Sunday, March 30, 2014

धुआं उड़ाती सिटी बजाती मोनो रेल का रोमांच (04)

भले ही पटियाला स्टेट मोनो रेल इतिहास बन चुकी हो पर धुआं उड़ाती सिटी बजाती मोनो रेल के रोमांच को दिल्ली के नेशनल रेल म्युजियम में महसूस किया जा सकता है। रेल म्यूजियम में हर बुधवार और रविवार को यह रेल चलाई जाती है। आप इस पर सवारी का भी आनंद उठा सकते हैं। टिकट थोडा महंगा जरूर है। एक आदमी के लिए 200 रुपये। पर आप सवारी नहीं करना चाहते तो भी इसे चलते हुए देख सकते हैं। इसके लिए कोई दाम नहीं देना पड़ता।


रेल म्यूजिम में पटियाला मोनो रेल

यह संयोग है कि पटियाला मोनो रेल का एक इंजन और एक कोच आज भी चालू हालत में नई दिल्ली के चाणक्यापुरी स्थित नेशनल रेल म्यूजियम की शोभा बढ़ा रहे हैं। इसके सवारी डिब्बे पूरी तरह लकड़ी के बने हुए थे। जो किसी बग्घी के जैसे लगते हैं।

पटियाला में मोनो रेल का सफर बंद होने के बाद कई दशक तक इसकी सुध नहीं ली गई। कई कोच तो यूं ही पड़े पड़े कबाड़ में तब्दील हो गए। रेलों के इतिहास में रूचि रखने वाले लेख मि. माइक स्टा ने 1962 में इन्हें ढूंढ निकाला। बाद में उनके प्रयास से पटियाला मोनो रेल के कुछ कोच और लोकोमोटिव को अमृतसर में रेल यार्ड में संरक्षित किया गया। दिल्ली में रेल म्यूजियम बनाए जाने के बाद इसे दिल्ली लाया गया। इसका एक इंजन पीएसएमटी 4 रेल म्यूजियम में आराम फरमा रहा है।

चलते हुए देखना रोमांचक अनुभव - लंबे समय तक रेल संग्रहालय में इसे हर रविवार को छोटे से मार्ग पर चलाया जाता था। रेल संग्रहालय में इसे दुबारा संचालित करने के लिए यहां मोनो रेल का छोटा सा ट्रैक बनाया गया। सिंगल लाइन के ट्रैक के साथ सड़क पर चलने वाले बड़े पहिए के लिए भी पतली सी सड़क बनाई गई। अब रेल संग्रहालय में मोनो रेल इसी ट्रैक पर एक चक्कर लगा लेती है। कभी आगे से तो कभी रिवर्स में भी इसे संचालित किया जाता है। पुराने लोकोमोटिव का रखरखाव बड़ा चुनौतीपूर्ण कार्य होता है। कुछ बिगड़ जाने पर इसके पुर्जे मिलते नहीं हैं। लिहाजा इसे जुगाड़ से संचालित करना पड़ता है। इसी दौरान कुछ समय तक इसका संचालन बंद रहा है। पर 2013 में रेलवे बोर्ड के चेयरमैन विनय मित्तल के कार्यकाल में रेलवे ने एक बार फिर इसका संचालन शुरू कराया। दो फरवरी 2013 में इसको रिस्टोर करके संचालित किया गया। तब इसे हर रविवार को चलाया जाता था। 

साल 2019 में इसे हर रविवार और बुधवार को चलाया जा रहा था। रेल म्युजियम का प्रवेश टिकट लेने के बाद अगर आप मोनो रेल की सवारी करना चाहते हैं तो इसके लिए अलग से टिकट लेना पड़ता है। इसकी राइड का टिकट 200 रुपये रखा गया है। भले ही थोड़ा ज्यादा लगता हो पर धुआं उड़ाती रेल पर चढ़ने अतीत की यादों में खो जाने जैसा है। इसके नन्हें से इंजन को चालू करने के लिए पहले कोयला और पानी भरना पड़ता है। कोयला चलाने के बाद स्टीम तैयार होता है तब यह धुआं उड़ाती हुई अपने सफर के लिए तैयार हो जाती है। 

फिल्मों में पटियाला मोनो रेल - साल 1980 में आई बीआर चोपड़ा की लोकप्रिय  फिल्म द बर्निंग ट्रेन में पटियाला के मोनो रेल को चलता हुआ देखा जा सकता है। रेलगाड़ी पर केंद्रित इस फिल्म की कहानी के शुरुआती दृश्यों में ही मोनो रेल पर बच्चे चलते हुए दिखाए जाते हैं। इस फिल्म के कुछ हिस्सों की शूटिंग दिल्ली के नेशनल रेल म्यूजियम में की गई थी। वह शुरुआती दौर था। उसके थोड़े पहले ही रेल संग्रहालय की स्थापना की गई थी। 

-- विद्युत प्रकाश मौर्य ( Email - vidyutp@gmail.com) 
( PATIALA STATE MONO RAIL TRAMWAY , NATIONAL RAIL MUSEUM, DELHI, PSMT ) 

Saturday, March 29, 2014

आधा आना में मोनो रेल का सफर ((03 ))


पंजाब के पटियाला स्टेट मोनो रेल में सफर के लिए 1908 में किराया महज आधा आना हुआ करता था। यह किराया इस रेल के पूरे सफर के लिए था। चाहे आप रास्ते में कहीं भी उतर जाओ। जबकि माल ढुलाई का किराया एक आना से शुरू होता था। इसके 1927 में बंद होने तक किराया यही रहा। मतलब लोगों पर किराया को बोझ नहीं  बढ़ाया गया। हालांकि इन 20 सालों में महंगाई में इजाफा हुआ। पर महाराजा पटियाला द्वारा संचालित रेलवे कंपनी ने लोगों का खयाल रखते हुए किराया स्थिर रखा।

अपने इस किफायती सफर के कारण ही यह मोनो रेल पंजाब के लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हुआ करती थी। इस रेल नेटवर्क की लोकप्रियता का ये आलम था कि सरहिंद मोरिंडा लाइन में 1908 में तकरीबन 20 हजार लोग इस रेल पर हर महीने सफर किया करते थे।

कनक यानी गेहूं की ढुलाई - पटियाला मोनो रेल जिस मार्ग पर चलती थी वह पंजाब का कनक ( गेहूं) उत्पादन करने वाला इलाका है। इस रेल से न सिर्फ लोग सवारी करते थे बल्कि इसमें कनक भी ढोई जाती थी। कनक ढोने के लिए अलग से कोच थे। मतलब मोनो रेल मालगाड़ी का काम करती थी। छोटे छोटे गांव से रेलगाड़ी में कनक लाद कर इसे मंडी तक पहुंचाया जाता था। किसानों के लिए कनक ढुलाई के लिए यह एक सस्ते विकल्प के तौर पर मौजूद थी। 




मोटर मार्ग से मिली चुनौती  1912 के बाद पंजाब की सड़कों पर मोटर वाहन आने लगे थे। इनकी स्पीड मोनो रेल से अधिक थी। पटियाला के आसपास सड़कों का भी विस्तार होने लगा था। इन सड़कों पर तेज गति वाले मोटर आ जाने के कारण 1927 आते आते मोनो रेल की लोकप्रियता काफी कम हो गई थी। लोग मोनो रेल के बजाय तेज गति के मोटर वाहन से चलने लगे थे। 

बंदी की ओर पटियाला मोनो रेल – एक दिन ऐसा आया जब इस सेवा को बंद करना पड़ा। एक अक्तूबर 1927 को महाराजा पटियाला ने मोनो रेल को बंद करने का फैसला किया। बीस साल से चला आ रहा शानदार सफर रुक गया। और इस तरह ये अनूठी रेल इतिहास के पन्ने का हिस्सा बन गई।

पटियाला में कोई निशानी नहीं - इसके बाद सन 1938 में मोनो रेल के सपने को साकार करने वाले पटियाला के महाराजा भूपिंदर सिंह की मृत्यु हो गई। पटियाला रियासत में इसके बाद के राजाओं ने मोनो रेल की सुध नहीं ली। पर इसके कोच और इंजन कई दशक तक पटियाला के पीडब्लूडी शेड में अपनी जगह पर ही आराम फरमाते रहे। कई दशक बाद भारतीय रेलवे ने इस अनमोल विरासत को संरक्षित करने का प्रयास किया। पर पटियाला शहर में अब इस मोनो रेल की याद में कुछ भी उपलब्ध नहीं है। नई पीढ़ी के लोगों को तो ये मालूम भी नहीं की उनके शहर में कभी इतनी शानदार रेलगाड़ी चलती थी। 

-- विद्युत प्रकाश मौर्य  ( Email - vidyutp@gmail.com) 
( PATIALA STATE MONO RAIL TRAMWAY , PSMT ) 



Friday, March 28, 2014

पटियाला मोनो रेल का 80 किलोमीटर का सफर ((02))

पटियाला स्टेट मोनो रेल का कुल नेटवर्क 80 किलोमीटर का था। इसमें दो लाइनें थी। पहली लाइन सरहिंद से मोरिंडा के बीच 24 किलोमीटर की थी। इसे रोपड़ तक आगे बढ़ाने का प्रस्ताव था जो आकार नहीं ले सका। दूसरी लाइन 56 किलोमीटर की थी जो पटियाला से सुनाम के बीच चलाई गई थी। इस लाइन का निर्माण मुंबई की मार्सलैंड एंड प्राइस नामक कंपनी ने किया था। तब ट्रैक बिछाने में 70 हजार रुपये का खर्च आया था। 

हालांकि आज की तारीख में इस ट्रैक का कोई स्मृति चिन्ह पटियाला, सुनाम, सरहिंद, मोरिंडा मार्ग पर नजर नहीं आता है। हालांकि इस लाइन के निर्माण से जुडे चीफ इंजीनियर कर्नल बावेल एक पत्र में लिखते हैं कि 
पटियाला शहर की लाइन नार्थ वेस्टर्न रेलवे के माल गोदाम से आरंभ होती थी। इसके बाद लाइन पटियाला शहर में मुख्य रेलवे लाइन को क्रास कर शहर की मंडी से होते हुए कैंटोनमेंट इलाके में जाती थी। वहां से भवानीगढ़ होते हुए सुनाम तक जाती थी।  


पहले खींचते थे खच्चर – पटियाला मोनो रेल को खींचने के लिए लंबे समय तक खच्चरों का इस्तेमाल किया गया है। राजा के अस्तबल में बड़ी संख्या में खच्चर थे, जिन्हें मोनोरेल को खींचने के लिए लगाया गया। दरअसल ये खच्चर युद्धकाल के लिए लाए गए थे। पर इनके खाली होने के कारण इनका इस्तेमाल परिवहन में किया गया। ऐसा पता चलता है कि पटियाला से सुनाम वाली लाइन  में स्टीम इंजन का इस्तेमाल किया गया। जबकि सरहिंद मोरिंडा लाइन के कोच को खच्चर ही खींचते रहे। पहले स्टीम इंजन का इस्तेमाल पटियाला स्टेशन और शहर की मंडी के बीच के एक किलोमीटर मार्ग में किया गया।

मोनो रेल का लोकोमोटिव ( इंजन) – पटियाला मोनो रेल में 0-3-0 माडल का लोको इस्तेमाल हुआ। ये ओरेनस्टीन एंड कोपेल ( ओ एंड के) द्वारा बनाया गया था। बर्लिन की कंपनी से इंजन 500 और 600 पाउंड में खरीदा गया था। रेल के सुचारू संचालन के लिए कुल चार लोकोमोटिव खरीदे गए थे। डोनाल्ड डब्लू डीकेन्स अपने लेख में लोको के बारे में बताते हैं कि दाहिने तरफ का वाटर टैंक बड़ा था इसलिए इंजन का वजन लोहे की पटरी पर चलने वाले पहिए पर शिफ्ट कर जाता था। पटरी वाले  पहिए का व्यास 39 ईंच ( 990एमएम ) था। लोको पायलट के खड़े होने की जगह में अच्छा खासा केबिन स्पेस भी हुआ करता था।

मोनो रेल के कोच – पटियाला मोनो रेल के कोच 8 फीट लंबे और 6 फीट चौड़े हुआ करते थे। 1908 में पटियाला मोनो रेल की जब शुरुआत हुई तब इसके पास 15 पैसेंजर कोच और 75 मालगाड़ी के डिब्बे थे। इन मालगाड़ी वाले डिब्बों का इस्तेमाल मुख्य रूप से कनक (गेहूं) की ढुलाई के लिए भी किया जाता था। इनमें कुछ माल गाड़ी के डिब्बे ऐसे भी थे जिन्हें जरूरत पड़ने पर सवारी डिब्बे में भी बदल दिया जाता था। 

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 

( PATIALA STATE MONO RAIL TRAMWAY , PSMT ) 

Thursday, March 27, 2014

राजा पटियाला ने चलवाई अनूठी मोनो रेल (01)

मोनो रेल मतलब एक पहिए पर चलने वाली रेल। मुंबई में 2 फरवरी 2014 से आसमान में खंभो पर चलने वाली मोनो रेल सेवा आरंभ हुई है। पर हम मोनो रेल के इतिहास में जाएं तो मूल रूप से मोनो रेल मतलब जिसका एक पहिया लोहे की पटरी पर चलता हो और दूसरा पहिया सड़क पर। इस तरह की मोनो रेल भारत में सबसे पहले महाराजा पटियाला ने अपने रियासत में चलवाई थी। मजे की बात कि इस मोनो रेल को पहले कोई इंजन नहीं बल्कि खच्चर खींचते थे। बाद में इसमें स्टीम इंजन लगाया गया।

पटियाला रियासत में मोनो रेल सेवा 1907 में आरंभ हुई और दो दशक तक अपनी सेवा देती रही। इसे 1927 में बंद कर दिया गया। कुल 80 किलोमीटर रेल सेवा के लिए दो लाइनें बिछाई गई थीं। इसकी कंपनी का नाम पटियाला स्टेट मोनो रेल ट्रामवे ( पीएसएमटी) था।

केरल के मुन्नार में कांडला वैली रेलवे के बाद ये भारत की अपने तरह की दूसरी मोनो रेल सेवा थी। हालांकि 1908 में कांडला वैली मोनो रेल के नैरोगेज में बदल दिया गया पर पटियाला मोनो रेल 1927 तक सरपट दौड़ती रही।


महाराजा भूपिंदर सिंह का कोशिश रंग लाई - महाराजा सर भूपिंदर सिंह को अपने राज्य की जनता के लिए अनूठी रेल सेवा शुरू करने का ख्याल आया। इस परियोजना के चीफ इंजीनियर कर्नल सी डब्लू बावेल्स बनाए गए। कर्नल बावेल्स इस तरह के मोनो रेल तकनीक का प्रयोग पहले भी बंगाल नागपुर रेलवे में माल ढुलाई के ट्रैक के लिए कर चुके थे। महाराजा भूपिंदर सिंह ने उन्हें पीएसटीएम प्रोजेक्ट का मुख्य इंजीनियर नियुक्त किया। इस रेल के बग्घियों के खींचने के लिए रियासत में पाले गए 560 खच्चरों का इस्तेमाल किया गया। खच्चरों के अलावा इस मोनो रेल में बैलों और सांडों का भी इस्तेमाल किया गया।

पीएसएमटी के बारे में 1908 के इंपेरियल गजट के अलावा छपी हुई जानकारी कहीं नहीं मिलती है। इसमें लिखा गया है कि 1907 में भारत में एक मोनो रेल सेवा आरंभ की गई है जो मोरिंडा को सरहिंद शहर से जोड़ती है।
दिल्ली के नेशनल रेल म्युजियम में संरक्षित पटियाला मोनोरेल का लोकोमोटिव। 

अनूठा एविंग सिस्टम – पटियाला मोनो रेल के संचालन में एविंग सिस्टम का इस्तेमाल किया जा रहा था। इसमें किसी कोच का 95 फीसदी भार लोहे की पटरी पर चलने वाले पहिए पर पड़ता है जबकि महज 5 फीसदी भार सड़क पर चलने वाले पहिए पर पडता है। इस तरह संतुलन बना रहता है। जबकि समान्य रेल गाड़ियों में बराबर बराबर भार रेल के दोनो पटरियों पर चलने वाले पहियों में बंट जाता है। लोहे की पटरी पर चलने वाला पहिया छोटा था जबकि सड़क पर चलने वाला बड़ा।

मोनो रेल में समान्य रेल की तरह डिरेलिंग यानी पटरी से उतर जाने की समस्या नहीं रहती है। इसके साथ ही सड़क का समतल होना भी काफी जरूरी नहीं होता। साथ ही मोनो रेल की पटरियां बिछाने का खर्च भी समान्य रेल से काफी कम आता है। मोनो रेल को परंपरागत रेल से घुमाव के लिए कोण भी बहुत कम चाहिए।

पटियाला मोनो रेल पटियाला शहर के घनी आबादी के बीच भी आसानी से चलती थी। इससे सड़क पर चल रहे समान्य ट्रैफिक को कोई दिक्कत नहीं आती थी। मोनो रेल की ये तकनीक वास्तव में आज भी उन इलाकों के लिए लाभकारी हो सकती है जो भीड़ भाड वाले इलाके हैं जहां जगह की कमी के कारण मेट्रो ट्रेन या फिर ट्राम चलाना संभव नहीं है।  

- विद्युत प्रकाश मौर्य  
( PATIALA STATE MONO RAIL TRAMWAY , PSMT ) 



Tuesday, March 25, 2014

बच्चा बाबू का जहाज और एलसीटी सेवा

पहलेजा घाट पर पीएस गोमती ( फोटो सौ - आर वी स्मिथ) 
महात्मा गांधी सेतु बनने से पहले रेलवे स्टीमर के अलावा पटना और पहलेजा घाट के बीच लोगों के लिए दो और स्टीमर सेवा चलती थी। बांस घाट से बच्चा बाबू की स्टीमर सेवा भी काफी लोकप्रिय थी। बच्चा बाबू सोनपुर के रईस थे जिनकी निजी कंपनी बांस घाट से पहलेजा घाट के बीच स्टीमर सेवा का संचालन करती थी। बड़ी संख्या में लोग इस सेवा से भी आते जाते थे। जब लोग राजधानी पटना से सफर करके अपने गांव पहुंचते लोग हालचाल के साथ ये भी पूछते कौन से जहाज से आए तो लोग जवाब देते बच्चा बाबू के जहाज से।

जहाज के इस सफर में इंतजार और सफर में काफी वक्त जाया हो जाता था। इसलिए पढाकू विद्यार्थी अपनी किताबें खोलकर जहाज में पढ़ने बैठ जाते थे। समय का सदुपयोग करने के लिए। वहीं पटना के कुर्जी के पास मैनपुरा से चलती थी गंगा एलसीटी सर्विस की सेवा। 

अरे सब कुछ लाद दो - एलसीटी मतलब लैंडिग क्राफ्ट टैंक। ऐसी फेरी का इस्तेमाल माल ढुलाई के लिए किया जाता था। तो गंगा एलसीटी सर्विस पटना और पहलेजा के बीच माल ढुलाई का महत्वपूर्ण साधन थी। इसके आधार तल पर माल लोड किया जाता था वहीं ऊपरी तल पर लोग सफर करते थे। आधार तल पर दो ट्रक, कुछ जीप, ढेर सारा खाने पीने का सामान, मोटर साइकिलें आदि बुक करके लादी जाती थीं। वहीं एलसीटी सेवा से सोनपुर मेले के समय बड़ी संख्या में हाथी घोडे और दूसरे जानवर भी लादकर इस पार से उस पार लाए जाते थे।

हमने अपनी मोटरसाइकिल भी लाद दी - मुझे याद है एलसीटी सेवा से कई बार हमलोग अपनी प्यारी राजदूत मोटर साइकिल को लादकर पटना आते थे। इसका फायदा ये था कि बाइक से पहलेजा घाटतक पहुंचो। बाइक को जहाज में लाद दो खुद भी उसी जहाज में सवार हो जाओ। जब पटना पहुंचो तो अपनी बाइक उतारो और पटना में जहां जाना है निकल पड़ो। पर गंगा एलसीटी सर्विस लोगों में इतनी लोकप्रिय थी कि इसपर वाहन लादने के लिए नंबर लगता था। कई बार क्षमता के बराबर भर जाने पर आपको अगली सेवा के लिए 4 से 6 घंटे इंतजार भी करना पड़ता था।

हम यूं मान सकते हैं कि गंगा एलसीटी सेवा एक समय में पटना में गंगा नदी पर एक बंदरगाह की तरह हुआ करता था। अब ये सेवा बंद हो चुकी है। पर पटना के मैनपुरा में एलसीटी घाट नाम से इलाके का नाम अब भी मशहूर है। जहाज नहीं है बंदरगाह नहीं पर नाम में उसकी स्मृतियां कायम है।  
एलसीटी के लिए पटना में इस्तेमाल में लाए जाने वाले जहाज मूल ब्रिटिश रॉयल नेवी की ओर विकसित किए गए थे। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान इनका कई जगह इस्तेमाल हुआ। पहले इनका नाम टैंक लैंडिग क्राफ्ट हुआ करता था। बाद में अमेरिका नामकरण प्रणाली के मुताबिक इनका नाम एलसीटी (लैंडिंग क्राफ्ट वेसल) हो गया।
पटना के पास गंगा में गंडक और सोन नदियों का संगम होता है....

कुलियों की मारामारी- कोई भी जहाज जब अपने मंजिल तक पहुंचने वाला होता था। चाहे पहलेजा की तरफ हो या फिर पटना तरफ। जहाज किनारे लगने से पहले ही बड़ी संख्या में कुली पानी में  कूद कूद कर तेजी से चारों तरफ से जहाज में घुस आते थे। मानो वे जहाज पर हमला करने आए हों। उसके बाद वे अपने ग्राहकों की तलाश में जुट जाते किसे कुली चाहिए। जो हां कहता उसके सामान पर कब्जा कर लेते। दूसरी कक्षा के छात्र के तौर पर अक्तूबर 1978 में जब हमारा रेलवे स्टीमर अंधेरी सुबह में पहलेजा घाट पर किनारे लगा तो कुलियों की मारामारी देखकर मेरा बाल मन भयाक्रांत हो गया। पर यह तो उनकी रोज की दिनचर्या थी। पापी पेट का सवाल जो था।
  
-    विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com
(GANGA, BIHAR, PATNA, PAHLEJA GHAT, STEAMER) 

Monday, March 24, 2014

महेंद्रू से पहलेजा घाट - रेलवे की स्टीमर सेवा

पहलेजा घाट पर खड़ा स्टीमर पीएस गोमती ( फोटो सौ- राबर्ट वी स्मिथ) 
उत्तर बिहार और दक्षिण बिहार को जोड़ने के लिए पटना के महेंद्रू घाट से सोनपुर के पास पहलेजा घाट के बीच रेलवे की स्टीमर सेवा काफी लोकप्रिय थी। महेंद्र घाट से हर रोज सुबह 3.50, सुबह 8.30, दोपहर 11.15 13.10, शाम 17.30 रात 20 50 और 23.30 रात्रि में आखिरी स्टीमर सेवा पहलेजा घाट के लिए खुलती थी। महेंद्रू से पहलेजा घाट का सफर नदी की धारा के विपरीत था। ये रास्ता स्टीमर डेढ़ घंटे में तय करता था।

वहीं पहलेजा घाट से पटना आने में स्टीमर को एक घंटे 10 मिनट का समय लगता था। पहलेजाघाट से सुबह 5.30 में पहली स्टीमर सेवा खुलती थी। इसके बाद 8.50, 11.15, 14.00, 17.45, 21.35 और रात के 23.30 बजे आखिरी स्टीमर सेवा चलती थी। ये समय अक्तूबर 1977 में प्रकाशित न्यूमैन इंडियन ब्राड शा के मुताबिक हैं। पटना जंक्शन से सोनपुर तक के रेल टिकट पर दूरी 42 किलोमीटर अंकित रहती थी। हालांकि ये दूरी बिल्कुल सही नहीं कही जा सकती थी। पहलेजा घाट से सोनपुर रेलवे स्टेसन की दूरी 11 किलोमीटर थी।

पटना के महेंद्रू घाट की तरफ गंगा नदी की धारा होती थी। इसलिए स्टीमर से सड़क बिल्कुल पास होता था। पर पहलेजा घाट से पहलेजा रेलवे स्टेशन तक जाने के लिए गंगा की रेत पर आधा किलोमीटर से कुछ अधिक चलना पड़ता था।

गंगा में गोमती और यमुना – रेलवे की ओर संचालित दो स्टीमरों के नाम पीएस गोमती और पीएस यमुना हुआ करता था। दोनों स्टीमर पहलेजा घाट और महेंद्रू घाट के बीच अनवरत सेवाएं दिया करते थे। गोमती का निर्माण कलकत्ता की स्टीमर कंपनी डिस्टांट ने किया था। (  अ हिस्ट्री आफ इंडियन म्यूटिनी, जार्ज डब्लू फारेस्ट )
अपने सफर पर स्टिमर (  फोटो सौ- राबर्ट वी स्मिथ) 
रेल न्यूज विक्टोरिया के संपादक राबर्ट बी स्मिथ ने अपने महेंद्रू से पहलेजा के एक स्टीमर सफर के दौरान इन स्टीमर की तस्वीरें संग्रहित की। उन्होंने इस सफर को शानदार बताया और स्टीमर सेवा की खूब तारीफ की थी।

इस फेरी सेवा का स्टीमर इसलिए कहते थे क्योंकि ये भाप इंजन से संचालित किए जाते थे। स्टीमर में कोयला जलाकर भाप तैयार किया जाता था जिसकी शक्ति से स्टीमर के पानी को काटने वाले चप्पू तेज गति से चलते थे। कई कुली बहाल थे जो बायलर से कोयला जलने के बाद राख को बाल्टी से निकाल कर तेजी से दूसरी तरफ रखते जाते थे।
गंगा में सफर पर पीएस गोमती   (फोटो सौ- राबर्ट वी स्मिथ) 

फर्स्ट क्लास और सेकेंड क्लास – स्टीमर में दो क्लास थे। नीचे का सारा  हिस्सा सेकेंड क्लास होता था। बैठने के लिए कोई बेंच कुरसी नहीं चाहे जहां मर्जी बैठ जाओ। खड़े रहो या फिर जहाज में घूमते फिरते रहो। सेकेंड क्लास में आमतौर पर काफी भीड़ रहती थी। बड़ी संख्या में सामान बेचने वाले वेंडर भी होते थे। वहीं उपरी मंजिल पर फर्स्ट क्लास का केबिन था। इसमें बैठने के लिए गद्देदार बेंच बने हुए होते थे। मुझे याद है कि हमलोग सेकेंड क्लास का टिकट लेकर ही पटना से पहलेजा घाट जाते थे। पर मैं जहाज में जाने के बाद पूरे जहाज में चहल कदमी करता था। पिताजी मुझे जहाज में कहीं भी घूमने की छूट दे दे देते थे। तो मैं सीढ़ियां चढ़कर फर्स्ट क्लास में भी चला जाता था। उसके ऊपर जहाज के कप्तान का केबिन होता था। मैं उसके करीब जाकर उन्हें जहाज को चलाते हुए देखकर आनंदित होता था। जब बोर होने लगता तो जहाज के डेक पर चला जाता और पानी को पीछे की ओर भागते हुए देखता था। इसमें काफी आनंद आता था। जब घाट नजदीक आने लगता तो फिर जहाज में पिताजी को ढूंढ कर उनके पास पहुंच जाता था। रेलवे के स्टीमर में एक कैंटीन भी हुआ करती थी। वहां चाय बिस्कुट और हल्का नास्ता मिल जाता था।
  
साल 1982 के बाद गंगा में पुल बन जाने पर रेलवे की ये स्टीमर सेवा बंद हो गई। उसके बाद इन जहाजों का क्या हुआ। लंबे समय तक यू हीं खड़ी रहीं। बाद में उन्हें पर्यटन के लिए इस्तेमाल किए जाने की योजना बनी।

-    ----- विद्युत प्रकाश मौर्य 
(GANGA, BIHAR, PATNA, PAHLEJA GHAT, STEAMER) 

Sunday, March 23, 2014

पनिया के जहाज से पलटनिया बनी अइह सैंया..

पटना से पहलेजा घाट वाया स्टीमर
पानी के जहाज पर पहला सफर भला कौन भूल सकता है। भोजपुरी में शारदा सिन्हा का लोकप्रिय गीत है...पनिया के जहाज से पलटनिया बनी अइह सैंया... तो पहले उत्तर बिहार और दक्षिण बिहार के बीच पानी का जहाज ही चलता था। पटना हाजीपुर के बीच गंगा नदी पर 1984 में महात्मा गांधी सेतु पुल बनने से पहले राजधानी पटना से उत्तर बिहार जाने का एक मात्र साधन स्टीमर थे। तब छपरा, सोनपुर, हाजीपुर के लोगों को राजधानी पटना पहुंचने में स्टीमर या नाव से लंबा वक्त लग जाया करता था। पटना के दीघा घाट से पहलेजा घाट के बीच निर्माणाधीन रेल सह सड़क पुल के आरंभ हो जाने के बाद एक नए युग की शुरूआत हो चुकी है।

तीन जगह से स्टीमर सेवा - 1984 से पहले पटना के गंगा घाट पर तीन अलग अलग जगह से स्टीमर चलते थे। पटना के बीएन कालेज के पास महेंद्रू घाट से रेलवे की ओर से संचालित स्टीमर चलता था जो सोनपुर के पास पहलेजा घाट को जोड़ता था।

दूसरा स्टीमर निजी कंपनी का बांसघाट से चलता था। तीसरी स्टीमर सेवा कुर्जी के पास मैनपुरा से चलती थी जिसका नाम गंगा एलसीटी सर्विसेज था। एलसीटी मतलब लैंडिग क्राफ्ट टैंक। यानी ऐसे स्टीमर जिनसे वाहनों ढुलाई की जाती हो।

नदी जल परिवहन और स्टीमर - बात रेलवे और स्टीमर की। रेलवे की यात्रियों के लिए स्टीमर सेवा महेंद्रू घाट से चलती थी। और अतीत में चलें तो दीघा घाट स्टीमर सेवा का बड़ा केंद्र हुआ करता था। दीघा से माल ढुलाई के लिए और यात्री सेवा वाले स्टीमर चला करते थे। इंडियन नेविगेशन कंपनी द्वारा स्टीमर दीघा घाट से चलाए जाते थे। पटना जंक्शन जिसका नाम पहले बांकीपुर रेलवे स्टेशन था, वहां से दीघा घाट तक एक ब्रांच रेलवे लाइन बिछाई गई थी। पटना जंक्शन से जो यात्री महेंद्रू घाट जाकर स्टीमर पकड़ना चाहते हों उनके लिए रेलवे स्टेशन से तांगा या आटो रिक्शा का विकल्प था। चूंकि स्टीमर सेवा रेलवे की थी इसलिए आप इसके टिकट रेलवे स्टेशन से भी खरीद सकते थे।


जल परिवहन का बड़ा केंद्र था पटना -  कभी पटना नदी से परिवहन का बहुत बड़ा केंद्र हुआ करता था। यहां गंगा नदी पर 100 घाट थे जहां से नावें चलती थीं। वहीं पटना से हावड़ा के बीच नदी से जल से सामान ढोया जाता था। 1862 में रेल मार्ग आरंभ होने से पहले गंगा नदी परिवहन का बड़ा माध्यम थी। ( इंट्रा अर्बन मार्केट ज्योग्राफी – ए केस स्टडी ऑफ पटना, अबदुस सामी)

बिहार एंड ओडिशा डिस्ट्रिक्ट गजट के अनुसार गंगा नदी पर हरदी छपरा, दीघा, मारूफगंज, मोकामा, फतुहा, बैकुंठपुर, बाढ़ पटना जिले में स्टीमर के महत्वपूर्ण स्टेशन थे। दीघा से बक्सर के बीच परिवहन के लिए स्टीमर चलते थे। रेलवे कंपनी बंगाल एंड नार्थ वेस्टर्न रेलवे और इंडियन नेविगेशन मिलकर नदी में स्टीमर का संचालन करते थे। दीघा घाट से बंगाल ( अब बांग्लादेश) के ढाका पासा राजाबाड़ी जिले के गोआलुंदो घाट के लिए नियमित स्टीमर सेवा संचालित हुआ करती थी। गोआलुंदो पद्मा नदी (गंगा) और ब्रह्मपुत्र के संगम के पास है।

रेलवे के विकास के साथ इन स्टीमर सेवाओं की जरूरत खत्म होने लगी और दीघा घाट रेलवे स्टेशन तक रेलगाडियों की आवाजाही भी बंद कर दी गई। हालांकि लालू प्रसाद यादव ने रेल मंत्री बनने पर दीघा घाट और पटना घाट के बीच पैसेंजर सेवा का संचालन आरंभ कराया पर यह रेलवे के लिए लाभकारी सौदा नहीं साबित हुआ। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य
( GANGA, BIHAR, PATNA, PAHLEJA GHAT, STEAMER ) 

Saturday, March 22, 2014

दिल में दिल का प्यारा है मगर मिलता नहीं

छ्न्नूलाल के सुरों का अनूठा जादू
अच्छा संगीत भी भूख मिटाता है। यह दिल और दिमाग का भोजन है। भले ही आप अच्छा गा नहीं हो सकते हैं पर अच्छा सुनना भला किसके कानों को सुखकर नहीं लगता। जब गाने वाला अपने सुरों के माध्यम से आपको एक साथ कई तरह के संगीत का रसास्वादन कराए तो मजा और भी बढ़ जाता है। 
ऐसी ही एक शाम सजी थी दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में और गायक थे पंडित छन्नूलाल मिश्रा तो सुनने वालों में थे लार्ड मेघनाद देसाई, बाल्मिकी प्रसाद सिंह, भीष्म नारायण सिंह समेत 200 से ज्यादा सुधी श्रोता। बनारस के शास्त्रीय संगीत के ये महान सुरों के साधक जब मंच पर आए तो कहा नोम तोम करूंगा तो काफी वक्त चला जाएगा। इसलिए एक घंटे में आपको संगीत के कई रंग में डुबाने की कोशिश करूंगा। और उन्होंने कजरी, सोहर, ठुमरी सब कुछ सुनाया। हालांकि वे पूरबी अंग की ठुमरी के लिए खास तौर पर जाने जाते हैं पर उन्होंने लाजवाब कर दिया ऊर्दू के शायर अनवर की नज्मों को शास्त्रीय धुन में सुनाकर...
दिल में दिल का प्यारा है मगर मिलता नहीं
आंखों में आंखों का तारा है मगर मिलता नहीं
ढूंढते फिरते हैं उसको दर बदर और खू ब खू
हर तरफ हर नजर
है मगर मिलता नहीं
शेख ढूंढे हरम में  बरहम दैर में
हर जगह वो आशिकारा है मगर मिलता नहीं
मेरे दिल में वही खेले और खेला मुझसे वो दुलारा
है मगर मिलता नहीं
क्या कहूं कुछ बस में नहीं अनवर
दिलबर हमारा यहां बज्म में है मगर मिलता नहीं
( भटियाली धुन में )

लोकप्रिय शास्त्रीय सुरों के साधक छन्नू लाल मिश्र जब उर्दू शायर की इन पंक्तियों को शास्त्रीय धुनों में पिरोकर श्रोताओं के सामने पेश करते हैं तो शास्त्रीय और सूफी का अदभुत संगम नजर आता है और श्रोता उसमें डूबते चले जाते हैं।

 शास्त्रीय संगीत में भोजपुरी के गीत और कबीर के पद तो सुनने को मिलते हैं तो पर उर्दू के नज्म दुर्लभ हैं। कुमार गंधर्व ने ज्यादातर कबीर के भजनों को सुर दिया। पर छन्नूलाल ख्याल गायकी के हर फन के मौला हैं। वे ऐसे लोगों का भी मनोरंजन करने में कामयाब हैं जो शास्त्रीय संगीत की एबीसी नहीं समझते। हर कोई छन्नू लाल की ओर से तुरत-फुरत में सुरों के बसाए संसार में रम जाता है।
पर पद्मभूषण छन्नूलाल मिश्र जाने जाते हैं अपनी खास काशी की होली के लिए जो वे हर जगह सुनाते हैं। शिव की होली। दिगंबर खेले मशाने मे होली....
और अंत में उनकी आवाज में.ये निर्गुण – दुनिया दर्शन का है मेला...अपनी करनी पार उतरनी...चाहे गुरू चाहे चेला...कंकड चुनि चुनि महल बनाया...लोग कहें घर मेरा...न घर तेरा न घर मेरा...चिड़िया  रैन बसेरा।

- विद्युत प्रकाश मौर्य 

( 25 दिसंबर 2013, इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, महामना मालवीय जयंती, BHU, DELHI, VARANASI, MAHAMANA, MALVIYA, OLD STUDENT MEET ) 

Friday, March 21, 2014

प्रकट सिया सुख दईया, जनकपुर में बाजे बधईया...

नेपाल का शहर जनकपुर विदेह राजा जनक की नगरी है। यहां पर मां जानकी का विशाल मंदिर है। जनकपुर प्राचीन मिथिला राज्य की राजधानी थी। यह वो पवित्र स्थान है जिसका धर्मग्रंथों, काव्यों एवं रामायण में उत्कृष्ट वर्णन है। धार्मिक ग्रंथों में उसे स्वर्ग से भी ऊंचा स्थान दिया गया है। जनकपुर धाम प्राचीन काल से ही हिंदुओं का आस्था केंद्र रहा है। यहां स्थित जानकी मंदिर देवी सीता को समर्पित है।
नौलखा मंदिर - कहा जाता है कि इस के निर्माण में नौ लाख रुपए खर्च हुए थे। इसलिए इसे नौलखा मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। सीता माता को समर्पित जानकी मंदिर जनकपुर बाज़ार के उत्तर पश्चिम में स्थित है।
वर्तमान जानकी मंदिर का निर्माण टीकमगढ़ की महारानी वृषभानु कुंअरि जी द्वारा 1967 में करवाया गया। मंदिर दूर से देखने में किसी महल सा लगता है। मंदिर के मुख्य गर्भ गृह में माता जानकी, राजा रामचंद्र और लक्ष्मण जी की प्रतिमा है। मंदिर के गर्भ गृह की फोटोग्राफी वर्जित है। मंदिर के बाहर विशाल प्रांगण है जिसमें एक साथ हजारों लोग बैठ सकते हैं। मंदिर परिसर में सरकार की ओर से सुरक्षाकर्मी तैनात हैं।

सुंदर प्रदर्शनी गैलरी -  मंदिर के अंदर 2012 में एक सुंदर गैलरी का निर्माण हुआ है। इसमें राम जी के जन्म से जुड़ी कथा झांकियों में देखी जा सकती है। झांकियों के साथ यहां मधुबनी पेंटिंग का सुंदर संकलन है जिसमें रामकथा के कई प्रसंग है। झांकी में मंदिर में माता सीता को किए जाने वाले श्रंगार के सामान में देखे जा सकते है। इस गैलरी का प्रवेश टिकट नेपाली रुपये मे 15 रुपये है। 
अखंड सीताराम धुन - जानकी मंदिर में पिछले कुछ सालों से अखंड सीताराम धुन जारी है। मंदिर के बाईं तरफ के बरामदे में एक मंडली वाद्य यंत्रों के साथ सीताराम धुन गाती रहती है। 
जनकपुर में होने वाली शादियों में लोग शादी की रात से पहले माता का सीता का आशीर्वाद लेने के लिए दुल्हन को लेकर जानकी मंदिर आते हैं। मंदिर में दर्शन के लिए आने वाली महिलाएं मैथली में सुंदर धुन में सीता जी की प्रार्थना करती हैं। 
जनकपुर आने वाले हिंदू श्रद्धालु मिथिला परिक्रमा भी करते हैं जिसमें सीताजी से जु़ड़े हुए सारे तीर्थ स्थल आते हैं। मंदिर परिसर में मिथिला परिक्रमा का मार्ग चित्र लगा हुआ है। 
सीता जी का जन्म - 'प्रकट सिया सुख दईया, जनकपुर में बाजे बधईया... कहा जाता है जनकपुर में ही वैशाख शुक्ल नवमी को मां जानकी का अवतार हुआ था। इस मौके पर जानकी नवमी के रूप में मनाया जाता है। जनकपुर का दूसरा प्रमुख त्योहार विवाह पंचमी का है। इसी दिन सीता जी का रामचंद्र जी से विवाह हुआ था। तब जनकपुर का ये मंदिर खूब सजाया जाता है।
वैसे सीतामढ़ी शहर में एक जानकी मंदिर है। शहर के पास ही पुनौरा गांव में एक जानकी मंदिर है। कई लोग इसे वही जगह मानते हैं जहां राजा जनक ने खेत में सोने का हल चलाया था और सीता माता प्रकट हुई थीं।

धनुष धाम - कहते हैं राजा जनक के दरबार में जब रामचंद्र जी ने शिव का धनुष तोड़ा तो उसके तीन टुकड़े हुए थे। एक टुकडा जनकपुर से 40 किलोमीटर दूर धनुषधाम में जाकर गिरा था। वहां एक बड़ी पहाड़ी सी संरचना है जिसे लोग धनुष का एक टुकड़ा बताते हैं। 
जनकपुर धाम मंदिर में जारी अखंड सीताराम की धुन। 

कैसे पहुंचे - बिहार के सीतामढ़ी से करीब 42 किलोमीटर उत्तर और नेपाल की तराई में स्थित जनकपुर है। वैसे तो जनकपुर नेपाल में है पर यहां पहुंचने का सुगम रास्ता बिहार के सीतामढ़ी शहर से है। सीतामढ़ी तक आप रेलगाड़ी से पहुंच सकते हैं। वहां से बस से नेपाल का सीमांत बाजार भिट्ठामोड। भिट्ठामोड ने नेपाल रोडवेज की बसों से जनकपुर पहुंचा जा सकता है। सीतामढ़ी से दिन भर में जनकपुर घूम कर लौटा जा सकता है। जनकपुर ने नेपाल की राजधानी काठमांडू का बस का सफर 10 घंटे का है। 

रहना खाना - जनकपुर में रहने के लिए कुछ धर्मशालाएं और होटल उपलब्ध हैं। मंदिर के आसपास शाकाहारी होटल हैं। यहां भारतीय रुपये चलते हैं। आप 50 रुपये से 500 रुपये में यहां ठहर सकते हैं। अच्छा शाकाहारी खाना और बेहतरीन मिठाइयों का स्वाद भी जनकपुर में लिया जा सकता है। 

- विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com 
( JANAKPUR, NEPAL, SITA MATA )