Monday, April 15, 2013

अत्यंत गुणकारी है बेल का शरबत- सफरजले हिंद

बंगाल के गंगा सागर के रास्ते में काकदीप में बेल। 
गरमी की तपिश से बचने के लिए आपने बेल का शर्बत तो जरूर पिया होगा। इसकी तासीर ठंडी होती है। बेल के पत्तों की तासीर भी ठंडी होती है इसलिए भगवान शिव को बेल और बेल के पत्ते अर्पित किए जाते हैं। दिल्ली में रहते हुए सारी गरमी मेरी कोशिश होती है कि रोज बेल का जूस पीने को मिल जाए।

पूरे देश में मिलता है बेल - सारे भारत में खासकर हिमालय की तराई मेंसूखे पहाड़ी क्षेत्रों में 4 हजार फीट की ऊंचाई तक पाया जाता है । मध्य व दक्षिण भारत में बेल जंगल के रूप में फैला पाया जाता है । मध्य और दक्षिण भारत में बेल जंगल में फैला पाया जाता है । आध्यात्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होने के कारण इसे मंदिरों के पास लगाया जाता है। उष्ण कटिबंधीय फल बेल के वृक्ष हिमालय की तराईमध्य एवं दक्षिण भारत बिहारतथा बंगाल में घने जंगलों में अधिकता से पाए जाते हैं। चूर्ण आदि औषधीय प्रयोग में बेल का कच्चा फलमुरब्बे के लिए अधपक्का फल और शर्बत के लिए पका फल काम में लाया जाता है।


रोगों को नष्ट करने की क्षमता - बाजार में दो प्रकार के बेल मिलते हैं- छोटे जंगली बेल और बड़े उगाए हुए बेल । दोनों के गुण समान हैं। इसका संस्कृत नाम है बिल्व तो वनस्पति विज्ञान में इसका नाम इगल मार्मेलोज है। अंग्रेजी में इसे वूड एपल कहा जाता है। पर हमारे यहां भोजपुरी में इसे श्रीफल कहते हैं। बिल्व (बेल) के बारे में कहा गया है- 'रोगान बिलत्ति-भिनत्ति इति बिल्व।अर्थात रोगों को नष्ट करने की क्षमता के कारण बेल को बिल्व कहा गया है। बेल के पत्तों से भगवान शिव की पूजा होती है।

कई तरह की बीमारियों में लाभकारी - बेल की पत्तियों को पीसकर उसके रस का दिन में दो बार सेवन करने से डायबिटीज की बीमारी में काफी राहत मिलती है। रक्ताल्पता में पके हुए सूखे बेल की गिरी का चूर्ण बनाकर गर्म दूध में मिश्री के साथ एक चम्मच पावडर प्रतिदिन देने से शरीर में नया रक्त बनता है

गैस्ट्रोएंटेटाइटिस एवं हैजे के ऐपीडेमिक प्रकोप में बेल को अत्यंत उपयोगी अचूक औषधि माना है। विषाणु को परास्त करने की इसमें गजब की क्षमता है। कच्चा या अधपका फल गुण में कषाय (एस्ट्रोन्जेंट) होता है। यह टैनिन एवं श्लेष्म (म्यूसीलेज) के कारण दस्त में लाभ करता है। पुरानी पेचिसअल्सरेटिव कोलाइटिस जैसे जीर्ण असाध्य रोग में भी यह लाभ करता है। बेल में म्यूसिलेज की मात्रा अधिक होती है। यह डायरिया के तुरंत बाद वह घावों को भरकर आंतों को स्वस्थ बनाने में समर्थ है। शरीर में मल संचित नहीं हो पाता और आंतें कमजोर होने से बच जाती हैं।

होम्योपैथी में बेल के फल व पत्र दोनों को समान गुण का मानते हैं। खूनी बवासीर व पुरानी पेचिश में इसका प्रयोग बहुत लाभदायक होता है । अलग-अलग पोटेन्सी में बिल्व टिंक्चर का प्रयोग कर आशातीत लाभ देखे गए हैं। यूनानी मतानुसार इसका नाम है- सफरजले हिन्द। यह दूसरे दर्जे में सर्द और तीसरे में खुश्क है।
आपको गरमी के दिनों में कहीं बेल का शरबत नहीं प्राप्त हो तो आप पतंजलि के स्टोर से भी बेल का शरबत खरीद सकते हैं। 

गर्मी दिनों में कस्तूरबा गांधी मार्ग स्थित जब अपने हिन्दुस्तान हिंदी दैनिक के दफ्तर पहुंचता हूं तो बाराखंबा मेट्रो से बाहर निकलने पर स्टेट्समैन वाली गली में एक बूढ़े बाबा रोज बेल का शरबत बेचते नजर आते हैं। उनके यहां से एक ग्लास बेल का शरबत पीना हमारा रूटीन सा बन गया। साल 2014 में हमारा दफ्तर नोएडा सेक्टर 63 में शिफ्ट हो गया तो हम उस बेल वाले बाबा का काफी याद करते थे। हालांकि नोएडा में भी कई बार बेल के शरबत वाले दिखाई दे जाते हैं।
 - विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com  

( बेल, श्रीफल, AEGLE MARMELOS, JUICE, WOOD APPLE  ) 

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