Tuesday, June 10, 2014

एक बार फिर सोहवलिया - राजू भाई की शादी में


साल 2014 में ही जल्द ही अपने गांव सोहवलिया जाने का दुबारा मौका मिल गया। दरअसल सुदर्शन चाचा के बेटे छोटे भाई राजीव की शादी जून में तय हो गई थी। चाचा ने बुलाया है तो चल पड़ा हूं। दिल्ली से मेरी ट्रेन  है सासाराम के लिए। इलाहाबाद के बाद यमुना के पुल पर रेल की खिड़की से फोटो खिंचते हुए मेरा पहला एंड्राएड फोन शहीद हो गया। इस फोन को संभवतः पुल पर चल रहे किसी शोहदे ने खींच लिया होगा। अब मैं फोन विहीन हो गया हूं। 
गोरी गांव में बना वॉच टावर 

सासाराम उतरने पर सीधे अरविंद भैया के घर पहुंचा। पिताजी और मां पहले से ही गांव जा चुके हैं। शाम को अरविंद भैया के साथ बाइक से अपने गांव सोहवलिया के लिए चल पड़ा। हमलोगों ने वाया करगहर नया रास्ता अपनाया गांव जाने के लिए। रास्ते में गोरी, बीसो डिहरी जैसे गांव आए। गोरी गांव में एक ऐतिहासिक वॉच टावर दिखाई देता है। बताया जाता है कि यह वॉच टावर शेरशाह के जमाने का है। इसे दुश्मन पर निगरानी रखने के लिए बनवाया गया था। गोरी हमारे इलाके का पुराना और समृद्ध गांव रहा है। 
बीसो डिहरी गांव का स्कूल - इस स्कूल में मेरे पिताजी ने पढ़ाई की। 

गोरी के बाद बीसो डिहरी गांव आया। इसी गांव के मिडिल स्कूल में मेरे पिता जी ने पढ़ाई की थी। अब यह स्कूल हाई स्कूल बन गया है पर इसकी इमारत कुछ ज्यादा बड़ी नहीं बन पाई है। शाम होने से पहले मैं अपने गांव पहुंच गया हूं। आज तिलकोत्सव है। यानी कन्या पक्ष के लोग आने वाले हैं। गांव के उत्तर खेतों में तंबू लगा है जहां मेहमानों के खाने पीने का इंतजाम है। अब पांत में नहीं खिलाया जा रहा है। टेबल और कुर्सियां लगाई गई हैं। 

तिलक के दौरान मेरी मुलाकात रामगुन दुबे जी से होती है। राम गुन दुबे हमारे पुरोहित हैं। वे शहर गांव के रहने वाले हैं। मुझे बचपन याद आ जाता है जब रामगुन दुबे अपने दादा जी के साथ मेरे घर में आते थे। तब मेरे दादा जी हर पूर्णिमा को सत्यनारायण भगवान की कथा कराते थे। रामगुन मुझसे उम्र में कुछ साल बड़े थे। बचपन में जब वे मेरे घर आते तो मैं उनके साथ खेलता था। वे मुझसे इतने सालों बाद मिलकर बड़े खुश हुए। उनके पास एयरटेल का मोबाइल कनेक्शन है। उनके फोन से ही कॉल करके मैंने अपने दोनों पोस्टपेड सिम कार्ड को ब्लॉक कराया। जैसा कि मैंने आपको पहले ही बताया कि प्रयागराज में मेरा मोबाइल गायब हो चुका है।

घर के छत पर तिलक चढ़ाने की रस्म अदा की जा रही है। गांव की मेरी बहनों ने माइक संभाल रखा है। वे कन्या पक्ष के लोगों के लिए गीत सुना रही हैं।
गाई के गोबर अंगना लिपाओ रघुनंदन हरि
गजमोती चउका पुराओ सुन हो रघुनंदन हरि। 
और 
जल्दी जल्दी  तिलक चढ़ाव बदरिया घेरी अइले समधी
कुरता ले अइल समधी धोती ले अइल... सूट काहे नाही ले के अइल 
बदरिया घेर अइले समधी....
दो दिन बाद बारात जाने की तैयारी है। इससे पहले मैं चाचा के साथ खरीददारी करने कुदरा बाजार भी गया। मैं देख पा रहा हूं कि बसही में कुदरा नदी पर अब काफी ऊंचा पुल बन गया है। फोन विहीन होने के कारण कुदरा में भी किसी से संपर्क नहीं कर पाया। बारात सासाराम जाने वाली है। इस बीच मुझे दो दिन गांव में रहने का पूरा मौका मिला। रिश्तेदारों नातेदारों से मुलाकात और बातचीत का मौका। गांव में सारे लोगो से मिलने का मौका। कई सालों बाद गांव को खूब जीया।



शाम को बारात निकल पड़ी। अलग-अलग कई बुलेरो गाड़ियों में। अब गांव में ज्यादातर बारात बुलेरो से ही जाती है। सड़कें अच्छी बन गई हैं, तो अब बैलगाड़ी और ट्रैक्टर के जमाने गए। एक घंटे में हमलोग सासाराम पहुंच गए। बारात हमारे मित्र परमेश्वर प्रताप के मुहल्ले गांधी नगर में पहुंची है, पर फोन नहीं होने के कारण मैं परमेश्वर से बात नहीं कर पाया। राजू भाई के शादी में मुझे बड़े भाई की भूमिका निभाने का मौका मिला। मतलब गहने चढ़ाने की रस्म। इस दौरान कन्या पक्ष की ओर भसुर को भी खूब मीठी मीठी गालियां सुनने को मिलती हैं।
धीरे धीरे हो भसुर धीरे धीरे... 
हमरा मड़वा में अइह भसुर धीरे धीरे... 
कुछ ऐसे भी गीत होते हैं....
टीकवा ले अइल भसुर बक्सा में मुन के
खोल के देखाव ना त गारी देहब चुन के...
अगले दिन दोपहर में मेरी दिल्ली के लिए वापसी की ट्रेन है महाबोधि एक्सप्रेस। ट्रेन चार घंटे लेट है।इस बीच सासाराम की गरमी को सहना मुश्किल हो रहा है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 

( SOHWALIA DAYS - 6 , GORI, BISO DEHRI, BIHAR, SHADI, GANDHI NAGAR, SASARAM ) 

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