Sunday, March 16, 2014

औद्योगिक जरूरतें और डेहरी रोहतास लाइट रेलवे (01)

रोहतास जिले में आरा सासाराम लाइट रेलवे के अलावा एक और नैरो गेज वाली रेलवे लाइन संचालित हुआ करती थी। इसका नाम था डेहरी रोहतास लाइट रेलवे (DRLR) । यह रेल मार्ग डेहरी ओन सोन से रोहतास गढ़ के किले की तरफ जाता था। इसका मार्ग के सोन नदी के समानांतर था। सड़क के किनारे किनारे इसकी पटरियां बिछाई गई थीं। यह 2 फीट 6 ईंच चौड़ाई वाली लाइट रेलवे थी। 

इस रेल मार्ग का संचालन डेहरी रोहतास ट्रामवे कंपनी करती थी। ये डालमियानगर में कई उद्योग धंधों का संचालन कर रही रोहतास इंडस्ट्रीज की ही सहायक कंपनी हुआ करती थी। कंपनी ने अपनी औद्योगिक जरूरतों को पूरा करने के लिए ये रेल मार्ग शुरू किया था। पर बाद में इस मार्ग पर पैसेंजर ट्रेनों का भी संचालन किया जाने लगा।

रेल मार्ग का आरंभ - इस रेल मार्ग की नींव 1907 में पड़ी। कोलकाता की द ओक्टावियस स्टील कंपनी ने डेहरी से अकबरपुर तक लाइन बिछाने के लिए सरकार से अनुमति प्राप्त की। कंपनी को मूल रूप से ठेका 40 किलोमीटर लंबी एक फीडर लाइन बनाने के लिए मिला था। यह रेल मार्ग रोहतास गढ़ से दिल्ली कोलकाता रेलमार्ग (ईस्ट इंडियन रेलवे) तक पहुंचने के लिए डेहरी ओनसोन तक बनाया जाना था। बाद में यही ट्रामवे कंपनी लाइट रेलवे कंपनी में बदल गई। 4 जून 1909 को ओक्टावियस स्टील कंपनी और शाहाबाद जिला बोर्ड के बीच इस रेलवे लाइन को बिछाने के लिए आधिकारिक तौर पर करार हुआ। 

कालांतर में इस कंपनी का अधिग्रहण रोहतास इंडस्ट्रीज ने कर लिया। इस कंपनी ने अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए असम के बंद पड़ी दवारा थेरिया लाइट रेलवे की परिसंपत्तियों का अधिग्रहण कर लिया। रोहतास इंडस्ट्रीज डालमियानगर और आसपास के शहरों में कई तरह के औद्योगिक इकाइयां चलाती थी। इसमें सीमेंट, वनस्पति, एस्बेस्टस, पेपर और बोर्ड, वैल्केनाइज्ड फाइबर आदि प्रमुख थे। अपनी तमाम औद्योगिक जरूरतों को कच्चे माल की सप्लाई और तैयार माल को भेजने के लिए कंपनी को रेल मार्ग की जरूरत थी।

1911 में यात्री रेल सेवाओं की हुई शुरूआत
डेहरी रोहतास लाइट रेलवे ( डीआरएलआर) पर यात्री गाड़ियों के संचालन की शुरूआत 1911 में हुई। धीरे धीरे ये लोगों में लोकप्रिय होने लगी। साल 1913-14 में इस रेल मार्ग पर 50 हजार से ज्यादा सवारियां और 90 हजार टन से ज्यादा माल की ढुलाई की जा रही थी। इस लाइट रेलवे पर खास तौर पर रोहतासगढ़ के आसपास के पहाड़ों से मार्बल और पत्थरों की ढुलाई की जा रही थी।

रोहतासगढ़ फोर्ट तक विस्तार -  1927 में डेहरी रोहतास लाइट रेलवे के 40 किलोमीटर मार्ग का विस्तार ढाई किलोमीटर बढ़ाकर रोहतास से रोहतासगढ़ फोर्ट तक किया गया। अब इस मार्ग की कुल लंबाई 42.5 किलोमीटर हो गई।

बाद में रोहतास इंडस्ट्रीज ने अपनी जरूरतों मुताबिक इस लाइन का विस्तार 25 किलोमीटर और आगे तक किया। अब इस लाइन को तिउरा पीपराडीह तक बढाया गया। इस तरह नैरो गेज रेलमार्ग की कुल लंबाई 67.5 किलोमीटर हो गई।

भाप इंजन का दौर -  डेहरी रोहतास रेलवे का संचालन अलग अलग तरह के लोकोमोटिव ( इंजन) से होता था। इसकी शुरुआत हंसले  द्वारा निर्मित 0-6-2 माडल के तीन टैंक लोकोमोटिव से हुई। ये सभी पुराने लोकोमोटिव हुआ करते थे, जो असम से द्वारा थेरिया रेलवे मार्ग के 1909 में बंद होने के बाद यहां लाए गए थे।
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद ट्रैफिक बढ़ा -  दूसरे विश्वयुद्ध के खत्म होने और देश आजादा होने के बाद इस मार्ग पर ट्रैफिक बढ़ गया। तब जरूरतें पूरी करने के लिए इस पर नया जेडबी क्लास का 2-6-2 लोकोमोटिव भी लाए गए। इन इंजनों का निर्माण हडसन क्लार्क और कुरास माफेई कंपनियों ने किया था।

- विद्युत प्रकाश  मौर्य

( DRLR1, DEHRI ROHTAS LIGHT RAILWAY )

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