Wednesday, February 5, 2014

1903 में आरंभ हुआ था बराक घाटी रेलमार्ग


अगरतला सिलचर पैसेंजर रात को बदरपुर जंक्शन से गुजर गई। आते समय मैं सिलचर से बदरपुर करीमगंज होेते हुए अगरताल पहुंचा था। वापसी का रास्ता बदरपुर जंक्शन तक वही था। पर बदरपुर जंक्शन से लमडिंग के बीच ट्रेन बराक घाटी के मार्ग पर चल रही है। असम की बराक नदी के नाम पर इस क्षेत्र को बराक घाटी कहते हैं।

लमडिंग जंक्शन से सिलचर के बीच का रेलमार्ग पूर्वोत्तर मेें सामरिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है। यह मणिपुर और मिजोरम के साथ त्रिपुरा और असम के कई हिस्सों को देश के बाकी हिस्से से जोड़ता है। साल 2015 में यह मार्ग ब्राडगेज में बदला जा चुका है। पर 2013 में जब मैंने इस मार्ग पर सफर किया तब यह मीटर गेज ही था।

सन 1882 में बनी योजना - ब्रिटिश काल में साल 1882 से 1887 के बीच असम के बराक घाटी में लमडिंग बदरपुर के बीच रेल नेटवर्क स्थापित करने की योजना बनी। हालांकि तब स्थानीय डिमासा जनजाति के लोग गोरों का अपने क्षेत्र में प्रवेश करने का काफी विरोध कर रहे थे। वे अपनी जीवन शैली में किसी बाहरी तकनीक का प्रवेश नहीं होने देना चाहते थे।

पर इस विरोध की परवाह न करते हुए 25 अक्तूबर 1887 को गवर्नर जनरल ने इस क्षेत्र में रेल लाइन बिछाने की अनुमति प्रदान की। तब ब्रिटिश सरकार असम के पहाड़ी क्षेत्रों को चटगांव ( अब बांग्लादेश में) बंदरगाह को रेलवे से जोड़ना चाहती थी जिससे एक विकल्प दिया जा सके और कलकता बंदरगाह पर दबाव कम हो सके। साथ ही सरकार को लगता था ये रेल लाइन चाय बगानों से चाय की सप्लाई और कोयला ढुलाई के लिए मुफीद साबित होगी।

इस रेल लाइन के निर्माण के दौरान 12 जून 1897 को 8.7 तीव्रता वाला भूकंप शिलांग क्षेत्र में आया। इससे गुवाहाटी लमडिंग सेक्शन पर रेल निर्माण बाधित हुआ। फिर भी 1903 के लमडिंग-दामचारा तक पर रेल का परिचालन चालू हो गया।  ( संदर्भ- पुस्तक- फाइनल फ्रंटियर) आज ये लाइन असम के गुवाहाटी से मणिपुर, मिजोरम और त्रिपुरा जैसे राज्यों को जोड़ती है। अगर असम में पहली रेलवे लाइन की बात करें तो 1881 में ढिब्रूगढ़ से माकूम (तीनसुकिया) कोलफील्ड के बीच 65 किलोमीटर लंबी मीटर गेज लाइन बिछाने का काम शुरू हुआ ये लाइन 1883 में चालू हुई थी। ( संदर्भः एनएफआर वेबसाइट)


रेलगाड़ी की खिड़की से लोअर हाफलॉंग रेलवे स्टेशन 
ब्रिटिश काल में असम और पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों का रेल नेटवर्क अभी की तरह न्यू जलपाईगुडी से होकर भारत के शेष हिस्से से नहीं जुड़ा हुआ था बल्कि ये ढाका-चटगांव के से जुड़ा था। देश आजाद होने के बाद युद्धस्तर पर फकीराग्राम( असम) और किशनगंज बिहार के बीच रेल लाइन बिछाने पर काम शुरू हुआ। 26 जनवरी 1948 को 228 किलोमीटर लंबी इस परियोजना पर काम शुरू हुआ और रिकार्ड दो साल की अवधि में दिसंबर 1949 में काम पूरा कर लिया गया और 26 जनवरी 1950 को असम के लिए पहली रेल शेष भारत से चली थी।

ब्रिटिश काल में जिस तेज गति से रेल परियोजनाएं पूरी होती थीं उसका बराक घाटी आदर्श उदाहरण है। वहीं आजादी के बाद पूर्वोत्तर को रेल जोडने की परियोजना भी तेजी से पूरी की गई, पर आज हम रेल परियोजनाओं को पूरा करने में लेट लतीफी के लिए जाने जाते हैं। आज कोई भी रेल प्रोजेक्ट अपने तय समय (डेडलाइन) पर पूरा नहीं हो पाता। ये लेटलतीफी हमें विकास के पैमाने पर पीछे तो ले ही जाती है, परियोजनाओं का खर्च भी कई गुना बढ़ा देती है।


बराक घाटी- 2013 में जारी था गेज कनवर्जन का काम।
बराक घाटी रेल मार्ग को मीटरगेज से बदलकर ब्राडगेज करने की शुरूआत 1998 में तत्कालीन प्रधानमंत्री एचडी देवेगोडा ने की थी पर 16 साल बाद भी ये परियोजना पूरी नहीं हो सकी है। लेटलतीफी का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है।

 बराक घाटी रेल मार्ग के स्टेशन - लमडिंग जंक्शन, मांडेरडिशा, हाथीखाली, लांगटिंग, दीफू, मूपा, कालाचांद, माइबंग, वाडरांगडिशा, दाउतूहाजा, फिडिंग, मिगरेनडिशा, लोअर हाफलौंग, बागेटर, हाफलौंग, जतिंगा, मैलोंगडिशा, हारांगजाओ, डिटोकाचेरा, बांदराखाल, दामचारा, चंद्रनाथपुर, बिहारा, हिलारा, सुक्रितीपुर, बदरपुर जंक्शन।

और चलने लगी बड़ी लाइन -
 21 नवंबर 2015 से असम के सिलचर (बराक घाटी)मणिपुरमिजोरम और त्रिपुरा के लोगों हुई सुविधा...सिलचर गुवाहाटी के बीच बड़ी लाइन पर ट्रेन चलने लगी। नई ट्रेन को रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने हरी झंडी दिखाई। बराक घाटी का ऐतिहासिक रेल मार्ग कभी मीटर गेज हुआ करता था।( कुल दूरी 199 किलोमीटर )

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com   

( बराक घाटी एक्सप्रेस-  Barak Valley Express-1, LUMDING, SILCHAR RAIL ) 

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