Saturday, May 31, 2014

कांगड़ा की जीवन रेखा है घाटी की रेल ((4))

पहाड़ों में यात्री रेल सेवा का सबसे शानदार उदाहरण है कांगड़ा घाटी रेल। यह 19वीं शताब्दी के भारतीय तकनीक से बने रेल लाइन का आदर्श उदाहरण है। इस रेल लाइन से पहले कांगड़ा घाटी में पैदल सफर करने या फिर जानवरों की पीठ पर माल ढुलाई के अलावा कोई साधन नहीं था। इस रेलमार्ग ने घाटी के लोगों को सफर का विकल्प प्रदान किया। 
अगर देखा जाए तो 100 मील से ज्यादा सफर कराने वाला ये दुनिया का सबसे लंबा नैरो गेज रेल मार्ग है जो लोगों को अपनी सेवाएं दे रहा है। आज कांगड़ा घाटी रेल इलाके की पहचान के साथ विरासत भी बन चुका है। कांगड़ा घाटी क्षेत्र के लोगों के सामाजिक आर्थिक विकास में इस रेल मार्ग की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
कांगड़ा वैली रेल 19वीं सदी की इंजीनियरिंग का नायाब नमूना है। 1926 में बने जब इस रेलवे लाइन की शुरुआत हुई तब की बनाई हुआ आधारभूत संरचना का आज भी इस रेल मार्ग पर इस्तेमाल हो रहा है। स्टेशनों के भवन तब के ही बने हुए हैं जिनका अभी भी इस्तेमाल किया जा रहा है। उनका डिजाइन खूबसूरत है जो किसी काटेज जैसा एहसास देते हैं। इनकी दीवारे पतली हैं और पहाड़ों को देखते हुए लकड़ी का इस्तेमाल निर्माण में किया गया है। बड़े बरामदे लकड़ी के स्तंभ और आसपास में फूलों के पेड़ स्टेशनों को आकर्षक बनाते हैं। इनकी मूल संरचना को आज भी बचाए रखा गया है।

इस मार्ग पर चलने वाले लोको ( इंजन) भी पुराने और अब विरासत का हिस्सा बन चुके हैं। रेल मार्ग का सिग्नल सिस्टम भी 1926 का बना हुआ है। कभी कांगड़ा घाटी रेल में कालका शिमला रेल की तरह ही स्टीम इंजनों का इस्तेमाल किया जाता था। हालांकि अब इस मार्ग पर डीजल इंजन चलाए जा रहे हैं। पर एक स्टीम इंजन को आज भी सैलानियों के लिए चालू हालत में रखा गया है। कई पुराने यंत्र आज भी इस रेल मार्ग पर प्रचलन में हैं। ट्रैक के लिए रॉड से चलने वाले स्विच, कैरोसीन लैंप और टोकन निकालने वाली मशीन यहां देखी जा सकती है।

नैरो गेज रेलों के इतिहास में देखें तो कांगड़ा घाटी रेल का अलग महत्व है। दुनिया के ज्यादातर नैरोगेज रेल 1850 के आसपास अस्तित्व में आए। पर ज्यादातर नैरोगेज लाइन छोटी दूरी के हैं। वे 10 से लेकर 10 किलोमीटर का सफर तय करते हैं। पर कांगड़ा वैली रेल का सफर 160 किलोमीटर से ज्यादा का है। इसकी दूसरी खास बात इसे औरों से अलग करती है वो है कि इस लाइन का निर्माण माल ढुलाई के लिए हुआ था। बाद में इसे यात्रियों के लिए खोला गया।

दुनिया के कई हिस्सों में शुरू की गई नैरोगेज रेलों को घाटे का सौदा मानकर बंद कर दिया गया या उन्हें ब्राडगेज में बदल दिया गया। पर कांगड़ा घाटी रेल आठ दशक से अधिक से क्षेत्र के लोगों को सेवाएं दे रही है। यह रेल मार्ग न सिर्फ इलाके के लोगों की चहेती है बल्कि सैलानियों को भी लुभाती है। कई बार इस लाइन को बदल कर ब्राडगेज लाइन बिछाने की बात की जाती है। पर कांगड़ा की घाटियों के लिए ब्राडगेज लाइन व्यवहारिक नहीं है। नैरोगेज लाइन पहाड़ के पर्यावरण से बेहतर संतुलन बनाते हुए चल रही है। इसका सफर तो यूं ही जारी रहना चाहिए। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य 

( KANGRA VALLEY RAILWAYS, KVR, NARROW GAUGE ) 

Friday, May 30, 2014

कांगड़ा रेल - 933 पुल 484 मोड़ और 164 किलोमीटर का सफर ((3))

कांगड़ा घाटी रेल लाइन की लंबाई 164 किलोमीटर है। कांगड़ा घाटी रेल रेल मार्ग में दो सुरंगें हैं। जिनमें से एक 250 फुट लंबी और दूसरी 1,000 फुट लंबी है। ट्रेन 2 फीट 6 इंच चौड़ाई वाले पटरियों पर कुलांचे भरती है। इस लाइन का सबसे ऊंचा प्वाइंट आहजू रेलवे स्टेशन पर है जो 3901 फीट ऊंचा है। कांगड़ा घाटी क्षेत्र में औसत ऊंचाई 2400 फीट की है। पठानकोट रेलवे स्टेशन 383 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है जबकि आखिरी रेलवे स्टेशन जोगिंदर नगर 1184 मीटर की ऊंचाई पर है। इस रेल मार्ग में कुल 933 पुल आते हैं। कुल 484 मोड़ आते हैं। 


1925 में शुरू हुआ निर्माण कार्य - इस रेलवे लाइन का निर्माण कार्य 1925 में आरंभ हुआ। एक दिसंबर 1928 को मालगाड़ियों के लिए इस मार्ग को खोला गया। वास्तव में इस लाइन का निर्माण जोगिंदरनगर के आगे बन रहे हाइड्रोलिक पावर प्रोजेक्ट के लिए माल ढुलाई के वास्ते किया गया था। पर अप्रैल 1929 में इस मार्ग पर पैसेंजर ट्रेनों का संचालन भी शुरू किया गया।
बारह साल की बंदी -  दूसरे विश्वयुद्ध के समय यह रेलमार्ग बंद हो गया। तब रसद की सप्लाई के लिए इस मार्ग के ट्रैक को 1941-42 में बंद कर दिया गया। 12 सालों के बाद 1954 में इस मार्ग को दुबारा चालू किया गया। 1973 में पोंग डैम के निर्माण के समय कांगड़ा घाटी का 25 किलोमीटर मार्ग एक बार फिर बंद करना पड़ा।

फिलहाल इस मार्ग पर सात जोड़ी सवारी गाड़ियां चलाई जाती हैं। सभी पैंसेजर गाड़ियां हैं जो सारे स्टेशनों पर रुकती हैं। अब मार्ग पर ट्रेनों के संचालन के लिए डीजल लोकोमोटिव का इस्तेमाल किया जा रहा है पर एक स्टीम लोको को पठानकोट रेलवे स्टेशन पर संरक्षित रखा गया है। इस मार्ग पर ट्रेन अधिकतम 45 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से चलती है जबकि औसत स्पीड 20 किलोमीटर प्रति घंटे होती है।

तीन हिस्सों में बंटा मार्ग- ये रेलमार्ग मुख्य रुप से तीन हिस्सो में बंटा है। पहला पठानकोट से चक्की पुल का 12 किलोमीटर का हिस्सा। यह हिस्सा पंजाब के पठानकोट जिले में आता है। पठानकोट में केवीआर का लोकोमोटिव शेड भी है। पठानकोट से चक्की नदी तक का इस रेल मार्ग का इलाका कम ऊंचाई वाला है।

चक्की नदी के पुल से बैजनाथ पपरोला तक 130 किलोमीटर का क्षेत्र धार्मिक पर्यटन वाला इलाका है। इसी क्षेत्र में रेल मार्ग की दो सुरंगे ढुंढी और दौलपुर आती हैं। कांगड़ा शहर की बात करें तो ये इस रेलमार्ग के बीच में आता है।

कांगड़ा से पालमपुर की ओर बढ़ने पर इस मार्ग पर चाय के बगान दिखाई देते हैं तो पहाड़ो की मनोरम चोटियों के भी दर्शन होते हैं। तीसरा खंड बैजनाथ से जोगिंदर नगर का है जो 22 किलोमीटर लंबा है और औसत ऊंचाई 979 मीटर की है।



कांगड़ा घाटी रेलवे के स्टेशन



1 पठानकोट जंक्शन -      2 डलहौजी रोड-

3 नूरपुर रोड               4 तेलरा

5 भारमौर                6 जवांवाला शहर

7 हरसार डेहरी             8 मेघराजपुरा

9 नगरोटा सूरियां         10 बारयाल हिमाचल

11 नंदपुर               12 गुलेर

13 त्रिपाल               14 ज्वालामुखी रोड

15 कोपरलाहार           16 कांगड़ा

17 कांगड़ा मंदिर           18 समलोटी

19 नगरोटा              20 चामुंडा मार्ग


21 पारोह                22 सुलह हिमाचल

केवीआर का एक रेलवे स्टेशन 



2
3 पालमपुर - 

24 पट्टी राजपुरा - 

25 पंचरुखी - 

26 मझरैन हिमाचल -

27 बैजनाथ पपरोला -

28 बैजनाथ मंदिर -

29 आहजू - केवीआर का यह सबसे ऊंचाई पर स्थित रेलवे स्टेशन है।

30 चौंतरा बातरेह -

31 जोगिंदर नगर -  ( आखिरी रेलवे स्टेशन)

 --- विद्युत प्रकाश मौर्य
( KANGRA VALLEY RAILWAYS, KVR, NARROW GAUGE ) 

Thursday, May 29, 2014

कांगड़ा घाटी रेल - धौलाधार की वादियों का मोहक सौंदर्य (( 2))

छुक छुक के साथ पंजाब के गेहूं यानी कनक  के खेतों को पीछे छोड़ती कांगड़ा की रेल आपको ले जाती है धौलाधार पर्वत माला के बीच। इस सफर के दौरान कभी मस्ती में झूमते हुए जंगल आते हैं  तो कभी पहाड़ आते हैं, तो कभी दिखाई देते हैं विस्तारित चाय के हर भरे बगान। कांगड़ा घाटी रेलवे का तो मुख्य आकर्षण सम्मोहित कर देने वाले प्राकृतिक नजारे ही हैं। साथ ही उत्तरी पर्वत सीमा की प्राकृतिक विशालता, अद्भुत घाटियां और जल धाराएं भी लोगों का मन मोह लेती हैं। 
कांगड़ा घाटी का विस्तार हिमालय की धौलादार श्रेणी में उत्तर से दक्षिण तक है। मोटे तौर देखें तो यह एक आयताकार पट्टी है जो 90 मील लंबी और 30 मील चौड़ी है। उत्तर की तरफ पहले तो शिखरों की निम्न श्रंखला है, फिर चोटियों की विस्तृत श्रंखला है जिनकी ऊंचाई 7000 से 9000 फीट तक है।


कांगड़ा घाटी रेल से धौलाधार की पहाड़ों पर बर्फ का नजारा - फोटो दिसंबर 2015 - विद्युत प्रकाश 

इसके पीछे वाले शिखर समूहों की ऊंचाई 13,000 से 16,000 फीट तक है। उसके बाद की बात करें तो बर्फ ही बर्फ है। यहां आपको दूर-दूर तक कुहरे में लिपटी पहाडि़यां देखने को मिलेंगी। पहाड़ियों पर बर्फ ऐसे लगती है मानो हरेभरे समुद्र में सफेद हिम खंड तैरते नजर आ रहे हों।
कांगड़ा घाटी रेल मार्ग इस बात को प्रमाणित करता है कि रेलवे ऐसे रेल मार्ग का निर्माण कर सकता है जो यहां की सुंदरता और रहस्यमय परिवेश में सामंजस्य बनाए रखता हो। इस क्षेत्र में यह काम प्राकृतिक सौंदर्य को छेड़े बिना बड़ी कुशलता से किया गया है तभी तो यह यहां आने वाले सैलानियों के लिए परी लोक सा वातावरण प्रस्तुत करता है।


इस रेल मार्ग को पहाड़ों और घाटियों की भूल-भुलैया से निकालने की बजाय यदि किसी और तरीके से बनाया गया होता तो कहा जा सकता है कि इसकी स्वभाविक सुंदरता ऐसी बिल्कुल नहीं रह पाती।

घुमावदार और तीखे मोड़ों की बजाय इस रेल मार्ग को सीधा और आसान बनाया गया है जिसमें यात्रियों को कभी भी घबराहट या चक्कर नहीं आता जैसा कि अक्सर पहाड़ी क्षेत्रों की यात्रा में यात्रियों के साथ होता है। घाटी का सबसे खूबसूरत और सुरम्य भाग मंगवाल से कांगड़ा तक का 18 मील लंबा फैलाव है। उसके साथ-साथ बाण गंगा नामक संकरी घाटी और कांगड़ा दर्रा भी लुभावने स्थल हैं। 

रेल से पालमपुर पहुंचते ही बर्फ से ढकी हुई पर्वतों की श्रंखला जिसकी ऊंचाई 15 हजार से 16 हजार फीट है, मुश्किल से 15 किलोमीटर तक ही दूर रह जाती है। इसके आगे धौलाधार पर्वत श्रेणी के समानांतर चलता रेल मार्ग हिम शिखरों के इतने करीब से गुजरता है जितना कि भारत का कोई दूसरा रेल मार्ग नहीं गुजरता।

पूरी यात्रा के दौरान रास्ते में कुदरत के नजारे अत्यंत आकर्षक है। विशेषकर कांगड़ा पहुंचने से कुछ मील पहले वाले दृश्य तो बहुत ही मनोरम हैं। कांगड़ा का राजपूत किला जो कि 1805 में आए भूकंप में ध्वस्त हो गया था, दूसरी सुरंग से निकलने के बाद आपको दिखाई देने लगता है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य
( KANGRA VALLEY RAILWAYS, KVR, HIMACHAL NARROW GAUGE -2 ) 

Wednesday, May 28, 2014

कांगड़ा की मनोरम वादियों में नैरो गेज रेल- ((1))

कालका शिमला के बाद हिमाचल प्रदेश में दूसरी नैरो गेज की रेलवे लाइन है कांगड़ा वैली रेलवे जिसे केवीआर के नाम से जानते हैं।  ये लाइन पंजाब के पठानकोट शहर से शुरू होती है और हिमाचल प्रदेश में जोगिंदर नगर नामक छोटे से  पहाड़ी कसबे तक जाती है। ये रेलमार्ग सैलानियों को कांगड़ा की मनोरम वादियों की सैर कराता है।
पर कांगड़ा घाटी रेलवे (केवीआर) लाइन का धार्मिक महत्व भी है। इस मार्ग पर ज्वालामुखी देवी, ब्रजेश्वरी देवी, चामुंडा देवी, शिव का बैजनाथ मंदिर जैसे प्रमुख तीर्थ आते हैं। हालांकि यह देश के सभी नैरो गेज रेलमार्गों में सबसे नया है पर ये सबसे लंबा रेल मार्गों में से है। इसकी कुल लंबाई 164 किलोमीटर है। हालांकि ग्वालियर श्योपुर रेल मार्ग इससे भी लंबा है जो 200 किलोमीटर का है।    

कांगड़ा घाटी रेल खंड के लोकप्रिय पर्यटक स्थल-

ज्वाला देवी मंदिर: - ज्वालामुखी रोड स्टेशन से 21 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है ।रेलवे स्टेशन से मंदिर के लिए सुबह 5 बजे रात्रि 8 बजे तक बसें उपलब्ध रहती हैं।

KANGRA MANDIR RAILWAY STN. - photo- VIDYUT
चिंतपूर्णी देवी मंदिर - ज्वालामुखी रोड स्टेशन से 36 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है । यहां भी ज्वालामुखी रोड रेलवे स्टेशन से बस द्वारा जाया जा सकता है। 

धर्मशाला (हिमाचल प्रदेश) कांगड़ा या कांगड़ा मंदिर रेलवे स्टेशन से तकरीबन17 किलोमीटर की दूरी पर है। नगरोटा रेलवे स्टेशन से भी उतर कर कांगड़ा जाया जा सकता है। 

मैक्लोडगंज - कांगड़ा स्टेशन से 27 किलोमीटर है  जो बौद्ध धर्म के लोगों को आस्था का बड़ा केंद्र है। यहां जाने के लिए आप चामुंडा मार्ग रेलवे स्टेशन भी उतर सकते हैं।



कांगड़ा का ब्रजेश्वरी देवी मंदिर कांगड़ा मंदिर स्टेशन से महज दो किलोमीटर है । रेलवे स्टेशन से पैदल चलकर जा सकते हैं।चामुण्डा देवी मंदिर पालमपुर हिमाचल रेलवे स्टेशन से आठ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है । वहीं चामुंडा मार्ग रेलवे स्टेशन से महज 5 किलोमीटर की दूरी पर है। 



विशेष रेल का इंतजाम भी - यदि आप चाहते हैं कि आपके परिवार तथा मित्रों के लिए विशेष रेलगाड़ी हो तो पठानकोट-जोगिन्दर नगर सेक्शन के किसी भी स्टेशन से किसी भी स्टेशन तक यह सेवा रेलवे उपलब्ध करा सकता है।

विशिष्ट रेलगाड़ी में यात्रा करने के लिए आपको लगभग 20 हजार रुपये रूपये देने होंगे। ऐसी स्पेशल ट्रेन में 4 प्रथम श्रेणी डिब्बे (हर डिब्बे में बैठने की क्षमता 18) और एक गार्ड वान होगा। यह ट्रेन पठानकोट से सुबह 08.50 बजे प्रस्थान करेगी। पालमपुर तक भ्रमण कराने के बाद ये ट्रेन शाम को सात बजे तक पठानकोट वापस पहुंचा देगी। 

- विद्युत प्रकाश मौर्य (vidyutp@gmail.com)
( KANGRA VALLEY RAILWAYS, KVR, NARROW GAUGE ) 

Monday, May 26, 2014

शिवालिक डिलक्स का वह यादगार सफर ((06 ))

लाल रंग के छोटे-छोटे डिब्बे। आरामदायक सोफे जैसी सीटें। खिड़की से हरियाली को निहारते हुए लोहे की नन्ही पटरियों पर 96 किलोमीटर का सफर। शिवालिक डिलक्स से कालका से शिमला तक सफर जीवन भर नहीं भूलने वाला है। छुट्टियों में शिमला कई बार जा चुका हूं। इस बार अपने बाल गोपाल के साथ जा रहा था। जून में सारी ट्रेनों में एडवांस बुकिंग रहती है। इसलिए दिल्ली से शिमला का सफर टुकड़ों में शुरू हुआ।
दिल्ली से अंबाला शाने-पंजाब से। वहां से जिरकपुर तक बस से। जिरकपुर से पंचकूला में अपने स्कूली दोस्त के घर पहुंचा। मिथिलेश गुप्ता और मैं 1987-89 में लंगट सिंह कॉलेज मुजफ्फरपुर में साथ पढ़े थे। एक दो दशक बाद हम एक दिन मियां, बीवी और बच्चों के साथ रहे। एक यादगार दिन। बच्चों ने तो खूब मजा किया। हमारी योजना हमेशा की तरह टॉय ट्रेन से ही शिमला जाने की थी। आफ सीजन में टॉय ट्रेन में भीड़ नहीं होती। आप जनरल डिब्बे में भी मजे में जा सकते हैं।
खैर हमारे दोस्त ने पता किया कि शिवालिक डिलक्स जो सुबह 5.30 में चलती है उसकी एक डुप्लिकेट सुबह 6.30 में चलती है। इसका टिकट मैनुअल बनता है। 5.30 वाली ट्रेन में टिकट उपलब्ध नहीं था। पर उनकी कोशिश रंग लाई और हमें शिवालिक डिलक्स डुप्लिकेट के दो टिकट मिल गए। सुबह सुबह हमलोग कालका रेलवे स्टेशन पहुंचे तो आरपीएफ के इंस्पेक्टर साहब हमारे लिए दो टिकट खरीदकर हमारा इंतजार कर रहे थे। 

कालका से शिमला के बीच चलने वाली शिवालिक डिलक्स का किराया 280 रुपये है। कोच में सोफे जैसी सीटें हैं। चाय, वाटर बोटल और ब्रेकफास्ट टिकट में शामिल है। सुबह 6.30 में शुरू हुआ शिवालिक डिलक्स का सफर। कोच एटेंडेंट ने कालका में ही चाय पेश की। हमारी ट्रेन समय पर चल पड़ी। एक कोच में 18 लोगों के बैठने की जगह है। कुल छह कोच लगते हैं शिवालिक डिलक्स में। वैसे तो कालका शिमला के बीच शिवालिक का ठहराव सिर्फ बड़ोग में है लेकिन ट्रेन कई बार क्रासिंग के लिए रूकती है।


समय की बात करें ये भी पैसेंजर के बराबर छह घंटे समय ही लगा देती है शिमला पहुंचाने में, लेकिन सफर अरामदेह होता है। बड़ोग में हर ट्रेन 10 मिनट रूकती है। शिवालिक के यात्रियों का यहां नास्ता पेश किया जाता है। ट्रेन के चलते ही हमारे सुपुत्र अनादि तो सुरंगे गिनने में जुट गए। बड़ोग की सुरंग एक किलोमीटर से ज्यादा लंबी है। वहीं कोटी की सुरंग 700 मीटर लंबी है।
कालका शिमला के सफर में आपकी सहयात्रियों से तुरंत दोस्ती हो जाती है। छह घंटेके सफर में कई बार अच्छी दोस्ती हो जाती है। कालका शहर को पार करते ही ट्रेन बल खाती हुई पहाड़ों पर चढ़ने लगती है। ट्रेन एक सुरंग से निकलती है तो दूसरे सुरंग में घुस जाती है। कभी यह सड़क के किनारे आकर आते जाते वाहनों से संवाद करती जाती है तो कभी फिर से मांद में घुस जाती है। तो इस सुहाने सफर में छह घंटे तक चलता रहता लुका छिपी का खेल।

कई बार ट्रेन की खिड़की से पहाड़ों की ऊंचाई दिखाई देती है तो कई बार गहराई। टकसाल स्टेशन के आसपास ट्रेन एक ही जगह पर घूमती हुई पहाड़ पर काफी ऊंचाई पर पहुंच जाती है। शिमला पहुंच कर आपको पता चलता है कि आप 600 मीटर से चल कर 2100 मीटर की ऊंचाई पर आ चुके हैं। टकसाल के बाद कोटी में ट्रेन के ऊंचाई पर पहुंचने का अद्भुत नजारा दिखाई देता है। किसी बहुमंजिले इमारत पर चढ़ने जैसा उपक्रम करती दिखाई देती है ट्रेन। आपको खिड़की से दिखाई देता है थोड़ी देर पहले उस नीचे वाली पटरी पर थी ट्रेन।
धर्मपुर ऐसा स्टेशन है जहां सड़क और बस स्टाप स्टेशन के बगल में है। यहां सनावर के प्रसिद्ध लारेंस इंटरनेशनल स्कूल में जाने का रास्ता है। सोलन कालका शिमला के बीच का स्टेशन है। सोलन हिमाचल प्रदेश का जिला और बड़ा औद्योगिक शहर भी है।

कालका शिमला मार्ग के कई स्टेशन बिल्कुल जंगलों के बीच आते हैं। हर स्टेशन पर बच्चों के लिए झूले बने हैं। कई स्टेशन पर मास्टर अनादि ट्रेन रुकने पर झूले पर झूलने का मजा लेने के जिद करते रहे। हम झूलते-झूलते ही दोपहर तक शिमला के करीब पहुंच गए। सफर में समय का एहसास ही नहीं होता। शोघी रेलवे स्टेशन के बाद शिमला शहर दिखाई देने लगता है। तारा देवी, जतोग और समर हिल शिमला शहर के स्टेशन हैं। समर हिल में हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी है। शिवालिक डिलक्स ने हमें दोपहर साढ़े 12 बजे शिमला पहुंचा दिया।

शिमला से केएसआर पैसेंजर से वापसी - दो दिन बाद हमारी वापसी भी केएसआर से ही हुई। पर इस बार शिवालिक में नहीं बल्कि पैसेंजर ट्रेन से। जून की गर्मी में केएसआर में खूब भीड़ होती है । पर हमने शाम को चलने वाली ट्रेन में सीट का जुगाड़ कर ही लिया। पैसेंजर का किराया कालका तक महज 18 रुपये ही था। रास्ते के लिए खाना हमने शिमला से ही पैक करा लिया था। इस सफर में कुछ ही घंटे बाद अंधेरा छा गया। हमें कालका शिमला रेल के पुराने सफर याद आने लगे। पहली बार 2001 के जून महीने में अकेला आया था शिमला। आया तो बस से था पर वापसी खिलौना ट्रेन से की। इस दौरान चलती ट्रेन में वाराणसी के एक फोटोग्राफर से दोस्ती हुई थी। शादी के बाद जून 2003 में मैं और माधवी एक बार फिर कालका शिमला ट्रेन पर सवार थे। इस दौरान सहयात्रियों के साथ खूब मजे करते हुए सफर कटा था। शिमला पहुंचने से पहले बारिश आ गई थी और ट्रेन के कोच में फुहारें घुसने लगी थीं। 




हमारी सुनहरी यादों की परत मन में चल रही थी और कालका शिमला पैसेंजर ट्रेन धीरे धीरे नीचे उतर रही थी। हमलोग रात साढ़े दस बजे कालका पहुंच गए थे। वहां से बस से हमलोग चंडीगढ़ के सेक्टर 43 के बस स्टैंड पहुंचे। वहां हमारे साथी सुधीर राघव हमें घर ले जाने के लिए पहुंचे हुए थे। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
(  KSR, KALKA SHIMLA RAIL, NARROW GAUGE, SHIVALIK DELUXE )