Monday, June 30, 2014

एक नदी जो उगलती है सोना- स्वर्णरेखा

रांची शहर में जाने से पहले बात एक नदी की जो सोना उगलती है। बोकारो स्टील सिटी से रांची जाने के रास्ते में जन शताब्दी एक्सप्रेस की खिड़की से हमें स्वर्णरेखा नदी के दर्शन होते हैं। वही स्वर्णरेखा नदी जिसका नाम हम स्कूली किताबों में पढ़ते आए हैं। तो आज इस नदी के दर्शन हो गए। नदियां जल का स्रोत होती हैं, जीवन देती हैं। पर आपको पता है ये नदी सोना उगलती है। हां जी सोना मतलब गोल्ड। चौंक गए न। तभी तो इसका नाम स्वर्णरेखा है।

स्वर्णरेखा नदी रांची शहर से 16 किलोमीटर दूर दक्षिण-पश्चिम से निकलती है। 474 किलोमीटर लंबी नदी सीधे बंगाल की खाडी में जाकर गिरती है। स्वर्णरेखा नदी की एक प्रमुख विशेषता यह है कि उदगम से लेकर सागर में मिलन तक यह किसी की सहायक नदी नहीं बनती है। यह सीधे बंगाल की खाड़ी में गिरती है।

झारखंड के सिंहभूम जिले में बहती हुई स्वर्णरेखा उत्तर पश्चिम से बंगाल के मिदनापुर जिले में प्रवेश करती है। इस जिले के पश्चिम भाग के जंगलों में बहती हुई ओडिशा के बालेश्वर जिले में पहुंचती है जहां यह बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इसकी प्रमुख सहायक नदियां कांची एवं कर्कारी हैं। भारत का प्रसिद्ध एवं पहला लोहा-इस्पात का कारखाना टाटानगर इस नदी किनारे स्थापित हुआ।

पठारी भाग की चट्टानों वाले प्रदेश से प्रवाहित होने के कारण स्वर्णरेखा और इसकी सहायक नदियां घाटियों तथा जल प्रपात का निर्माण करती हैं। राढू (रांची) इसकी सहायक नदी हैजो होरहाप से निकल कर सिल्ली से दक्षिण तोरांग रेलवे स्टेशन से दक्षिण-पश्चिम में मिलती है। स्वर्णरेखा नदी मार्ग में जोन्हा के पास एक जल प्रपात का निर्माण करती हैजो कि 150 फीट की ऊंचा है। इसे गौतम धारा के नाम से जाना जाता है। यहां गौतमधारा नामक रेलवे स्टेशन भी है। इसकी एक सहायक नदी कांची भी हैजो राढू के संगम स्थल से दक्षिण में मिलती है। यह भी तैमारा से दक्षिण में दशम जल प्रपात का निर्माण करती हैजो 144 फीट ऊंचा है।



स्वर्णरेखा जैसा कि नाम से ही संकेत मिलता है कि इसमें सोना है। नदी की सुनहरी रेत में सोने की थोड़ी-थोड़ी मात्रा पाई जाती है। मात्रा अधिक न होने के कारण इसका व्यवसायिक उपयोग नहीं हो पाता। नदी मिलने वाले इस धन के कारण क्षेत्र के आदिवासी नदी को नंदा भी कहते हैं।

रहस्य बना है सोना -  स्वर्णरेखा नदी में जो सोने के कण मिलने को लेकर राज्य और केन्द्र सरकार उदासीन है। कोई सरकारी एजेंसी यह मालूम नहीं कर सकी कि इस नदी के रेत में पानी के साथ मिलकर बहने वाले सोने के कण कहां से निकलते हैं। वहीं नदी में बालू की तलहटी से सोने के कण निकालकर हजारों आदिवासी अपना जीविकोपार्जन करने में लगे हैं। कई परिवार पीढियों नदी से सोने के कण निकालने के काम में लगे हैं। हालांकि मामूली सोना निकालने के कारण उनके आर्थिक हालात में कोई सुधार नहीं हुआ है।

आदिवासी निकालते हैं सोना - नदी से आदिवासी सोने के कण एकत्र करते हैं जिसे वहां के स्थानीय व्यापारी औने पौने दामों में खरीद लेते हैं। आदिवासी सोने कणों को छानने के लिए मछलियां पकडने के काम आने वाली बेंत की लकड़ी की बनी टोकरी का इस्तेमाल करते हैं। इसकी पेंदी में कपड़ा लगा होता है। विशेष प्रक्रिया द्वारा मिट्टी से सोने के बारीक कण अलग किए जाते हैं। दिनभर मेहनत के बाद मामूली सा सोना ढूंढ पाते हैं।

आदिवासी नदी से निकाले गए सोने को पूर्वी सिंहभूमि जिले के हल्दी पोखर के बाजार में बेच देते हैं। हल्दी पोखर के बाजार में सोने की खरीद फरोख्त मिट्टी के मोल की जाती है। इस व्यापार से यहां के सुनार करोड़पति हो गए पर आदिवासियों का हाल वैसा ही है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - Email - vidyutp@gmail.com 
  
(   JHARKHAND RIVER, SWARNREKHA, GOLD )  


Saturday, June 28, 2014

पटना से रांची जनशताब्दी एक्सप्रेस से

संयुक्त बिहार में के जमाने में रांची बिहार के गर्मियों की राजधानी हुआ करता था। लेकिन सन 2000 में झारखंड बनने के बाद ये खूबसूरत शहर नए राज्य की राजधानी बन गया। पर पटना से रांची का रिश्ता आज भी खूशबूदार बना हुआ है। रोज रात्रि सेवा की दर्जनों लग्जरी बसें रांची के लिए प्रस्थान करती हैं तो कई रेलगाड़ियां भी हैं। पर मेरा सफर शुरू हुआ रांची जनशताब्दी एक्सप्रेस से। ट्रेन पटना जंक्शन के प्लेटफार्म नंबर से ठीक सुबह 6.00 बजे खुल गई। पटना से आगे चलने पर छोटा सा स्टेशन तारेगना दिखाई दिया। इस छोटे से गांव तारेगना का अंतरिक्ष विज्ञान में बड़ा महत्व है। ये तारेगना तारों की गणना से बना है। 

रेल गाड़ी से झारखंड के जंगल।  
पटना गया लाइन का सफर कभी नारकीय हुआ करता था। पर अब डबल लाइनविद्युतीकृत ट्रैक पर दिन भर दौड़ती ट्रेनों के कारण हालात बदल गए हैं। चेन पुलिंग बीते दिनों की बात हो गई है। कई नए हाल्ट बन गए हैं। सो जन शताब्दी तय समय से पहले  ही गया पहुंच गई। स्टेशन पर अनानास और पपीता बेचने वाले नजर आए. ठहराव 20 मिनट का था। हमने फलाहार किया। ट्रेन आगे बढ़ी। फल्गू नदी को पारकर मानपुर आया बुनकरों का मोहल्ला। 

थोडी देर बाद मोबाइल नेटवर्क खत्म। जंगल शुरू। हरियाली को पार कर आ गए अबरख के पहाड। कोडरमा, झारखंड का पहला बड़ा रेलवे स्टेशन। भाजपा के सांसद रीतलाल प्रसाद वर्मा की याद आई। वे दिल्ली में मिलने पर कई बार मुझे कोडरमा चलने को कहते थे। पर मैं कभी उनके साथ नहीं जा सका। वे इस दुनिया से चले गए। 

गोमो बनाम नेताजी सुभाष चंद्र बोस जंक्शन -  हजारीबाग रोडपारसनाथ के बाद रेलगाड़ी पहुंच गई है गोमो जंक्शन। गोमो का नया नाम अब नेताजी सुभाष चंद्र बोस जंक्शन हैं। इसी रेलवे स्टेशन से 1941 में नेताजी वेश बदलकर ब्रिटिश हुकुमत को चकमा देकर पलायन कर गए थे। उनकी याद में स्टेशन पर स्मृति पट्टिका लगी है। 


दामोदर नदी का पुल - चंद्रपुरा जंक्शन से पहले दामोदर नदी नजर आई। दामोदर यानी झारखंड की जीवन रेखा। इस नदी के नाम पर दामोदर वैली कारपोरेशन का गठन हुआ है।दामोदर नदी पेयजल के साथ विद्युत उत्पादन का बड़ा स्रोत है। तुपकाडीह से पहले दामोदर पर रेल पुल आता है। इसके बाद बोकारो स्टील सिटी। कई साल पहले में एक परीक्षा देने आया था इस शहर में। 



ट्रेन सरपट आगे भागती जा रही है। एक बार फिर मोबाइल नेटवर्क खत्म हो जाता है। मूरी जंक्शन से पहले स्वर्णरेखा नदी दिखाई देती है। मूरी जंक्शन के बाद हरे-भरे अलमस्त जंगलों के  बीच गौतमधारा, गंगाघाट जैसे स्टेशन आते हैं। टाटी सिलवे और नामकुम जैसे स्टेशन भी गुजर गए हैं। अब हम रांची की सीमा में पहुंच रहे हैं। 

अब रांची शहर का विस्तार टाटी तक होने लगा है। तकरीबन आठ घंटे के सफर के बाद जन शताब्दी ने हमें रांची पहुंचा दिया है। दोपहर के दो बजे हैं। मैं प्लेटफार्म से बाहर निकल रहा हूं। रांची रेलवे स्टेशन की सफेद इमारत कुछ कुछ अगरतला स्टेशन की याद दिलाती है। स्टेशन के बाहर शहर में चलने वाले रिक्शा दिखाई देते हैं जिनकी ऊंचाई पटना के रिक्शा की तुलना में काफी कम है। पटना के रिक्शा से गिरने का डर बना रहता है। पर रांची का रिक्शा अपनेपन का एहसास करता है। तो अब चलते हैं शहर में। 
-vidyutp@gmail.com  विद्युत प्रकाश मौर्य
(RANCHI, JHARKHAND, RAIL, JAN SHATABDI EXPRESS ) 



Thursday, June 26, 2014

कोई नहीं आता फूल चढ़ाने देशरत्न की समाधि पर

पटना के बांसघाट के पास देशरत्न की समाधि। फोटो- विद्युत
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की समाधि दिल्ली में यमुना तट पर है। इसके साथ कई किलोमीटर लंबी हरित पट्टी है जहां दूसरे प्रधानमंत्रियों की भी समाधि है। इस क्षेत्र में कई सौ एकड़ जमीन संरक्षित रखी गई है। हजारों लोग रोज इन समाधियों को देखने आते हैं। पर देश के महान सपूत और पहले राष्ट्रपति डाक्टर राजेंद्र प्रसाद की समाधि कहां है।


ये समाधि पटना में गंगा तट पर बांसघाट के बगल में है। समाधि के आसपास कोई भव्यता नहीं है। सड़क की चौड़ाई भी ज्यादा नहीं है। समाधि स्थल के ठीक बगल में बांस घाट में अनवरत शवदाह चलता रहता है जिसका धुआं देशरत्न डाक्टर राजेंद्र प्रसाद की समाधि के पास आता रहता है। आप पर्यटक के तौर पर समाधि को देखने जाएं तो समाधि के द्वार पर ताला लगा दिखाई देता है। अंदर जाकर देश रत्न को नमन करना भी मुश्किल है।

डाक्टर राजेंद्र प्रसाद 10 साल देश के सर्वोच्च पद पर रहने के बाद अवकाश प्राप्त करने के बाद 14 मई 1962 को पटना लौट आए। उन्होंने कोई सरकारी आवास नहीं लिया और बाकी के दिन सदाकत आश्रम में बिहार विद्यापीठ में गुजारना पसंद किया। यहीं पर 28 फरवरी 1963 को उन्होंने अंतिम सांस ली। 

उनका अंतिम संस्कार पास के ही बांसघाट के पास किया गया। कई साल बाद यहां पर उनकी पक्की समाधि जरूर बना दी गई। पर समाधि के ररखाव का हाल बुरा है। हर साल 3 दिसंबर को देशरत्न की जयंती पर नेतागण पर पुष्पांजलि देने जरूर आते हैं। पर शेष 364 दिन कोई नहीं पूछता। गांधी नेहरु की समाधि पर फूल चढ़ाने लोग हजारों लोग पहुंचते हैं पर देशरत्न की समाधि के बारे में पटना में भी जागरूकता की भारी कमी है। जरूरत है कि समाधि स्थल को ऐसा बनाया जाए जिससे नई पीढ़ी इस महान व्यक्तित्व से प्रेरणा ले सके।


बिहार की राजनीति में सक्रिय युवा नेता राघवेंद्र सिंह कुशवाह समाधि के कायाकल्प की मांग कर रहे हैं। उनकी मांग है कि समाधि के बगल से शवदाह गृह को दूर हटाया जाए। समाधि के पास राजघाट की तरह अखंड ज्योति प्रज्जवलित की जाए। समाधि स्थल के आसपास का सौंदर्यीकरण किया जाए। साथ ही यहां पर राजेंद्र प्रसाद से जुड़े हुए साहित्य के बिक्री और वितरण का इंतजाम किया जाए। इन कदमों से आने वाली पीढ़ी को देशरत्न से प्रेरणा मिल सकेगी।


( समाधि के सौंदर्यीकरण के लिए 6 जुलाई 2014 को पटना में समाधि स्थल पर धरना देंगे सर्वजन समाज के लोग)


- विद्युत प्रकाश मौर्य

 ( PATNA, DESHRATNA DR RAJENDRA PRASAD ) 

Tuesday, June 24, 2014

बनारस की घुघरानी गली की लस्सी का स्वाद

भीषण गर्मी में तरावट के लिए लस्सी पीना किसे अच्छा नहीं लगता. लस्सी अगर मिट्टी के करूए (ग्लास) में पी जाए तो उसका स्वाद और  ही बढ़ जाता है। वह लस्सी बनारस की हो तो बात ही क्या। बनारस में भी घुघरानी गली के लस्सी का स्वाद और बढ़ जाता है।

वैसे तो उत्तर भारत के अधिकांश शहरों में लस्सी मिलती है। कई दुकानदार लस्सी बनाकर फ्रीज में रख देते हैं। मांग के हिसाब से दिन भर ग्राहकों को पेश करते हैं। पर लस्सी ताजी बनी हुई ही अच्छी लगती है। अब राजधानी दिल्ली के कई दुकानों में भी मिट्टी के ग्लास में लस्सी मिल जाती है। पर दिल्ली में लस्सी जरा महंगी है। दिल्ली में लस्सी 25 से 40 रुपये की ग्लास मिलती है। पर बनारस में अभी भी लस्सी 10, 15 और 20 में बिकती है।

बनारस में पांच साल गुजराने के दौरान हम लंका पर लस्सी और मैंगो शेक के मजे लेते थे। तो कभी कभी अपनी साइकिल दौड़ाई और बांस फाटक के पास घुघरानी गली पहुंच गए। साल 2014 के मई की दोपहरी में भी घुघरानी गली की लस्सी की स्वाद इस गरमी में काफी राहत देता है।

यहां पर आपको छोटा, मध्यम या बड़ा जो आर्डर करें लस्सी बनारसी अंदाज में तैयार होकर मिलेगी। बनारसी बाबू अपने अंदाज में लस्सी घोंटते हैं। दही, चीनी, बर्फ तो हर जगह होती है पर उसके ऊपर मलाई की परत उसका स्वाद और बढ़ा देती है। महानगरों में प्लास्टिक के डिस्पोजेबल ग्लास आ गए हैं। पर बनारस में लस्सी पेश करने का अंदाज वही है। कई शहरों में लस्सी के साथ रूह अफजा का स्वाद मिलाया जाता है। पर बनारसी अंदाज इनसे जुदा है। वैसे बनारस के हर चौक चौराहे पर लस्सी की दुकानें मिल जाएंगी। पर अगर आप बनारस में गौदौलिया चौराहे की तरफ से गुजर रहे हों तो लस्सी का स्वाद लेना नहीं भूलें।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य  
(VARANASI, LASSI, GHUGHRANI GALI ) 

Sunday, June 22, 2014

तेलंगाना - भारत का 29वां पूर्ण राज्य

दो जून 2014 को देश के 29वें पूर्ण राज्य के तौर पर तेलंगाना का जन्म हुआ। आंध्र प्रदेश से अलग होकर बने इस राज्य की राजधानी हैदराबाद होगी। 17 फरवरी 1954 को जन्मे कलवकुंतला चंद्रशेखर राव तेलंगाना के पहले मुख्यमंत्री बने। तेलंगाना शब्द का अर्थ है - तेलुगूभाषियों की भूमि। नया राज्य तेलंगाना पिछले चार दशकों से यहां लोगों के संघर्ष और बलिदान की परिणाम है।

संघर्ष गाथा - तेलंगाना मूल रूप से हैदराबाद के निजाम की रियासत का हिस्सा था। वर्ष 1948 में भारत ने निजाम की रियासत को खत्म करके हैदराबाद राज्य की नींव रखी।
1948 में पहली बार कामरेड वासुपुन्यया ने अलग तेलंगाना राज्य की मुहिम शुरू की। वासुपुन्यया का सपना भूमिहीन किसानों को जमींदार बनाना था। मगर कुछ साल बाद इस आंदोलन की कमान नक्सलियों के हाथों में चली गई। इसी बीच 1956 में तेलंगाना के एक बड़े हिस्से को आंध्र प्रदेश में शामिल कर लिया गया, जबकि कुछ हिस्से कर्नाटक और महाराष्ट्र में मिला दिए गए।
1969 में तेलंगाना आंदोलन फिर शुरू हुआ। इस बार इसका मकसद इलाके का विकास था और इसमें बड़ी तादाद में छात्र आंदोलन में सक्रिय थे। उस्मानिया विश्वविद्यालय इस आंदोलन का प्रमुख केंद्र था। इस आंदोलन के दौरान पुलिस फायरिंग और लाठीचार्ज में मारे गए सैकड़ों छात्रों की कुर्बानी ने इसे ऐतिहासिक बना दिया।

1971 में कांग्रेस पार्टी ने तेलंगाना क्षेत्र के पीवी नरसिंह राव को भी आंध्र प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाकर तेलंगाना आंदोलन को कमजोर किया।
2001 में के चंद्रशेखर राव की अगुवाई में अलग तेलंगाना राज्य की मांग फिर तेज हुई। नाराज केसीआर ने तेलुगु देशम पार्टी को अलविदा कह नई पार्टी बनाई।
27 अप्रैल 2001 को केसीआर तेलंगाना राष्ट्र समिति नामक दल का गठन किया जिसका मुख्य मांग की अलग तेलंगाना राज्य बनाने की थी।
2004 में कांग्रेस ने अलग तेलंगाना राज्य के गठन को समर्थन देते हुए केसीआर से गठबंधन किया मगर इस बार भी वादाखिलाफी हुई। आंध्र के मुख्यमंत्री रहे वाईएसआर ने भी अलग तेलंगाना राज्य के गठन को तरजीह नहीं दी।

ऐसा है राज्य
- 10 जिले हैं तेलंगाना में। हैदराबाद, रंगारेड्डी, अदिलाबाद, खम्मम, करीमनगर, महबूबनगर, मेडक, नलगोंडा, निजामाबाद और वारंगल।
- 119 विधानसभा सीटें और लोकसभा 17 सीटें हैं नए राज्य में। 
- 30 अप्रैल को हुए विधान सभा चुनाव में 63 सीटें जीतकर बहुमत में है टीआरएस।
- 84% हिंदू, 12.4% मुस्लिम और 3.2% सिख, ईसाई और अन्य धर्म के लोग हैं राज्य में।
- 76% लोग तेलुगु 12% उर्दू तथा 12% लोग अन्य भाषाएं बोलते हैं तेलंगाना में।


राज्य का निर्माण : कदम दर कदम
30 जुलाई 2013 : यूपीए ने तेलंगाना के गठन पर सर्वसम्मति से सहमति दी।
05 दिसंबर 2013 : मंत्रिसमूह द्वारा बनाए ड्राफ्ट बिल को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी।
18 फरवरी 2014 : आंध्र प्रदेश पुर्नगठन बिल 2014 को लोकसभा ने भाजपा के समर्थन से पास किया।
21 फरवरी 2014 : तेलंगाना पर संसद की मुहर, कर्मचारियों के आवंटन के लिए समितियां बनीं।

01 मार्च 2014 : तेलंगाना बिल पर राष्ट्रपति की मुहर।

--vidyutp@gmail.com   ( TELANGANA, NEW STATE, HYDRABAD ) 

Friday, June 20, 2014

नन्हकी शाह की लिट्टी – एक रुपये में पूरा स्वाद


एक रुपये में भला क्या मिलता है आजकल। पर ऐसा नहीं है एक रुपये का भी मोल है। एक रुपये में आती है पटना के नन्हकी शाह की स्वादिष्ट लिट्टी। पटना के मुसल्लहपुर हाट में लगने वाली नन्हकी शाह की लिट्टी की दुकान में सुबह से ही लिट्टी खरीदने वालों की लाइन लग जाती है। दस से 11 बजने तक तो सारी लिट्टी खत्म भी हो जाती है। खास तौर पर आसपास के लॉज में रहने वाले छात्रों की खास पसंद है ये दुकान।

तेल में तली हुई लिट्टी एक रुपये की होने के कारण आकार में निश्चित तौर पर छोटी होती है। पर इसके अंदर मकुनी (मसाला) भरा होता है जो इसके स्वाद को बेहतर बनाता है। इस लिट्टी के साथ ग्राहकों को मिलती है चने की घुघनी। घुघनी फ्री में। खरीदने वाले कम से कम 5 रुपये की 5 लिट्टी खरीदते हैं और बड़े चाव से खाते हैं। अगर इस लिट्टी के साथ आप जलेबी भी ले लें तो खाने का स्वाद और भी बढ़ जाता है। मुसल्लहपुर हाट इलाके में नन्हकी शाह की लिट्टी इतनी प्रसिद्ध है कि न सिर्फ प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्र बल्कि आसपास के घरों के लोग भी इनकी लिट्टी मंगाकर खाते हैं।

 कुछ साल पहले नन्हकी शाह की लिट्टी तो महज 50 पैसे में बिकती थी। पर महंगाई के कारण दाम बढ़ाकर एक रुपया कर दिया है। हालांकि पटना और उत्तर बिहार के शहरों में तली हुई लिट्टी कम से कम तीन रुपये की मिलती है। पर उसमें भी नन्हकी शाह वाली बात कहां। वैसे तो बिहार लिट्टी के लिए प्रसिद्ध है। दक्षिण बिहार के शहरों में कोयले पर पकाई हुई लिट्टी बिकती है तो उत्तर बिहार में तली में लिट्टियां। दोनों का अपना अपना स्वाद है। ... तो अगली बार कभी पटना जाएं मुसल्लहपुर हाट में उनकी लिट्टी का स्वाद लेना न भूलें।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य 

(NANHKI SHAH, LITTI, JALEBI, PATNA )  

Wednesday, June 18, 2014

ऐसे करें रसोई घर की संभाल

हमारी कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा किचेन पर ही खर्च होता है। इसलिए यह जरूरी है कि आप किचेन के खर्च पर ध्यान दें। कुछ विंदुओं पर ध्यान देकर आप अपने रसोई का बजट कम कर सकते हैं। सबसे पहले गैस चूल्हे का मितव्ययीता से इस्तेमाल जरूरी है। इससे गैस की बचत होगी ही साथ ही आपके रुपये की भी। आजकल चूंकि एलपीजी की किल्लत चलती रहती है इसलिए आपको किचेन में मल्टी सिस्टम ईंधन का प्रयोग करना चाहिए। यानी आप किचेन में गैस चूल्हे के अलावा माइक्रोवेव ओवन व हीटर आदि का भी इस्तेमाल करें। अगर आपके पास सोलर कूकर हो तो उसका भी इस्तेमाल करें। जिन लोगों के घर में आंगन बड़ा हो या जिनके पास अपनी छत हो वे सोलर कूकर का इस्तेमाल कर अच्छी खासी गैस की बचत कर सकते हैं।

आप यह ध्यान रखें की रसोई घर में इंधन की बचत करना न सिर्फ आपकी जेब के लिए अच्छा है बल्कि देश व समाज के लिए भी हितकर है क्योंकि आपको पता होना चाहिए कि उर्जा का भंडार सीमित है। इसलिए सबके हित में है कि इसका हम समझदारी से दोहन करें। अब आपको कुछ ऐसे उपाय करने चाहिए जिससे की रसोई घर में गैस की बचत हो।

1.  जब भी कुछ बनाएं तो कोशिश करें कि इसके लिए चौड़ी पेंदी वाले बरतनों का इस्तेमाल हो। इससे गैस की बचत होगी साथ ही आपके समय की भी
2.  कोशिश करें की परिवार के सभी सदस्य एक ही समय में खाना खाने बैठें। इससे सबके लिए बार बार खाना गरम करने से छुटकारा मिल जाएगा।
3.  रसोई घर हमेशा हवादार बनवाएं। उसमें एक्जास्ट फैन का भी प्रबंध रखें। इससे रसोई में काम करने वाली गृहणी को सुविधा होगी।
4.  दाल व ऐसी ही अन्य सामग्री जो पकने में ज्यादा समय लेती है उसे पकाने से पहले पानी में फूलने के लिए डाल दें इससे भी गैस की बचत की जा सकेगी।
5.  जब कोई सामग्री फ्रीज से निकाली जाती है और उसे गर्म करना हो तो पहले उसे बाहर निकाल कर समान्य तापमान पर आने दें। इससे भी ईंधन की थोड़ी बचत होगी।
6.  याद रखें आपके द्वारा थोड़ा थोड़ा करके बचाया गया ईंधन आपके गैस की खपत को पांच से दस दिन तक बढ़ा सकता है।
7.  किचेन में कोशिश करें की ज्यादा व्यंजन आप प्रेशर कुकर में ही बनाएं। साथ ही अधिकांश चीजें ढककर ही कुक करें।
8.  कुकर की पहली सिटी के बाद अधिकांश व्यंजन स्लो फ्लेम पर ही बनाएं। इससे खाना सुस्वादु तो बनेगा ही इसके साथ ही इंधन की भी बचत होगी। आप कम सामग्री बनानी हो तो छोटे कुकर का इस्तेमाल करें। अपनी जरूरत के हिसाब से सवा लीटर से आठ लीटर तक के कुकर किचेन में रख सकते हैं।
अगर आप सोलर कुकर और अन्य वैकल्पिक ईंधनो का प्रयोग करते हैं तो बहुत अच्छी बात है। पर सोलर कुकर किसी भी चीज को पकाने में समय ज्यादा लेता है। इसलिए अपनी तैयारी भी उसी तरह से रखें।
माधवी रंजना, madhavi.ranjana@gmail.com
( KITCHEN, SOLAR, CHIMNEY ) 

Monday, June 16, 2014

शुद्ध जल पीएं और स्वस्थ रहें


यह माना जाता है कि 80 फीसदी तक बीमारियां पानी के इन्फैक्सन से ही होती हैं। इसलिए स्वस्थ रहने के लिए जरूरी है कि स्वच्छ पानी पीया जाए। सभी विकसित देशों के लोग स्वच्छ पानी को लेकर काफी जागरुक हैं। हमारे देश में अभी पानी को लेकर जागरुकता कम है। वैसे हर घर में पानी की स्वच्छता को लेकर जागरुकता होनी चाहिए। जो लोग पानी को लेकर ज्यादा रुपये नहीं खर्च कर सकते हैं उन्हें भी चाहिए कि पीने के पानी को हमेशा ढक कर रखें। कोशिश करें की पानी को उबाल कर फिर उसे ठंडा करके पीएं। वे लोग जो समर्थ हैं उन्हें अवश्य ही वाटर प्यूरीफायर का इस्तेमाल करना चाहिए।

बड़े शहरों में कई समर्थ लोग हमेशा बीमारियों से बचने के लिए मिनरल वाटर ही पीतें हैं। इसे मिनरल वाटर न कह कर बोतलबंद पानी कहना चाहिए। पर ऐसा बोतल बंद पानी आप घर में भी वाटर प्यूरीफायर की मदद से तैयार कर सकते हैं। आमतौर पर आर.सिस्टम वाला वाटर प्यूटीफायर घर मे इंस्टाल करने मे पांच हजार से 11 हजार रुपए तक का खर्च आता है। कई कंपनियां इस तरह के सिस्टम इंस्टाल करती हैं आप कोई भी सिस्टम लगवाने से पहले बाजार में अच्छी तरह जांच पड़ताल कर लें।
खास कर उन क्षेत्रों में जहां का पानी पीने लायक नहीं है वहां के लोगों को आरओ सिस्टम जरूर अपने घर में लगवाना चाहिए। आमतौर पर सरकारी दफ्तरों व निजी संस्थानों में वाटर कूलर के साथ वाटर प्यूरीफिकेशन का कोई सिस्टम लगा हुआ होता है।

क्या है आरओ सिस्टम- रिवर्स आस्मोसिस सिस्टम का आविष्कार 1970 में डेनिस चांसलर ने किया। यह पांच चरणों में पानी को शुद्ध करता है। इस प्रक्रिया में पानी को पतली झिल्ली से गुजारा जाता है कई तरह के कणों को अलग कर साफ पानी को ही आगे जाने देता है। इसी प्रक्रिया से विश्व के कई विकसित देशों में समुद्र का पानी पीने योग्य बनाया जाता है वहीं गटर के गंदे पानी को भी दुबारा शुद्ध बनाया जाता है। लास एंजिल्स जैसे शहर मेंजहां पानी की कमी हैबरसात के पानी को पीने योग्य बनाया जाता है।

1.  कैल्सियम कार्बोनेट और अन्य अम्लीय तत्वों को छांटता है।

2.  छोटे छोटे कण अलग करता है।

3.  कार्बन व अन्य आर्गेनिक तत्वों को अलग करता है।

4.  टीएफएम(थीन फिल्म मेम्ब्रेनजो रिवर्स आस्मोसिस की प्रक्रिया से पानी को शुद्ध करता है।

5.  सेकेंड कार्बन फिल्टरआरओ से बचे तत्वों को अलग करता है।

इसकी भी हैं सीमाएं - हालांकि इस आरओ सिस्टम की भी अपनी सीमाएं हैं। यह पानी में मौजूद सारे बैक्टिरिया को नष्ट नहीं कर पाता है। यह आर्सेनिक को नहीं अलग कर पाता है। आम तौर पर इस सिस्टम से शुद्धिकरण का पैमाना 70 से 80 फीसदी माना जाता है।

इसके अलावा बाजार मे जीरो बी नल में लगाने वाला सिस्टम और तीन हजार रुपये के रेंज में दो चरण में शुद्ध करने वाले वाटर फिल्टर भी मौजूद हैं। हर आदमी को अपनी सूझबूझ से पानी को शुद्ध करके पीने के उपाय करने चाहिए।

कई शहरों का और गांव का पानी तो पीने लायक बिलकुल नहीं रह गया है। हमारे गाजियाबाद शहर का ग्राउंड वाटर काफी दूषित है। तो मान लीजिए आपको पानी से होने वाले इन्फेक्शन के कारण कोई बीमारी होती है तो एक सिस्टम खरीदने से ज्यादा पैसा इलाज में खर्च हो सकता है इसलिए श्रेयस्कर है आप पानी शुद्ध करने के लिए कोई उपाय करें। खास तौर पर अपने बच्चों के लिए इसका खास ख्याल रखें कि उन्हें पीने को शुद्ध किया हुआ पानी ही मिले। अगर कुछ संभव नहीं हो तो उन्हें पानी उबाल कर ही पीलाएं।

- माधवी रंजना  madhavi.ranjana@gmail.com
( SAFE DRINKING WATER ) 


Saturday, June 14, 2014

अदभुत वास्तुकला का नमूना - धौलपुर का चोपड़ा शिव मंदिर


चंबल क्षेत्र के मंदिरों में प्रमुख नाम है धौलपुर का चोपड़ा शिवमंदिर का जिसकी वास्तु कला अद्भुत है। राजस्थान के धौलपुर शहर में यह अनूठा शिव मंदिर है जिसे चोपड़ा शिव मंदिर के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर का निर्माण धौलपुर के महारावल भगवंत सिंह के मामा राजधर कन्हैयालाल ने 1856 ई. में करवाया था। 

कन्हैया लाल जी धौलपुर राजघराने के दीवान थे। मंदिर में उनका कला प्रेम बखूबी दिखाई देता है। इस मंदिर की ऊंचाई 150 फीट (45 मीटर) है। मंदिर वास्तु कला की नजरिए से अनूठा है। इसका का गर्भ गृह अष्ट कोणीय है। इसके आठो दीवार में आठ दरवाजे भी हैं। 

मंदिर के हर दरवाजे पर भी आकर्षक मूर्तियां उकेरी गई हैं। मंदिर का उन्नत शिखर भी अत्यंत आकर्षक है। बाहर की ओ से इसकी नक्कासी बहुत ही खूबसूरत है। मंदिर के निर्माण में इस्तेमाल किए गए पत्थर के टुकडों पर नक्काशी का काम अत्यंत बारीक और आकर्षक है। ये शिवमंदिर 19वीं शताब्दी के वास्तुकला का सुंदर नमूना है।

मंदिर के बगल में एक कुंड भी बना हुआ है जिसका निर्माण भी दीवान कन्हैया लाल जी ने ही करवाया था। हालांकि इस कुंड की स्थिति खराब रख रखाव के कारण दयनीय हो गई है।  मंदिर मुख्य परिसर के बीच एक बड़े से आंगन में स्थित है। मंदिर के गर्भगृह में जाने के लिए 25 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। चंबल क्षेत्र के लोग इस मंदिर को सिद्ध मानते हैं।


जगदगुरु शंकराचार्य श्री श्री 1008 स्वामी श्री जयेन्द्र सरस्वती भी इस मंदिर में पधारकर अभिषेक कर चुके हैं। चोपड़ा शिव मंदिर धौलपुरशहर का सबसे प्राचीन शिव मंदिर है। हर साल महाशिवरात्रि के समय यहां श्रद्धालुओँ की बड़ी भीड़ उमड़ती है।

कैसे पहुंचे - चोपड़ा शिव मंदिर राजस्थान के धौलपुर शहर में आगरा ग्वालियर मार्ग पर स्थितहै। धौलपुर शहर के मुख्य बस स्टैंड से 500 मीटर की दूरी पर स्थित है। बस स्टैंड से पैदल मंदिर तक पहुंचा जा सकता है। मंदिर प्रातः सात बजे से दोपहर 12 बजे तक और सांय 4 से 7 बजे तक लोगों को दर्शन के लिए खुला रहता है।

-         - विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 


( CHOPRA SHIVA TEMPLE, DHAULPUR RAJSTHAN ) 
धौलपुर में चोपड़ा शिव मंदिर के बगल में बदहाल कुंड । 


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Thursday, June 12, 2014

ग्वालियर का विवस्वान सूर्य मंदिर

वैसे तो देश में कई सूर्य मंदिर हैं पर ग्वालियर के सूर्य मंदिर की भव्यता अनूठी है। यह आधुनिक सूर्य मंदिर है जिसका निर्माण बड़ी ही कलात्मकता से कराया गया है। बिड़ला परिवार द्वारा निर्मित यह मंदिर अब ग्वालियर का प्रमुख दर्शनीय स्थलों में शुमार हो गया है।

शहर के मुरार इलाके में स्थित विवस्वान सूर्य मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा 23 जनवरी 1988 को की गई। मंदिर का उदघाटन बसंत कुमार बिड़ला द्वारा किया गया। इस पूरब रूख के मंदिर में सात घोड़ों पर सवार सूर्य के दर्शन किए जा सकते हैं। मंदिर का रूख पूरब की ओर होने के कारण सुबह के सूर्य की पहली किरणें जब मंदिर के प्रवेश द्वार को चूमती हैं मंदिर का अनूठा सौंदर्य दिखाई देता है।

बाहर से बलुआ पत्थर ( रेड स्टोन) से बने पूरे मंदिर की आकृति किसी भव्य रथ के जैसी है जिसमें दोनों तरफ 16 पहिए लगे हुए हैं। मंदिर की प्रतिकृति ओडिशा के कोणार्क में स्थित सूर्य मंदिर से काफी कुछ मिलती जुलती है।

मंदिर के मुख्य द्वार पर साथ घोड़ों की आकृति बनी हुई है जो सूर्य के रथ को खींचते हुए प्रतीत होते हैं। कहा जाता है कि सूर्य हर सुबह सात घोड़ों पर सवार होकर जगत को देदीप्यमान करने के लिए निकलते हैं। मंदिर के आंतरिक सज्जा में सफेद संगमरमर का इस्तेमाल किया गया है। अंदर जगह जगह कई देवी देवताओं की मूर्तियां भी दीवारों पर उकेरी गई है।

सूर्य मंदिर अब ग्वालियर शहर के ऐतिहासिक महत्व की इमारतों के साथ ही सैलानियों के लिए प्रमुख दर्शनीय स्थलों में शामिल हो चुका है। 

कई एकड़ में फैले इस विशाल मंदिर परिसर में हरियाली ऐसी है कि यहां से जल्दी बाहर निकलने का दिल ही नहीं करता। मंदिर परिसर में घनश्याम दास बिड़ला का लोगों के लिए संदेश लिखा गया है – मैं यही कहना चाहता हूंकि सत्कर्म कीजिए और भगवान का नाम लीजिए। ईश्वर आपका मंगल करेगा। सुबह के समय मंदिर में टहलने वालों की भीड़ दिखाई देती है।

खुलने का समय- आम श्रद्धालुओं के लिए मंदिर सूर्योदय लेकर सूर्यास्त तक खुला रहता है। दोपहर 12 से 1 बजे तक मंदिर बंद होता है। जबकि शनिवार और रविवार को सूर्य मंदिर शाम 7.30 बजे तक खुला रहता है।

कैसे पहुंचे - ग्वालियर शहर के प्रसिद्ध गोला का मंदिर चौराहा से सूर्य मंदिर की दूरी 10 मिनट पैदल चलने भर की है। यह शहर का बाइपास इलाका है जहां से मुरैना और शिवपुरी के लिए रास्ते बदलते हैं। सूर्य मंदिर रेसीडेंसी क्षेत्र में है। मंदिर के पास महाराजपुर एयर स्टेशन स्थित है।
  -    विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
(SUN TEMPLE, RESIDENCY ROAD, GWALOIR ) 

Tuesday, June 10, 2014

एक बार फिर सोहवलिया - राजू भाई की शादी में


साल 2014 में ही जल्द ही अपने गांव सोहवलिया जाने का दुबारा मौका मिल गया। दरअसल सुदर्शन चाचा के बेटे छोटे भाई राजीव की शादी जून में तय हो गई थी। चाचा ने बुलाया है तो चल पड़ा हूं। दिल्ली से मेरी ट्रेन  है सासाराम के लिए। इलाहाबाद के बाद यमुना के पुल पर रेल की खिड़की से फोटो खिंचते हुए मेरा पहला एंड्राएड फोन शहीद हो गया। इस फोन को संभवतः पुल पर चल रहे किसी शोहदे ने खींच लिया होगा। अब मैं फोन विहीन हो गया हूं। 
गोरी गांव में बना वॉच टावर 

सासाराम उतरने पर सीधे अरविंद भैया के घर पहुंचा। पिताजी और मां पहले से ही गांव जा चुके हैं। शाम को अरविंद भैया के साथ बाइक से अपने गांव सोहवलिया के लिए चल पड़ा। हमलोगों ने वाया करगहर नया रास्ता अपनाया गांव जाने के लिए। रास्ते में गोरी, बीसो डिहरी जैसे गांव आए। गोरी गांव में एक ऐतिहासिक वॉच टावर दिखाई देता है। बताया जाता है कि यह वॉच टावर शेरशाह के जमाने का है। इसे दुश्मन पर निगरानी रखने के लिए बनवाया गया था। गोरी हमारे इलाके का पुराना और समृद्ध गांव रहा है। 
बीसो डिहरी गांव का स्कूल - इस स्कूल में मेरे पिताजी ने पढ़ाई की। 

गोरी के बाद बीसो डिहरी गांव आया। इसी गांव के मिडिल स्कूल में मेरे पिता जी ने पढ़ाई की थी। अब यह स्कूल हाई स्कूल बन गया है पर इसकी इमारत कुछ ज्यादा बड़ी नहीं बन पाई है। शाम होने से पहले मैं अपने गांव पहुंच गया हूं। आज तिलकोत्सव है। यानी कन्या पक्ष के लोग आने वाले हैं। गांव के उत्तर खेतों में तंबू लगा है जहां मेहमानों के खाने पीने का इंतजाम है। अब पांत में नहीं खिलाया जा रहा है। टेबल और कुर्सियां लगाई गई हैं। 

तिलक के दौरान मेरी मुलाकात रामगुन दुबे जी से होती है। राम गुन दुबे हमारे पुरोहित हैं। वे शहर गांव के रहने वाले हैं। मुझे बचपन याद आ जाता है जब रामगुन दुबे अपने दादा जी के साथ मेरे घर में आते थे। तब मेरे दादा जी हर पूर्णिमा को सत्यनारायण भगवान की कथा कराते थे। रामगुन मुझसे उम्र में कुछ साल बड़े थे। बचपन में जब वे मेरे घर आते तो मैं उनके साथ खेलता था। वे मुझसे इतने सालों बाद मिलकर बड़े खुश हुए। उनके पास एयरटेल का मोबाइल कनेक्शन है। उनके फोन से ही कॉल करके मैंने अपने दोनों पोस्टपेड सिम कार्ड को ब्लॉक कराया। जैसा कि मैंने आपको पहले ही बताया कि प्रयागराज में मेरा मोबाइल गायब हो चुका है।

घर के छत पर तिलक चढ़ाने की रस्म अदा की जा रही है। गांव की मेरी बहनों ने माइक संभाल रखा है। वे कन्या पक्ष के लोगों के लिए गीत सुना रही हैं।
गाई के गोबर अंगना लिपाओ रघुनंदन हरि
गजमोती चउका पुराओ सुन हो रघुनंदन हरि। 
और 
जल्दी जल्दी  तिलक चढ़ाव बदरिया घेरी अइले समधी
कुरता ले अइल समधी धोती ले अइल... सूट काहे नाही ले के अइल 
बदरिया घेर अइले समधी....
दो दिन बाद बारात जाने की तैयारी है। इससे पहले मैं चाचा के साथ खरीददारी करने कुदरा बाजार भी गया। मैं देख पा रहा हूं कि बसही में कुदरा नदी पर अब काफी ऊंचा पुल बन गया है। फोन विहीन होने के कारण कुदरा में भी किसी से संपर्क नहीं कर पाया। बारात सासाराम जाने वाली है। इस बीच मुझे दो दिन गांव में रहने का पूरा मौका मिला। रिश्तेदारों नातेदारों से मुलाकात और बातचीत का मौका। गांव में सारे लोगो से मिलने का मौका। कई सालों बाद गांव को खूब जीया।



शाम को बारात निकल पड़ी। अलग-अलग कई बुलेरो गाड़ियों में। अब गांव में ज्यादातर बारात बुलेरो से ही जाती है। सड़कें अच्छी बन गई हैं, तो अब बैलगाड़ी और ट्रैक्टर के जमाने गए। एक घंटे में हमलोग सासाराम पहुंच गए। बारात हमारे मित्र परमेश्वर प्रताप के मुहल्ले गांधी नगर में पहुंची है, पर फोन नहीं होने के कारण मैं परमेश्वर से बात नहीं कर पाया। राजू भाई के शादी में मुझे बड़े भाई की भूमिका निभाने का मौका मिला। मतलब गहने चढ़ाने की रस्म। इस दौरान कन्या पक्ष की ओर भसुर को भी खूब मीठी मीठी गालियां सुनने को मिलती हैं।
धीरे धीरे हो भसुर धीरे धीरे... 
हमरा मड़वा में अइह भसुर धीरे धीरे... 
कुछ ऐसे भी गीत होते हैं....
टीकवा ले अइल भसुर बक्सा में मुन के
खोल के देखाव ना त गारी देहब चुन के...
अगले दिन दोपहर में मेरी दिल्ली के लिए वापसी की ट्रेन है महाबोधि एक्सप्रेस। ट्रेन चार घंटे लेट है।इस बीच सासाराम की गरमी को सहना मुश्किल हो रहा है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 

( SOHWALIA DAYS , GORI, BISO DEHRI, BIHAR, SHADI, GANDHI NAGAR, SASARAM )