Wednesday, March 5, 2014

नेरल माथेरन रेल मार्ग पर - वन किस टनेल (03)

नेरल माथेरन नैरो गेज मार्ग पर एकमात्र छोटी सी सुरंग आती है जिसे लोग प्यार से वन किस टनेल के नाम से याद रखते हैं। ऐसा क्यों,  यानी ट्रेन सुरंग में इतनी ही देर के लिए ही रहती है जितने में कि आप चाहें तो बगल में बैठी अपनी प्रेयसी को धीरे से चूम सकें। इसके बाद तो  उजाला हो जाता है। इस सुरंग की कुल लंबाई 35.67 मीटर है जबकि चौड़ाई 3.6 मीटर है। तो बनाइए योजना चलते हैं माथेरन। क्योंकि माथेरन के अदभुत नजारे आपका इंतजार कर  रहे हैं। 

पश्चिमी घाट का अदभुत सौंदर्य देखिए - माथेरन का तापमान सर्दियों में 16 डिग्री सेल्सियस तक तो गर्मियों में 32 डिग्री से ज्यादा नहीं जाता। वहीं बारिश के दिनों में अच्छी खासी बरसात होती है। दिन हो या रात माथेरन रेलवे से सफर कुदरत का दिलकश नजारा पेश करता है। अगर रात में आसमान साफ है तो रेलगाड़ी की खिड़की से आप मुंबई शहर की रोशनी देख सकते हैं।



माथेरन मुंबई के लोगों के बीच बड़ा ही लोकप्रिय पिकनिक स्पाट है। माथेरन एक ऐसा हिल स्टेशन है जहां किसी भी तरह के मोटर गाड़ियों की आवाजाही पर पूरी तरह से रोक है। इसलिए यहां का वातावरण पूरी तरह प्रदूषण रहित बना रहता है। हरियाली मनमोह लेती है। माथेरन आकर एक अलग तरह की ताजगी का एहसास होता है जो और किसी हिल स्टेशन में नहीं मिलता।


निजी कारोबारी ने बनवाई थी रेल -  रेलवाला यानी अब्दुल हसन की माथेरन रेल

अब्दुल हसन जो मुंबई के जाने माने उद्योगपति सर आदमजी पीरभोय के बेटे थे, उन्होने इन पहाड़ों पर रेल गाड़ी ले जाने का सपना देखा। वे  अक्सर माथेरन घूमने आते थे। तभी उनके मन में इस हिल स्टेशन को रेल से जोडने का ख्याल आया। फिर योजना बनी। कानूनी औपचारिकताएं पूरी की गईं। 
16 लाख में तैयार हुई रेलवे लाइन - साल   1901 से 1907 के बीच ये रेल मार्ग बनकर तैयार हुआ। इसके लिए धन उपलब्ध कराया अब्दुल हसन के उद्योगपति पिता ने। तब इस रेल मार्ग के निर्माण में 16 लाख रुपये की लागत आई।


आदम जी छुट्टियां बीताने के लिए अक्सर माथेरन आते थे। उनकी भी दिली तमन्ना थी कि इन पहाड़ियों तक रेल मार्ग पहुंचे। पिता की अनुमति के बाद अब्दुल हसन ने 1900 ईश्वी में माथेरन में अपना शिविर बना डाला और पहाड़ियों पर नैरो गेज रेल मार्ग के निर्माण के लिए योजना को अंजाम देने में जुट गए। जुलाई 1904 में इस रेल मार्ग के निर्माण को बांबे के लोक निर्माण विभाग ने स्वीकृत किया। अब्दुल हसन ने माथेरन स्टीम लाइट ट्रामवे कंपनी नामक एक स्वतंत्र कंपनी बनाई। कंपनी का शेयर कैपिटल 10 लाख रुपये का था। कपंनी पूर्ण रुप से पीरभाई परिवार की ही थी।

मुफ्त में मिली जमीन -  रेल लाइन के निर्माण के लिए सरकारी जमीन बिना किसी कीमत के कंपनी को उपलब्ध कराई गई। वहीं जो निजी जमीन थी उसे अधिग्रहण कर सरकार ने कंपनी को सौंपा। कंपनी के प्रोमोटरों को इस लाइन पर निर्माण और रखरखाव का अधिकार दिया गया।साल 1904 में निर्माण कार्य आरंभ हुआ और 22 मार्च 1907 में इस मार्ग को जनता के लिए खोल दिया गया।

आजादी के बाद इस रेलमार्ग का अधिग्रहण भारत सरकार ने कर लिया। अब यह खिलौना ट्रेन का मार्ग सेंट्रल रेलवे का हिस्सा है। इस रेल लाइन के निर्माता उद्योगपति अब्दुल हसन पीरभोय को प्यार से रेलवाला कहकर पुकारते हैं। इस उद्योगपति परिवार की पीढ़ियां अभी भी मुंबई में व्यापार जगत में सक्रिय हैं और इस रेल मार्ग के निर्माण के लिए अपने पुरखों पर गर्व करती हैं।
विस्टाडम कोच के साथ चलती नेरल माथेन रेल... ( 23 फरवरी 2019 ) 



नेरल माथेरल रेल विस्टाडम कोच के साथ चली    -   23 फरवरी 2019 को मुंबई के पास चलने वाली नैरोगेज टॉय ट्रेन नेरल माथेरल रेल शनिवार को पहली बार विस्टाडम कोच के साथ चलाई गई।   मुंबई के पास नेरल से हिल स्टेशन माथेरन जाने वाली रेल को लंबे समय बाद स्टीम लोकोमोटिव से भी संचालित किया गया। विस्टाडम कोच में सफर को लेकर सैलानियों में भारी उत्साह दिखा। इस कोच की छतें भी ग्लास की है जिससे आसमान का भव्य नजारा सफर के दौरान दिखाई देता है। इससे पहले कालका शिमला रेलवे में भी पारदर्शी विस्टाडम कोच लगाए जा चुके हैं।

हमेशा डीजल इंजन से चलने वाली इस ट्रेन के संचालन के लिए23 फरवरी 2019 को खास तौर पर दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे के स्टीम लोकोमोटिव 794बी को लाया गया था। दो फीट की पटरियों पर स्टीम इंजन से दौड़ती रेल को लोग बड़े कौतूहल से देख रहे थे।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 

( ONE KISS TUNNEL, NERAL MATHERAN RAIL - 3)



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