Friday, August 1, 2014

भारत का मैनेचेस्टर लुधियाना ((16))

लुधियाना रेलवे स्टेशन के पास स्थित घंटाघर। 
( पहियों पर जिंदगी 16) 
14 अक्तूबर 1993 लुधियाना। मंडी गोबिंदगढ़ से ट्रेन रात को 10 बजे चल पड़ी। थोड़ी देर में पंजाब का सबसे बड़ा शहर लुधियाना आ गया। होजरी और ऊनी वस्त्रों का बड़े पैमाने पर यहां कारोबार होता है इसलिए इसे भारत का मैनेचेस्टर भी कहते हैं। अस्सी के दशक के बाद लुधियाना में उद्योग धंधों का बड़े पैमाने पर विकास हुआ। यह शहर न सिर्फ ऊनी वस्त्रों के निर्माण में देश में नंबर वन है बल्कि साइकिल के लिए भी जाना जाता है। लोकप्रिय हीरो और एवन साइकिलों का निर्माण इसी शहर में होता है। आबादी में यह पंजाब का सबसे बड़ा शहर है। 
लुधियाना में रात को ही तमाम सामाजिक संगठनों ने हमारा स्वागत किया। इसके बाद हमलोग सो गए। 14 अक्तूबर की सुबह लुधियाना जंक्शन के प्लेटफार्म पर होती है। सुबह के नास्ते के बाद हमारी रैली अंबेदकर नगर स्थित झुग्गी झोपड़ी कालोनी में पहुंची। झुग्गी झोपड़ी के बच्चों के मध्य बहुत सुंदर कार्यक्रम हुआ। यहीं दोपहर के भोजन का भी इंतजाम था। शाम का कार्यक्रम डुगरी रोड पर कृष्ण मंदिर में हुआ।

मुंबई की रहने वाली लिसी भरूचा मैडम जो सद्भावना यात्रा का जन संपर्क देखती हैं उन्हें अपने टाइपराइटर पर काम करने के लिए एक टेबल की जरूरत है। हमारा दफ्तर ट्रेन के कावेरी कोच में चलता है। मैं लिसी मैडम लुधियाना के बाजार में गए और एक फोल्डिंग टेबल खरीदा। साथ ही दूसरे जरूरी स्टेशनरी सामान भी। 



विजय भारतीय जी के साथ बहस - शाम को विजय भारतीय जी के साथ लंबी वार्ता हुई। हमलोग लुधियाना में एक दुकान पर गए जहां गर्मागर्म दूध के साथ लंबी बहस हुई। विजय भारतीय जी गुजरात के अहमदाबाद में रहते हैं। वे पूर्णकालिक तौर पर समाजसेवा से जुडे हैं।  वे मेरी पढ़ाई के बाद आगे की योजना पूछ रहे हैं। उनका ख्याल है कि मुझे कोई एक क्षेत्र चुन लेना चाहिए और पूरी तरह समाजसेवा करनी चाहिए। मैं रोजी रोटी और कैरियर को लेकर उधेड़बुन में हूं। मैं बीए के बाद एमए करना चाहता हूं। आगे क्या बनना है नहीं सोचा अभी पर मैं समाज सेवक तो नहीं बनना चाहता। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में एमए में एडमिशन लेकर मैं रेल यात्रा पर आ गया हूं। अगले दिन विजय भारतीय जी वापस गुजरात लौट गए। पर मैं उन्हें अपने जवाब से संतुष्ट नहीं कर पाया।

यशपाल मित्तल जी से मुलाकात  - लुधियाना में दिन में रेलगाड़ी में एक बुजुर्ग सज्जन सुब्बराव जी से मिलने आए।  उनका नाम यशपाल मित्तल है। पता चला कि वे प्रस्थान आश्रम पठानकोट के संचालक हैं। उनका व्यक्तित्व काफी हद तक भाई जी जैसा है। काफी मिलनसार हैं। उनसे ढेर सारी बातें हुईं। उन्होंने बताया कि वे 1969 में चली गांधी प्रदर्शनी रेल में भी सुब्बराव जी के साथ थे। कुछ समय तक उन्होंने रेल के प्रभारी के तौर पर भी काम किया था। उन्होंने रेल यात्रा के संबंध में जानकारी ली और बताया कि पठानकोट में जब रेल रुकेगी तो हमारी उनकी तफ्सील से मुलाकात होगी।