Saturday, November 30, 2013

नागालैंड में जरूरी है इनर लाइन परमिट


अपने ही देश में जाने के लिए इजाजत की जरुरत। सुनकर थोड़ा अजीब लगता होलेकिन  पूर्वोत्तर के तीन राज्यों और लक्षद्वीप के लिए ऐसी औपचारिकता जरूरी है। आपको अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और मिजोरम में प्रवेश करने के लिए इनर लाइन परमिट ( आईएलपी) लेना जरूरी है। पूर्वोत्तर के राज्य असम, त्रिपुरा और मणिपुर जाने के लिए कोई परमिट नहीं चाहिए। मेघालय में भी प्रवेश के लिए आईएलपी जरूरी नहीं है। हालांकि इन दिनों मेघालय के संगठन वहां भी आईएलपी अनिवार्य करने की मांग को लेकर आंदोलन पर उतरे हुए हैं।

 अगर आप पूर्वोत्तर में इन तीन राज्यों में जाने की कोई योजना बना रहे हों तो आपको पहले आईएलपी हासिल कर लेना चाहिए। अगर विदेशी नागरिक हों तो उन्हें वीजा के अलावा रिस्ट्रिक्टेड एरिया का खास परमिट लेना पड़ता है। आईएलपी हासिल करने के दौरान आपको ये जानकारी देनी होती है कि आपको कितने दिन और किन किन जिलों में जाना है। संबंधित राज्यों में जाने के लिए आईएलपी दिल्ली स्थित नागालैंड, अरुणाचल या मिजोरम के रेसिडेंट कमिश्नर के दफ्तर से ये परमिट हासिल किया जा सकता है। इसके अलावा परमिट बनवाने के दफ्तर कोलकाता और गुवाहाटी में भी हैं। नागालैंड का परमिट डिमापुर स्थित दफ्तर से भी बनवाया जा सकता है। अगर आप बिना परिमट के नागालैंड, मिजोरम, अरुणाचल में घुस गए हैं तो आपको कहीं से भी वापस भेजा जा सकता है। इसलिए ऐसी गलती नहीं करें। 

मैंने नागालैंड की यात्रा से पहले दिल्ली स्थित नागालैंड हाउस जाकर परमिट हासिल कर लिया था। वहां परमिट बनवाने की प्रक्रिया बहुत सरल है। महज 15 मिनट में परमिट बनकर मिल गया। अगर आप गुवाहाटी और डिमापुर में परमिट बनवाने जाएं तो थोड़ा ज्यादा वक्त भी लग सकता है। इसलिए समय बचाने के लिए आईएलपी पहले ही बनवा लें तो अच्छा।


प्रवेश के लिए दो तरह के हैं आईएलपी - आईएलपी दो तरह के हैं एक टूरिस्ट के लिए और दूसरा बिजनेस के लिए। किसी भी तरह के बिजनेस के सिलसिले में इन राज्यों में जाने वालों को अपने उस राज्य में संपर्क व्यक्ति ( कांटेक्ट पर्सन) का नाम पता फोन नंबर आदि देना पड़ता है। अगर भारत सरकार की नौकरी में आपकी पोस्टिंग इन राज्यों में है तो परमिट की जरूरत नहीं है। डिमापुर से कोहिमा जाते समय रास्ते में पड़ने वाले चेक पोस्ट पर परमिट की चेकिंग होती है। अगर आप डिमापुर से इंफाल बस या टैक्सी से जा रहे हैं तो रास्ता हांलाकि नागालैंड होकर जाता है लेकिन इस रास्ते जाने के लिए परमिट जरूरी नहीं है। 
TOUPHEMA TOURIST VILLAGE, NAGALAND 

देश का 16वां राज्य है नागालैंड  -  नागालैंड राज्य का गठन एक दिसंबर 1963 में हुआ। यह भारत का 16वां राज्य है। यह आबादी में देश के छोटे राज्यों में शुमार है। 2011 की जनगणना में इसकी आबादी 20 लाख से भी कम रही है। आबादी के लिहाज से 25वें नंबर पर आता है नागालैंड। आजादी के समय नागालैंड असम का ही हिस्सा हुआ करता था। पर नागा आंदोलन के बाद 1957 में अलग यूनियन टेरीटरी बना। बाद में 1963 में इसे पूर्ण राज्य का दर्जा मिला। पर नागा लोगों का आंदोलन और समस्याएं अभी खत्म नहीं हुई हैं। नागा संगठनों और भारत सरकार के बीच युद्ध विराम समझौता के कारण 1997 के बाद यहां ज्यादा हिंसा की घटनाएं नहीं देखी जाती हैं।
कोहिमा में नागालैंड की विधान सभा 
तो यह मान लें कई सालों से नागालैंड में शांति का आलम है। आप राज्य के कई इलाकों में घूम सकते हैं।

नागालैंड राज्य में 17 प्रमुख जनजातियां निवास करती हैं। हर ट्राईब की अपनी अलग वेश भूषा और भाषा है। राज्य की तकरीबन पूरी आबादी ईसाई है और भाषा पर अंग्रेजी का प्रभाव है। कुल 11 जिलों में विभाजित राज्य का आबादी में सबसे बड़ा शहर डिमापुर है। राज्य की सीमा असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और अंतरराष्ट्रीय सीमा म्यांमार से लगती है। इस नाते यह एक संवेदनशील राज्य है। 

नागालैंड में पर्यटन - अगर पर्यटन की बात करें तो नागालैंड में हर साल सैलानी कम जाते हैं। पर वहां टूरिज्म की अपार संभावनाएं हैं। कोहिमा शहर में आप सालों भर जा सकते हैं। दिसंबर में होने वाले हार्नबिल फेस्टिवल में काफी लोग पहुंचते हैं। पर नागालैंड में इको टूरिज्म की संभावनाएं हर जिले में हो सकती हैं। प्रकृति ने नागालैंड को ऐसा मौसम प्रदान किया है कि यहां आप सालों भर घूमने के लिए आ सकते हैं। ट्रैकिंग, जंगल कैंप, रॉक क्लाइंबिंग आदि के लिए यह आदर्श राज्य है। डिमापुर, कोहिमा के अलावा आप यहां मोकोचुंग जा सकते हैं। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य

Friday, November 29, 2013

डिमापुर से कोहिमा की ओर... बस से

डिमापुर - रेलवे स्टेशन के पास स्थित बस स्टैंड 
सुबह सुबह डिमापुर रेलवे स्टेशन के बाहर मैं कोहिमा जाने के लिए विकल्प की तलाश में हूं। टैक्सी या फिर बस। बस सस्ती है टैक्सी से। फिर बस से ही जाना तय करता हूं।
नागालैंड की राजधानी कोहिमा पहुंचने के लिए डिमापुर निकटतम रेलवे स्टेशन है। यहां से नगालैंड की राजधानी कोहिमा की दूरी 74 किलोमीटर है। कोहिमा के लिए आपको रेलवे स्टेशन परिसर से पीली टैक्सियां मिलती हैं। इन शेयरिंग टैक्सियों में एक व्यक्ति का किराया 220 रुपये है। अगर टैक्सी के बजाय बस से जाना चाहते हैं तो रेलवे स्टेशन के सामने ही नगालैंड स्टेट ट्रांसपोर्ट ( एनएसटी) का बस स्टैंड है। यहां से कोहिमा का बस किराया 120 रुपये है। मैंने बस से ही सफर करने का फैसला लिया। एनएसटी की कार्य पद्धति काफी अनुशासित है।

बस काउंटर से कंप्यूटरीकृत टिकट मिलने के साथ ही उस पर आपका सीट नंबर और बस का नंबर अंकित होता है। मैं यहां देख पा रहा हूं कि स्टेशन परिसर में सुबह लगे नोटिस बोर्ड में दिन भर खुलने वाली बसों के नंबरखुलने का समयगंतव्य के साथ ड्राइवर और कंडक्टर के नाम भी प्रकाशित किए जाते हैं। ये शासकीय पारदर्शिता का सुंदर नमूना है। संयोग से मुझे बस में खिड़की वाली सीट मिल गई है।

पीफेमा में चाय नास्ते के लिए ठहराव। 
बस अपने नियत समय पर खुली। डिमापुर कोहिमा का सफर तीन घंटे का है। डिमापुर शहर पार करते ही नेशनल हाईवे नंबर 29 पर पहाड़ी रास्ते शुरू हो जाते हैं। धीरे-धीरे ठंड बढ़ने लगती है। पहाड़ घाटियां और हरियाली ये बताते हैं कि क्यों नागालैंड को पूर्वोत्तर का स्वीटजरलैंड कहा जाता है। रास्ते में मेडिजफेमा में राष्ट्रीय मिथुन अनुसंधान केंद्र आता है।

हमारी बस पीफेमा में देर तक रूकती है चाय नास्ते के लिए। पीफेमा छोटा सा बाजार है जो डिमापुर कोहिमा के मध्य में स्थित है। हमारे बस के ड्राइवर बड़े अनुशासन से बस को धीरे धीरे चला रहे हैं। ये अच्छी बात वरना पहाड़ के घुमावदार रास्तों में चकरघिन्नी से लोगों को उल्टियां आने लगती हैं।

सुबह के दस बजे हैं, पहाड़ों पर चटकीली धूप खिली है। एक प्रवेश द्वार आता है जिस पर लिखा है वेलकम टू कोहिमा। शिमला, दार्जिलिंग की तरह एक और पहाड़ी शहर कोहिमा में हम पहुंच चुके थे। एनएसटी स्टैंड के पास ही एक होटल का बोर्ड नजर आता है -बोनांजा लॉज। कमरे का किराया कम है, मैं इसी में एक कमरा बुक करा लेता हूं।
वैसे कोहिमा में रुकने के लिए और कई होटल उपलब्ध हैं। अगर आपको डिमापुर में ही रात को रुकना पड़ जाए तो वहां भी कई होटल उपलब्ध हैं। इनमें से एक है जल महल होटल। जहां हर तरह के कमरे और शाकाहारी रेस्टेरोंट भी उपलब्ध है। http://hoteljalmahal.com/
- vidyutp@gmail.com

Thursday, November 28, 2013

डिमापुर – नागालैंड का प्रवेश द्वार

पूर्वोत्तर के अनूठे राज्य नागालैंड के लिए हमारा सफर शुरू हो रहा था । नागालैंड देश का वह राज्य है जिसके बारे में कई तरह की बातें कही जाती हैं। कई तरह की आशंकाएं अभी भी लोगों ने पाल रखी हैं। गुवाहाटी रेलवे स्टेशन से रात 11.35 बजे नागालैंड एक्सप्रेस खुलती है। इसके स्लिपर कोच में मेरा आरक्षण था। रात को गुवाहाटी के पलटन बाजार में डिनर के बाद नियत समय पर मैंने अपने कोच में जगह ले ली। हमारे सामने वाले बर्थ पर दो नागा महिलाएं जा रही हैं। उनकी कोहिमा में दुकान है खिलौनों की। वे गुवाहाटी से दुकान में बिक्री का सामान लेकर जा रही हैं। उनको देखकर मुझे पूर्वोत्तर में नारी सशक्तिकरण की झलक साफ दिखाई दे रही है। इस  ट्रेन के कोच साफ सुथरे नहीं है। खासकर टायलेट्स काफी गंदे हैं। पर एक रात का सफर है। अपने बर्थ पर मैं सो जाता हूं। पर आखों ने नींद कहां। एक नए राज्य में प्रवेश को लेकर उत्सुकता जो है। रास्ते में लंका, लमडिंग जंक्शन, दीफू जैसे रेलवे स्टेशन आते हैं। ये ट्रेन ठीक सुबह पांच बजे नागालैंड के एकमात्र रेलवे स्टेशन डिमापुर ( स्टेशन कोड DMV) पहुंच जाती है। वैसे दिन में डिमापुर जाने के लिए कई ट्रेनें हैं जो 4 से 5 घंटे में डिमापुर पहुंचा देती हैं। 

डिमापुर के बाद आगे तिनसुकिया ढिब्रूगढ़ की तरफ जाने वाली ट्रेनें एक बार फिर से असम में प्रवेश कर जाती हैं। सिर्फ डिमापुर रेलवे स्टेशन ही नागालैंड में पड़ता है। अब डिमापुर से राजधानी कोहिमा को रेल से जोड़ने की परियोजना पर विचार चल रहा है। फिलहाल कोहिमा जाना हो तो स्टेशन के बाहर से शेयरिंग टैक्सी या पास में ही स्थित बस स्टैंड से बस मिल जाती है।
डिमापुर स्टेशन के बाहर कोहिमा जाने के लिए पीली टैक्सियां। 


लमडिंग-डिमापुर-ढिब्रूगढ़ रेलवे लाइन कभी मीटर गेज हुआ करता था। यह 1997 में ब्राडगेज में बदला गया। उसके बाद यहां दिल्ली गुवाहाटी और शेष भारत से सीधी रेलगाड़ियां आ जाती हैं। डिमापुर नगालैंड का एकमात्र रेलवे स्टेशन है। इस रेलवे स्टेशन पर तीन प्लेटफार्म हैं। स्टेशन पर रेलवे बुक स्टाल, कैंटीन आदि सुविधाएं उपलब्ध हैं। स्टेशन का बिल्डिंग अब बाहर से भव्य बन गया है।     

नागालैंड में - डिमापुर रेलवे स्टेशन पर। 
सुबह की चाय डिमापुर में - शेष भारत की तुलना में डिमापुर में उजाला थोड़ा पहले हो जाता है। सुबह के पांच बजे उजाला हो चुका है। रेलवे स्टेशन प्लेटफार्म नंबर एक पर कैंटीन की चाय पांच रुपये की है। चाय वाले के पास दूध और पानी अलग अलग केतली में गर्म हैं। चाय मांगने पर वह कप में एक चम्मच चीनी डालता है फिर थोड़ा दूध। छन्नी में ताजी डस्ट चाय पत्ती डालता है। इसके ऊपर और गर्म पानी उड़ेलता और हो जाती है चाय तैयार। तो सुबह सुबह नगालैंड की पहली चाय पीकर स्टेशन से बाहर निकल पड़ता हूं। नागालैंड में प्रवेश के लिए मेरे पास इनर लाइन परमिट दिल्ली से ही बना हुआ है इसलिए कोई चिंता की बात नहीं है। 

वैसे डिमापुर रेलवे स्टेशन पर दक्षिण भारतीय कैंटीन भी है। वहीं स्टेशन के बाहर परिसर में ही एक पंजाबी ढाबा भी है। स्टेशन परिसर में ही दो मंदिर भी हैं। हालांकि नगालैंड में डिमापुर के बाहर कहीं भी कोई मंदिर दिखाई नहीं देता। डिमापुर नागालैंड का एक जिला है। यह राज्य का एकमात्र औद्योगिक और व्यापारिक शहर हैं। यहां बड़ी संख्या में मारवाड़ी व्यापारी हैं जो देश भर से व्यापार करते हैं। हालांकि सुनने में आता है कि उन्हें भी उग्रवादी संगठनों को अंडरग्राउंड टैक्स देना ही पड़ता है।

डिमापुर रेलवे स्टेशन परिसर में मंदिर
डिमापुर से खासतौर सागवान की लकड़ी और उससे बने फर्नीचर की तिजारत होती है। छुटपन में डिमापुर का नाम मैं अपने परिवार में आने वाले एक भैया जय प्रकाश जायसवाल से सुनता था, जो यहां रहकर टिंबर ट्रेडिंग करते थे। अब मैं उस नागालैंड की धरती पर पहुंच गया हूं। हालांकि बाहरी लोग नागालैंड में घर नहीं बना सकते है। इसलिए यहां व्यापारी लीज पर जमीन लेकर अपने लिए आवास बनाते हैं। अब डिमापुर में कई उद्योग भी लग गए हैं। कुछ कपड़ों के तो कुछ अन्य उत्पादों के भी।
अगर आप यहां रूकना चाहें तो डिमापुर में रहने के लिए होटल भी हैं। यहां पर आप नागालैंड में जाने के लिए इनर लाइन परमिट भी बनवा सकते हैं।

वैसे कभी डिमापुर कछारी राजवंश की राजधानी हुआ करता था। अंग्रेजों के जमाने से ये भारत का बहुत बड़ा रेलवे स्टेशन हुआ करता है। ब्रिटिश काल में यह बड़ा व्यापारिक केंद्र भी बन गया था। डिमापुर से म्यांमार और चीन के साथ बड़े पैमाने पर व्यापार हुआ करता था। आज भी वह सिलसिला जारी है। 


-    -- विद्युत प्रकाश मौर्य 

Wednesday, November 27, 2013

लामडिंग जंक्शन से त्रिपुरा, मणिपुर और मिजोरम

गुवाहाटी के बाद लामडिंग पूर्वोत्तर का दूसरा बड़ा महत्वपूर्ण रेलवे स्टेशन है। वैसे तो गुवाहाटी से डिमापुर जाते समय लमडिंग रात में गुजर गया पर वापसी में यहां दिन में कुछ घंटे गुजराने का मौका मिला। 

ये स्टेशन नौगांव जिले में आता था।  अब होजाई जिले में आता है। लमडिंग पूर्वोत्तर सीमा रेलवे (एनएफआर) का डिविजन भी है। लामडिंग पूर्वोत्तर राज्यों में सबसे बड़ा जंक्शन स्टेशन है। असम बंगाल रेलवे द्वारा लमडिंग स्टेशन का निर्माण 1900 में कराया गया। 

इससे पहले लंका नामक स्टेशन भी आता है जो नौगांव जिले में है। लामडिंग महत्वपूर्ण इसलिए है कि लमडिंग जंक्शन से अगरतला और सिलचर के लिए रेलवे लाइन जाती है। लामडिंग से अगरतला की दूरी 404 किलोमीटर है।जो अब ब्राडगेज  लाइन से जुडा है

आप चाहें तो लामडिंग से सिलचर भी जा सकते हैं। सिलचर से पूर्वोत्तर के दो राज्य मणिपुर और मिजोरम जाने का मार्ग है। लमडिंग जंक्शन ब्राडगेज पर है। ये लाइन ढिब्रूगढ़ से तिनसुकिया होते हुए लीडो तक जाती है। फिलहाल तीनसुकिया जिले का लीडो पूर्वोत्तर का आखिरी रेलवे स्टेशन है।



खाने की सस्ती थाली -  मुझे लामडिंग रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर एक दो पर तीन भोजनालय दिखाई देते हैं इनमें दो शाकाहारी और एक मांसाहारी है। यहां 40 रुपये की चावल दाल सब्जी की थाली उपलब्ध है, साथ में पापड़ भी। चावल आप जितनी मर्जी दुबारा भी ले सकते हैं। 

मुझे नहीं लगता, देश के किसी और रेलवे स्टेशन पर अब इतने वाजिब दाम पर खाना मिल जाता है। यहां मांसाहारी थाली भी वाजिब कीमत पर उपलब्ध है। यहां 60 रुपये में मछली की थाली मिल रही थी।

अब लामडिंग में अच्छा खासा बाजार विकसित हो चुका है। यहां पर एक डिग्री कालेज और कुछ स्कूल भी हैं। रेेलवे की बड़ी कालोनी है। ब्रिटिश काल में लमडिंग को दूसरे विश्वयुद्ध में रडार स्टेशन के तौर पर भी इस्तेमाल किया गया। लामडिंग नौगांव लोकसभा क्षेत्र में आता है। अगरतला से लौटते वक्त मेरे पास थोड़ा समय होता है तो मैं लामडिंग स्टेशन के बाहर टहलने निकल जाता हूं। यहां पर देखता हूं कि महिलाएं चिकेन के दुकान में मुर्गा काटकर बेचती हुई नजर आती हैं। तो ये पूर्वोत्तर में महिला सशक्तिकरण का उदाहरण है।


सूटकी मछली की चटनी -  मछली की बात करें तो पूरे पूर्वोत्तर में मछली खूब खाई जाती है, पर इतनी मछली का उत्पादन नहीं होता है। इसलिए  यहां मछली आती है आंध्र प्रदेश से। होटलों में  रोहू, कतला समेत कई तरह की मछलियों के विकल्प खाने के समय मौजूद होते हैं। आप अपनी पसंद के हिसाब से आर्डर कर सकते हैं। पूर्वोत्तर में लोगों को सूखी मछली खाने का भी शौक है।

लोग यहां सूखी मछली का अचार बनाते हैं। वहीं सूखी मछली के साथ हरी सब्जियों का समन्यवय बनाकर घरों में सब्जियां बनती हैं। आपको पूर्वोत्तर के हर मछली बाजार में सूखी मछलियां खूब बिकती हुई मिल जाएंगी।

गुवाहाटी से लामडिंग के बीच एक रेलवे स्टेशन आता है जागी रोड। जागी रोड सूखी मछली का बड़ा उत्पादन केंद्र और बाजार है। इसे असमिया में सुटकी कहते हैं। सूखी मछली की चटनी असम और बंगाल के लोगों को खूब पसंद है।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य  ( LUMDING JUNCTION,  NFR DIVISION, RAIL, ASSAM )
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