Tuesday, September 9, 2014

सदभावना रेल दूसरा चरण - बनारस से बनवासी सेवा आश्रम रेणुकूट में ((55))

बनवासी सेवा आश्रम में भारत की संतान की प्रस्तुति। (1994) 
(पहियों पर जिंदगी 54) 
सदभावना रेल यात्रा का पहला चरण मई 1994 में दिल्ली में खत्म होने के बाद 1995 में इसका दूसरा चरण शुरू हुआ। इसका कुल मार्ग पहले चरण की तुलना में छोटा था। इस बार रेल की शुरुआत गाजियाबाद रेलवे स्टेशन से हुई ।  27 जनवरी 1995 को यात्रा को गाजियाबाद में ओडिशा के पूर्व राज्यपाल और महान गांधीवादी डॉक्टर बीएन पांडेय ने हरी झंडी दिखाई। दूसरे चरण की यह यात्रा 27 मार्च 1995 तक संचालित हुई। इसके मार्ग में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, बिहार आदि राज्य थे।  


रेनुकूट आश्रम में, पगड़ी किसी साथी ने दी थी
पर इस बार मैं यात्रा में अपनी पढ़ाई की व्यस्तताओं के कारण नहीं जा सका। पर दूसरे चरण में ट्रेन जब इस चरण में वाराणसी पहुंची तो अजय पांडे जी के साथ मैं स्थानीय आयोजकों की मंडली में स्वागत समिति में स्वयंसेवक की भूमिका में काम कर रहा था। पर वाराणसी से चलने के बाद कुछ दिनों के लिए मैं एक बार फिर सद्भावना ट्रेन में एक बार फिर सवार हो गया। इस बार मैं यात्री था। वही सद्भावना रेल है, जो पहले चरण में थी। ट्रेन में कुछ नहीं बदला है, साइकिलें वहीं हैं, पर सवार बदल गए हैं। राही बदल गए हैं, शहर बदल गए हैं। वाराणसी से चलकर हमारी ट्रेन सोनभद्र जिले के रेणुकूट रेलवे स्टेशन पर  रूकी। यहां एक दिन का ठहराव है। रेणुकूट हिंडालको का शहर है। यूपी के बड़े औद्योगिक शहर में शुमार है। यहां हमारी यात्रा गोविंदपुर स्थित बनवासी सेवा आश्रम में पहुंची। ये आश्रम प्रेम भाई द्वारा स्थापित किया गया था। प्रेम भाई अब इस दुनिया में नहीं रहे। 
रेनकूट आश्रम में मेरी एक तस्वीर। 

वाराणसी में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के सर सुंदरलाल चिकित्सालय में उपचार के दौरान मेरी उनके एक बार मुलाकात हुई थी। सामाजिक कार्यकर्ता श्री मोहन शुक्ला जी ने मुझे उनसे मिलवाया था। रेणुकूट में मोहन शुक्ला जी से मेरी एक बार फिर मुलाकात हुई। उनकी पत्नी इसी आश्रम में रहती हैं। जिंदादिल सामाजिक कार्यकर्ता मोहन शुक्ला जी से मेरी पहली मुलाकात एनवाईपी के अलीगढ़ शिविर ( सितंबर 1991) में हुई थी। तब उन्होंने हमें एक बांग्ला समूह गान सिखाया था।


डॉ रागिनी प्रेम( 1934-2014)
बनवासी सेवा आश्रम आसपास के गांवों में समाजसेवा के दर्जनों प्रकल्प चलाता है। प्रेम भाई की पत्नी डॉक्टर रागिनी प्रेम अब इस अभियान को आगे बढा रही हैं। रागिनी बहन की भी एक कहानी है। एमबीबीएस की पढ़ाई करने के बाद वे चिकित्सक बन गईं। यानी वे रागिनी बहन मूल रूप से डॉक्टर थीं। पर पीड़ित मानवता दर्द उनसे देखा नहीं गया। वे प्रेम भाई के समाज सेवा के विचारों से प्रभावित होकर उनके साथ विवाह करके आ गईं। इसके बाद अपना सारा जीवन समाजसेवा के नाम कर दिया। साल 2014 में जब मैं रेल यात्रा के संस्मरणों को लिपिबद्ध कर रहा हूं, सुनने में आया कि रागिनी बहन भी इस दुनिया में नहीं रहीं। पर उम्मीद है कि आश्रम की गतिविधियां बदस्तूर जारी रहेंगी। 

आज प्रेम भाई नहीं हैं पर आश्रम की गतिविधियां उसी तरह संचालित हो रही हैं। अगर किसी को गांधीवादी तरीके से समाजसेवा के प्रकल्पों पर काम आगे बढ़ता हुआ देखना हो तो वह रेणुकूट के इस आश्रम को देख सकता है।

शाम की सर्व धर्म प्रार्थना सभा में रागिनी बहन ने हमें आश्रम की गतिविधियों से रुबरू कराया। हमारा एक दिन का प्रवास इसी आश्रम में रहा। रात्रि भोजन और सदभावना रेल यात्रा के यात्रियों का रात्रि विश्राम का इंतजाम भी आश्रम में ही था।

इस दौरान हम यहां आश्रम के कार्यकर्ताओं से भी मिले। इनके परिवार समेत रहने का इंतजाम और बच्चों के पढने की व्यवस्था आश्रम की ओर से की जाती है। यहां हमें बिहार के पूर्णिया जिले के रहने वाले शबरी मंडल मिले जो आश्रम के कार्यकर्ता हैं और परिवार समेत यहीं रहते हैं। वे हमें सुबह के नास्ते पर अपने घर ले गए। अपने पूरे परिवार से मुझे मिलवाया। रेणुकूट से जब ट्रेन चलने लगी तो आश्रम के तमाम कार्यकर्ता रेलवे स्टेशन पर हमें छोड़ने आए। मंडल जी तो साथ छूटते हुए भावुक हो गए। ऐसा लगा जैसे एक दिन में हम परिवार के सदस्य जैसे बन गए हों।

 - विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com


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