Tuesday, April 29, 2014

रेल भवन के बाहर तैनात नन्हा स्टीम लोकोमोटिव

 जब दिल्ली के रेल भवन के पास से गुजरते हैं तो यहां पर बाहर के नन्हें से रेलवे इंजन को तैनात देखते हैं। ये लोकोमोटिव है पूर्वोत्तर सीमा रेलवे का,  जो 1993 तक रेलवे को अपनी सेवाएं दे रहा था। अब यह आते जाते लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। इसे रेलवे की विरासत के तौर पर रेल भवन के बाहर लाकर स्थापित किया गया है।


कभी डीएचआर का हिस्सा था-  लंबे समय तक दार्जिलिंग हिमालयन रेल पर अपनी सेवाएं देने के बाद ये रिटायर हुआ और अब रेल भवन के बाहर शोभा बढ़ा रहा है। ये नन्हा से इंजन इस बात की प्रतीत है रेलवे ने नन्हें लोको से आगे बढ़ते हुए आज 4500 हार्स पावर के और 160 किलोमीटर प्रति घंटे तक गति तक वाले लोको तक का सफर तय किया है। हर बड़े सफर की शुरुआत तो आखिर छोटे से सफर से ही होती है ना।
रेल भवन के बाहर आराम फरमा रहे 799 बी एक स्टीम लोकोमोटिव (इंजन) है। इसका निर्माण ब्रिटेन के ग्लासगो की कंपनी नार्थ ब्रिटिश लोको कंपनी ने 1925 में किया था। इसका मेक नंबर 23292 है। लंबे समय तक धुआं उड़ाते हुए बड़े शान से सेवाएं देने के बाद इसे 1993 में संरक्षित किया गया। रेलवे के विकास के इतिहास की कहानी मूक रूप से याद दिलाने के लिए रेल भवन के बाहर लाकर तैनात किया गया।
डीएचआर के मार्ग पर चलते समय इसका नाम डीएचआर 46 हुआ करता था। इस बी क्लास लोकोमोटिव का वजन 14 टन था। डीएचआर पर यह तीसरी पीढ़ी का लोकोमोटिव था। वन (1) क्लास और ए क्लास के बाद डीएचआर के पास नार्थ ब्रिटिश लोकोमोटिव कंपनी से लिए गए कई लोकोमोटिव हुआ करते थे। इनमें से 17 लोकोमोटिव को अलग अलग स्थलों पर संरक्षित किया गया है। इस कंपनी का गठन शार्प स्टुअर्ट और कई अन्य कंपनियों को मिलाकर 1903 में किया गया था। कंपनी आरंभ में स्टीम और फिर डीजल लोकोमोटिव बनाती थी। भारत और श्रीलंका को बड़े पैमाने में स्टीम लोकोमोटिव की सप्लाई इस कंपनी ने की थी। 


 
बड़ौदा हाउस के बाहर भी एक नन्हा लोकोमोटिव 

दिल्ली के इंडिया गेट के पास स्थित बड़ौदा हाउस जो उत्तर रेलवे का मुख्यालय है उसके बाहर भी एक नन्हा लोकोमोटिव आराम फरमा रहा है। ये नैरो गेज दो फीट छह इंच की पटरियों पर दौड़ने वाला लोकोमोटिव है। ये तत्कालीन पाकिस्तान में अपनी सेवाएं दे रहा था। 1910  में बना ये लोको कराची पोर्ट ट्रस्ट में पहली बार तैनात किया गया। इसका निर्माण ब्रिटेन की डिक केर एंड कंपनी  (DICK KERR AND CO, LONDON) ने किया था। इंजन पर कंपनी का लोगो लंबे समय बाद भी साफ दिखाई देता है। डब्लू बी डिक और जॉन केर ने पार्टनशिप में 1883 में रेलवे लोकोमोटिव बनाने की कंपनी स्थापित की थी। इसी कंपनी ने इस लोकोमोटिव का निर्माण किया। सन 1919 तक कंपनी ने तकरीबन 50 लोकोमोटिव का निर्माण किया था। ( https://www.gracesguide.co.uk/Dick,_Kerr_and_Co) 

इसका नामकरण एमटीआर -1 ( 0-4-2) मॉडल के तौर पर किया गया था। ये ये दो फीट 6 इंच का नैरो गेज मार्ग पर चलने वाला लोकोमोटिव था। पाकिस्तान के जंगलों से इससे लंबे समय तक लकड़ी ढुलाई का का काम लिया गया। कराची बंदरगाह पर मालगाड़ी के डिब्बों के ये लोको लंबे समय तक खिंचता रहा।

जब यब बूढ़ा होने लगा तो 1922 में इसे पंजाब के कपूरथला जिले के ढिलवां प्लांट को स्थानांतरित कर दिया गया। वहां भी इसने लंबे समय तक अपनी सेवाएं दीं। 1990 में इस लोकोमोटिव को उत्तर रेलवे के अमृतसर वर्कशॉप में काफी मेहनत करके रिस्टोर किया गया है। कई सालों बाद इसे रेलवे विरासत के तौर पर प्रदर्शित करने के लिए नई दिल्ली स्थित उत्तर रेलवे के मुख्यालय बड़ौदा हाउस के बाहर लाकर स्थापित किया गया। अब यह यूं दिखाई देता है जैसे बस चलने को तैयार हो।


बडौदा हाउस के बाहर नन्हा लोको- ( फोटो - विद्युत प्रकाश) 
अब इसे चलता हुआ देखें - आते जाते लोगों का पुराने स्टीम लोकोमोटिव पर ध्यान दिलाने के लिए उत्तर रेलवे ने इसे चलाने की कवायद की। हर रोज शाम 5.30 बजे से रात्रि आठ बजे तक आप इसे चलता हुआ देख सकते हैं। इस स्टीम इंजन को बिजली से चलाया जाता है। इसके पहिए और घूमते नजर आता हैं। यह स्टीम के पुराने दौर के इंजन की तरह आवाज भी निकालता है
 - विद्युत प्रकाश मौर्य -  vidyutp@gmail.com  


( NARROW GAUGE, RAIL, DHR , RAIL BHAWAN, DELHI, MTR, BARODA HOUSE, DICK KERR AND CO LONDON  ) 

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