Monday, August 17, 2015

वेधशाला है वाराणसी का मान मंदिर महल



जौनपुर से बारात से देर रात ही लौट आया था। जायसवाल जी के साथ।बाकी सारे बाराती सुबह लौटेंगे पर हमारे पास अलग गाड़ी थी तो लौट आए। लौटने के बाद सुबह-सुबह मंडुवाडीह से चलकर वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर पहुंच गया। एक छतरी वाले पंडाजी के पास अपना बैग और कपड़े रखकर नीचे उतर गया। कई सालों बाद गंगा जी में स्नान का सुख प्राप्त किया। मई की गरमी में गंगा जल की शीतलता से बाहर निकलने की इच्छा ही नहीं हो रही थी।

इसके  बाद पहुंच गया बगल में मान मंदिर महल देखने। वाराणसी में दशाश्वमेध घाट के ठीक बगल में स्थित है मान मंदिर महल। ये महल वास्तव में एक वेधशाला है। दिल्ली के जंतर मंतर की तरह। इस महल के साथ ही है मान मंदिर घाट। वहीं मान मंदिर महल की खिड़कियों से गंगा की लहरों का नजारा भी किया जा सकता है। मान मंदिर महल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से  संरक्षित इकाई है। इसमें प्रवेश के लिए 5 रुपये का टिकट तय किया गया है। सूर्योदय से सूर्यास्त तक महल में प्रवेश किया जा सकता है।

मानमंदिर महल के द्वार पर ( मई 2014 ) 
राजा मान सिंह ने बनवाया था महल 

मान मंदिर के नाम से विख्यात गंगा तट पर बने  इस महल का निर्माण राजस्थान के आमेर के राजा मान सिंह द्वारा 1600 ईश्वी के आसपास कराया गया था। भवन में राजस्थानी शैली की छाप खूब देखी जा सकती है। इसके कमरे में अलंकृत झरोखे बने हुए हैं, जहां से बहती हुई गंगा को निहारा जा सकता है। भवन में नक्काशीदार दरवाजे बने हुए हैं।  

सवाई जय सिंह द्वितीय ने बनवाई वेधशाला - 
इसके बाद जयपुर शहर के संस्थापक राजा सवाई जय सिंह द्वितीय ( 1699-1743) ने इस मान मंदिर महल के छत पर एक वेधशाला का निर्माण कराया। सवाई जय सिंह की खगोल शास्त्र में खास रूचि थी। उन्होंने सन 1730 के आसपास मान मंदिर महल में वेधशाला का निर्माण कराया। उन्होंने वाराणसी के अलावा दिल्ली, जयपुर, मथुरा और उज्जैन में भी ऐसी ही वेधशालाओं का निर्माण कराया था। ये वेधशालाएं आम बोलचाल में जंतर मंतर के नाम से जानी जाती हैं। मान मंदिर महल का 1912 में जयपुर के कछवाहा राजपूत शासकों ने जीर्णोद्धार भी कराया था। अब मान मंदिर महल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के अधीन है। 

वाराणसी की वेधशाला में ये यंत्र देखे जा सकते हैं-
सम्राट यंत्र इस यंत्र द्वारा ग्रह नक्षत्रों की क्रांति विशुवांस, समय आदि का ज्ञान किया जाता है।

लघु सम्राट यंत्र इस यंत्र का निर्माण भी ग्रह नक्षत्रों की क्रांति विशुवांस, समय आदि का ज्ञान के लिए किया गया था।

दक्षिणोत्तर भित्ति यंत्र- इस यंत्र की सहायता से मध्यान्ह के उन्नतांश का मापन किया जाता है। 

चक्र यंत्र इस यंत्र से नक्षत्रादिकों की क्रांति स्पष्ट विसुवत काल आदि की सटीक गणना की जाती है।
दिगंश यंत्र - यह एक अनूठा यंत्र है। ज्योतिषीय गणना में इसक महत्वपूर्ण भूमिका है। इस यंत्र की सहायता से नक्षत्र आदि के दिगंश मालूम किए जाते हैं।

नाड़ी वलय दक्षिण और उत्तर गोल - इस यंत्र द्वारा सूर्य तथा अन्य ग्रह उत्तर या दक्षिण किस गोलार्ध में हैं इसका ज्ञान होता है। इसके अलावा इस यंत्र द्वारा समय का भी ज्ञान होता है।

सोमेश्वरनाथ मंदिर - मान मंदिर महल के पास सोमेश्वर मंदिर भी स्थित है। इसलिए इस घाट का पुराना नाम सोमेश्वर घाट हुआ करता था। इस मंदिर में स्थापित शिवलिंगम गुजरात के सोमनाथ मंदिर की प्रतिकृति है।

कैसे पहुंचे - मान मंदिर महल के आसपास का इलाका बहुत साफ सुथरे हाल में नहीं है। यहां पहुंचने के लिए आपको दशाश्वमेध के सब्जी बाजार की गलियों से होकर जाना होता है। हालांकि मान मंदिर घाट को गंगा के तट से भी देखें को तो काफी भव्य लगता है। रात की रोशनी में इसकी सुंदरता देखते ही बनती है।
---- विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com 
( VARANASI, COLORS OF BANARAS, UTTRAR PRADESH, MAN MANDIR MAHAL )

 
दशाश्वमेध घाट पर गंगा स्नान के बाद , मई 2014 ( कैमरे से सेल्फी ) 

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