Sunday, July 13, 2014

रजरप्पा - मां के दरबार में बलि और प्रदूषण

असम के कामाख्या देवी, बंगाल के तारापीठ और त्रिपुरा के त्रिपुर सुंदरी मंदिरों की तरह झारखंड के रजरप्पा में भी बलि चढाने की परंपरा सदियों चली आ रही है।
मंदिर के सामने बलि-स्थान पर रोज सौ-दो सौ बकरों की बलि चढ़ाई जाती है। खास मौकों पर यह संख्या हजारों में पहुंच जाती है। श्रद्धालु मंदिर परिसर में बकरों की बलि चढ़ाने के बाद उसी स्थल में मांस के भोज का आयोजन भी करते हैं। जिस बकरे की बलि चढ़ाई जाती है उसका यहीं पर भोज किया जाता है। अक्सर बकरे का सिर पंडा के हिस्से में जाता है और उसका धड़ मनौती मानने वाले परिवार का होता है। मुंडन के लिए रजरप्पा में रोज बकरे का बाजार लगता है। श्रद्धालु यहीं से बकरे खरीदते हैं और यहीं पर बलि की पूरी प्रक्रिया को अंजाम देते हैं।

आखिर बलि क्यों दी जाती है। हिंदू धर्म में निरीह प्राणियों के बलि देने की पुरानी परंपरा को अब काफी लोग गलत ठहरा रहे हैं। इसी क्रम में देश कई मंदिरों में बलि की प्रथा खत्म हो चुकी है। पर कई राज्यों के कई प्रमुख मंदिरों में अभी भी जारी है। 
रजरप्पा में लोग अपनी  कामनाओं की पूर्ति के बलि देते हैं। इसके लिए बकरा चढ़ाते हैं। रोज सैकडो निरीह बकरों की खरीद फरोख्त होती है मंदिर के आसपास की बकरा मंडी में। एक जीव की रक्षा के लिए दूसरे जीव के प्राण ले लेना...क्या ये मां को पसंद आता होगा...मेरा मन कहता है हरगिज नहीं...

बलि के बाद हुए भोज के बाद वे पत्तलप्लेट आदि को नदी में ही बहा देते हैं। इस तरह से नदी का जल हर रोज प्रदूषण और गंदगी का शिकार हो रहा है। एक ओर तो श्रद्धालु भैरवी नदी में डूबकी  लगाते हैं दूसरी ओर इस नदी के तट पर रोज बकरे को काटने का अभियान जारी रहता है। भला इस तरह से नदी साफ कैसे रह सकती है। इसी भैरवी नदी का पानी आगे जाकर दामोदर नदी में मिलता है। इस तरह दामोदर नदी में भी गंदगी प्रवाहित होती रही है। 

पर्यावरण बचाने की कोशिशें बेअसर -  बलि किए गए बकरों का मुंडन  करने की प्रक्रिया भी पास के भैरवी नदी के बीचों बीच किया जाता है और उसकी गंदगी खून आदि नदी की धारा में बहा दी जाती है। इसके कारण मां छिन्नमस्तिका मंदिर परिसर में पर्यावरण का खतरा मंडरा रहा है।
मंदिर परिसर के पास अवस्थित भैरवी व दामोदर नदी भी पर्यावरण प्रदूषण की चपेट में हैं। पास में स्थित सीसीएल का प्रोजेक्ट और जिला प्रशासन की और मंदिर और आसपास के पर्यावरण को  बचाने की कोशिशें बेअसर दिखाई देती हैं।
झारखंड पर्यटन की ओर से यहां एक साइन बोर्ड लगा हुआ दिखाई देता है इस पर लिखा है कि कि रजरप्पा झेत्र को पालीथीन से मुक्त रखें। ये अभियान अच्छा है। पर पालीथीन से ज्यादा गंदगी तो रोज दी जा रही बलि के कारण यहां आसपास में फैल रही है।
बंद होनी चाहिए बलि प्रथा-  देश के कई मंदिरों में समय समय पर बलि प्रथा को बंद किए जाने या फिर प्रतीकात्मक बलि दिए जाने की आवाज उठती रही है। पर रजरप्पा में इस तरह की आवाज शायद नहीं उठी। धर्मप्रिय लोगों को इस मामले में पहल करनी चाहिए। आप खस्सी या बकरी चढ़ाने की मनौती मांगने के बजाय दरिद्रनारायण को भोज कराने जैसी मनौती भी तो मांग सकते हैं। क्यों न हम इस तरह की सकारात्मक पहल की शुरुआत करें। 
-  विद्युत प्रकाश मौर्य
( RAJRAPPA, DAMODAR, BHAIRWI, SANGAM, JHARKHAND, RAMGARH )
रजरप्पा में दामोदर नदी के तट पर कचरे का ढेर लगा दिखाई देता है....