मीदों का दीया। आस्था का दीया। गुनगुनी ठंड में नहर के किनारे सारी रात। किसी की भी आंख में नींद नहीं। प्रातः अरुण के आगमन का इंतजार। सुबह होते ही चाचा गाय का दूध लेकर पहुंच जाते। सुबह का अर्घ्य तो दूध से दिया जाता है ना। 


एक बार तय हुआ कि इस बार छठ नानी के गांव में होगा। भोजपुर जिले में पीरो से पूरब कोईल के पास कुसुम्ही गांव। गांव के दक्षिण में आहर। पेड़ों की लंबी कतार और उसके साथ नदीनुमा जल की धारा। बड़ा ही मनोरम दृश्य था उस आहर के किनार छठ का। वहीं भी गांव की सारी महिलाएं सारी रात जागकर उग ना सूरूज देव गाती रहतीं...वहां कभी कभी लोकनृत्य का भी आयोजन होता था। बड़ों के लिए पूजा थी। आस्था थी पर हमें तो इंतजार रहता था छठ के प्रसाद का। सुबह के अर्घ्य के बाद मां के हाथों से घाट पर प्रसाद पाने का इंतजार। अब मां की उम्र बढ़ती जा रही है वे अब छठ नहीं कर पातीं। पर उम्मीद है गांव में आज भी उसी तरह छठ होता होगा। और छठ पूजा का एक गीत...

कांच ही बांस के बहंगिया,
बहंगी लचकत जाय...
बहंगी लचकत जाय...
बात जे पुछेले बटोहिया
बहंगी केकरा के जाय ?
बहंगी केकरा के जाय ?
तू त आन्हर हउवे रे बटोहिया,
बहंगी छठी माई के जाय...

( विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com) 

Sunday, November 23, 2014

दाल रोटी घर दी...दिवाली अमृतसर दी...

पूरे पंजाब में ये कहावत मशहूर है। दाल रोटी घर दी...दिवाली अमृतसर दी...और होता भी यही है हर साल दिवाली के दिन पंजाब के अलग अलग जिलों से लाखों लोग अमृतसर का रूख करते हैं।
अमृतसर का स्वर्ण मंदिर इस दिन साल के अन्य दिनों की तुलना में ज्यादा प्रकाशमान होता है। इसकी छटा देखने के लिए लोग रात भर जगकर स्वर्ण मंदिर का नजारा करते है। खासकर मंदिर के सरोवर के चारों तरफ भक्तगण मोमबत्तियों से रोशनी करते हैं। लाखों दीपक जल उठते हैं तो उनका अक्श मंदिर के सरोवर में दिखाई देता है जो बड़ा ही नयनाभिराम दृश्य प्रस्तुत करता है। 

वैसे तो देश भर में दिवाली पर रोशनी की जाती है। पर स्वर्ण मंदिर की दिवाली यादगार होती है। इस दिवाली को देखने के लिए देश भर से लोग पहुंचते हैं। वहीं बड़ी संख्या में विदेशी भी दिवाली देखने यहां पहुंचते हैं। 



लाखों लोगों का मेला स्वर्ण मंदिर के आसपास होता है। दिवाली के दिन आपको पंजाब के हर जिले के लोगों की जमघट स्वर्ण मंदिर परिसर में मिल जाएगी। मंदिर प्रशासन की ओर से भी दिवाली के आयोजन की कई दिन पहले तैयारी की जाती है।

सिख धर्म में दिवाली पर्व का खास महत्व है। ठीक उसी तरह जैसे हिंदू धर्म में। दिवाली के साथ स्वर्ण मंदिर की कई कथाएं जुड़ी हुई हैं। अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में दिवाली का त्योहार दिवाली से दो दिन पूर्व आरम्भ होकर दो दिन पश्चात समाप्त होता है।


इसी दिन सन 1577 में अमृतसर में स्वर्ण मन्दिर का शिलान्यास हुआ था। वहीं दिवाली ही के दिन ही 1619 में सिक्खों के छठे गुरु हरगोबिन्द सिंह जी को कारागार से रिहा किया गया था। गुरु हरगोबिन्द जी गुरु नानक देव जी के विचारों को प्रफुल्लित करने में जुटे थे, जो मुगल बादशाह जहांगीर को बर्दाश्त नहीं था। गुरु जी की यश गाथा सुन कर जहांगीर ने गुरु हरगोबिन्द जी को ग्वालियर के किले में बन्दी बना लिया। 

श्री गुरु हरगोबिन्द जी मध्य प्रदेश के ग्वालियर के किले से 52 राजाओं के साथ रिहा हुए थे। सिक्ख इतिहास में गुरु अर्जुन देव जी के सुपुत्र गुरु हरगोबिन्द साहिब की दल-भंजन योद्धा कहकर प्रशंसा की गई है। 


गुरु हरगोबिन्द सिंह ने सिख धर्म को जरूरत के समय शस्त्र उठाने की ऐसी सीख दी जो आज भी सिख धर्म की पहचान है। उन्होंने अपने श्रद्धालुओं को न किसी से डरो ना किसी से डराओ की प्रेरणा देते हुए एक बहादुर कौम की स्थापना की थी।  गुरु हरगोबिंद सिंह ने ही सिखों को अस्त्र-शस्त्र का प्रशिक्षण लेने के लिए प्रेरित किया। 
vidyutp@gmail.com


Saturday, November 22, 2014

सोनवा के कटोरिया में दूध भात ले ले आव...


नन्हे मुन्ने बच्चे जिनके दूध के दांत अभी नहीं टूटे वे बच्चे दूध भात ही खाते हैं और उनकी माताएं उन्हें लोरी गाकर खिलाती और सुलाती हैं। भोजपुरी समाज की अति प्रसिद्ध लोरी है – चंदा मामा आरे आव पारे आव...लाखों माताओं ने अपने बच्चों को ये लोरी सुनाई होगी। पर ये लोरी वास्तव में एक फिल्म से ली गई है। 

1953 में आई फिल्म भौजी में लता मंगेशकर ने इस प्यारी सी भोजपुरी लोरी को गाया था। इसे संगीतबद्ध करा था ‘चित्रगुप्त’ ने। चित्रगुप्त का संबंध बिहार के छपरा शहर से था। यानी खांटी भोजपुरिया। तो इस गाने के बोल लिखे थे मजरूह सुल्तानपुरी’ ने। मजरूह साहब उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर शहर से आते थे। उनके रगों में भी भोजपुरी रक्त दौड़ता था। और ये लोरी अमर हो गई। गीत बोल कुछ इस प्रकार हैं-

चंदा मामा आरे आव.. पारे आव
नदिया किनारे आव.. ।
सोनवा के कटोरिया में दूध भात ले ले आव...
बबुआ के मुंहवा में घुटूं ।।

आव हो उतरी आव हमारी मुंडेर
 कब से पुकारिले भईल बड़ी देर ।
भईल बड़ी देर हां बाबू के लागल भूख ।
ऐ चंदा मामा ।।

मनवा हमार अब लागे कहीं ना
रहिले देख घड़ी बाबू के बिना
एक घड़ी हमरा के लागे सौ जून ।
ऐ चंदा मामा ।।

यू ट्यूब पर मौजूद इस गाने का लिंक - https://www.youtube.com/watch?v=R7zBQmlKb60

हालांकि भौजी हिंदी फिल्म थी पर इस लोरी के बोल विशुद्ध भोजपुरी में हैं। एक शब्द में भी कोई बनावटीपन नहीं है। लता जी की मीठी आवाज में ये लोरी दिल को छू जाती है। बार बार सुनो..बार बार गुनगुनाओ तो भी जी नहीं भरता। इस गीत संवेदनाओं को अदभुत वेग है।

अब बात चंदा मामा की ही हो रही है त चंदा मामा पर एक लोरी फिल्म वचन में भी है। 1955 में आई इस फिल्म गीता बाली और बलराज सहनी थे। गीत के बोल हैं – चंदा मामा दूर के पुए पकाएं गुर के...आप खाएं थाली में...मुन्ने को दें प्याली मे...प्याली गई टूट मुन्ना गया रूठ। दोनों ही गीतों में चंदा मामा हैं। यहां खाने में पूए हैं तो दूध भात। बच्चों को ये दोनों गीत खूब पसंद आते हैं।

-          विद्युत प्रकाश मौर्य 
( LATA, MAJROOH, BHOJPURI SONG, DOODH BHAT ) 




Saturday, November 15, 2014

क्या सैलाब पीड़ितों के लिए राहत लेकर आएगा ये चुनाव

तीन महीने पहले सैलाब में डूबे श्रीनगर शहर में चुनावी बयार बह रही है। सैलानियों से गुलजार रहने वाले डल झील के शिकारों पर चुनावी पोस्टर लगे हैं। कहीं केसरिया रंग है तो कहीं इंद्रधनुषी छटा है। सैलाब में अपने जीवन की बड़ी कमाई गंवा चुके लोगों को इस चुनाव से काफी उम्मीदे हैं।

श्रीनगर शहर की विधानसभा सीटें ( 8) – अमीरकदाल, हब्बाकदाल, हजरतबल, जैदीबल, ईदगाह, खानियार, सोनावर, बटमालू ।

अमीर कदाल - कदाल का मतलब पुल। और अमीर कदाल श्रीनगर शहर में झेलम का पहली पुल माना जाता है। इसका निर्माण 1774 में मो अमीर ने करवाया था। तब ये पुल लकड़ी का था। अब 1982 में शेख अब्दुल्ला ने इस कंक्रीट का पुल बनवा दिया है। अमीर कदाल नाम से ही श्रीनगर शहर का एक विधानसभा क्षेत्र है। इसके तहत रामबाग, सनतनगर, रावलपोरा, मेहजूर नगर, बागे मेहताब जैसे इलाके हैं। झेलम का कहर सितंबर में इन इलाकों में सबसे ज्यादा फूटा था। इस विधानसभा क्षेत्र  का इलाका बडगाम जिला के अलावा बटमालू, खनियार और सोनवार विधानसभा क्षेत्रों को छूता है। इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में सिख मतदाता भी हैं। यहां 2008 में महज 14.98 फीसदी मत पड़े थे।

हब्बा कदाल - हब्बा कदाल दूसरा सबसे पुराना पुल है। इसे 1551 में हबीब शाह ने बनवाया था। 1893 के बाढ में ये पुल बह गया था। 2001 में पुराने पुल के पास फारुक अब्दुल्ला ने एक नया पुल बनवाया। हब्बा कदाल श्रीनगर शहर का दूसरा विधानसभा क्षेत्र है। ये दोनों ऐसे इलाके हैं जहां श्रीनगर शहर की स्थानीयता को बड़े निकट से महसूस किया जा सकता है।

हजरतबल विधानसभा क्षेत्र भी श्रीनगर शहर का मानो दिल है। डल झील के आसपास के इलाके इस विधानसभा क्षेत्र में हैं। डल के दायरे में बसा रैनावाड़ी मुहल्ला भी इसी क्षेत्र में आता है। ऐतिहासिक हजरतबल मस्जिद के नाम पर इस विधानसभा क्षेत्र का नाम रखा गया है। ऐसा विश्वास है इस मस्जिद में मुहम्मद साहब के बाल रखे हुए हैं।


जैदीबल- श्रीनगर शहर का एक और विधानसभा क्षेत्र है। यहां का इमामबाड़ा प्रसिद्ध है। ये कश्मीर घाटी का सबसे पुराना इमामबाड़ा माना जाता है। काजी चक ने इसे 1518 में बनवाया था।
ईदगाह – वैसे तो श्रीनगर शहर में कई ईदगाह हैं। पर लाल चौक से तीन किलोमीटर आगे ऐतिहासिक जियारत बाबा बुड्ढा शाह ईदगाह है। के नाम पर शहर का एक और विधानसभा क्षेत्र है। पर ये इलाका भी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहा है। 1983 से इस विधानसभा सीट पर नेशनल कान्फ्रेंस का कब्जा है।

खनियार – श्रीनगर शहर के मुख्य इलाके में शामिल है। खनियार, नौहट्टा, ख्वाजा बाजार, नोवापाड़ा जैसे इलाके आते हैं। 2008 में नेकां के अली मोहम्मद सागर महज 806 वोटों से जीते थे। पिछले तीन चुनावों से ये सीट नेशनल कान्फ्रेंस के पास है।
सोनवार – श्रीनगर शहर की इस सीट पर फारुक अब्दुल्ला प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। वहीं ये सीट 1996 के बाद लगातार जम्मू कश्मीर नेशनल कान्फ्रेंस के खाते में जाती रही है। इस बार उमर अब्दुल्ला यहां से चुनाव लड़ रहे हैं।

बटमालू – श्रीनगर शहर का बाहरी इलाका है। शहर का आटोमोबाइल हब है। सितंबर 2014 में आए सैलाब में बटमालू के ज्यादातर इलाके डूब गए थे। अब बटमालू के लोगों को विधानसभा चुनाव से नई उम्मीदे हैं।

-         - ---- विद्युत प्रकाश मौर्य
(KASHMIR, FLOOD )


Friday, November 14, 2014

इस बरबादी से भी नहीं सीखा तो एक दिन कुछ नहीं बचेगा... ((आखिरी))

श्रीनगर में डल झील के किनारे हल्की बारिश के बीच।
( जन्नत में जल प्रलय 62 )
पहले 2005 में मुंबई फिर 2013 में उत्तराखंड और 2014 में कश्मीर में प्रकृति ने जल प्रलय का एक ट्रेलर दिखाया है। हम 1995 में प्रदर्शित हॉलीवुड की फिल्म वाटर वर्ल्ड को याद करें। केविन कास्टनर की इस विज्ञान फिल्म में उस हालात का लोगों को सामना करते हुए दिखाया गया है जब पूरी धरती पानी में डूबने लगती है। पर लगता है श्रीनगर में साल 2014 में इस जल प्रलय से हमने अभी सबक नहीं लिया है।
सैलाब के बाद भारत सरकार झेलम की धारा को श्रीनगर शहर से बाहर करने का प्रस्ताव पर विचार कर रही है। 30 सितंबर 2014 को इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर के मुताबिक सरकार ने इस मामले में विशेषज्ञों से राय मांगी है। ये विचार जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के उस पत्र के बाद आया है जिसमें उन्होंने श्रीनगर शहर को भविष्य में सैलाब से बचाने के लिए झेलम के लिए एक वैकल्पिक चैनल बनाने पर विचार करने को लिखा है। इस मामले में केंद्र सरकार ने केंद्रीय जल आयोग के विशेषज्ञों से सलाह मांगी है। क्या कोई वैकल्पिक चैनल श्रीनगर शहर के बाहर से बनाकर शहर को भविष्य में बाढ़ से रोका जा सकता है। बारिश के दिनों में झेलम नदी के पानी को मोड़ने के लिए ऐसे वैकल्पिक चैनल बनाए जाने का प्रस्ताव बहुत पुराना है। इस पर 8500 करोड़ रुपये का खर्च आने का अनुमान है। हालांकि इस प्रस्ताव पर कभी बात आगे नहीं बढ़ सकी। विशेषज्ञ भी मानते हैं कि ऐसा कोई चैनल बनाकर हम छोटे मोटे बाढ़ से तो शहर को सुरक्षित कर सकते हैं पर जितना बड़ा सैलाब 2014 में आया, इससे निपटने के लिए कोई वैकल्पिक चैनल बनाना भी पर्याप्त नहीं होगा। 
वास्तव में ये प्रस्ताव बड़ा ही अव्यवहारिक है। नदियों के किनारे पहले इंसान ने शहर बसाया। नदी के डूब क्षेत्र पर कब्जा किया। उसके जल प्रवाह के सारे रास्ते बंद किए। अब संकट आया तो अपनी सुरक्षा के इंतजाम करने के बजाय नदी को ही वहां से हटाने के बारे में विचार कर रहा है। अगर झेलम ने कहर ढाया है तो इसमें झेलम का कोई कसूर तो था नहीं, हमने पानी के लिए रास्ते बंद कर डाले थे।

कहा जाता है कि कई हजार साल पहले पूरा श्रीनगर शहर की सतीसर नामक विशाल झील हुआ करती थी। अब इस इलाके में साढ़े 12 लाख से ज्यादा की आबादी रहती है। इस सैलाब से सबक लेकर हमें इस आबादी के सुरक्षित स्थल की ओर शिफ्ट करने के बारे में सोचना चाहिए। न की झेलम नदी की मुख्य धारा को ही शहर से बाहर ले जाने के बारे में। सरकार में इस प्रस्ताव पर विचार हो रहा है कि 8000 करोड़ से ज्यादा राशि खर्च करके झेलम नदी को शहर के बाहरी इलाके से गुजारा जाए। क्या इससे अच्छा ये नहीं होगा कि इतनी राशि खर्च करके राजधानी के सचिवालय और अन्य भवन ही सुरक्षित स्थानों पर बनाएं जाएं, और नदी को अविरल बहने दिया जाए।
राज्य  के बाढ़ नियंत्रण विभाग को नहीं मालूम की आपदा के असली कारण क्या थे। इतना सब कुछ गुजर जाने के बाद राज्य का बाढ़ नियंत्रण विभाग ये नहीं जान सका है कि ये सब कुछ हुआ कैसे। पढिए समाचार पत्र ग्रेटर कश्मीर में 29 सितंबर को प्रकाशित बाढ़ नियंत्रण विभाग के सचिव पवन कोटवाल का बयान-
हम अभी तक ये आकलन करने मे सफल नहीं हुए हैं कि 6-7 की दरम्यानी रात को क्या हुआ। झेलम में पानी का तेज बहाव आया जिसने नदी के किनारे बने बांध को तोड़ डाला। इसके बाद शहर दाहिनी तरफ से और पीछे की तरफ से बाढ़ में डूब गया।
...और अंत में मशहूर शायर अली सरदार जाफरी की रचना जो उन्होंने झेलम दरिया पर लिखी है...

झेलम का तराना

मानिंद जू ए ज़िंदगी शाम ओ सहर बहता हू मैं।
हर दम रवां, हर दम दवां, हर दम जवां रहता हूं मैं..
वादी में लहराता हुआ
सब्ज़ से इठलाता हुआ         
सौ पेच ओ खम खाता हुआ
हंसता हुवा गाता हुआ

मौजों की जुफें खोलता
क़तरों के मोती रोलता
माशूक़ा-ए-कश्मीरी के
पहलू में इतराता हुआ

खेतों के दामन में यहां
बागों के साए में वहां
अपनी शराब-ए-नब के
सागर को छलकाता हुआ

मानिंद जू ए ज़िंदगी शाम ओ सहर बहता हूं मैं
हर दम रवां हर दम दवां, हर दम जवां रहता हूं में...

( अली सरदार जाफरी )


जन्नत में जल प्रलय की ये आखिरी कड़ी है। हजारों लोगों ने 62 कड़ियों कश्मीर के संस्मरण और रिपोर्ताज को पढ़ा और प्रतिक्रियाएं दीं उनका आभारी हूं। 


Thursday, November 13, 2014

सब कुछ बरबाद हो गया... शून्य से होगी शुरुआत

थाना मंडी राजौरी का एक नजारा ( फोटो सौ - हामिद आर वानी)
( जन्नत में जल प्रलय - 61 )
श्रीनगर के आपदा से बचकर दिल्ली लौटने के कई दिनों बाद एक दिन अचानक राजौरी से आफताब भाई का फोन आता है। आफताब भाई आपदा की घड़ियों में हमारे साथ थे। इनका पूरा परिवार मुगल रोड के रास्ते से बड़ी मुश्किलों वाला सफर करके अपने घर राजौरी लौटा था। मुश्किल घड़ियों में धैर्य नहीं खोने वाले आफताब भाई आपदा से बचकर लौटने के बाद अब दुखी थे। बताने लगे- सिर्फ श्रीनगर में ही कुदरत का कहर नहीं बरपा है बल्कि पूरे कश्मीर घाटी और जम्मू क्षेत्र का बड़ा इलाका भी सैलाब में प्रभावित हुआ है। 

राजौरी के थाना मंडी इलाके की एक नदी जिसे हम लगभग भूला चुके थे। वह नदी अब नाले का रूप ले चुकी थी। इस सैलाब में उस नदी ने विकराल रूप ले लिया। इस नदी में इतना पानी आया जिसकी हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी। ये पानी हमारी सारी जमा पूंजी बहा ले गया। आफताब भाई काष्ठ शिल्पी हैं। वे लकड़ी से कई तरह की कलाकृतियां बनाते हैं। जैसे किस्ती, जहाज, हाथी, घोड़े आदि। पर इस बाढ़ में उनके वर्कशाप का सारा तैयार माल बह गया। इतना ही नहीं वर्कशाप की सारी मशीनों को भी पानी बहा ले गया। अपने पूरे वर्कशाप की बरबादी देखकर आफताब भाई दुखी हो गए। अब उन्हें शून्य से एक नई शुरूआत करनी पडेगी।

उनके गांव में चलने वाले घर्राट ( पनचक्कियों) को भी ये सैलाब बहा ले गया। आसपास की कई सड़कें भी बह गई हैं। ये तबाही की एक बानगी भर है। कश्मीर के हर जिले में इसी तरह पानी ने अपना कहर दिखाया है। कुछ दिन बाद पिर वानी साहब से बात हुई, बोले सोच रहा हूं पंजाब के बटाला शहर जाऊं और वहां से फिर से वर्कशाप से जुड़ी सामग्री खरीद लाऊं और एक नई शुरूआत करूं।

छह करोड़ का इन्फ्रास्ट्रक्चर नुकसान
शुरूआती आकलन के अनुसार सरकारी इन्फ्रास्ट्रक्चर का 6000 करोड़ का नुकसान हुआ है।

राज्य सरकार के राजस्व विभाग के सचिव विनोद कौल ने समाचार एजेंसी पीटीआई से कहा कि सरकारी भवनों जो बाढ़ में जमींदोज हुए हैं या दरक गए हैं उनको दुबारा बनाने के लिए कम से कम 5000 करोड की राशि की जरूरत होगी। श्रीनगर शहर के अलावा अनंतनाग, शोपियां, पुलवामा, कुलगाम जैसे जिले में भी भारी बर्बादी हुई है।


विमान की खिड़की से श्रीनगर शहर ( 6 - 09 2014) 

एक लाख करोड़ का नुकसान – सैलाब के बाद जम्मू कश्मीर सरकार का आकलन है कि पूरे राज्य में इस सैलाब से एक लाख करोड़ का नुकसान हुआ है। पूरे राज्य को दुबारा से पुरानी रौनक लौटाने और पुनर्निमाण में कई साल लग जाएंगे। कश्मीर चेंबर ऑफ कामर्स एंड इंडस्ट्रीज का आकलन है कि  60 हजार करोड़ का नुकसान हुआ है। केसीसीआई के चेयरमैन शेख आशिक अहमद कहते हैं कि अब तेजी पुनर्वास कार्य शुरू किए जाने की जरूरत है। सात सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कश्मीर के लिए 1000 करोड़ रुपये के फौरी राहत पैकेज का ऐलान किया था।
पर 29 सितंबर को राज्य के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि राज्य में सरकारी और निजी संपत्ति मिलाकर इस सैलाब से एक लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है। इस नुकसान की बानगी देखिए...

112 साल में कश्मीर घाटी में आई सबसे बड़ी तबाही
3.5 लाख घर इस सैलाब में तबाह हुए
83 हजार पक्के घर गिरे
96089 घर आंशिक रूप से गिरे
21162 कच्चे घर क्षतिग्रस्त हुए
54264 कच्चे घर आंशिक तौर पर क्षतिग्रस्त
5611 करोड़ की फसल हुई स्वाहा
1568 करोड़ की बागवानी स्वाहा
10,000 दुधारू पशु सैलाब में लापता, मारे गए
33,000 भेड़े सैलाब में बहीं
5000 करोड़ की आवासीय कालोनियां बरबाद
6000 किलोमीटर राज्य की सड़के बहीं
3000 किलोमीटर वाटर सप्लाई पाइप स्वाहा
350 करोड़ का पुलिस का आधारभूत ढांचाखत्म हुआ।





Wednesday, November 12, 2014

हर साल राजधानी बदलने का ड्रामा

( जन्नत में जल प्रलय - 60 )
हम जानते हैं कि जम्मू एंड कश्मीर की राजधानी श्रीनगर है। पर यह आधा सच है। वास्तव में श्रीनगर जम्मू एवं कश्मीर की गर्मियों की राजधानी है। हर साल अप्रैल महीने में राजधानी को जम्मू से श्रीनगर शिफ्ट किया जाता है। अक्तूबर में राजधानी एक बार फिर जम्मू वापस चली जाती है। राज्य सरकार के सचिवालय का 3000 लोगों को स्टाफ मूल रूप से सालों भर जम्मू में ही रहता है। जब राजधानी शिफ्ट की जाती है तब सारा स्टाफ श्रीनगर आ जाता है। ये सारे लोग सरकारी खर्चे पर श्रीनगर के निजी होटलों में छह महीने तक रहते हैं। इस दौरान उनका परिवार जम्मू में ही रहता है। यह सरकार पर एक तरह का अतिरिक्त बोझ है। इतना ही नहीं राजधानी शिफ्टिंग के दौरान साल में दो बार स्टाफ को 10-10 दिनों का अवकाश भी मिलता है। 

शिफ्टिंग के दौरान एडवांस पार्टी सारी फाइलें जम्मू से ट्रकों में लेकर श्रीनगर आती है। इन फाइलों को श्रीनगर सचिवालय में सजाया जाता है। फिर ऐसा ही काम राजधानी के श्रीनगर से जम्मू वापसी के समय भी होता है। राजधानी शिफ्टिंग के दौरान तकरीबन एक महीने सरकारी कामकाज विकास के फैसले पूरी तरह से ठप्प रहते हैं। भला ऐसी राजधानी शिफ्टिंग का क्या लाभ। इससे तो अच्छा है सालों पर राजधानी जम्मू में ही रखा जाए। इससे सरकारी खजाने का बड़ा खर्च बचेगा। आजकल गर्मियों में दफ्तरों में एसी चलाकर काम लिया जा सकता है।

सैलाब के समय राजधानी श्रीनगर में थी। सरकार के पास अच्छा बहाना था कि हम पूरी तरह लाचार हो गए। हमारे मंत्री और स्टाफ भी आपदा में फंसे हैं। अगर जम्मू से समांतर इंतजाम होते तो ऐसा बुरा हाल नहीं होता। 7 सितंबर को झेलम ने कहर ढाया था। 6 अक्तूबर को देश के अखबारों में एक तस्वीर छपती है। श्रीनगर सचिवालय के फाइलों को धूप में सुखाया जा रहा है। कंप्यूटर और आनलाइन कार्यपद्धति के जमाने में सरकार कितनी हाईटेक इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है।

स्टेट बैंक से सीखें - 2005 में मुंबई में जब भीषण बाढ़ का कहर बरपा उस समय स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने बहुत तेजी से आपदा प्रबंधन किया। बैंक ने रातो रात अपना सेंट्रल सर्वर मुंबई से हैदराबाद को शिफ्ट कर दिया। इससे स्टेट बैंक का देशव्यापी नेटवर्क ठप्प नहीं हुआ। बैंक ने इसके लिए पहले से वैकल्पिक इंतजाम कर रखे थे। जब कश्मीर घाटी में बाढ़ का पुराना इतिहास रहा तब जम्मू कश्मीर सरकार ने आपदा की घड़ी के लिए क्या कुछ सोचा नहीं था।

एक हजार करोड़ के सेब बरबाद 
कश्मीर में आई पिछले कई दशकों की भयानक बाढ़ से राज्य का बागवानी कारोबार बुरी तबाह हो गया। बाढ़ से राज्य में 1,000 करोड़ रुपये की सेब की फसल को नुकसान पहुंचा है। उद्योग मंडल एसोचैम के आंकलन अनुसार बाढ़ से कश्मीर में 1,000 करोड़ रुपये मूल्य के सेब की फसल बह गई जिससे किसानों पर जबरदस्त प्रभाव पड़ा है। रिपोर्ट के अनुसार देशभर में ग्राहकों को भी इसका खामियाजा भुगतान पड़ सकता है। सेब की फसल खराब होने से उपभोक्ताओं को आने वाले त्यौहारी सीजन और सर्दियों में सेब के लिए उंची कीमत चुकानी पड़ सकती है। बाढ़ से सबसे अधिक प्रभावित जिले बारामुला, कुपवाड़ा और सोपोर सेब के सबसे बड़े उत्पादक जिले हैं, जहां भारी नुकसान हुआ है। पांपोर में जाफरान के बाग भी बरबाद हो गए हैं। पांपोर का जाफरान ( केशर) कश्मीर में सबसे बेहतरीन क्वालिटी का माना जाता है। जम्मू कश्मीर सरकार का आकलन है कि राज्य में 1568 करोड़ का बागवानी कारोबार तबाह हो गया है।

Tuesday, November 11, 2014

बाहर निकलने के सारे रास्ते हो गए थे बंद

( जन्नत में जलप्रलय- 59 ) 

दिल्ली के रोहिणी इलाके में सेहतमंद बने रहने के लिए योगा क्लब चलाने वाले डीएके गुप्ता और उनके सात दोस्त साल में एक बार 4 दिनों के लिए कहीं साथ साथ बाहर घूमने जरूर जाते हैं। इस बार इन लोगों ने श्रीनगर जाने की योजना बनाई थी। वे लोग श्रीनगर के विश्वंभर नगर के होटल सेंट्रल प्वाइंट ( http://www.centrepointhotel.in/) में ठहरे थे।
तीन दिन श्रीनगर में गुजारने के बाद सात सितंबर को उन्हें वापस लौटना था। वे लोग एयरपोर्ट के लिए चल पड़े, रास्ते में पता चला कि पूरे शहर में सैलाब आने के कारण एयरपोर्ट जाने के सारे रास्ते बंद हो चुके हैं।

अब कोई चारा नहीं था सिवाय की होटल की ओर वापस लौटा जाए। पर होटल वापस लौटने पर पता चला कि अब इस होटल में रहने का इंतजाम नहीं हो सकता। जब अपने ही होटल में जगह नहीं मिली तो शुरू हुई एक नए आशियाने की तलाश। ख्याम चौर पर अपना घर में जाकर सबके लिए जगह मिली। इस होटल के संचालक एक बंगाली बाबू थे। उनका व्यवहार काफी अच्छा था।

शाम को सात बजे अपना घर नामक होटल में जगह तो मिल गई। तीसरी मंजिल पर दो कमरे में सभी लोगों ने अपना सामान जमा लिया। गुप्ता जी के साथ बीपी ध्यानी, नैन सिंह रावत, आरके राणा, एससी गुप्ता, नंदन सिंह और रजनीश पांडे थे। ये सभी लोग दिल्ली में नेशनल इंश्योरेंस कंपनी में कार्यरत हैं। 

पर ख्याम चौक इलाके के अपना घर में रात को 12 बजे के बाद पानी आने लगा। आठ तारीख की सुबह तक होटल के चारों तरफ 4 फीट पानी जमा था। आठ को दिन भर सारे लोग इसी होटल में रहे। होटल प्रबंधन ने खाने का प्रबंध कर दिया। कुल 30 लोग इस होटल में थे। होटल प्रबंधन का कहना था कि उसके पास अगले बीस दिनों के लिए खाने का इंतजाम है। स्टाक में चावल आलू और दाल पड़ा हुआ है। यानी भूखे मरने का खतरा तो नहीं था। पर चारों तरफ से पानी से घिरे थे। यहां से बाहर निकलने की चिंता थी। अगले दिन 9 तारीख को दोपहर में तय किया कि खतरा बढ़ रहा है इसलिए होटल छोड़ देना चाहिए। होटल मालिक की भी यही सलाह थी। यह भी सूचना मिल गई थी राजभवन से सैलानियों की एयर लिफ्टिंग का इंतजाम है। गुप्ता जी बताते हैं कि हमलोग पैदल चलकर राजभवन पहुंच गए। अपना सारा लगेज होटल में ही छोड़ दिया था। 9 की शाम को किसी तरह अंदर पहुंच गए। पर यहां खाने पीने सोने का कोई इंतजाम नहीं था। लगा कि यहां बीमार पड़ जाएंगे। इसका अंदाजा भी नहीं ता लिफ्टिंग में कब नंबर आएगा।
10 को हमलोग राजभवन से एक बार फिर बार निकले और शहर में किसी होटल में आशियाना ढूंढने की कोशिश की। पर फाइव स्टार होटल ललित ग्रैंड ने अपने दरवाजे बंद कर रखे थे। गुपकर रोड पर यूएन दफ्तर के पास के होटल ने भी आसरा देने से इनकार कर दिया। सड़कों पर भटकते रहे पर शहर में कहीं कुछ खाने को भी नहीं मिला। लौटते समय सात लोगों में से दो लोग बिछुड गए। उनके पास सर्दियों के कपड़े नहीं थे।
गुप्ता जी और दोस्तो के होटल के आसपास जमा पानी। (फोटो - रजनीश पांडे)

 गुप्ता जी बताते हैं कि 10 सितंबर की शाम को वापस आने पर बड़ी मुश्किल से दुबारा हेलीपैड में इंट्री मिल सकी। इसमें भी सात में दो लोग बाहर ही रह गए। उन्हें 10 और 11 की रात सड़क पर गुजारनी पड़ी। 12 तारीख को दोपहर के बाद जाकर हमलोगों की एयरलिफ्टिंग हो सकी। 13 की शाम को गुप्ता जी और उनके दोस्त वायुसेना के विमान से चंडीगढ़ पहुंचे और वहां से टैक्सी बुक कर रोहिणी दिल्ली में अपने घर। 
-vidyutp@gmail.com 



Monday, November 10, 2014

कौनो तरह से जान बच गइल इहे ढेर बा...

( जन्नत में जल प्रलय57 )
बड़ी संख्या में यूपी और बिहार के मजदूर श्रीनगर के बाढ़ में फंसे थे। इनमें से कई मजदूर परिवार जब अपने घर पहुंच गए तो लगा जैसे कि उन्हें नया जीवन मिल गया हो। प्रस्तुत है ऐसे ही एक समूह की दास्तां...

श्रीनगर के सैलाब में फंसे मजदूरों का दर्द

सेवरही। (कुशीनगर)  यूपी में नारायणी नदी की बाढ़ से बचने और अपनी तकदीर संवारने कश्मीर गए जवहीदयाल और अहिरौलीदान के लोगों को वहां झेलम और तवी नदी का कहर झेलना पड़ा। 10 दिनों तक कश्मीर में बाढ़ से जूझने के बाद मंगलवार की सुबह इनमें से आठ लोग किसी तरह अपने घर पहुंचे। वहीं 12 लोग अब भी वहां फंसे हैं। घर आए लोगों ने वहां की तबाही का जो मंजर बताया वह दिल को दहला देने वाला है।


मंगलवार को तरया थाने के एपी तटबंध के किनारे बसे जवही दयाल गांव के दीनानाथ, पप्पू कुमार, गुड्डू, मनोज, कन्हाई और अहिरौलीदान के वीरेंद्र, साधू और अरविंद अपने घर पहुंचे। इन लोगों के चेहरे पर घर पहुंचने की जितनी चमक थी, उससे अधिक उस बाढ़ के खौफनाक मंजर का डर भी झलक रहा था। कश्मीर के श्रीनगर शहर के आसपास मजदूरी का काम करने वाले ये लोग जब मंगलवार की सुबह सेवरही के ट्रैक्सी स्टैंड पर उतरे तो इनके आंखों में आंसू छलक गए। जब इन लोगों से वहां के हालात के बारे में पूछा गया तो सभी का एक ही जवाब था - कौनों तरह से जान बच गईल इहे ढेर बा।

कन्हाई ने बताया कि हम लोग श्रीनगर के सालटेन चौराहा के पास रहकर मजदूरी करते थे। छह सितंबर की सुबह अचानक मोहल्ले में पानी की धारा बहने लगी। देखते देखते पानी घरों में घुसने लगा। पहले तो लगा कि कुछ देर बाद सब सामान्य हो जाएगा, लेकिन धीरे-धीरे पानी चढ़ता ही गया। पहले एक शाम तक पहली मंजिल पूरी तरह से डूब गई तो हम लोग दूसरी मंजिल पर पहुंच कर मदद की बाट जोहने लगे। वीरेंद्र ने बताया कि चार दिनों तक वे लोग भूखे प्यासे रह गए। पांचवें दिन सेना के जवानों की मदद से उन्हें बिस्किट और पानी मिला। तीन दिन पहले किसी तरह से निकल कर ये लोग पैदल करीब 40 किलोमीटर चलने के बाद सेना के शिविर के पास पहुंचे और वहां से सेना के हेलीकॉप्टर से उन्हें श्रीनगर एयरपोर्ट पहुंचाया गया।


नहीं मिला मजदूरी का एक रुपया भी - इन लोगों कहना है कि ये सभी लोग छह माह पहले वहां गए थे। मजदूरी का एक भी रुपया उन्हें नहीं मिला है, क्योंकि जिनके यहां उन लोगों ने काम किया था, उनका सब कुछ तबाह हो गया है। यहां तक की बैंकों और एटीएम सेंटरों पर पानी भरा हुआ है। कुछ साथी अभी भी अपनी मजदूरी पाने की उम्मीद में वहां रुके हैं। वापस आए लोगों का कहना था कि इनके गांव में हर साल मानसून आने के दौरान बाढ़ आती है। वास्तव में नारायणी नदी के बाढ़ के कहर से बचने के लिए ये लोग कश्मीर गए थे। पर वहां पर झेलम नदी का कहर इन्हें झेलना पड़ा।

( साभार - अमर उजाला, 17 सितंबर, कुशीनगर