Saturday, February 1, 2014

माणिक सरकार - हम लाएं है तूफान से कश्ती निकाल के

 देशभक्ति के जज्बे से ओतप्रोत गीत हम लाए हैं तूफान से कश्ती निकाल के... इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के। ये गीत त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार पर फीट बैठता है। माणिक सरकार त्रिपुरा के ऐसे मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने अशांत त्रिपुरा को खुशहाल त्रिपुरा में बदलने का मुश्किल काम कर दिखाया है वह भी बहुत कम समय में।
त्रिपुरा में वामदल मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) का शासन 1993 में शुरू हुआ। माणिक सरकार 1998 में मुख्यमंत्री बने। तब त्रिपुरा इतना अशांत था कि अगरतला राजधानी के अलावा त्रिपुरा के किसी भी ग्रामीण इलाके में कोई भी बाहरी व्यक्ति बिना सुरक्षा के नहीं जा सकता था। राज्य में उग्रवाद चरम पर था। एक नहीं कई उग्रवादी संगठन गोलियां बरसा रहे थे।


माणिक सरकार ने सत्ता संभालने के बाद अगले कुछ सालों में अपनी सूझबूझ और काबिलियत के बल पर इन पर काबू किया और त्रिपुरा को एक शांत राज्य बनाया और त्रिपुरा चल पड़ा विकास के राह पर। साल 2005 तक राज्य की फिजां बदल गई। यह सब माणिक दादा का जादू था कि बंदूकें शांत हो गईं। अब सभी उग्रवादी संगठन शांत हो गए हैं। कुछ उद्योग व्यापार में लग गए हैं कुछ मुख्य धारा की राजनीति में शामिल हो गए हैं। जिन लोगों ने त्रिपुरा में उग्रवाद का वह काला दौर देखा वह माणिक सरकार की राजनीतिक कौशल की तारीफ करते हैं। 
बदल गई राज्य की फिजां - अब 16 साल के माणिक सरकार के शासन काल में त्रिपुरा की फिजां बदल चुकी है। आप अगरतला की सड़कों पर रात दस बजे के बाद बेखौफ घूम सकते हैं। पूरे त्रिपुरा शहर के किसी भी गांव में बिना किसी सुरक्षा के घूमने जा सकते हैं। सुदूर जंगलों के दर्शनीय स्थल सैलानियों की किलकारियों से गुलजार रहते हैं। त्रिपुरा गैस आधारित बिजली उत्पादन में देश के सामने नजीर पेश कर रहा है।
ओएनजीसी के साथ मिलकर सीएनजी का उत्पादन कर रहा है। राजधानी अगरतला के आसपास सीएनजी ऑटोरिक्शा चल रहे हैं। सालाना विकास दर में त्रिपुरा पूर्वोत्तर के राज्यों से आगे निकल चुका है। तो चाय के नए बगान, रबर की खेती ने राज्य के गांवों में रहने वालों की तकदीर बदल दी है। राज्य में बांस से जुड़े उद्योग ने लोगों को बड़े पैमाने पर रोजगार दिया है। 

त्रिपुरा में गांव-गांव में सड़कों का विस्तार हुआ है। पंचायतों के चमचमाते भवन बने हैं। गांव गांव में सरकारी डाक्टर पहुंचते हैं। अंग्रेजी के अलावा होम्योपैथिक और आर्युवेदिक चिकित्सालय भी काम कर रहे हैं।

गरीब मुख्यमंत्री होने का गर्व - त्रिपुरा में राज्य सरकार के कर्मचारियों को वेतन अन्य राज्यों की तुलना में कम मिलता है। पर माणिक सरकार मुख्यमंत्री के तौर पर खुद भी बहुत कम वेतन पर काम करते हैं। वे मात्र 10 हजार रुपये मासिक वेतन लेते हैं। उसमें वे 5 हजार रुपये मासिक से काम चलाते हैं। बाकी रुपया पार्टी फंड में दान दे देते हैं। उनकी पत्नी अपने आवास से रिक्सा में बैठकर अपने स्कूल जाती हैं। इन सबके बीच माणिक दादा खुद को गरीब मुख्यमंत्री कहलाने में खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं।

अगर हम राजनेताओं के सादगी भरे जीवन की बात करते हैं तो हमें गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पार्रिकर और दिल्ली के अरविंद केजरीवाल भी याद आते हैं पर माणिक दादा की सादगी इनसे दो कदम आगे है। उन्होंने त्रिपुरा में समावेशी विकास का ऐसा माडल पेश किया है जिसमें गरीबों, दलितों, पिछड़ों, ग्रामीण और शहरी हर वर्ग के लोगों का खासा ध्यान रखा गया है। इसलिए राज्य में किसी भी वर्ग के लोगों को उनसे शिकायत नजर नहीं आती। 

साल 2018 के विधानसभा चुनाव में जब पर्चा दाखिल करते समय उन्होंने अपने संपत्ति का ब्योरा पेश किया तो एक बार फिर वे देश के सबसे गरीब मुख्यमंत्री थे। उनके पास सिर्फ 1520 रुपये नकदी थी। इतनी कम आय है कि रिटर्न दाखिल करने की जरूरत नहीं पड़ती। देश में एक ओर सांसदों, विधायकों का वेतन बढ़ता जा रहा है। वहां माणिक सरकार की जीवन शैली नजीर है।
2018 के चुनाव में हार के बाद 4 मार्च को माणिक सरकार ने अपना इस्तीफा सौंप दिया।
------------- 1949 में 22 जनवरी का जन्म हुआ माणिक सरकार का। उनके पिता दर्जी का काम करते थे। 
2018 में भी धनपुर विधान सभा क्षेत्र से चुनाव जीते। 
1992 में उनका विवाह पांचाली भट्टाचार्य से हुआ। वे धर्म के आधार पर खुद को नास्तिक मानते हैं।
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-    विद्युत प्रकाश मौर्य  ( अपडेट किया - फरवरी 2018 )
TRIPURA, CHIEF MINISTER, MANIK SARKAR, AGTL