Friday, January 31, 2014

ऊर्जा के क्षेत्र में कुलांचे भरता त्रिपुरा

सुदूर पूर्वोत्तर का छोटा सा राज्य त्रिपुरा ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में भी नई इबारतें लिखने की   सफल   कोशिश में लगा हुआ   है। यहां नेचुरल गैस और गैस आधारित बिजली उत्पादन के क्षेत्र में काम हो रहा है। ओएनजीसी की सहयोगी कंपनी ओएनजीसी त्रिपुरा पावर कंपनी यहां काम कर रही है। कंपनी की स्थापना राज्य सरकार के सहयोग से की गई है।
कंपनी तेल और प्राकृतिक गैस के नए खदानों की तलाश में लगी है। साथ ही राज्य में गैस के सीएनजी का उत्पादन हो रहा है। अगरतला शहर और आसपास में सीएनजी के पंप खुल गए हैं।

राजधानी अगरतला में और आसपास के शहरों में सीएनजी से वाहन चलाए जा रहे हैं। देश के दस लाख से ज्यादा आबादी वाले कई बड़े शहर हैं जहां प्रदूषण बड़ी समस्या बन चुकी है पर वहां अभी सीएनजी वाहन नहीं पहुंचाए जा सके है। पर  चार लाख आबादी वाले   त्रिपुरा की  राजधानी अगरतला के   सड़कों पर सीएनजी आटो रिक्शा और दूसरे हल्के वाहन चलने लगे हैं।
 


गांव गांव में पहुंचे सीएनजी वाहन -   
राजधानी अगरतला के आसपास के गांव में भी सीएनजी वाहन पहुंच गए हैं। गांव में परिवहन के लिए सीएनजी वाहन चलाए जा रहे हैं। मैं एक बार अगरतला से 30 किलोमीटर दूर के मधुपुर गांव में सीएनजी से चलने वाला आटो चल रहा था। 

आटो वाले ने बताया कि गैस खत्म होने पर भरवाने के लिए अगरतला जाना पड़ता है। एक बार तो गांव में गैस खत्म हो गई थी। तब एक दूसरे आटो वाले को 100 रुपये दिए वह आटो को खींच कर अगरतला ले गया। सीएनजी स्टेशन तक।

ओएनजीसी की सहयोगी कंपनी ओपीटीसी के गैस आधारित प्लांट ने बिजली का उत्पादन शुरू कर दिया है। अगरतला से 60 किलोमीटर दूर पटलाना में इसकी दो यूनिटों से 726 मेगावाट बिजली का उत्पादन शुरू हो गया है। यह गैस आधारित बिजली की बड़ी परियोजना है जिसका उदघाटन ऱाष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने जून 2013 में किया था। इस परियोजना से पूर्वोत्तर के सात राज्यों को बिजली मिल सकेगी।

राज्य बिजली उत्पादन में आत्मनिर्भर हो चुका है। अब त्रिपुरा में बिजली उत्पादन की दूसरी संभावनाओं पर भी काम हो रहा है। इनमें सफलता मिलने पर ये राज्य अपनी जरूरत से ज्यादा बिजली दूसरे राज्यों को देने में भी सक्षम होगा।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com

(AGARTALA, CAPITAL, ROAD, AUTO RICKSHAW, CNG, POWER ) 

Thursday, January 30, 2014

चलिए खाते हैं अगरतला में चिकेन पुलाव



खाने पीने का खालिस बंगाली स्वाद है अगरतला की सड़कों पर। सबसे पहले बात चिकेन   पुलाव की। बट्टला चौराहे पर एक साथ कई दुकाने हैं जहां चिकेन पुलाव मिलता है। बासमती चावल के इस पुलाव को आप बिरयानी भी कह सकते हैं। अगर आप सिर्फ बिरयानी खाते हैं तो 30 या 50 रुपये की प्लेट। इसके साथ आपको चिकेन की ग्रेवी मिल जाएगी। इसके साथ चिकेन लेते हैं तो 50 रुपये में हाफ या 80 रुपये में फुल।

यानी चिकेन पुलाव की हाफ थाली 80 की और फुल 140 की। होटल वाले इसके साथ करीने से कट बारीक सलाद भी पेश करते हैं। चिकेन का स्वाद ऐसा की एक बार खाएं आप लंबे समय तक याद रखें कि क्या अगरतला में खाया था। रेल यात्री और शौकीन लोग यहां से चिकेन पुलाव पैक कराकर भी ले जाते हैं। श्यामाश्री रेस्टोरेंट समेत यहां तीन दुकानें हैं जिनका चिकेन पुलाव प्रसिद्ध है। 

मिठाइयों की बहार - अब पुलाव खाने के बाद मिठाई खाने का दिल करे तो सामने मिठाइयों की प्रसिद्ध दुकान सत्यनारायण मिष्टान भंडार है। 
वैसे अगरतला की हर सड़क पर आपको मिठाइयों की दुकानें मिलेंगी जहां आप खीर कदम, रसगुल्ले जैसी मिठाइयां और सुस्वादु समोसे खा सकते हैं। कोलकाता की ही तरह यहां मिठाइयां प्रति नग के हिसाब से बिकती हैं। चाहे तो आप एक मिठाई खरीद लें और पैक करा लें। एक मिठाई पैक करने के लिए कागज की डिब्बी मौजूद है।
 दिल्ली में तो ऐसा कत्तई नहीं होता। हरिगंगा बसाक रोड पर खाने के लिए कई रेस्टोरेंट हैं। चांदना होटल में मछली की थाली तो भूरी भोज में त्रिपुरा के अलग अलग स्वाद का मजा ले सकते हैं।

गुजरात भोजनालय के अशोक गांधी। 
अगरतला में गुजरात के गांधीजी   -  
अगर आप अगरतला की शहरों पर शाकाहारी थाली खाना चाहते हैं तो बहुत कम विकल्प हैं। मोटर स्टैंड के पास निरामिष भोजनालय समेत दो होटल मौजूद हैं।   शकुंतला रोड पर गुजरात भोजनालय शहर का अच्छा शाकाहारी होटल है। इस होटल को अगरतला के एकमात्र गुजराती भाई अशोक गांधी ( मोबाइल – 98620 46317 ) चलाते हैं। होटल पहली मंजिल पर स्थित है। होटल की पूरी बिल्डिंग थोड़ी सी टेढ़ी हो गई है। शायद गुजरात में आए भूकंप का असर इस पर भी पड़ गया था। 

रात का खाना खाते हुए मेरी बातचीत इसके मालिक से होती है। कई दशकों से चल रहा ये होटल एक जनवरी 2014 से नई बिल्डिंग में शिफ्ट हो रहा है। अशोक गांधी बताते हैं कि उनके तीन बेटे अच्छी खासी पढाई कर बेहतरीन नौकरियां कर रहे हैं इसलिए मेरे बाद इस होटल को शायद कोई नहीं चलाएगा। गुजरात होटल का खाना बहुत सस्ता है।   वैसे   अगरतला में स्ट्रीट फूड की भी बहार है।   यहां आप कई तरह का स्वाद ले सकते हैं। 


अगरतला की सड़कों पर पीठा भी बिकते हुए देखा। आमतौर पर ये घर में खास मौकों पर ही बनाया जाता है। पर यहां बाजार में बिक रहा था। तो यहां सड़क पर गोलगप्पा 10 रुपये में आठ मिल रहे थे। यानी दिल्ली से सस्ता है।

थक गए तो नारियल पानी पीएं। अगरतला की सड़कों पर नारियल पानी भी खूब मिलता है। वह भी सस्ता । त्रिपुरा के दूध के ब्रांड का नाम गोमती मिल्क है जो गोमती नदी और राज्य के एक जिले के नाम पर है। गोमती न सिर्फ दूध बल्कि दूध से बनने वाले तमाम दूसरे तरह के उत्पाद भी बनाती है। 
-    विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 




( TRIPURA - A Place of Satiety, AGARTALA, CHICKEN PULAO, RICE, MILK, ASHOK GANDHI, VEG FOOD  ) 

Wednesday, January 29, 2014

कमला सागर - जय काली मां कसबे वाली

अगरतला के आखिरी दिन सुबह सुबह मैं  मां काली कसबे वाली के दर्शन के लिए चल पड़ा हूं।  यह मंदिर कमला सागर में बांग्ला देश की सीमा पर स्थित है।   उज्जयंत पैलेस में मिले गाइड महोदय ने मुझे इस मंदिर के दर्शन के लिए सलाह दी थी। 


त्रिपुरा के कमला सागर में मां काली का मंदिर राज्य का अदभुत मंदिर है। पंद्रहवीं सदी का बना यह मंदिर अब बिल्कुल बांग्लादेश की सीमा पर है। मंदिर के बगल में विशाल सुंदर सरोवर है। इस सरोवर में असंख्य कमल के पुष्प खिले हैं। सरोवर के तट पर सामने ऊंचाई की ओर जाती सीढ़ियां काली माता के दरबार की ओर जा रही हैं।


आस्था और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत समन्वय  - यहां पर मुझे आस्था और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है । कमला सागर में स्थित काली मां के मंदिर को कसबे वाली काली मां भी कहते हैं। आजादी के बाद कसबा नामक छोटा सा कस्बा तो बांग्लादेश में चला गया पर काली मां का मंदिर हिंदुस्तान में ही रहा। कमला सागर मंदिर के ठीक बगल में बांग्लादेश सीमा की बाड़ लगी है। बाड़ के उस पार बांग्लादेश के नागरिक अपने खेतों में काम करते हुए दिखाई देते हैं।


तब खोल दी जाती है सीमा - साल में एक बार भाद्रपद आमवस्या पर  मंदिर में मेला लगता है। इस पूजा के खास अवसर पर बांग्लादेश के हिंदू परिवारों को भी काली मां के पूजा की अनुमति दी जाती है। यहां तैनात सीमा सुरक्षा बल के जवान इसके लिए खास तौर पर बंग्लादेशी श्रद्धालुओं को रास्ता उपलब्ध कराते हैं। मां काली की पूजा करने के बाद वे श्रद्धालु वापस लौट जाते हैं। दो देशों के बीच सरहदें जरूर बन गई हैं आस्था को दीवार नहीं जुटा कर सकी है।

काली मां का ये  मंदिर महाराजा धन माणिक्य का कार्यकाल  15वीं सदी में बनवाया गया। धन माणिक्य त्रिपुरा में माणिक्य वंश के सबसे प्रतापी राजा थे, उन्होंने कई मंदिर बनवाए। कहा जाता है ये मंदिर उनकी पत्नी कमला देवी ने बनवाया था।


उन्होंने ही मंदिर के पास विशाल पुष्करणी सरोवर भी खुदवाया जिसका नाम महारानी कमला देवी के नाम पर कमला सागर रखा गया। कमला देवी बड़ी ही परोपकारी और सहृदय महारानी थी। कहा जाता है कि उन्होंने अपने राज्य में चली आ रही नरबलि प्रथा को खत्म कराया था।


 भाद्रपद आमस्वया   पर  बड़ा मेला   -   कमला सागर का ये मंदिर बाकी काली मंदिरों से थोड़ा अलग है। मंदिर में दसभुजा धारी महिषासुर मर्दिनी की प्रतिमा है। साथ में शिव भी स्थापित हैं। हर रोज मां की प्रतिमा का सुरूचिपूर्ण ढंग से श्रंगार होता है। हर साल   भाद्रपद आमस्वया   के समय यहां बड़ा मेला लगता है।

मंदिर का परिसर बड़ा ही मनोरम है। हमारे आटो रिक्शा वाले बताते हैं कि नए साल के मौके पर यहां पिकनिक मनाने वालों की बड़ी भीड़ जुटती है। बाकी साल अगर आप पहुंचे तो यहां अद्भुत आध्यात्मिक शांति का एहसास होता है।


बांग्लादेश के दर्शन -  कमला सागर मंदिर परिसर के आसपास से बांग्लादेश के कस्बा के खेत घर दिखाई दे रहे हैं। सीमा के उस पार लोग अपना काम निपटाते हुए   दिखाई दे  रहे  हैं। पर सीमा पर तैनात बीएसएफ के जवान कंटीले तारों के उस पार की फोटोग्राफी के लिए मना करते हैं। मुझे सीमा के उस पार के बांग्लादेश के  रेलगाड़ी की सिटी भी सुनाई देती है। दरअसल उस पार का रेलवे लाइन बिल्कुल बगल  में है। कसबा बांग्लादेश के चटगांव डिविजन का एक उप जिला है।  काली मंदिर के करीब ही सीमा के उस पार बांग्लादेश रेलवे का कसबा रेलवे स्टेशन है।


कैसे पहुंचे  -   कमला सागर की दूरी अगरतला शहर से  28   किलोमीटर है। अगरतला से कमला सागर जाने के लिए नगरजल बस स्टैंड से टैक्सी या बस ली जा सकती है। उदयपुर मार्ग पर बिशालगढ़ से पहले गोकुल नगर स्टैंड पर उतर जाएं।

गोकुल नगर से आटो रिक्शा कमला सागर जाते हैं। रास्ते में मधुपुर नामक गांव आता है। इस मार्ग में त्रिपुरा से आदर्श ग्रामीण परिवेश से साक्षात्कार होता है। आप चाहें तो अगरतला से सीधे टैक्सी बुक करके कमला सागर जा सकते हैं। इससे आपका समय बचेगा।


कहां ठहरें - कमला सागर में रहने के लिए कोमिला गेस्ट हाउस बना है। वैसे आप अगरतला शहर में ही रुक कर कमला सागर आ सकते हैं। कमला सागर में आपको खाने पीने के लिए एक दो छोटी दुकानें दिखाई देती हैं।   मंदिर परिसर में प्रसाद की दुकानें और कैफेटेरिया आदि भी है। यहां आप थोड़ी से पेट पूजा कर सकते हैं, या फिर यहां पर दोपहर का भोजन भी ले सकते हैं।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com   ( KAMLA SAGAR, TEMPLE, BANGLADESH BORDER, BSF, TRIPURA, AGARTALA ) 


Tuesday, January 28, 2014

ऐसी है त्रिपुरा की आदर्श ग्राम पंचायत


कमला सागर जाने के रास्ते में त्रिपुरा राज्य के आदर्श ग्रामीण परिवेश से हमारा साक्षात्कार होता है। कमलासागर से पहले मधुपुर नामक गांव आता है। गांव का पंचायत भवन पक्के का बना हुआ है। पंचायत भवन के बगल में ही पंचायत सचिव का दफ्तर है। यहां जमीन के कामकाज से जुडे मामले देखे जाते हैं। रोज नियत समय पर पंचायत सचिव यहां आकर बैठता है।


पंचायत भवन के बगल में ही सीपीएम का पक्का दफ्तर भी बना हुआ। इस दफ्तर में सीपीएम के कार्यकर्ता अखबार पढ़ते हुए नजर आते हैं। यहां तीन बांग्ला के अखबार रोज आते हैं जो अगरतला से प्रकाशित होते हैं। 
पंचायत संकुल में ही एलोपैथिक और आयुर्वेदिक चिकित्सालय भी है। इन चिकित्सालयों में रोज समय पर डाक्टर आकर बैठते हैं। गांव के लोग बताते हैं कि राज्य के ज्यादातर ग्राम पंचायतों के भवन इसी तरह पक्के के बन चुके हैं। कुल मिलाकर पंचायत संकुल मिनी सचिवालय है। हर पंचायत में सड़क के किनारे गांव के कृषि उपज को बेचने के लिए प्लेटफार्म बना हुआ दिखाई देता है।


छतदार प्लेटफार्म बना है यानी बारिश से बचने का भी पूरा इंतजाम है। राज्य में मानिक सरकार की अगुवाई में चल रही सीपीएम की सरकार की छाप गांव गांव में दिखाई देती है। मानिक दादा ऐसे समावेशी विकास की बात करते हैं जिसका असर समाज के हर तबके पर दिखाई दे। यानी विकास की लाभ गांव के दलित पिछड़े और गरीबों तक पहुंच सके।
गांव में कृषि उत्पादों की बिक्री के लिए बना शेड। 
मुझे पंचायत भवन के पास ही गांव का सरकारी स्कूल नजर आता है। स्कूल बंद है। पर मैं देखता हूं कि स्कूल में बच्चों के लिए शौचालय बने हुए हैं, लड़कियों के लिए अलग और लड़कों के लिए अलग। स्कूल में पेयजल के लिए टंकी भी बनी है। नलों में पानी आ रहा है। मुझे अपने बचपन का बिहार के गांव का स्कूल याद आता है। वहां शौचालय नहीं थे। पीने के पानी के लिए एक हैंडपंप था जो अक्सर खराब हो जाता था।


अगरतला लौटते हुए एक साप्ताहिक हाट दिखाई देता है। इस हाट में सूअर की मंडी लगती है। लोग छोटे छोटे सूअर खरीद कर ले जाते हैं, फिर इन्हें पाल कर बड़ा करते हैं। बाद में ये उंचे दामों पर बिकते हैं। छोटे सूअरों को पैक करने के लिए चटाई बुनने वाली सामग्री की पैकिंग मिलती है। इसमें छोटे सूअर का मुंह और पूंछ बाहर रहता है बाकी हिस्सा पैक। मंडी से सूअर खरीदकर छोटे किसान गांव ले जाते हैं।
 हमें कमला सागर में एक बोर्ड दिखाई देता है रूरल टूरिज्म का। यानी राज्य सरकार की ओर सैलानियों को गांव दिखाने के इंतजाम भी किए जाते हैं। वाह अलबेला है त्रिपुरा... 

-    विद्युत प्रकाश मौर्य     - vidyutp@gmail.com 
( ADARSH GRAM PANCHYAT, MADHUPUR, KAMLA SAGAR, AGARTALA)


Monday, January 27, 2014

सचिन देव बर्मन का शहर अगरतला

अगरतला के कालेज में सचिन दादा की मूर्ति। 
ओरे मांझी ले चल पार..
जाएगा कहां मुसाफिर ,वहां कौन है तेरा..., कोरा कागज था मन मेरा....
जैसे हिंदी फिल्मों के लोकप्रिय गीत। इन गीतों को सुर देने वाले सचिन देव बर्मन। हिंदी फिल्मों में सचिन दा जैसी ऊंचाई को छूने वाला कोई दूसरा गायक नहीं हुआ। जिन गीतों को उन्होंने स्वर दिया वह उनके समकालीन गायकों के बस की बात नहीं थी। शास्त्रीय संगीत की जो गहराई सचिन दा के सुरों में दिखाई देती वह किसी में थी ही नहीं। सचिन देव बर्मन त्रिपुरा के ऐसे रत्न थे जिस पर पूरे त्रिपुरा को हमेश नाज रहता है। एक अक्तूबर 1906 को त्रिपुरा के राजघराने में सचिन दा जन्म हुआ था। उनकी जन्मस्थली कोमिला ( अगरतला से 50 किलोमीटर ) अब बांग्लादेश में चली गई है। सचिन दा के पिता का नाम नवाबदीप चंद्रदेव बर्मन था। वे पांच संतानों में सबसे छोटे थे। सचिन दा चांदी का चम्मच मुंह लेकर पैदा हुए थे। पर उन्हे राजघराने का धन वैभव और ऐश्वर्य रास नहीं आया। उन्होंने शास्त्रीय संगीत साधना के मुश्किल राह को चुना और उसमें वे सफलता की ऊंचाइयों पर पहुंचे। उस ऊंचाई पर जिस पर सदियों में भी कोई पहुंच नहीं पाता है।
Stamp on Sachin Dev Barmun
सचिन दा संगीत साधना माधव और अनवर जैसे प्रारंभिक गुरूओं के सानिध्य में की। उन्होंने शास्त्रीय संगीत की भटियाली धुन पर काफी रियाज किया।

कोमिला से 1920 में मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद कोलकाता चले गए। वहां से अंग्रेजी में एमए किया पर उनकी रूचि तो संगीत में थी। 

बचपन से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा के बाद उन्होंने कोलकाता में बतौर रेडियो आर्टिस्ट अपना कैरियर शुरू किया। सचिन दा ने उस्ताद अफताबुद्दीन खां से बांसुरी की भी तालिम ली। साल 1933 में पहली बार यहूदी की लड़की नाटक के लिए गाया।   सन   1938 में सिंगर और डांसर मीरा देव बर्मन से विवाह किया। सचिन देव बर्मन ने 89 हिंदी फिल्मों में अपना सुर दिया। दस बांग्ला फिल्मों में भी गीत गाए। इसके अलावा हिंदी, बांग्ला और असमिया में गाए उनके गैर फिल्मी गीत भी हैं।

अगरतला के लीचू बगान में सचिनदेव बर्मन कालेज आफ म्यूजिक। 

 फिल्मिस्तान के शशिधर मुखर्जी के आग्रह पर वे मुंबई पहुंचे। 1946 में बालीवुड के आठ दिन फिल्म  के लिए पहला गीत गाया जिसके शब्द गोपाल सिंह नेपाली के थे। 31 अक्तूबर 1975 में सचिन दा ने इस दुनिया को अलविदा कहा। चुपके, चुपके और मिली उनके आखिरी दौर की फिल्में थीं। उनकी पत्नी मीरा का निधन 2007 में हुआ। बालीवुड के लोकप्रिय नाम राहुल देव बर्मन (आरडी बर्मन) उनके बेटे हैं। सचिन दा की 101वीं जयंती पर भारत सरकार ने एक डाक टिकट जारी किया। 
सचिन दा के सुर पर बांग्ला और असमिया के लोकधुनों का प्रभाव दिखाई देता है। ओरे मांझी ले चल पार...उनका सर्वकालिक लोकप्रिय गीत बन चुका है जिसे कई पीढ़ी के लोग पसंद करते हैं।

Book on SD Burman 
अगरतला में हैं सचिन दा की यादें - अगरतला शहर की सड़कों पर घूमते हुए मैं सचिन दा की स्मृतियां ढूंढ रहा था। किसी ने बताया कि आप लीचू बगान चले जाएं वहां म्यूजिक कालेज है। मैं लीचू बगान पहुंचा। वहां पहाड़ी पर सचिन देव बर्मन मेमोरियल कालेज ऑफ म्यूजिक का भव्य भवन बना है। ये अंडरग्रेजुएट कालेज है। कालेज के प्रवेश द्वार पर सचिन देव बर्मन की मूर्ति लगी है। मैंने सोचा कालेज आ गया हूं तो प्रिंसिपल से भी मुलाकात कर ही लूं। मृदुभाषी और सौम्य प्रिंसिपल ममता दास से मुलाकात यादगार रही। उन्होंने कहा आप इतनी दूर से आए हैं तो चाय पीकर ही जाएं। ( 0381-2411011) कॉलेज के परिसर में संगीत की अलग अलग स्वर लहरियां गूंज रही थीं। 
इस तरह अगरतला शहर ने अपने एक महान सुर साधक जिसे पूरा देश सम्मान से याद करता है उसकी स्मृतियों को संजो कर रखा है। वैसे मुझे लगता है कि शहर के किसी चौराहे पर सचिन दा की विशाल प्रतिमा लगाई जानी चाहिए। जिससे कि अगरतला आने वालों को लगे कि वे सचिन दा के शहर में आए हैं।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य
 http://www.sdburman.com/

 ( SACHIN DEV BARMAN , TRIBE, MUSIC, COLLEGE,  SINGER, AGARTALA )

Sunday, January 26, 2014

अगरतला - रविंद्रनाथ टैगोर का पसंदीदा शहर

 साल 2013 में कविगुरू रविंद्रनाथ टैगोर की पुस्तक गीतांजलि को नोबेल पुरस्कार दिए जाने के सौ साला उत्सव मनाया जा रहा है। 1913 में इस बांग्ला कविताओं की पुस्तक के अंगरेजी अनुवाद को साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला था।
बांग्ला के प्रसिद्ध साहित्यकार रविंद्रनाथ टैगोर जिन्हे बांग्ला के लोग रबी ठाकुर कहते हैं, को अगरतला शहर काफी प्रिय था। इसलिए तो टैगोर बार बार अगरतला प्रवास पर आते थे। अगरतला के लोग बताते हैं कि टैगोर कुल सात बार अगरतला आए।


टैगोर ने अपनी कई प्रसिद्ध रचनाएं अगरतला प्रवास के दौरान ही लिखीं। इतना ही नहीं उनके कुछ नाटकों में त्रिपुरा के राजा और देवी देवता के चरित्र भी हैं। टैगोर के प्रसिद्ध नाटक राजर्षि और विसर्जन में उदयपुर के भुवनेश्वरी देवी मंदिर का जिक्र आता है। जबकि महाराजा गोविंद माणिक्य ( 1660-1676) भी टैगोर के नाटकों में चरित्र के तौर पर उभर कर आते हैं। इसलिए अगरतला के लोग टैगोर को बड़े सम्मान से याद करते हैं।
बताया जाता है कि टैगोर सात पर कोलकाता से अगरतला आए। तब सड़क मार्ग से कोलकाता से अगतला आना आसान था। बांग्लादेश के ढाका होकर अगरतला कुछ घंटों में ही पहुंजा जा सकता था। अगरतला शहर में टैगोर की कई स्मृतियां है। टैगोर ज्यादातर अगरतला प्रवास के दौरान त्रिपुरा के राजघराने के मेहमान होते थे। इसलिए वे राजघराने की ओर से दिए गए अतिथि गृह में ठहरते थे। वह अतिथि गृह अब बन चुका है राज्यपाल निवास यानी गवर्नर हाउस।


अगरतला का राज निवास - कभी यहां रहते थे टैगोर।
इस निवास की ओर जाने वाली शहर की मुख्य सड़क का नाम रखा गया है रवींद्र सरणी। रविंद्र सरणी पर चलते हुए राज्यपाल निवास के पहले एक सुंदर पार्क का निर्माण हाल के दिनों में किया गया है। इस पार्क का नाम रखा गया है रविंद्र कानन पार्क। इस तरह कई तरीके से अगरतला के लोगों ने विश्वकवि की यादों को संजो कर रखने की कोशिश की है।

वास्तव में  जितना पश्चिम बंगाल के लोग टैगोर को अपना मानते हैं उतना ही त्रिपुरा के लोग भी कवि गुरू टैगोर को अपना मानते हैं। गीतांजलि के सौ साल पूरे होने पर अगरतला शहर में कई आयोजन हुए जिसमें टैगोर को याद किया गया।
 त्रिपुरा सरकार के अगरतला स्थित सरकारी टूरिस्ट लॉज का नाम गीतांजलि  टूरिज्म गेस्ट हाउस है। ये एयरपोर्ट रोड पर कुंजबन में स्थित है।   त्रिपुरा के साहित्यिक गलियारे में बांग्ला में कविताएं लिखने वाले साहित्यकारों की अच्छी खासी संख्या है। अब अगरतला में बने विशाल सांस्कृतिक केंद्र के बाहर भी रविंद्र नाथ टैगोर की विशाल प्रतिमा स्थापित की गई है।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 

( RABINDRA NATH TAGORE, GEETANJLI,  AGARTALA )