Wednesday, January 22, 2014

जब त्रिपुरा में उसने कहा, मैं भोजपुरी हूं...

माताबाड़ी, उदयपुर में त्रिपुर सुंदर मंदिर में मेरे कंधे में लटके बैग का फीता टूट गया। मैं मुश्किल में पड़ गया। कोई तात्कालिक उपाय चाहिए था। मंदिर परिसर में एक बालक दुकान लगा रहा था। पूजन सामग्रियों की दुकान। मैंने उससे अपनी समस्या बताकर कहा कोई सेफ्टीपिन होगा जिससे मैं अपने बैग को अस्थायी तौर पर बांध लूं। उसने कहा एक नहीं तीन चार ले लो। मेरा काम हो गया। संकट का समाधान हो गया, पर मेरे पूछने पर भी उस बालक ने सेफ्टी पिन के पैसे लेने से इनकार कर दिया। कहा इतनी छोटी सी राशि क्या लेना। आपका काम तो चल गया ना।

ये मंदिर नहीं शौचालय है। ( माताबाड़ी के पास ) 
बालक ने मेरी समस्या दूर की थी। इसलिए मैं ये उपकार मुफ्त में नहीं लेना चाहता था। सो मैंने उससे एक सगुन का धागा खरीद लिया। उसने अपना नाम बताया किशोर दास। सातवीं कक्षा में पढ़ाई करता है। साथ में मंदिर में दुकान भी। पूर्ण बंगाली समुदाय में इतनी अच्छी हिंदी कैसे बोल लेते हो। उसने बताया मैं पोगो चैनल रोज देखता हूं। उसके कार्टून चैनलों से हिंदी सीखता हूं। मैं चलने लगा तो किशोर दास ने कहा
, मुझे याद रखना। अगली बार त्रिपुर सुंदरी आना तो जरूर मिलना। मैंने भी वादा कर डाला, फिर मिलेंगे। 



माताबाड़ी मंदिर के  मार्केट में मुझे यादव मिष्टान भंडार  और यादव होटल के बोर्ड नजर आते हैं। हिंदी में लिखा है यादव पर अंगरेजी में YADAB सुबह-सुबह ये दुकानें अभी खुली नहीं हैं । पर मुझे यह देखकर आश्चर्य होता है कि यादव  लोग पूरे देश में  फैले हैं। हरियाणा, यूपी बिहार से लेकर त्रिपुरा तक। उधर दक्षिण में देवगिरी से लेकर मैसूर तक। 

माताबाडी से आगे बढ़कर ब्रह्मावाडी चौराहे पर पहुंचा। यहां एक मोची की दुकान पर अपने बैग के फीते को सिलाई के लिए दे दिया। तुम्हारा नाम क्या है। संजीत रविदास। अचानक वह बोल पड़ा मैं भोजपुरी हूं। भोजपुरी। सुनकर मैं चौंका। उसने बताया मेरे पुरखे बिहार के भोजपुर जिले से आए थे। मेरे घर में अभी भी भोजपुरी बोली जाती है। मेरे जैसे कुछ और परिवार यहां हैं।  


हालांकि संजीत को ये नहीं मालूम कि भोजपुर जिले में उसका घर कहां है। न ही अब उसके कोई रिश्तेदार नाते बिहार में हैं जिससे उसका संपर्क हो। वह कभी बिहार गया भी नहीं। पर   कई   पीढ़ी   पहले   आए   पुरखों से मिली विरासत से कुछ बचाकर रखी है तो बस अपनी जुबान। इसके साथ ही सहज गर्व के साथ अपनी उपाधि महान संत रविदास के नाम। चंदन रविदास बंग्ला अंदाज में भोजपुरी बोलते हैं तो काफी प्यारी लगती है।

उदयपुर से  अगरतला  वापस आते हुए शहर से पहले  त्रिपुरा यूनीवर्सिटी का कैंपस नजर आता है।  यह विश्वविद्यालय धीरे धीरे विस्तार ले रहा है।  अक्तूबर 1987 में स्थापित  यह केंद्रीय विश्वविद्यालय है।  इसका परिसर 87 एकड़ में फैला हुआ है।  यहां त्रिपुरा की भाषा कोकबोराक का भी विभाग संचालित है।   





-    विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com 
(TRIPURA, MATABARI, UDAIPUR, BHOJPURI  ) 

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