Friday, September 12, 2014

सदभावना के साथी- जिन्हें भूला न पाएंगे ((58))

अंबाला में द्वारकानाथ, मधु भाई, गगन, पुनीत, अमन, विद्युत, देवेंद्र गौड़।
(पहियों पर जिंदगी 57 )
जिंदगी सदभावना की रेल नहीं हो सकती। पर इस सफर के कई साथी बहुत याद आते हैं। ऐसे साथी जो नींव के ईंट की तरह हैं। सदभावना रेल यात्रा के संचालन और अनुशासन बनाए रखने में उनकी अपनी भूमिका महत्वपूर्ण रही। पर वे किसी तरह के प्रचार से दूर स्वंयसेवक के भाव से यात्रा में लगे रहे।  

देवेंद्र गौड़ ( उत्तर प्रदेश) -  देवेंद्र गौड़ भाई झांसी से आए थे। वे आरसी गुप्ता जी के संपर्क से रेल यात्रा से जुड़े थे। उनसे मेरी मुलाकात सदभावना यात्रा के आधार शिविर में नई दिल्ली के रेलवे स्टेडियम में हुई। वे एमबीए की पढ़ाई कर रहे हैं। तेज तर्रार और स्मार्ट देवेंद्र ने कार्यालय व्यवस्था और पंजीयन आदि का काम देखना शुरू किया है। वे हालांकि शुरुआत के 20 दिनों तक ही यात्रा में रहे। अंबाला से वे वापस लौट गए। क्योंकि उन्हें आगे अपनी पढ़ाई जारी रखनी थी। पर उसके बाद दफ्तर चलाने, रजिस्ट्रेशन आदि का जिम्मा मुझे सौंप गए। मैंने दिल्ली से ही उनके काम में सहायता करनी शुरू कर दी थी।



मधुसूदन दास (ओडिशा)  मधूसूदन दास ओडिशा के कटक के पास के रहने वाले हैं। वे पूर्णकालिक समाजसेवक हैं। आजकल एनवाईपी के साथ काम कर रहे हैं। लोग मधु भाई को मिनी भाईजी कहते हैं। ऐसा इसलिए कि वे भाई जी से प्रेरणा लेकर उनकी तरह ही निक्कर और खादी की बुशर्ट पहनते हैं। मधुभाई से मेरी मुलाकात पहली बार 1992 में दिल्ली में यूथ वर्कर्स मीट के दौरान हुई थी। इसके बाद उनसे जौरा आश्रम में भी मिलना हुआ। वे बड़े कुशल संगठक और मंच संचालक हैं। जरूरत पड़ने पर गुस्सा भी कर लेते हैं। कदकाठी से दुबले पतले हैं। कभी कभी वे कहते हैं कि आखिर मैं कैसा खाना खाउं कि मेरे गाल भी रणसिंह परमार की तरह लाल लाल हो जाएं।

शशांक सुबुद्धि (ओडिशा) - उनका पूरा नाम शशांक शेखर सुबुद्धि है। ओडिशा से आए हैं। हमारी उम्र के हैं। पर पढ़ाई छोड़ दी है। अपना घर भी छोड़ दिया है। कहते हैं अब पूरे समय समाज सेवा ही करूंगा। आगे भविष्य कैसे चलेगा इसकी कोई चिंता नहीं है। कई मुद्दों पर बातचीत होते होते उनकी अक्सर मुझसे लड़ाई भी हो जाती है। रणसिंह परमार जी पूछते हैं कि तुम सुबुद्धि से इतना लड़ते क्यों हों। पर मैं क्या करूं मेरी जो उनसे नहीं पटती।



आनंद दिनकर पंडित ( मध्य प्रदेश ) - आनंद पंडित मूल रूप से मराठी हैं पर वे ग्वालियर शहर के रहने वाले हैं। उनसे हमारी मुलाकात बेंगलुरू में आध्यात्मिक युवा शिविर के दौरान हुई थी। वहां वे सुबह सुबह जागरण गीत आ गया...आ गया...जागने का वक्त आ गया...गाते थे जिसे हजारों लोग पीछे से दुहराते थे। दिन भर आनंद भी जहां मिलें शिविरार्थी उन्हें देखकर बस आ गया...बोलते थे। आनंद भाई बाबा आम्टे के भारत जोड़ो यात्रा में रह चुके हैं। उन्हें राष्ट्रीय एकता से जुड़ी यात्राएं करने का पुराना अनुभव है। सदभावना यात्रा में रैली संचालन में कमांडर जैसी भूमिका निभाते हैं।

दिलीप शसाने ( महाराष्ट्र ) - दिलीप भाई बड़े सरल और सहज इंसान है। वे रेल यात्रा के दौरान स्टोर की जिम्मेवारी निभाते हैं। रेल यात्रा में अनुशासन बनाए रखने में उनकी बड़ी भूमिका रहती है। हर छोटा बड़ा काम करने के लिए वे तुरंत तैयार रहते हैं। वे महाराष्ट्र के अहमदनगर के रहने वाले हैं। वे रेल यात्रा के दौरान हमारे घर हाजीपुर भी पहुंचे थे। कई साल बाद उनसे बात हुई। वे अहमदनगर में ही रह रहे हैं और सामाजिक कार्यों में योगदान करते रहते हैं। 

-    vidyutp@gmail.com  
( DEVENDRA GAUR, DWARKANATH, MADHUSUDAN DAS, ANAND PANDIT, LIFE ON WHEELS )


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