Wednesday, March 19, 2014

जयनगर जनकपुर अंतरराष्ट्रीय रेल मार्ग

जयनगर जनकपुर नैरोगेज रेलवे ( फोटो सौ - इकांतिपुर टाइम्स, नेपाल ) 
भारत से जनकपुर पहुंचने का एक रास्ता बिहार के मधुबनी जिले के जयनगर से है। भारत के शहर जयनगर से जनकपुर के बीच नेपाल रेलवे की नैरोगेज रेलवे लाइन हुआ करती थी। इस मार्ग से रेल से नेपाल के धार्मिक शहर जनकपुर पहुंचा जा सकता था। जयनगर बिजलीपुरा नौरोगेज लाइन का सफर 50 किलोमीटर का था। यह भारत नेपाल को जोडने वाली अंतरराष्ट्रीय रेलवे लाइन हुआ करती थी। जयनगर से जनकपुर की दूरी 28 किलोमीटर है। इस रेलमार्ग पर चलने वाली पैसेंजर ट्रेन में अत्याधिक भीड़ हुआ करती थी। इसलिए सैलानियों के लिए ये सफर मुश्किल भरा हुआ करता था।जनकपुर से जयनगर के लिए सुबह 7 बजे 11 बजे और 4 बजे रेलगाडियां चलाई जाती थीं।

देश में अटारी-लाहौर और कोलकाता-ढाका के अलावा एक और रेलमार्ग है जो दो देशों को जोड़ता है। पर जयनगर जनकपुर रेल मार्ग जो बिहार के एक शहर को पडोसी देश नेपाल से जोड़ता है। पर ये रेल मार्ग भारत पाकिस्तान और भारत बांग्लादेश अंतराष्ट्रीय रेल मार्ग की तरह ब्राडगेज नहीं था।
जयनगर से नेपाल को जाने वाली छुक छुक गाड़ी लंबे समय तक नैरो गेज की पटरियों पर ही दौड़ती रही। इस रेलमार्ग के पटरियों की चौड़ाई ढाई फीट यानी 762 सेंटीमीटर थी।

1928 में हुई शुरुआत - जयनगर जनकपुर रेलमार्ग की शुरूआत 1928 में हुई। नेपाल के राजा शमशेर राणा एवं दरभंगा महाराज के बीच हुए समझौते के आधार पर जयनगर में नेपाल रेलवे के लिए जमीन उपलब्ध कराई गई थी। जिसमें रेलवे लाइन के साथ नेपाल रेलवे के महाप्रबंधक कार्यालय का निर्माण भी जयनगर में किया गयाजो बाद में पहले जनकपुर और बाद में काठमांडु स्थानांतरित कर दिया गया।
नेपाल सरकार द्वारा संचालित ये मार्ग भारत के बिहार राज्य से नेपाल के तराई क्षेत्र को जोड़ता था। इस मार्ग की अहमियत इसलिए भी थी क्योंकि ये हिंदू धर्म के प्रसिद्ध तीर्थ जनकपुर को रेल मार्ग के मानचित्र पर लाता है। नेपाल की राजधानी काठमांडु से 100 किलोमीटर दूर धनुषा प्रांत में स्थित ये रेलमार्ग नेपाल का सबसे लंबा रेलमार्ग हुआ करता था। रेलमार्ग की लंबाई 51 किलोमीटर थी। धार्मिक शहर जनकपुर से आगे इस रेलवे लाइन का आखिरी रेलवे स्टेशन बिजलीपुरा था। इस रेलवे का संचालन पहले ट्रांसपोर्ट कारपोरेशन आफ नेपाल-जनकपुर रेलवे करती थी।

 जनकपुरधाम  पर खड़े कोच।  कभी पटरी पर दौड़ती थी अब इतिहास हुई। 
बाद में 2004 में इस कंपनी का नाम बदलकर नेपाल रेलवे कारपोरेशन लिमिटेड कर दिया गया। यह नेपाल सरकार की सरकारी कंपनी हुआ करती थी। धार्मिक शहर जनकपुर के साथ जुड़ा होना इस रेलमार्ग की प्रमुख विशेषता है। इस मार्ग पर सिर्फ सवारी गाड़ियां चलाई जाती थीं। पर इसमें  जरूरत के हिसाब से मालगाड़ी के डिब्बे भी जोड़े जाते थे।
तराई क्षेत्र के लोगों के लिए ये रेलमार्ग परिवहन का मुख्य साधन हुआ करती थी। इसलिए आमतौर पर सात यात्री डिब्बों वाले इस रेल में हमेशा ठसाठस भीड़ चलती थी। इस रेलमार्ग के समांतर बेहतर सड़क नहीं होने के कारण जनकपुर मार्ग के लोगों के लिए ये रेल जीवन रेखा थी। कम किराया में जयनगर से जनकपुर पहुंचने के लिए ये रेलमार्ग लोकप्रिय साधन रहा। रेलगाड़ी के डिब्बे काफी बुरे हाल में थे। इनकी प्रकाश व्यवस्था काफी खराब थी। रात में अक्सर डिब्बों में रोशनी के इंतजाम नहीं रहते थे।   

रेलवे लाइन दो खंडों में विभाजित थी। जयनगर से जनकपुर 29 किलोमीटर और जनकपुर से बिजलीपुरा 22 किलोमीटर। पर साल 2001 में जनकपुर से बिजलीपुरा के बीच रेल का संचालन बंद कर दिया गया, क्योंकि इस खंड पर दो रेल पुलों की हालत जर्जर हो चुकी थी। ये लाइन जयनगर से उत्तर की ओर नेपाल सीमा तक जाती है। इसके बाद इसका मार्ग पश्चिम की ओर जनकपुर की तरफ मुड़ जाता था। जनकपुर से बिजलीपुरा का मार्ग फिर उत्तर की ओर मुड़ जाता था।

जयनगर जनकपुर में भाप इंजन का दौर
जनकपुर धान (नेपाल) रेलवे स्टेशन के बाहर। ( जून 2015 )
जयनगर जनकपुर मार्ग पर रेल के संचालन के लिए 1928 में जिस पहले स्टीम लोको का इस्तेमाल किया गया उसका नाम हिंदू देवता के नाम पर विष्णु रखा गया। दस लाख किलोमीटर से ज्यादा सफर के बाद भी ये इंजन हाल के सालों तक संचालन में था।

साल 1994 में विष्णु ने अपना आखिरी सफर पूरा किया। इस मार्ग पर भाप इंजन के दौर में सात लोकोमोटिव चलते थे। इन सबके नाम देवी देवताओं पर रखे गए थे। इनके नाम श्री विष्णु के अलावा सीताराम, महाबीर और पशुपति हुआ करते थे। इनके रखरखाव के लिए नेपाल के खजूरी में लोको शेड का निर्माण किया गया था।

रेल मार्ग में आया डीजल इंजन का दौर
जयनगर जनकपुर रेलमार्ग पर पुराने पड़ चुके स्टीम इंजन को बदलने की शुरुआत नब्बे के दशक में की गई। पर नेपाल की एकमात्र रेलवे होने के कारण इसमें भारतीय रेल ने सहयोग किया। खराब रखरखाव के कारण पुराने स्टीम इंजन की लोकप्रियता में कमी आ रही थी।
पर साल 1994 के बाद  इस मार्ग डीजल इंजन से रेल का संचालन होने लगा। जेडीएम 5 माडल का इंजन अब डिब्बों को लेकर जनकपुर की ओर दौड़ने लगा। 1994 में इस माडल के चार रेल इंजन भारत सरकार ने नेपाल सरकार को उपहार स्वरूप दिए थे। जेडीएम5 के 524, 533 और 535 नंबरों वाले इंजन 2013 तक संचालन में रहे। वहीं जेडीएम5 536 को पहले ही रिटायर कर दिया गया। यह जनकपुर धाम के लोको शेड में आराम फरमा रहा है।

- विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com 
(JANAKPUR DHAM, JAINAGAR, NARROW GAUGE RAIL, NEPAL, BIHAR )
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