Monday, June 30, 2014

महान सेनानी बिरसा मुंडा का शहर - रांची

रांची शहर को कई कारणों से जाना जाता है, उसमें एक महान क्रांतिकारी बिरसा मुंडा की यादें भी हैं। झारखंड के लोग उन्हें सम्मान से बिरसा भगवान कहते हैं। कौन थे बिरसा मुंडा जो 25 साल से कम उम्र में भगवान कहे जाने लगे थे। बिहार झारखंड के छात्र तो स्कूली पुस्तकों में उनके बारे में पढ़ चुके हैं, पर पूरे देश बिरसा जैसे क्रांतिकारियों के बारे में कम ही मालूम है।

रांची शहर के एयरपोर्ट का नाम बिरसा के नाम पर बिरसा मुंडा एयरपोर्ट रखा गया है। वहीं रांची के कांके स्थित प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय का नाम बिरसा कृषि विश्वविद्यालय है। पर बिरसा सिर्फ झारखंड के ही नहीं देश स्वतंत्रता आंदोलन के उन महान क्रांतिकारियों में शुमार हैं जिन्होंने महज 25 साल की उम्र में अपने प्राण भारत मां के चरणों में न्योछावर कर दिए। बिरसा उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में देश के क्रांतिकारियों की फेहरिस्त में सबसे ज्यादा चमकते हुए सितारे थे।

सुगना मुंडा का सपूत - बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवम्बर 1875 को रांची जिले के उलिहतु गांव में हुआ था। अब यह गांव खूंटी जिले में आता है। बिरसा के पिता का नाम सुगना मुंडा और माता का नाम करमी हटू था। मुंडा रीति रिवाज के अनुसार उनका नाम गुरुवार को जन्म होने के कारण बिरसा रखा गया था। गांव में प्रारंभिक पढ़ाई के बाद बिरसा चाईबासा इंग्लिश मिडिल स्कूल में पढने गए। बिरसा मुंडा के मन में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ बचपन से ही विद्रोह का भाव भर गया था।
  
उलगुलान को अंजाम दिया - बिरसा मुंडा 19वीं सदी के प्रमुख आदिवासी जननायकों में से थे। उनके नेतृत्‍व में मुंडा आदिवासियों ने 19वीं सदी के आखिरी वर्षों में एक महान आन्दोलन उलगुलान को अंजाम दिया। उलगुलान का मतलब भारी कोलाहाल या उथल पुथल है। यह अंगरेजों के खिलाफ बड़ा आदिवासी विद्रोह था। इसीलिए बिरसा को मुंडा समाज के लोग भगवान के रूप में पूजा करते हैं।

रांची में बिरसा भगवान की समाधि पर। 

बिरसा को अपनी जमीन और संस्कृति से गहरा लगाव था। जब वह अपने स्कूल में पढ़ते थे तभी से उन्हें मुंडाओं की छिनी गई भूमि पर उन्हें दुख था। वे वाद-विवाद में हमेशा प्रखर तरीके से  आदिवासियों की जल, जंगल और जमीन पर हक की वकालत करते थे।

बगावती बिरसा स्कूल से निकाले गए - उन्हीं दिनों एक पादरी डॉक्टर नोट्रेट ने लोगों को लालच दिया कि अगर वह ईसाई बनें और उनके अनुदेशों का पालन करते रहें तो वे मुंडा सरदारों की छीनी हुई भूमि को वापस करा देंगे। पर 1886-87 में मुंडा सरदारों ने जब भूमि वापसी का आंदोलन किया तो इस आंदोलन को न केवल दबा दिया गया बलिक ईसाई मिशनरियों द्वारा इसकी भर्त्सना भी की गई जिससे बिरसा मुंडा को गहरा आघात लगा। उनकी बगावत को देखते हुए उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया। वे 1890 में पिता के साथ चाईबासा से वापस आ गए।

बिरसा कृषि विश्वविद्यालय रांची में बिरसा भगवान की प्रतिमा। 
धरती बाबा और महापुरुष - बिरसा की गतिविधियां अंग्रेज सरकार को रास नहीं आई और उन्हें 1895 में गिरफ्तार कर लिया गया। बिरसा को हजारीबाग केन्द्रीय कारागार में दो साल के लिए जेल की सजा दी गई।  पर बिरसा और उनके समर्थकों ने तो अकाल पीड़ित जनता की सहायता करने की ठान रखी थी।

उनके सेवा भाव के कारण युवा काल में ही उन्हें महापुरुष का दर्जा मिल गया।  उन्हें इलाके के लोग धरती बाबा के नाम से पुकारने लगे। 



अंग्रेजी फौज से तीर कमान लेकर भिड़े - साल 1897 से 1900 के बीच मुंडाओं और अंग्रेज सिपाहियों के बीच कई युद्ध हुए।  बिरसा और उसके चाहने वालों अंग्रेजों को नाको चने चबाने को मजबूर कर दिया। अगस्त 1897 में बिरसा और उसके 400 सिपाहियों ने तीर कमानों से लैस होकर खूंटी थाने पर धावा बोला। 1898 में तांगा नदी के किनारे मुंडाओं की भिड़ंत अंग्रेज सेना से हुई जिसमें पहले तो अंग्रेजी सेना हार गयी लेकिन बाद में इसके बदले उस इलाके के बहुत से आदिवासी नेताओं की गिरफ़्तार किया गया। जनवरी 1900 में जहां बिरसा अपनी जनसभा संबोधित कर रहे थे, डोमबाड़ी पहाड़ी पर एक और संघर्ष हुआ, जिसमें बहुत सी औरतें और बच्चे मारे गए। बाद में बिरसा के कुछ समर्थकों की भी गिरफ्तारी हुई।  बिरसा भी तीन फरवरी, 1900 को चक्रधरपुर में गिरफ्तार कर लिए गए।


रांची में बिरसा की समाधि - 9 जून 1900 को रांची जेल में बिरसा की मौत हो गई। रांची शहर में बिरसा की समाधि बनाई गई है। मैं इस समाधि स्थल पर पहुंचा हूं। उस महान क्रांतिकारी को याद करके श्रद्धा से सिर झुक जाता है, जो कांग्रेस पार्टी की स्थापना के 15 साल बाद ही इस दुनिया को अलविदा कह गया। ब्रिटिश सरकार का जैसा उग्र विरोध कांग्रेस और दूसरे नेताओं ने 1930-40 के दशक में शुरू किया, बिरसा वैसा विद्रोह काफी पहले कर चुके थे। अपने पच्चीस साल के छोटे जीवन में ही बिरसा ने जैसी क्रांति की लौ जलाई , उसकी नजीर कहीं और नहीं मिलती।

-         विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com
-         (BIRSA MUNDA, RANCHI, JHARKHAND )

Saturday, June 28, 2014

कंक्रीट के जंगल में तब्दील होता रांची

जन शताब्दी ने सही समय पर रांची पहुंचा दिया। हमारे पुराने मित्र और वरिष्ठ पत्रकार अशोक कुमार जी स्टेशन पर मौजूद थे। उनका स्नेह है मेरे प्रति, वे मुझे सीधे अपने घर ले गए। टैगोर हिल से आगे बोड़िया रोड पर वृंदावन कालोनी। शहर के कोलाहल से दूर हरियाली के गोद में बसी कालोनी। आसपास में दो पहाड़ नजर आते हैं। इसी कालोनी में अशोक जी ने अपना घर बनाया है।  अशोक जी को खाने के बाद सैर करने की आदत है। कालोनी में सैर करते हुए लगता है कंक्रीट के जंगल में तब्दील होती राजधानी रांची से उनकी कालोनी अभी काफी अलग है। उनके बेटे सिद्धार्थ, बेटियां सुजाता, श्वेता और उनकी मां ने अथक प्रयास से ये आशियाना बनवाया है। 
हमारे दोस्त मुकेश बालयोगी बताते हैं कि रांची में पिछले पांच सालो में अपार्टमेंट संस्कृति तेजी से बढ़ी है। बहुमंजिले टावर बनने लगे हैं। शहर में भीड़ काफी बढ़ी है। कभी बिहार के सर्दियों की राजधानी बनने वाली रांची में महानगरों जैसा कोलाहल सुनाई देने लगा है। हालांकि मोराबादी मैदान के आसपास के इलाको में चौड़ी सड़के दिखाई देती हैं। यहीं मुझे झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता शीबू सोरेन का विशाल आवास दिखाई देता है। शहर के लालपुर चौक पर पैंटालून का मॉल बन गया है। सरकुलर रोड पर वाहनों की चिल्लपों बढ़ गई है।
अलबर्ट एक्का चौक बनाम फिरायालाल - शहर का मुख्य चौराहा अलबर्ट एक्का चौक के आसपास के नजारे में काफी बदलाव आ चुका है। अलबर्ट एक्का चौक को लोग फिरायालाल चौक के नाम से भी जानते हैं। फिरायालाल रांची शहर का काफी पुराना और प्रतिष्ठित डिपार्टमेंटल स्टोर है। यहां आप ब्रांडेड कपड़े खरीद सकते हैं। बाद में इस चौक का नाम लांस नायक अलबर्ट एक्का के नाम पर  अलबर्ट एक्का चौक कर दिया गया है। पर फिरायालाल चौक दशकों से लोगों की जुबां पर चढ़ा हुआ है।

रांची में रिम्स और ओपोलो जैसे अस्पताल खुल गए हैं। अब शहर में आईआईएम भी है। वैसे शहर कई दशक पहले से शिक्षा का प्रमुख केंद्र रहा है। बीआईटी मेसरा और सेंट जेवियर्स कालेज यहां के पुराने प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान हैं।

शहर के बीचों बीच बहने वाली हरमू नदी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। कुछ संगठन हरमू नदी को बचाने की मुहिम चला रहे हैं। पर नदी नाले का रूप ले चुकी है। इसी नदी के तट पर हरमू हाउसिंग कालोनी बन गई है। 
रांची शहर की मुख्य सड़क की बदलती रौनक 

इस कालोनी में टीम इंडिया के महान क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी का घर है। इसी कालोनी ईटीवी का दफ्तर भी है, जहां मेरे कई पुराने साथी कार्यरत हैं। उनसे लंबे समय बाद मिलना हुआ। अजय लाल मेरे साथ हैदराबाद में काम करते थे, वे अब रांची ब्यूरो में आ गए हैं।
हरमू हाउसिंग कालोनी पहुंचकर मुझे डॉक्टर प्रभु नारायण विद्यार्थी की खूब याद आई जिनसे 2002 में अमृतसर के इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस में मुलाकात हुई थी। विद्यार्थी जी अब इस दुनिया में नहीं रहे। उन्होंने राहुल सांकृत्यायन पर काफी काम किया था। हर साल वे राहुल जी के जन्मदिन पर बड़ा आयोजन किया करते थे।     
   - विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com 
( RANCHI, CITY, HARMU RIVER, JHARKHAND ) 

Thursday, June 26, 2014

एक नदी जो उगलती है सोना- स्वर्णरेखा

रांची शहर में जाने से पहले बात एक नदी की जो सोना उगलती है। बोकारो स्टील सिटी से रांची जाने के रास्ते में जन शताब्दी एक्सप्रेस की खिड़की से हमें स्वर्णरेखा नदी के दर्शन होते हैं। वही स्वर्णरेखा नदी जिसका नाम हम स्कूली किताबों में पढ़ते आए हैं। तो आज इस नदी के दर्शन हो गए। नदियां जल का स्रोत होती हैं, जीवन देती हैं। पर आपको पता है ये नदी सोना उगलती है। हां जी सोना मतलब गोल्ड। चौंक गए न। तभी तो इसका नाम स्वर्णरेखा है।

स्वर्णरेखा नदी रांची शहर से 16 किलोमीटर दूर दक्षिण-पश्चिम से निकलती है। 474 किलोमीटर लंबी नदी सीधे बंगाल की खाडी में जाकर गिरती है। स्वर्णरेखा नदी की एक प्रमुख विशेषता यह है कि उदगम से लेकर सागर में मिलन तक यह किसी की सहायक नदी नहीं बनती है। यह सीधे बंगाल की खाड़ी में गिरती है।

झारखंड के सिंहभूम जिले में बहती हुई स्वर्णरेखा उत्तर पश्चिम से बंगाल के मिदनापुर जिले में प्रवेश करती है। इस जिले के पश्चिम भाग के जंगलों में बहती हुई ओडिशा के बालेश्वर जिले में पहुंचती है जहां यह बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इसकी प्रमुख सहायक नदियां कांची एवं कर्कारी हैं। भारत का प्रसिद्ध एवं पहला लोहा-इस्पात का कारखाना टाटानगर इस नदी किनारे स्थापित हुआ।

पठारी भाग की चट्टानों वाले प्रदेश से प्रवाहित होने के कारण स्वर्णरेखा और इसकी सहायक नदियां घाटियों तथा जल प्रपात का निर्माण करती हैं। राढू (रांची) इसकी सहायक नदी हैजो होरहाप से निकल कर सिल्ली से दक्षिण तोरांग रेलवे स्टेशन से दक्षिण-पश्चिम में मिलती है। स्वर्णरेखा नदी मार्ग में जोन्हा के पास एक जल प्रपात का निर्माण करती हैजो कि 150 फीट की ऊंचा है। इसे गौतम धारा के नाम से जाना जाता है। यहां गौतमधारा नामक रेलवे स्टेशन भी है। इसकी एक सहायक नदी कांची भी हैजो राढू के संगम स्थल से दक्षिण में मिलती है। यह भी तैमारा से दक्षिण में दशम जल प्रपात का निर्माण करती हैजो 144 फीट ऊंचा है।



स्वर्णरेखा जैसा कि नाम से ही संकेत मिलता है कि इसमें सोना है। नदी की सुनहरी रेत में सोने की थोड़ी-थोड़ी मात्रा पाई जाती है। मात्रा अधिक न होने के कारण इसका व्यवसायिक उपयोग नहीं हो पाता। नदी मिलने वाले इस धन के कारण क्षेत्र के आदिवासी नदी को नंदा भी कहते हैं।

रहस्य बना है सोना -  स्वर्णरेखा नदी में जो सोने के कण मिलने को लेकर राज्य और केन्द्र सरकार उदासीन है। कोई सरकारी एजेंसी यह मालूम नहीं कर सकी कि इस नदी के रेत में पानी के साथ मिलकर बहने वाले सोने के कण कहां से निकलते हैं। वहीं नदी में बालू की तलहटी से सोने के कण निकालकर हजारों आदिवासी अपना जीविकोपार्जन करने में लगे हैं। कई परिवार पीढियों नदी से सोने के कण निकालने के काम में लगे हैं। हालांकि मामूली सोना निकालने के कारण उनके आर्थिक हालात में कोई सुधार नहीं हुआ है।

आदिवासी निकालते हैं सोना - नदी से आदिवासी सोने के कण एकत्र करते हैं जिसे वहां के स्थानीय व्यापारी औने पौने दामों में खरीद लेते हैं। आदिवासी सोने कणों को छानने के लिए मछलियां पकडने के काम आने वाली बेंत की लकड़ी की बनी टोकरी का इस्तेमाल करते हैं। इसकी पेंदी में कपड़ा लगा होता है। विशेष प्रक्रिया द्वारा मिट्टी से सोने के बारीक कण अलग किए जाते हैं। दिनभर मेहनत के बाद मामूली सा सोना ढूंढ पाते हैं।

आदिवासी नदी से निकाले गए सोने को पूर्वी सिंहभूमि जिले के हल्दी पोखर के बाजार में बेच देते हैं। हल्दी पोखर के बाजार में सोने की खरीद फरोख्त मिट्टी के मोल की जाती है। इस व्यापार से यहां के सुनार करोड़पति हो गए पर आदिवासियों का हाल वैसा ही है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - Email - vidyutp@gmail.com 
  
(   JHARKHAND RIVER, SWARNREKHA, GOLD )  


Tuesday, June 24, 2014

पटना से रांची जनशताब्दी एक्सप्रेस से

संयुक्त बिहार में के जमाने में रांची बिहार के गर्मियों की राजधानी हुआ करता था। लेकिन सन 2000 में झारखंड बनने के बाद ये खूबसूरत शहर नए राज्य की राजधानी बन गया। पर पटना से रांची का रिश्ता आज भी खूशबूदार बना हुआ है। रोज रात्रि सेवा की दर्जनों लग्जरी बसें रांची के लिए प्रस्थान करती हैं तो कई रेलगाड़ियां भी हैं। पर मेरा सफर शुरू हुआ रांची जनशताब्दी एक्सप्रेस से। ट्रेन पटना जंक्शन के प्लेटफार्म नंबर से ठीक सुबह 6.00 बजे खुल गई। पटना से आगे चलने पर छोटा सा स्टेशन तारेगना दिखाई दिया। इस छोटे से गांव तारेगना का अंतरिक्ष विज्ञान में बड़ा महत्व है। ये तारेगना तारों की गणना से बना है। 

रेल गाड़ी से झारखंड के जंगल।  
पटना गया लाइन का सफर कभी नारकीय हुआ करता था। पर अब डबल लाइनविद्युतीकृत ट्रैक पर दिन भर दौड़ती ट्रेनों के कारण हालात बदल गए हैं। चेन पुलिंग बीते दिनों की बात हो गई है। कई नए हाल्ट बन गए हैं। सो जन शताब्दी तय समय से पहले  ही गया पहुंच गई। स्टेशन पर अनानास और पपीता बेचने वाले नजर आए. ठहराव 20 मिनट का था। हमने फलाहार किया। ट्रेन आगे बढ़ी। फल्गू नदी को पारकर मानपुर आया बुनकरों का मोहल्ला। 

थोडी देर बाद मोबाइल नेटवर्क खत्म। जंगल शुरू। हरियाली को पार कर आ गए अबरख के पहाड। कोडरमा, झारखंड का पहला बड़ा रेलवे स्टेशन। भाजपा के सांसद रीतलाल प्रसाद वर्मा की याद आई। वे दिल्ली में मिलने पर कई बार मुझे कोडरमा चलने को कहते थे। पर मैं कभी उनके साथ नहीं जा सका। वे इस दुनिया से चले गए। 

गोमो बनाम नेताजी सुभाष चंद्र बोस जंक्शन -  हजारीबाग रोडपारसनाथ के बाद रेलगाड़ी पहुंच गई है गोमो जंक्शन। गोमो का नया नाम अब नेताजी सुभाष चंद्र बोस जंक्शन हैं। इसी रेलवे स्टेशन से 1941 में नेताजी वेश बदलकर ब्रिटिश हुकुमत को चकमा देकर पलायन कर गए थे। उनकी याद में स्टेशन पर स्मृति पट्टिका लगी है। 



दामोदर नदी का पुल - चंद्रपुरा जंक्शन से पहले दामोदर नदी नजर आई। दामोदर यानी झारखंड की जीवन रेखा। इस नदी के नाम पर दामोदर वैली कारपोरेशन का गठन हुआ है।दामोदर नदी पेयजल के साथ विद्युत उत्पादन का बड़ा स्रोत है। तुपकाडीह से पहले दामोदर पर रेल पुल आता है। इसके बाद बोकारो स्टील सिटी। कई साल पहले में एक परीक्षा देने आया था इस शहर में। 



ट्रेन सरपट आगे भागती जा रही है। एक बार फिर मोबाइल नेटवर्क खत्म हो जाता है। मूरी जंक्शन से पहले स्वर्णरेखा नदी दिखाई देती है। मूरी जंक्शन के बाद हरे-भरे अलमस्त जंगलों के  बीच गौतमधारा, गंगाघाट जैसे स्टेशन आते हैं। टाटी सिलवे और नामकुम जैसे स्टेशन भी गुजर गए हैं। अब हम रांची की सीमा में पहुंच रहे हैं। 

अब रांची शहर का विस्तार टाटी तक होने लगा है। तकरीबन आठ घंटे के सफर के बाद जन शताब्दी ने हमें रांची पहुंचा दिया है। दोपहर के दो बजे हैं। मैं प्लेटफार्म से बाहर निकल रहा हूं। रांची रेलवे स्टेशन की सफेद इमारत कुछ कुछ अगरतला स्टेशन की याद दिलाती है। स्टेशन के बाहर शहर में चलने वाले रिक्शा दिखाई देते हैं जिनकी ऊंचाई पटना के रिक्शा की तुलना में काफी कम है। पटना के रिक्शा से गिरने का डर बना रहता है। पर रांची का रिक्शा अपनेपन का एहसास करता है। तो अब चलते हैं शहर में। 
-vidyutp@gmail.com  विद्युत प्रकाश मौर्य
(RANCHI, JHARKHAND, RAIL, JAN SHATABDI EXPRESS ) 



Sunday, June 22, 2014

कोई नहीं आता फूल चढ़ाने देशरत्न की समाधि पर

पटना के बांसघाट के पास देशरत्न की समाधि। फोटो- विद्युत
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की समाधि दिल्ली में यमुना तट पर है। इसके साथ कई किलोमीटर लंबी हरित पट्टी है जहां दूसरे प्रधानमंत्रियों की भी समाधि है। इस क्षेत्र में कई सौ एकड़ जमीन संरक्षित रखी गई है। हजारों लोग रोज इन समाधियों को देखने आते हैं। पर देश के महान सपूत और पहले राष्ट्रपति डाक्टर राजेंद्र प्रसाद की समाधि कहां है।


ये समाधि पटना में गंगा तट पर बांसघाट के बगल में है। समाधि के आसपास कोई भव्यता नहीं है। सड़क की चौड़ाई भी ज्यादा नहीं है। समाधि स्थल के ठीक बगल में बांस घाट में अनवरत शवदाह चलता रहता है जिसका धुआं देशरत्न डाक्टर राजेंद्र प्रसाद की समाधि के पास आता रहता है। आप पर्यटक के तौर पर समाधि को देखने जाएं तो समाधि के द्वार पर ताला लगा दिखाई देता है। अंदर जाकर देश रत्न को नमन करना भी मुश्किल है।

डाक्टर राजेंद्र प्रसाद 10 साल देश के सर्वोच्च पद पर रहने के बाद अवकाश प्राप्त करने के बाद 14 मई 1962 को पटना लौट आए। उन्होंने कोई सरकारी आवास नहीं लिया और बाकी के दिन सदाकत आश्रम में बिहार विद्यापीठ में गुजारना पसंद किया। यहीं पर 28 फरवरी 1963 को उन्होंने अंतिम सांस ली। 

उनका अंतिम संस्कार पास के ही बांसघाट के पास किया गया। कई साल बाद यहां पर उनकी पक्की समाधि जरूर बना दी गई। पर समाधि के ररखाव का हाल बुरा है। हर साल 3 दिसंबर को देशरत्न की जयंती पर नेतागण पर पुष्पांजलि देने जरूर आते हैं। पर शेष 364 दिन कोई नहीं पूछता। गांधी नेहरु की समाधि पर फूल चढ़ाने लोग हजारों लोग पहुंचते हैं पर देशरत्न की समाधि के बारे में पटना में भी जागरूकता की भारी कमी है। जरूरत है कि समाधि स्थल को ऐसा बनाया जाए जिससे नई पीढ़ी इस महान व्यक्तित्व से प्रेरणा ले सके।


बिहार की राजनीति में सक्रिय युवा नेता राघवेंद्र सिंह कुशवाह समाधि के कायाकल्प की मांग कर रहे हैं। उनकी मांग है कि समाधि के बगल से शवदाह गृह को दूर हटाया जाए। समाधि के पास राजघाट की तरह अखंड ज्योति प्रज्जवलित की जाए। समाधि स्थल के आसपास का सौंदर्यीकरण किया जाए। साथ ही यहां पर राजेंद्र प्रसाद से जुड़े हुए साहित्य के बिक्री और वितरण का इंतजाम किया जाए। इन कदमों से आने वाली पीढ़ी को देशरत्न से प्रेरणा मिल सकेगी।


( समाधि के सौंदर्यीकरण के लिए 6 जुलाई 2014 को पटना में समाधि स्थल पर धरना देंगे सर्वजन समाज के लोग)


- विद्युत प्रकाश मौर्य

 ( PATNA, DESHRATNA DR RAJENDRA PRASAD ) 

Friday, June 20, 2014

तेलंगाना - भारत का 29वां पूर्ण राज्य


दो जून 2014 को देश के 29वें पूर्ण राज्य के तौर पर तेलंगाना का जन्म हुआ। आंध्र प्रदेश से अलग होकर बने इस राज्य की राजधानी हैदराबाद होगी। 17 फरवरी 1954 को जन्मे कलवकुंतला चंद्रशेखर राव ( केसीआर ) तेलंगाना के पहले मुख्यमंत्री बने। तेलंगाना शब्द का अर्थ है - तेलुगूभाषियों की भूमि। नया राज्य तेलंगाना पिछले चार दशकों से यहां लोगों के संघर्ष और बलिदान की परिणाम है।

संघर्ष गाथा - तेलंगाना मूल रूप से हैदराबाद के निजाम की रियासत का हिस्सा था। वर्ष 1948 में भारत ने निजाम की रियासत को खत्म करके हैदराबाद राज्य की नींव रखी।
1948 में पहली बार कामरेड वासुपुन्यया ने अलग तेलंगाना राज्य की मुहिम शुरू की। वासुपुन्यया का सपना भूमिहीन किसानों को जमींदार बनाना था। मगर कुछ साल बाद इस आंदोलन की कमान नक्सलियों के हाथों में चली गई। इसी बीच 1956 में तेलंगाना के एक बड़े हिस्से को आंध्र प्रदेश में शामिल कर लिया गयाजबकि कुछ हिस्से कर्नाटक और महाराष्ट्र में मिला दिए गए।
1969 में तेलंगाना आंदोलन फिर शुरू हुआ। इस बार इसका मकसद इलाके का विकास था और इसमें बड़ी तादाद में छात्र आंदोलन में सक्रिय थे। उस्मानिया विश्वविद्यालय इस आंदोलन का प्रमुख केंद्र था। इस आंदोलन के दौरान पुलिस फायरिंग और लाठीचार्ज में मारे गए सैकड़ों छात्रों की कुर्बानी ने इसे ऐतिहासिक बना दिया।

1971 में कांग्रेस पार्टी ने तेलंगाना क्षेत्र के पीवी नरसिंह राव को भी आंध्र प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाकर तेलंगाना आंदोलन को कमजोर किया।
2001 में के चंद्रशेखर राव की अगुवाई में अलग तेलंगाना राज्य की मांग फिर तेज हुई। नाराज केसीआर ने तेलुगु देशम पार्टी को अलविदा कह नई पार्टी बनाई।
27 अप्रैल 2001 को केसीआर तेलंगाना राष्ट्र समिति नामक दल का गठन किया जिसका मुख्य मांग की अलग तेलंगाना राज्य बनाने की थी।
2004 में कांग्रेस ने अलग तेलंगाना राज्य के गठन को समर्थन देते हुए केसीआर से गठबंधन किया मगर इस बार भी वादाखिलाफी हुई। आंध्र के मुख्यमंत्री रहे वाईएसआर ने भी अलग तेलंगाना राज्य के गठन को तरजीह नहीं दी।

ऐसा है राज्य
- 10 जिले हैं तेलंगाना में। हैदराबादरंगारेड्डीअदिलाबादखम्ममकरीमनगरमहबूबनगरमेडकनलगोंडानिजामाबाद और वारंगल।
- 119 विधानसभा सीटें और लोकसभा 17 सीटें हैं नए राज्य में। 
- 30 अप्रैल को हुए विधान सभा चुनाव में 63 सीटें जीतकर बहुमत में है टीआरएस।
- 84% हिंदू, 12.4% मुस्लिम और 3.2% सिखईसाई और अन्य धर्म के लोग हैं राज्य में।
- 76% लोग तेलुगु 12% उर्दू तथा 12% लोग अन्य भाषाएं बोलते हैं तेलंगाना में।




राज्य का निर्माण : कदम दर कदम
30 जुलाई 2013 : यूपीए ने तेलंगाना के गठन पर सर्वसम्मति से सहमति दी।
05 दिसंबर 2013 : मंत्रिसमूह द्वारा बनाए ड्राफ्ट बिल को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी।
18 फरवरी 2014 : आंध्र प्रदेश पुर्नगठन बिल 2014 को लोकसभा ने भाजपा के समर्थन से पास किया।
21 फरवरी 2014 : तेलंगाना पर संसद की मुहरकर्मचारियों के आवंटन के लिए समितियां बनीं।
01 मार्च 2014 : तेलंगाना बिल पर राष्ट्रपति की मुहर लगी।


--vidyutp@gmail.com   ( TELANGANA, NEW STATE, HYDRABAD ) 

Wednesday, June 18, 2014

नन्हकी शाह की लिट्टी – एक रुपये में पूरा स्वाद


एक रुपये में भला क्या मिलता है आजकल। पर ऐसा नहीं है एक रुपये का भी मोल है। एक रुपये में आती है पटना के नन्हकी शाह की स्वादिष्ट लिट्टी। पटना के मुसल्लहपुर हाट में लगने वाली नन्हकी शाह की लिट्टी की दुकान में सुबह से ही लिट्टी खरीदने वालों की लाइन लग जाती है। दस से 11 बजने तक तो सारी लिट्टी खत्म भी हो जाती है। खास तौर पर आसपास के लॉज में रहने वाले छात्रों की खास पसंद है ये दुकान।

तेल में तली हुई लिट्टी एक रुपये की होने के कारण आकार में निश्चित तौर पर छोटी होती है। पर इसके अंदर मकुनी (मसाला) भरा होता है जो इसके स्वाद को बेहतर बनाता है। इस लिट्टी के साथ ग्राहकों को मिलती है चने की घुघनी। घुघनी फ्री में। खरीदने वाले कम से कम 5 रुपये की 5 लिट्टी खरीदते हैं और बड़े चाव से खाते हैं। अगर इस लिट्टी के साथ आप जलेबी भी ले लें तो खाने का स्वाद और भी बढ़ जाता है। मुसल्लहपुर हाट इलाके में नन्हकी शाह की लिट्टी इतनी प्रसिद्ध है कि न सिर्फ प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्र बल्कि आसपास के घरों के लोग भी इनकी लिट्टी मंगाकर खाते हैं।

 कुछ साल पहले नन्हकी शाह की लिट्टी तो महज 50 पैसे में बिकती थी। पर महंगाई के कारण दाम बढ़ाकर एक रुपया कर दिया है। हालांकि पटना और उत्तर बिहार के शहरों में तली हुई लिट्टी कम से कम तीन रुपये की मिलती है। पर उसमें भी नन्हकी शाह वाली बात कहां। वैसे तो बिहार लिट्टी के लिए प्रसिद्ध है। दक्षिण बिहार के शहरों में कोयले पर पकाई हुई लिट्टी बिकती है तो उत्तर बिहार में तली में लिट्टियां। दोनों का अपना अपना स्वाद है। ... तो अगली बार कभी पटना जाएं मुसल्लहपुर हाट में उनकी लिट्टी का स्वाद लेना न भूलें।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य 

(NANHKI SHAH, LITTI, JALEBI, PATNA )  

Monday, June 16, 2014

ऐसे करें रसोई घर की देखभाल

हमारी कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा किचेन पर ही खर्च होता है। इसलिए यह जरूरी है कि आप किचेन के खर्च पर ध्यान दें। कुछ विंदुओं पर ध्यान देकर आप अपने रसोई का बजट कम कर सकते हैं। सबसे पहले गैस चूल्हे का मितव्ययीता से इस्तेमाल जरूरी है। इससे गैस की बचत होगी ही साथ ही आपके रुपये की भी। आजकल चूंकि एलपीजी की किल्लत चलती रहती है इसलिए आपको किचेन में मल्टी सिस्टम ईंधन का प्रयोग करना चाहिए। यानी आप किचेन में गैस चूल्हे के अलावा माइक्रोवेव ओवन व हीटर आदि का भी इस्तेमाल करें। अगर आपके पास सोलर कूकर हो तो उसका भी इस्तेमाल करें। जिन लोगों के घर में आंगन बड़ा हो या जिनके पास अपनी छत हो वे सोलर कूकर का इस्तेमाल कर अच्छी खासी गैस की बचत कर सकते हैं।

आप यह ध्यान रखें की रसोई घर में इंधन की बचत करना न सिर्फ आपकी जेब के लिए अच्छा है बल्कि देश व समाज के लिए भी हितकर है क्योंकि आपको पता होना चाहिए कि उर्जा का भंडार सीमित है। इसलिए सबके हित में है कि इसका हम समझदारी से दोहन करें। अब आपको कुछ ऐसे उपाय करने चाहिए जिससे की रसोई घर में गैस की बचत हो।

1.  जब भी कुछ बनाएं तो कोशिश करें कि इसके लिए चौड़ी पेंदी वाले बरतनों का इस्तेमाल हो। इससे गैस की बचत होगी साथ ही आपके समय की भी
2.  कोशिश करें की परिवार के सभी सदस्य एक ही समय में खाना खाने बैठें। इससे सबके लिए बार बार खाना गरम करने से छुटकारा मिल जाएगा।
3.  रसोई घर हमेशा हवादार बनवाएं। उसमें एक्जास्ट फैन का भी प्रबंध रखें। इससे रसोई में काम करने वाली गृहणी को सुविधा होगी।
4.  दाल व ऐसी ही अन्य सामग्री जो पकने में ज्यादा समय लेती है उसे पकाने से पहले पानी में फूलने के लिए डाल दें इससे भी गैस की बचत की जा सकेगी।
5.  जब कोई सामग्री फ्रीज से निकाली जाती है और उसे गर्म करना हो तो पहले उसे बाहर निकाल कर समान्य तापमान पर आने दें। इससे भी ईंधन की थोड़ी बचत होगी।
6.  याद रखें आपके द्वारा थोड़ा थोड़ा करके बचाया गया ईंधन आपके गैस की खपत को पांच से दस दिन तक बढ़ा सकता है।
7.  किचेन में कोशिश करें की ज्यादा व्यंजन आप प्रेशर कुकर में ही बनाएं। साथ ही अधिकांश चीजें ढककर ही कुक करें।
8.  कुकर की पहली सिटी के बाद अधिकांश व्यंजन स्लो फ्लेम पर ही बनाएं। इससे खाना सुस्वादु तो बनेगा ही इसके साथ ही इंधन की भी बचत होगी। आप कम सामग्री बनानी हो तो छोटे कुकर का इस्तेमाल करें। अपनी जरूरत के हिसाब से सवा लीटर से आठ लीटर तक के कुकर किचेन में रख सकते हैं।
अगर आप सोलर कुकर और अन्य वैकल्पिक ईंधनो का प्रयोग करते हैं तो बहुत अच्छी बात है। पर सोलर कुकर किसी भी चीज को पकाने में समय ज्यादा लेता है। इसलिए अपनी तैयारी भी उसी तरह से रखें।
माधवी रंजना, madhavi.ranjana@gmail.com
( KITCHEN, SOLAR, CHIMNEY ) 

Saturday, June 14, 2014

अदभुत वास्तुकला का नमूना - धौलपुर का चोपड़ा शिव मंदिर


चंबल क्षेत्र के मंदिरों में प्रमुख नाम है धौलपुर का चोपड़ा शिवमंदिर का जिसकी वास्तु कला अद्भुत है। राजस्थान के धौलपुर शहर में यह अनूठा शिव मंदिर है जिसे चोपड़ा शिव मंदिर के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर का निर्माण धौलपुर के महारावल भगवंत सिंह के मामा राजधर कन्हैयालाल ने 1856 ई. में करवाया था। 

कन्हैया लाल जी धौलपुर राजघराने के दीवान थे। मंदिर में उनका कला प्रेम बखूबी दिखाई देता है। इस मंदिर की ऊंचाई 150 फीट (45 मीटर) है। मंदिर वास्तु कला की नजरिए से अनूठा है। इसका का गर्भ गृह अष्ट कोणीय है। इसके आठो दीवार में आठ दरवाजे भी हैं। 

मंदिर के हर दरवाजे पर भी आकर्षक मूर्तियां उकेरी गई हैं। मंदिर का उन्नत शिखर भी अत्यंत आकर्षक है। बाहर की ओ से इसकी नक्कासी बहुत ही खूबसूरत है। मंदिर के निर्माण में इस्तेमाल किए गए पत्थर के टुकडों पर नक्काशी का काम अत्यंत बारीक और आकर्षक है। ये शिवमंदिर 19वीं शताब्दी के वास्तुकला का सुंदर नमूना है।

मंदिर के बगल में एक कुंड भी बना हुआ है जिसका निर्माण भी दीवान कन्हैया लाल जी ने ही करवाया था। हालांकि इस कुंड की स्थिति खराब रख रखाव के कारण दयनीय हो गई है।  मंदिर मुख्य परिसर के बीच एक बड़े से आंगन में स्थित है। मंदिर के गर्भगृह में जाने के लिए 25 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। चंबल क्षेत्र के लोग इस मंदिर को सिद्ध मानते हैं।


जगदगुरु शंकराचार्य श्री श्री 1008 स्वामी श्री जयेन्द्र सरस्वती भी इस मंदिर में पधारकर अभिषेक कर चुके हैं। चोपड़ा शिव मंदिर धौलपुरशहर का सबसे प्राचीन शिव मंदिर है। हर साल महाशिवरात्रि के समय यहां श्रद्धालुओँ की बड़ी भीड़ उमड़ती है।

कैसे पहुंचे - चोपड़ा शिव मंदिर राजस्थान के धौलपुर शहर में आगरा ग्वालियर मार्ग पर स्थितहै। धौलपुर शहर के मुख्य बस स्टैंड से 500 मीटर की दूरी पर स्थित है। बस स्टैंड से पैदल मंदिर तक पहुंचा जा सकता है। मंदिर प्रातः सात बजे से दोपहर 12 बजे तक और सांय 4 से 7 बजे तक लोगों को दर्शन के लिए खुला रहता है।

-         - विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 


( CHOPRA SHIVA TEMPLE, DHAULPUR RAJSTHAN ) 
धौलपुर में चोपड़ा शिव मंदिर के बगल में बदहाल कुंड । 


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Thursday, June 12, 2014

ग्वालियर का विवस्वान सूर्य मंदिर

वैसे तो देश में कई सूर्य मंदिर हैं पर ग्वालियर के सूर्य मंदिर की भव्यता अनूठी है। यह आधुनिक सूर्य मंदिर है जिसका निर्माण बड़ी ही कलात्मकता से कराया गया है। बिड़ला परिवार द्वारा निर्मित यह मंदिर अब ग्वालियर का प्रमुख दर्शनीय स्थलों में शुमार हो गया है।

शहर के मुरार इलाके में स्थित विवस्वान सूर्य मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा 23 जनवरी 1988 को की गई। मंदिर का उदघाटन बसंत कुमार बिड़ला द्वारा किया गया। इस पूरब रूख के मंदिर में सात घोड़ों पर सवार सूर्य के दर्शन किए जा सकते हैं। मंदिर का रूख पूरब की ओर होने के कारण सुबह के सूर्य की पहली किरणें जब मंदिर के प्रवेश द्वार को चूमती हैं मंदिर का अनूठा सौंदर्य दिखाई देता है।

बाहर से बलुआ पत्थर ( रेड स्टोन) से बने पूरे मंदिर की आकृति किसी भव्य रथ के जैसी है जिसमें दोनों तरफ 16 पहिए लगे हुए हैं। मंदिर की प्रतिकृति ओडिशा के कोणार्क में स्थित सूर्य मंदिर से काफी कुछ मिलती जुलती है।

मंदिर के मुख्य द्वार पर साथ घोड़ों की आकृति बनी हुई है जो सूर्य के रथ को खींचते हुए प्रतीत होते हैं। कहा जाता है कि सूर्य हर सुबह सात घोड़ों पर सवार होकर जगत को देदीप्यमान करने के लिए निकलते हैं। मंदिर के आंतरिक सज्जा में सफेद संगमरमर का इस्तेमाल किया गया है। अंदर जगह जगह कई देवी देवताओं की मूर्तियां भी दीवारों पर उकेरी गई है।

सूर्य मंदिर अब ग्वालियर शहर के ऐतिहासिक महत्व की इमारतों के साथ ही सैलानियों के लिए प्रमुख दर्शनीय स्थलों में शामिल हो चुका है। 

कई एकड़ में फैले इस विशाल मंदिर परिसर में हरियाली ऐसी है कि यहां से जल्दी बाहर निकलने का दिल ही नहीं करता। मंदिर परिसर में घनश्याम दास बिड़ला का लोगों के लिए संदेश लिखा गया है – मैं यही कहना चाहता हूंकि सत्कर्म कीजिए और भगवान का नाम लीजिए। ईश्वर आपका मंगल करेगा। सुबह के समय मंदिर में टहलने वालों की भीड़ दिखाई देती है।

खुलने का समय- आम श्रद्धालुओं के लिए मंदिर सूर्योदय लेकर सूर्यास्त तक खुला रहता है। दोपहर 12 से 1 बजे तक मंदिर बंद होता है। जबकि शनिवार और रविवार को सूर्य मंदिर शाम 7.30 बजे तक खुला रहता है।

कैसे पहुंचे - ग्वालियर शहर के प्रसिद्ध गोला का मंदिर चौराहा से सूर्य मंदिर की दूरी 10 मिनट पैदल चलने भर की है। यह शहर का बाइपास इलाका है जहां से मुरैना और शिवपुरी के लिए रास्ते बदलते हैं। सूर्य मंदिर रेसीडेंसी क्षेत्र में है। मंदिर के पास महाराजपुर एयर स्टेशन स्थित है।
  -    विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
(SUN TEMPLE, RESIDENCY ROAD, GWALOIR )