Sunday, June 8, 2014

मेरी पहली रेल यात्रा - कुदरा से सोनपुर वाया पटना

( कुदरा- गया - पटना- पहलेजाघाट सोनपुर )
परिंदो से रफाकत सी हो गई है। सफर की आदत सी हो गई है। अब तो 40 पार करने के बाद देश के 27 राज्यों को नाप चुका हूं। पर पहली रेल यात्रा की यादें हमेशा खुशनुमा होती हैं। तो चलिए याद करते हैं पहली यात्रा के साथ अपने छुटपन को।

दशहरे का रावण जल चुका था। मौसम में गुनगुनी सी ठंड आ गई थी। पिताजी छुट्टियों में गांव आए थे। उनकी इच्छा थी अब बड़े बेटे विकास को अपने साथ ले जाऊंगा। चार भाई बहनों में मैं सबसे बड़ा पुलकित होकर मां का आंचल छोड़ पिता के साथ रह कर पढ़ाई करने के लिए जाने के तैयार हो गया। ( तब चार ही थे दो बाद में आए) 1978 का साल था तब मैं दूसरी कक्षा में था। गांव के तीन स्कूलों से देश निकाला करार दिया जा चुका था। ( कारण फिर कभी बताउंगा) गांव से निकतम रेलवे स्टेशन कुदरा पहुंचने के लिए बसही पुल से घोड़ागाड़ी का सहारा था। 

बसहीं तक मेरे गांव से खेतों की मेड से होकर 4 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था। एक सुबह पिता की ऊंगली पकड़कर हम चल पड़े। बसही पुल पर घंटों इंतजार के बाद को तांगा नहीं आया। एक आया तो बोला अब जाउंगा नहीं। उस तांगे से जागा बाबा उतरे। वे मेरी छोटी फुआ के ससुर थे। बड़े बातूनी। उनके साथ गप्पे लड़ाते पिता जी गांव वापस लौट आए। अगले दिन फिर से बोरिया बिस्तर बांधा। इस बार तांगा मिल गया। 

कुदरा रेलवे स्टेशन पर ट्रेन का घंटों इंतजार। फिर एक ट्रेन आई। उसका नाम याद नहीं। पर वह गया जाने वाली ट्रेन थी। हमलोग उस ट्रेन से गया पहुंच गए। बीच में शिवसागर रोड, कुम्हऊं, सासाराम, करवंदिया, डेहरी ऑन सोन , अनुग्रह नारायण रोड, फेसर जैसे स्टेशन आ। फेसर नाम सुनकर मुझे खूब हंसी आई। क्या नाम है। गया का रेलवे स्टेशन बहुत बड़ा था। कई प्लेटफार्म। रात की रोशनी में मेरी आंखे चौंधियां गईं। पिताजी ने बताया यहां से रांची पटना एक्सप्रेस पकड़ेंगे पटना के लिए। रात 9 बजे ट्रेन आई। बहुत भीड़ थी। किसी तरह जनरल डिब्बे में घुस पाए। पिताजी को जगह नहीं मिली। मुझे बिठा दिया सीट के ऊपर वाली बर्थ पर। जो अमूमन सामान रखने के लिए होता है। ये सफर मुश्किलों भरा रहा। खैर पीजी लाइन पर से होकर हमलोग पटना पहुंच गए। राजधानी का रेलवे स्टेशन तो और भी बड़ा था। रेलवे स्टेशन का नाम रंग बिरंगी रोशनी में जगमगा रहा था। मैंने पहली बार बिजली के बल्ब देखे थे। रात को मुझे नींद आ रही थी। पर आधी रात में हमलोग टमटम पर सवार होकर महेंद्रू घाट पहुंचे। यहां से रेलवे की स्टीमर सेवा चलती थी।
पटना में गंगा में जहाज। 
 रात्रि सेवा से गंगा पार कर सुबह 4 बजे हमलोग पहलेजा घाट पहुंच चुके थे। अचानक लाल लाल वर्दी में ढेर सारे लोग हमारे जहाज में कूदने लगे और हमारे सूटकेस पर टूट पड़े। पिता जी ने समझाया घबराओ मत ये कुली हैं। सामान ढोने वाले। हमने कुली पहली बार देखे थे। मुझे रतजगा करने की आदत नहीं थी। पर मैं मां से दूर पिता की उंगली पकड़ उत्तर बिहार की धरती में आ चुका था। गंगाजी के रेतीले तट पर नन्हे नन्हे पांव से पदयात्रा करते हुए हमलोग पहलेजा घाट रेलवे स्टेशन पहुंचे। यहां से पैसेंजर ट्रेन में सवार हुए। पिताजी मुझे डिब्बे में बिठाकर प्लेटफार्म पर कुछ देखने चले गए। थोड़ी देर में ट्रेन से सिटी बजा दी। पिताजी नहीं आए थे। मैं भोंकार पार कर रोने लगा। सहयात्रियों ने पूछा कहां जाना है। मुझे इतना तो मालूम था कन्हौली जहां पिताजी ग्रामीण बैंक में मैनेजर हैं। पर कैसे पहुंचना है नहीं मालूम था। खैर ट्रेन चलने से पहले पिताजी आ गए। मेरी जान में जान आई। बाद में यात्रियों ने कहा, सर हम बेटे को महुआ तक तो छोड़ देते। मुझे नहीं मालूम था ये महुआ कहां है।

खैर ट्रेन ने सोनपुर छोड़ दिया। तब यहां संसार का सबसे लबां प्लेटफार्म था। यहां से तीन पहिया वाले आटो रिक्शा में बैठकर हमलोग हाजीपुर बस स्टैंड पहुंचे। उत्तर बिहार में आटो रिक्शा को टेंपू कहते हैं। मैं पहली बार इस तीन पहिए में चढ़ा था। सोनपुर से से हाजीपुर के बीच गंडकर नदी का पुल आया। पुल के आसपास जगह जगह पोस्टर लगे थे। शुभारंभ सोनपुर मेले का दो नवंबर से। 



कन्हौली का रामजानकी मंदिर। 
हाजीपुर में हम लाल रंग की सरकारी बस में चढ़े उस पर लिखा था- बिहार राज्य पथ परिवहन निगम। सुबह के सात बजे थे बस ने हमें कन्हौली जो महुआ से पांच किलोमीटर पहले एक गांव है वहां उतार दिया।

हमलोग अपने आवास पर पहुंचे। तब हमलोग कन्हौली बाजार में बम शंकर चौधरी के मकान में रहते थे। पिताजी के बैंक के सहकर्मी सियाराम जी ने हमारा स्वागत किया। मैं भोजपुरी माटी को छोडकर वज्जिका बोले जाने वाले प्रदेश में आ चुका था। जहां त का मतलब हं ( YES)  होता है। यहां सब कुछ मेरे लिए कौतूहल भरा था। दो मंजिले घर के पीछे खेतों में हरी-हरी फसल लहलहा रही थी। लोगों ने बताया तंबाकू (खैनी) है। वैशाली जिला बिहार में तंबाकू का बड़ा उत्पादक है। यह नकदी फसल है। बहुत सालों बाद हमने कर्नाटक में मैसूर के आसपास तंबाकू की खेती देखी।    
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( SOHWALIA DAYS 5 , KUDRA, ROHTAS,  BIHAR, RAIL, KANHAULI, VAISHALI )     

2 comments:

  1. Kindly post your Kudra Station photo over here: http://indiarailinfo.com/station/blog/kudra-ktq/1737

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