Tuesday, June 24, 2014

पटना से रांची जनशताब्दी एक्सप्रेस से

संयुक्त बिहार में के जमाने में रांची बिहार के गर्मियों की राजधानी हुआ करता था। लेकिन सन 2000 में झारखंड बनने के बाद ये खूबसूरत शहर नए राज्य की राजधानी बन गया। पर पटना से रांची का रिश्ता आज भी खूशबूदार बना हुआ है। रोज रात्रि सेवा की दर्जनों लग्जरी बसें रांची के लिए प्रस्थान करती हैं तो कई रेलगाड़ियां भी हैं। पर मेरा सफर शुरू हुआ रांची जनशताब्दी एक्सप्रेस से। ट्रेन पटना जंक्शन के प्लेटफार्म नंबर से ठीक सुबह 6.00 बजे खुल गई। पटना से आगे चलने पर छोटा सा स्टेशन तारेगना दिखाई दिया। इस छोटे से गांव तारेगना का अंतरिक्ष विज्ञान में बड़ा महत्व है। ये तारेगना तारों की गणना से बना है। 

रेल गाड़ी से झारखंड के जंगल।  
पटना गया लाइन का सफर कभी नारकीय हुआ करता था। पर अब डबल लाइनविद्युतीकृत ट्रैक पर दिन भर दौड़ती ट्रेनों के कारण हालात बदल गए हैं। चेन पुलिंग बीते दिनों की बात हो गई है। कई नए हाल्ट बन गए हैं। सो जन शताब्दी तय समय से पहले  ही गया पहुंच गई। स्टेशन पर अनानास और पपीता बेचने वाले नजर आए. ठहराव 20 मिनट का था। हमने फलाहार किया। ट्रेन आगे बढ़ी। फल्गू नदी को पारकर मानपुर आया बुनकरों का मोहल्ला। 

थोडी देर बाद मोबाइल नेटवर्क खत्म। जंगल शुरू। हरियाली को पार कर आ गए अबरख के पहाड। कोडरमा, झारखंड का पहला बड़ा रेलवे स्टेशन। भाजपा के सांसद रीतलाल प्रसाद वर्मा की याद आई। वे दिल्ली में मिलने पर कई बार मुझे कोडरमा चलने को कहते थे। पर मैं कभी उनके साथ नहीं जा सका। वे इस दुनिया से चले गए। 

गोमो बनाम नेताजी सुभाष चंद्र बोस जंक्शन -  हजारीबाग रोडपारसनाथ के बाद रेलगाड़ी पहुंच गई है गोमो जंक्शन। गोमो का नया नाम अब नेताजी सुभाष चंद्र बोस जंक्शन हैं। इसी रेलवे स्टेशन से 1941 में नेताजी वेश बदलकर ब्रिटिश हुकुमत को चकमा देकर पलायन कर गए थे। उनकी याद में स्टेशन पर स्मृति पट्टिका लगी है। 



दामोदर नदी का पुल - चंद्रपुरा जंक्शन से पहले दामोदर नदी नजर आई। दामोदर यानी झारखंड की जीवन रेखा। इस नदी के नाम पर दामोदर वैली कारपोरेशन का गठन हुआ है।दामोदर नदी पेयजल के साथ विद्युत उत्पादन का बड़ा स्रोत है। तुपकाडीह से पहले दामोदर पर रेल पुल आता है। इसके बाद बोकारो स्टील सिटी। कई साल पहले में एक परीक्षा देने आया था इस शहर में। 



ट्रेन सरपट आगे भागती जा रही है। एक बार फिर मोबाइल नेटवर्क खत्म हो जाता है। मूरी जंक्शन से पहले स्वर्णरेखा नदी दिखाई देती है। मूरी जंक्शन के बाद हरे-भरे अलमस्त जंगलों के  बीच गौतमधारा, गंगाघाट जैसे स्टेशन आते हैं। टाटी सिलवे और नामकुम जैसे स्टेशन भी गुजर गए हैं। अब हम रांची की सीमा में पहुंच रहे हैं। 

अब रांची शहर का विस्तार टाटी तक होने लगा है। तकरीबन आठ घंटे के सफर के बाद जन शताब्दी ने हमें रांची पहुंचा दिया है। दोपहर के दो बजे हैं। मैं प्लेटफार्म से बाहर निकल रहा हूं। रांची रेलवे स्टेशन की सफेद इमारत कुछ कुछ अगरतला स्टेशन की याद दिलाती है। स्टेशन के बाहर शहर में चलने वाले रिक्शा दिखाई देते हैं जिनकी ऊंचाई पटना के रिक्शा की तुलना में काफी कम है। पटना के रिक्शा से गिरने का डर बना रहता है। पर रांची का रिक्शा अपनेपन का एहसास करता है। तो अब चलते हैं शहर में। 
-vidyutp@gmail.com  विद्युत प्रकाश मौर्य
(RANCHI, JHARKHAND, RAIL, JAN SHATABDI EXPRESS ) 



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