Wednesday, December 3, 2014

बहुत याद आता है गांव का छठ

हर साल दिल्ली के रेलवे स्टेशनों पर छठ से पहले घर जाने के लिए रेलगाडियों में मारामारी होती है। इस मारामारी के बीच मैं किसी साल अब छठ में गांव नहीं जा पाता। पर गांव का छठ तो जेहन में बसा हुआ है। मेरे गांव सोहवलिया के पूरब में बहता सोन नदी से निकला माइनर नहर। इस नहर के किनारे पीपल का पेड़। पेड़ की छांव में बने घाट पर होता छठ। छठ के कई दिन पहले से तैयारी शुरू हो जाती थी। नहर के किनारे कुदाल से समतल करके बैठने योग्य घाट तैयार किया जाता था। इसके लिए पिताजी, चाचा लोग एक दिन पहले से जुट जाते थे। 

छठ की शाम को सारा गांव नहर के किनारे पीपल के पेड़ के नीच जुट जाता था। उस छठ पूजा में एक सामूहिकता का भाव था। पर शाम को अर्घ्य देने के बाद हमलोग घर वापस नहीं जाते थे शहर की तरह। सारी रात वहीं गुजरती थी। सुबह का इंतजार में मां और गांव भर की चाचियां छठ के गीत गाती रहती थीं। हम भी उन लोगों के साथ सारी रात जग कर सूर्य के उगने का इंतजार करते।

नहर के किनारे घाट पर रतजगा - गांव में घाट पर कोई नाच गाना या संगीत कार्यक्रम नहीं होता था। माई और चाची, दादी के कंठ से फूटते थे छठ के गीत। एक समूह गाते गाते रूक गया तो दूसरा समूह शुरू हो जाता था। हमारी ड्यूटी लगा करती थी दीपक में तेल भरते रहने की।

सारी रात जलता था दीया - सारी रात जलता रहता था दीया। उम्मीदों का दीया। आस्था का दीया। गुनगुनी ठंड में नहर के किनारे सारी रात। किसी की भी आंख में नींद नहीं। प्रातः अरुण के आगमन का इंतजार। सुबह होते ही चाचा गाय का दूध लेकर पहुंच जाते। सुबह का अर्घ्य तो दूध से दिया जाता है ना।

मां को न जाने कितने छठ के गीत याद थे। मां थक जाती तो एक चाची फिर दूसरी चाची गीत गाने अगुवाई करतीं। पर नहर के किनारे घाट पर छठ के गीतों की सुर धारा कभी रुकती नहीं थी। और इस तरह पीपल के पेड़ के नीचे इंतजार में सुबह हो जाती थी। मां का सबसे पसंदीदा छठ गीत था - केरवा से फरे ला घउद से ओह पर सुग मेडराए...

हमारे गांव में छठ में काफी पवित्रता बरती जाती है। छठ का प्रमुख प्रसाद ठेकुआ हो या फिर खाने पीने की दूसरी चीजें सब कुछ शुद्ध देसी घी में बनता। वह भी घर के बने हुए गाय के घी में। क्योंकि मेरे गांव में तो भैंस पाली ही नहीं जाती है ना। 

एक बार तय हुआ कि इस बार छठ नानी के गांव में होगा। भोजपुर जिले में पीरो से पूरब कोईल के पास कुसुम्ही गांव। गांव के दक्षिण में आहर। पेड़ों की लंबी कतार और उसके साथ नदीनुमा जल की धारा। बड़ा ही मनोरम दृश्य था उस आहर के किनार छठ का। 
वहां भी गांव की सारी महिलाएं सारी रात जागकर उग ना सूरूज देव भइल अरघ के बेर... गाती रहतीं...वहां कभी कभी लोकनृत्य का भी आयोजन होता था। बड़ों के लिए पूजा थी, आस्था थी। पर हमें तो इंतजार रहता था सुबह होने का, और छठ के प्रसाद का। सुबह के अर्घ्य के बाद मां के हाथों से घाट पर प्रसाद पाने का इंतजार। अब मां की उम्र बढ़ती जा रही है वे अब छठ नहीं कर पातीं। पर उम्मीद है गांव में आज भी उसी तरह छठ होता होगा। और छठ पूजा का एक गीत...
कांच ही बांस के बहंगिया,
बहंगी लचकत जाय...
बहंगी लचकत जाय...
बात जे पुछेले बटोहिया
बहंगी केकरा के जाय ?
बहंगी केकरा के जाय ?
तू त आन्हर हउवे रे बटोहिया,
बहंगी छठी माई के जाय... 

--- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com) 
( SOHWALIA DAYS 7, ROHTAS, CHHATH,  FESTVAL, WORSHIP OF SUN ) 

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