Thursday, September 11, 2014

सदभावना रेल यात्रा तीसरा चरण- एक बार फिर जम्मू में ((57))

जम्मू की यात्रा के दौरान रेलगाड़ी में सुब्बराव जी के साथ। 
( पहियों पर जिंदगी-56)
सदभावना रेल यात्रा का तीसरा चरण दो अक्तूबर 1995 में गांधी जयंती के दिन बापू की जन्मस्थली पोरबंदर से शुरू हुआ था। रेलवे बोर्ड के सदस्य राजकुमार ने यात्रा को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। तीसरे चरण में सदभावना रेल ने आठ राज्यों का सफर किया। पोरबंदर से चलने के बाद रेल का ठहराव द्वारका, ओखा, खंभालिया, जामनगर, राजकोट, सुरेंद्र नगर, वीरग्राम, धारंगना, गांधीधाम, अहमदाबाद, नाडियाड, आनंद, वडोदरा, गोधरा, दाहोद में रहा। इसके बाद रेल मध्य प्रदेश में प्रवेश कर गई।
रतलाम, कचरोद, नागदा, श्यामगढ़, कोटा, चित्तौड़गढ़, जोधपुर, जैसलमेर, बीकानेर, रेवाड़ी, अलवर, आगरा, धौलपुर, ललितपुर, भोपाल, पांडुरना, वर्धा, बांदेरा, अमरावती, अकोला, मलकापुर, खेमगांव, जलगांव, भुसावल, बीना, गुना, शिवपुरी, दतिया, डबरा, ग्वालियर, मुरैना, बल्लभगढ़, जम्मू होते हुए सदभावना का संदेश देती हुई राजधानी दिल्ली पहुंची। 

साल 1995 के अगस्त महीने में मैं दिल्ली में आकर भारतीय जन संचार संस्थान में पत्रकारिता में डिप्लोमा की पढ़ाई करने लगा था। इसलिए तीसरे चरण में जाने का मौका नहीं मिल सका था। पर दिसंबर की पहली तारीख को ट्रेन का समापन दिल्ली के सफदरजंग रेलवे स्टेशन पर होना था। मैं 30 नवंबर को एक दिन पहले के पड़ाव बल्लभगढ़ पहुंच गया, ताकि यात्रा और यात्रियों के संग एक दिन गुजार सकूं और अखबारों के लिए कुछ फीचर और आलेख आदि लिख सकूं। सुबह-सुबह मुरैना से चलकर फरीदाबाद के पास बल्लभगढ़ रेलवे स्टेशन पर सदभावना रेल पहुंची। यहां रेलयात्रियों का भव्य स्वागत हुआ। लंबे अंतराल के बाद उस ट्रेन को देखकर जहां मैंने कई माह गुजारे थे, मैं भी अभिभूत था। कई पुराने दोस्तों से मुलाकात कर मन भर आया। 

स्वागत कार्यक्रम के बाद सुब्बाराव जी से मुलाकात हुई तब पता चला कि ट्रेन का आखिरी पडाव से पहले कार्यक्रम में थोड़ा बदलाव हुआ है। अब आज रात को ट्रेन जम्मू जा रही है। वहां दो दिन के ठहराव के बाद दिल्ली वापस आएगी। अब मुझे एक बार फिर जम्मू जाने का मौका मिल रहा था। इस बार मैं ट्रेन में मेहमान की तरह था, दफ्तर संभालने की जिम्मेवारियों से मुक्त। सो मैंने सोचा कि अच्छा रहेगा वैष्णो देवी के दर्शन करने भी चला जाऊंगा। इसलिए मैं रेल यात्रा के साथ हो लिया। ट्रेन चल पड़ी। अगली सुबह सुब्बराव जी ने कुछ डिक्टेशन देने के लिए बुलाया। पिछली यात्राओं में कई बार मैं उनके खतों के जवाब लिखा करता था। इस बार मैंने चलती ट्रेन में सुब्बराव जी का एक साक्षात्कार भी लिया जो बाद में दिल्ली प्रेस की युवाओं की पत्रिका मुक्ता में प्रकाशित हुआ। 

ट्रेन एक बार फिर जम्मू में थी। पिछली बार मैं जम्मू शहर पूरा घूम चुका था इसलिए इस बार कार्यक्रमों में हिस्सा लेने में कोई रूचि नहीं थी। सो मैं अकेला वैष्णो देवी के लिए निकल गया। जम्मू से बस से कटरा और कटरा पदयात्रा करते हुए चढ़ाई शुरू कर दी। इस चढ़ाई में चलते कुछ दोस्त बन गए। वे लोग इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद जम्मू में हाइड्रो प्रोजेक्ट में बतौर इंजीनियर काम कर रहे थे। अक्तूबर का महीना... रास्ते में गुनगुनी ठंड। माता के दर्शन आसानी से हो गए। जब दर्शन के बाद लौट रहा था, तब छिंदवाड़ा के प्रवीण कुमार बागड़ी समेत तमाम रेल यात्री भी वैष्णो देवी के लिए चढाई करते मिले। पता चला कि रेल यात्रा में एक दिन का अवकाश सभी यात्रियों को माता वैष्णो देवी की यात्रा के लिए दे दिया गया है।

इस बार की जम्मू यात्रा में यश शर्मा जी से मुलाकात नहीं हो सकी, पर उनकी याद बहुत आई। उनका गीत याद आया जो राष्ट्रीय एकता और सदभावना के संदेश को पूरी तरह से ज्ञापित करता है। हम उनके साथ ये गीत बेंगलुरु शिविर में और सदभावना रेल यात्रा में गुनगुनाते थे। तो सुनिए वो गीत


एकता एकता एकता एकता का दीया 
इस जमीं पे सदा जगमगता रहे
आदमी, आदमी के लिए प्यार के गीत
बुनता रहे, गुनगुनाता रहे।  एकता...
रंग और नस्ल का भेद बेकार है
आदमियत वहां जहां प्यार है...
भाईचारे का बंधन न टूटे कभी
वक्त चाहे हमें आजमाता रहे। एकता...
फल फूल आएगा, पेड़ इतेहाद का
हम अगर एक हैं, हुश्न है ताज का
मादरे हिंद तेरा हर एक पासवां
तेरी अजमत के ही गीत गाता रहे। एकता....
लाख तूफां आए चले आंधियां
आसमां से कौंधे बिजलियां
अपना अज्मे जमां साथियों दोस्तों
कठिन घड़ियों में भी मुस्काराता रहे।
एकता एकता.....
( गीतकार यश शर्मा, 24 पी, गांधीनगर जम्मू)
चार दिसंबर 1995 को तीसरे चरण में सदभावना रेल जब दिल्ली पहुंची तो बड़ौदा हाउस में हुए एक कार्यक्रम में तत्कालीन रेल राज्यमंत्री सुरेश कालमाडी ने सभी सदभावना रेलयात्रियों का स्वागत किया। इसके बाद यात्रा के चौथे चरण शुरू होने का संयोग नहीं बन सका। हालांकि रेलवे ने एक लंबी दूरी की ट्रेन का नामकरण कर डाला सदभावना एक्सप्रेस। ये ट्रेन रक्सौल से दिल्ली के बीच चलती है। सदभावना रेल यात्रा का सफर बस इतना ही....जीवन के फिर किसी मोड़ पर मुलाकात होगी। सायोनारा...सब्बा खैर...

 - विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com 


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