Sunday, June 1, 2014

छुक छुक...कांगड़ा घाटी की रेल चली (( 5 ))

बचपन में दूरदर्शन पर कांगड़ा घाटी नैरो गेज रेल पर एक डाक्यूमेंटरी देखी थी, इसकी स्मृतियाँ मन में बस गई थी। तब से इस रेल पर सफर करने की एक इच्छा थी। साल 2001 का जुलाई का महीना था हमलोग सपरिवार वैष्णो देवी के दर्शन कर पठानकोट पहुंचे। आगे की योजना बन चुकी थी कांगडा घाटी रेल से धर्मशाला और आसपास के स्थलों के दर्शन की। शाम को पठानकोट पहुंचने पर पता चला कि कांगड़ा घाटी की पहली रेलगाड़ी सुबह ढाई बजे खुलेगी। इस सफर पर जाने का उत्साह इतना था कि हमलोग कांगड़ा मंदिर तक का टिकट लेने के बाद ट्रेन के लिए कई घंटे प्लेटफार्म पर ही इंतजार करना तय किया।

हमारी ट्रेन सात घंटे बाद थी। इतने वक्त के लिए होटल बुक करना या किसी के घर जाना उचित प्रतीत नहीं हुआ। तो बाजार जाकर दो चादर खरीद लाए और पठानकोट जंक्शन पर चादर बिछा कर सो गए। इस पठानकोट के अमर उजाला ब्यूरो में कार्यरत हमारे साथी अवधेॆश गुप्ता हमसे मिलने आए। 
ढाई बजे की ट्रेन के लिए आधा घंटे पहले ही पहुंचने पर पता चला ट्रेन तो ठसाठस स्थानीय लोगों से भर चुकी है। खैर जाना तो था ही बड़ी मुश्किल से ट्रेन में हमलोगों को जगह मिल पाई। लोगों ने यह जानकर की हम बाहर से आए सैलानी हैं हमारे लिए उदारता से थोड़ी जगह बनाई।

कांगड़ा वैली रेलवे का एक डिब्बा।
नन्ही पटरियों पर यह रेल समय पर चल पड़ी। पंजाब के कुछ स्टेशन तो अंधेरे में गुजर गए उजाला हुआ तो ट्रेन बारयाल हिमाचल नामक स्टेशन पर  थी। अपनी क्षमता से अधिक वजन उठाए ट्रेन पहाड़ों की हसीन वादियों के बीच हौले हौले आगे बढ़ रही थी। रेल में सवार लोगों कू चिलपों जारी थी . हमें लोगों से बातचीत में पता चला ब्रजेश्वरी देवी में अष्टमी का मेला है इसलिए आज इतनी भीड़ है। ट्रेन के एक सहयात्री को पता चला कि हम देवी दर्शन के लिए जा रहे हैं तो उसने मुझे एक 10 रुपये का नोट देते हुए कहा हमारी तरफ से देवी को चढ़ा देने हम किसी काम से दूसरी जगह जा रहे हैं। पहाड़ के लोगों की ब्रजेश्वरी देवी में अगाध श्रद्धा है। कई छोटे छोटे स्टेशनों को पार करते हुए हम कुछ घंटे बाद कांगड़ा मंदिर स्टेशन पहुंच गए थे। 

कांगड़ा मंदिर रेलवे स्टेशन के बगल में एक छोटी सी नदी बहती है। इस नदी पुल पारकर हमलोग कांगड़ा शहर में ब्रजेश्वरी देवी के मंदिर के पास पहुंचे। यहां मंदिर के धर्मशाला में ठिकाना बनाया. दिन कांगड़ा प्रवास के दौरान धर्मशाला, मैक्लोडगंज, भागसू, नड्डी, चामुंडा मंदिर आदि घूमने के बाद हमलोग एक बार फिर कांगड़ा मंदिर स्टेशन पहुंचे। आगे के सफर के लिए। पता चला ट्रेन दो घंटे लेट है। तो हमने इंतजार किया। पर इस बार ट्रेन में जगह आसानी से मिल गई। 

हमारी रेल समलोटी, नगरोटा, चामुंडा मार्ग, पारोह, सुलह हिमाचल, पालमपुर,  पट्टी राजपुरा, पंचरुखी, मझरैन हिमाचल जैसे छोटे छोटे स्टेशनों से होती हुई बैजनाथ पपरोला पहुंच गई। हमें जाना था बैजनाथ मंदिर जो अगला स्टेशन था। पर आगे ट्रैक पर पेड़ गिर जाने के कारण ट्रेन का सफर यहीं खत्म हो गया।
मंदिर यहां से एक किलोमीटर की ही दूरी पर था पर बीच में छोटी नदी थी जिस पर पुल से रेल की पटरियां गुजर रही थीं। सड़क पुल काफी दूर था। लिहाजा बाकी लोगों की तरह हमने भी सावधानी से पांव रखते हुए रेल पुल से ही नदी को पार किया और पहुंच गए बैजनाथ मंदिर।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य 
( KANGRA VALLEY RAILWAYS, KVR, NARROW GAUGE  RAIL SYSTEM, PATHANKOT, KANGRA MANDIR ) 

1 comment:

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