Saturday, March 1, 2014

चलों चलें माता वैष्णवी के दरबार में

साल 1995 - वैष्णो देवी के मार्ग पर। ( पहली यात्रा ) 
शक्ति की देवी मां दुर्गा के नौ रूपों में से एक माता वैष्णवी ( वैष्णो देवी) न सिर्फ जम्मू कश्मीर में बल्कि पूरे उत्तर भारत में सबसे लोकप्रिय देवी बन गई हैं। रियासी जिले में 5200 फीट की ऊंचाई पर स्थित माता के दरबार में हर साल आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में इजाफा होता जा रहा है। तिरुपति के बाद सबसे ज्यादा श्रद्धालु यहां हर साल पहुंचते हैं। 
ऐसी मान्यता है कि माता वैष्णवी त्रिकुटा पहाड़ी की गुफाओं में तपस्या में लीन हैं। वे अविवाहित हैं। कलियुग में जब विष्णु कल्कि अवतार लेंगे तो वे वैष्णवी से विवाह करेंगे। करोड़ों भक्तों की मां वैष्णवी में अगाध आस्था है। गुफा के अंदर माता की मूर्ति नहीं है। उनके दर्शन पिंडी के रूप में होते हैं। माता के दरबार तक पहुंचने के लिए 12 किलोमीटर की पदयात्रा अत्यंत मनोरम है। ये यात्रा सालों भर दिन रात चलती रहती है। 

अब कटरा से भवन का सफर भी धीरे धीरे सुगम होता जा रहा है। पदयात्रा का मार्ग किसी जमाने में कच्चा हुआ करता था। बाद में ये मार्ग पक्का हुआ। पूरे 12 किलोमीटर के मार्ग में जगह जगह खाने पीने के स्टाल बने हैं। थक जाएं तो बैठने के लिए शेड्स। खाने पीने के लिए हर थोड़ी दूर पर रेस्टोरेंट तो चाय काफी के स्टाल। रास्ते में कई भोजनालयों का संचालन माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड द्वारा होता है इसलिए यहां खाने पीने की दरें वाजिब हैं।
वैष्णो देवी मार्ग में अधकुंवारी मंदिर। 


वैष्णो देवी यात्रा के तकरीबन आधे मार्ग पर आता है अधकुआंरी, जहां खाने पीने की विशेष सुविधा है। इसके बाद सांझी छत पर भी अच्छे रेस्टोरेंट बने हुए हैं। अधकुंवारीसांझी छत और भवन में लोगों के रहने के लिए भी इंतजाम है।

फिल्म अवतार और नरेंद्र चंचल की भेंटे - वैष्णो देवी को सबसे पहले राजेश खन्ना की फिल्म अवतार में सिल्वर स्क्रीन पर देखा गया। जागरण गायक नरेंद्र चंचल की आवाज में ...चलो बुलावा आया है...माता ने बुलाया है ....गीत काफी लोकप्रिय हुआ था। इसके बाद टी सीरीज के गुलशन कुमार ने इसे लोकप्रिय बनाया।

पौड़ी पौड़ी चढ़दा जा..जय माता दी बोलता जा..इन नारों के साथ माता के भक्त कटरा से भवन के लिए 12 किलोमीटर का सफर हंसते खेलते तय कर लेते हैं।अगर सुखद वैष्णो देवी की यात्रा चाहते हैं तो आईआरसीटीसी का पैकेज ले सकते हैं। इसमें कन्फर्म रेल टिकट के साथ यात्रा की पर्ची और कटरा में रहने के लिए होटल बुकिंग की भी सुविधा उपलब्ध है। देखें – www.irctc.co.in

1995 - पहली यात्रा में कुछ साथी जो रास्ते में मिले। 



माता के दरबार में पहली यात्रा - मैं सदभावना रेल यात्रा के साथ 1993 में पहली बार जम्मू पहुंचा पर वैष्णो देवी के दरबार में नहीं जा सका। क्योंकि हमारे तीन दिन के जम्मू के ठहराव में वैष्णो देवी की यात्रा शामिल नहीं थी। पर 1995 में दुबारा रेल यात्रा के साथ जम्मू पहुंचा तो इस बार माता के दर्शन का मौका मिल गया। इस बार मैं रेलगाड़ी में बिना किसी जिम्मेवारी के था। तो जम्मू में ट्रेन के रुकते ही मैं बस से कटरा के लिए निकल पड़ा। सुबह भवन के लिए चढ़ना शुरू कर दिया और देर रात तक माता के दर्शन कर जम्मू वापस भी आ गया। 

मेरी यह पहली यात्रा अकेले हुई। रास्ते में कुछ साथी मिले जो इंजीनियरिंग के छात्र थे। उनसे बातें करते हुए लगभग पांच घंटे की पदयात्रा करके भवन पहुंच गया। पहली यात्रा मैंने पुरानी गुफा मार्ग के माता के दर्शन किए। अब श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए नया रास्ता बना दिया गया है  जिसमें एक साथ ज्यादा संख्या में श्रद्धालु जा सकते हैं।


दूसरी यात्रा दिल्ली से- साल 1997 में एक बार कटरा जाना हुआ। उज्जैन के बाबू सिंह कुशवाहा जी के परिवार के साथ दिल्ली आए थे। उन्होंने अपने साथ वैष्णो देवी चलने को कहा। दिल्ली से लंबी बस यात्रा कर हमलोग कटरा पहुंचे। पर मई महीने में इस बार भवन जाने के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ थी। इस बार कटरा में भीड़ प्रबंधन के लिए कच्ची पर्ची बनाकर लोगों को दो दिन इंतजार करने के लिए कहा जा रहा था।
इस दौरान कटरा के होटलों ने अपनी दरें खूब बढ़ा दी थीं। हमें किसी भी धर्मशाला में भी रहने की जगह नहीं मिली। तब हमने कटरा की गलियों में जाकर आवास की तलाश की। नारायन दास फली के घर में दो दिन रहने का रियायती दरों पर इंतजाम किया।
दिसंबर 1999। सांझी छत  में गीतेश्वर प्रसाद सिंह, विद्युत और सुधीर राघव।






तीसरी यात्रा जालंधर से - 1999 के दिसंबर के सर्द दिनों में जालंधर से अपने मित्रों सुधीर राघव और गीतेश्वर प्रसाद सिंह के साथ एक बार फिर माता के दरबार में जाने का कार्यक्रम बना। तब हम तीनों अमर उजाला जालंधर में कार्यरत थे। हमलोग रात भर बस से सफर कर जम्मू फिर वहां से कटरा पहुंचे। सर्दियों में कटरा से वैष्णो देवी के भवन की चढ़ाई और मनोरम हो जाती है। हालांकि दिसंबर के आखिरी हफ्ते में काफी भीड़ हो गई थी। हमने इस यात्रा में अर्धकुंवारी में भी दर्शन किए। वहां हमें तकरीबन छह घंटे लग गए।
शाम होने पर हमलोग भवन पहुंचे तो वहां भी बेतहाशा भीड थी। माता के दर्शन के बाद रात्रि भोजन किया फिर हमलोग भैरो नाथ मंदिर के लिए निकल पड़े। भवन से भैरोनाथ मंदिर के लिए लगभग दो किलोमीटर की तीखी चढ़ाई है। गीतेश भाई का कहना था कि बिना भैरोनाथ के दर्शन के यात्रा पूरी नहीं होती। हालांकि इसे पहले की यात्राओं मैं भैरोनाथ नहीं गया था।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 

(VAISHNO DEVI, KATRA, RIASI, J&K, SHAKTIPEETH) 

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