Sunday, July 6, 2014

बिरसा कृषि विश्वविद्यालय - हम याद रखें उनको

कांके कभी रांची शहर का बाहरी इलाका हुआ करता था पर अब शहर के आगोश में समा चुका है। हालांकि अभी भी कांके का तापमान रांची शहर से हमेशा थोड़ा कम ही रहता है। मतलब मौसम सुहाना रहता है। इसी कांके में स्थित है बिरसा कृषि विश्वविद्यालय। कभी इसका नाम रांची एग्रीकल्चर कॉलेज हुआ करता था। 

सन 1981 में बना विश्वविद्यालय -  साल 1956 में स्थापित इस कॉलेज को 26 जून 1981 को यूनीवर्सिटी का दर्जा देकर बिरसा कृषि विश्वविद्यालय नाम दिया गया। तब संयुक्त बिहार था। झारखंड राज्य बनने के बाद ये विश्वविद्यालय नए राज्य का गौरव बन गया है। संयोग ऐसा कि मैं जिस दिन विश्वविद्यालय के कैंपस में पहुंचता हूं इसका 34वां स्थापना दिवस मनाया जा रहा है। मुख्य द्वार के अंदर प्रवेश करते ही सामने प्रशासनिक भवन दिखाई देता है। 


इसके बगल में बने उद्यान में बिरसा भगवान की विशाल प्रतिमा लगी है। बिरसा मुंडा को झारखंड में भगवान का दर्जा मिला हुआ हैक्योंकि उन्होंने ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ विद्रोह किया था। मुझे रांची के कोकर इलाके में बिरसा भगवान का समाधि स्थल भी दिखाई दिया। इस समाधि स्थल को भी विकसित किया जा रहा है। 



मैं भी बिरसा मुंडा की प्रतिमा के करीब जाता हूं और आजादी के आंदोलन के इस महान रणबांकुरे को नमन करते हुए सिर झुकाता हूं। ऐसे ही महान सपूतों के कारण तो हम आजाद हवा में सांस ले पा रहे हैं। झारखंड ने बिरसा मुंडा को कई तरह से याद किया है। यहां के एयरपोर्ट का नाम भी उनके नाम पर है। बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के प्रवेश द्वार पर बाईं तरफ मुझे सरना पूजा स्थल दिखाई देता है।



छोटे से विश्वविद्यालय परिसर में जून के महीने में जब गरमी का मौसम होता है तब भी खूब हरियाली बिखरी हुई है...। वातावरण में शीतलता है। मैं देख पा रहा हूं कि मुख्य प्रशासनिक भवन के पीछे छात्रों के लिए 14 हॉस्टल बने हुए हैं। इन हॉस्टल के नाम भी प्रेरणादायक रखे गए हैं। सौम्य, शौर्य, संकल्प, सृजन आदि। छह  हॉस्टल छात्राओं के लिए भी हैं, इनके नाम सृष्टि, स्वप्निल, संचिता, स्वास्तिक जैसे रखे गए हैं। आजकल यहां कृषि स्नातक के अलावा वेटनरी साइंस, वानिकी, बायोटेक्नोलॉजी, मत्स्य पालन आदि की पढ़ाई होती है।


मेरे पिता ने यहां से पढ़ाई की - रांची आने पर मेरी दिली इच्छा बिरसा कृषि विश्वविद्यालय की मिट्टी को नमन करने की थी। क्योंकि यहां मेरे पिताश्री ने पढाई की थी। सत्तर के दशक में यहां से ही वे कृषि स्नातक हुए। वे यहीं छात्रावास में रहते थे। जब उनके पास वक्त होता है तब वे रांची के तमाम किस्से सुनाते हैं। पिताजी के एक मित्र थे नालंदा के रहने वाले अरविंद कुमार। वे भी पिताजी के साथ यहीं पढ़ते थे। उनके गुरु डॉक्टर चितरंजन प्रसाद इसी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हुआ करते थे।  थोड़ी देर विश्वविद्यालय परिसर में घूमने के बाद मैं विश्वविद्यालय परिसर से बाहर निकलता हूं। रांची रोड पर बिरसा कृषि विश्वविद्यालय का विशाल एग्रीकल्चर फार्म भी दिखाई देता है।


एक तरफ कांके का प्रसिद्ध मानसिक रोग चिकित्सालय केंद्रीय मनोचिकित्सा संस्थान का बोर्ड भी दिखाई देता है। रांची की पहचान 1918 में स्थापित इस पागलखाना से भी है। हमारे बचपन में गांव में अगर कोई उलूल जुलुल बात करे तो मजाक में लोग उसे रांची भेजने की बात करते थे। रांची पागलखाना को लेकर कई कथाएं और चुटकुले भी गढ़े जाते हैं। देश में दूसरा बड़ा ऐसा अस्पताल आगरा में स्थित है।

पर रांची शहर की पहचान इतनी ही नहीं है। उत्तर भारत में रांची शिक्षा का बड़ा केंद्र हमेशा से रहा है। अब इसमें और भी इजाफा हो रहा है। आज रांची में सेंट्रल यूनीवर्सिटी ऑफ झारखंड की स्थापना हो चुकी है। बिड़ला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी की शाखा यहां सालों से कार्यरत है। रांची के हटिया में हेवी इंजीनयरिंग कारपोरेशन (एचईसी) की विशाल ईकाई भी है। हालांकि सरकारी क्षेत्र के इस केंद्र में पिछले कुछ दशकों में उत्पादन में कमी आई है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com 
( RANCHI AGRICULTURE COLLEGE, BIRSA AGRICULTURE UNIVERSITY, KANKE,  RANCHI ) 

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