Saturday, November 30, 2013

नागालैंड में जरूरी है इनर लाइन परमिट


अपने ही देश में जाने के लिए इजाजत की जरुरत। सुनकर थोड़ा अजीब लगता होलेकिन  पूर्वोत्तर के तीन राज्यों और लक्षद्वीप के लिए ऐसी औपचारिकता जरूरी है। आपको अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और मिजोरम में प्रवेश करने के लिए इनर लाइन परमिट ( आईएलपी) लेना जरूरी है। पूर्वोत्तर के राज्य असम, त्रिपुरा और मणिपुर जाने के लिए कोई परमिट नहीं चाहिए। मेघालय में भी प्रवेश के लिए आईएलपी जरूरी नहीं है। हालांकि इन दिनों मेघालय के संगठन वहां भी आईएलपी अनिवार्य करने की मांग को लेकर आंदोलन पर उतरे हुए हैं।

 अगर आप पूर्वोत्तर में इन तीन राज्यों में जाने की कोई योजना बना रहे हों तो आपको पहले आईएलपी हासिल कर लेना चाहिए। अगर विदेशी नागरिक हों तो उन्हें वीजा के अलावा रिस्ट्रिक्टेड एरिया का खास परमिट लेना पड़ता है। आईएलपी हासिल करने के दौरान आपको ये जानकारी देनी होती है कि आपको कितने दिन और किन किन जिलों में जाना है। संबंधित राज्यों में जाने के लिए आईएलपी दिल्ली स्थित नागालैंड, अरुणाचल या मिजोरम के रेसिडेंट कमिश्नर के दफ्तर से ये परमिट हासिल किया जा सकता है। इसके अलावा परमिट बनवाने के दफ्तर कोलकाता और गुवाहाटी में भी हैं। नागालैंड का परमिट डिमापुर स्थित दफ्तर से भी बनवाया जा सकता है। अगर आप बिना परिमट के नागालैंड, मिजोरम, अरुणाचल में घुस गए हैं तो आपको कहीं से भी वापस भेजा जा सकता है। इसलिए ऐसी गलती नहीं करें। 

मैंने नागालैंड की यात्रा से पहले दिल्ली स्थित नागालैंड हाउस जाकर परमिट हासिल कर लिया था। वहां परमिट बनवाने की प्रक्रिया बहुत सरल है। महज 15 मिनट में परमिट बनकर मिल गया। अगर आप गुवाहाटी और डिमापुर में परमिट बनवाने जाएं तो थोड़ा ज्यादा वक्त भी लग सकता है। इसलिए समय बचाने के लिए आईएलपी पहले ही बनवा लें तो अच्छा।


प्रवेश के लिए दो तरह के हैं आईएलपी - आईएलपी दो तरह के हैं एक टूरिस्ट के लिए और दूसरा बिजनेस के लिए। किसी भी तरह के बिजनेस के सिलसिले में इन राज्यों में जाने वालों को अपने उस राज्य में संपर्क व्यक्ति ( कांटेक्ट पर्सन) का नाम पता फोन नंबर आदि देना पड़ता है। अगर भारत सरकार की नौकरी में आपकी पोस्टिंग इन राज्यों में है तो परमिट की जरूरत नहीं है। डिमापुर से कोहिमा जाते समय रास्ते में पड़ने वाले चेक पोस्ट पर परमिट की चेकिंग होती है। अगर आप डिमापुर से इंफाल बस या टैक्सी से जा रहे हैं तो रास्ता हांलाकि नागालैंड होकर जाता है लेकिन इस रास्ते जाने के लिए परमिट जरूरी नहीं है। 
TOUPHEMA TOURIST VILLAGE, NAGALAND 

देश का 16वां राज्य है नागालैंड  -  नागालैंड राज्य का गठन एक दिसंबर 1963 में हुआ। यह भारत का 16वां राज्य है। यह आबादी में देश के छोटे राज्यों में शुमार है। 2011 की जनगणना में इसकी आबादी 20 लाख से भी कम रही है। आबादी के लिहाज से 25वें नंबर पर आता है नागालैंड। आजादी के समय नागालैंड असम का ही हिस्सा हुआ करता था। पर नागा आंदोलन के बाद 1957 में अलग यूनियन टेरीटरी बना। बाद में 1963 में इसे पूर्ण राज्य का दर्जा मिला। पर नागा लोगों का आंदोलन और समस्याएं अभी खत्म नहीं हुई हैं। नागा संगठनों और भारत सरकार के बीच युद्ध विराम समझौता के कारण 1997 के बाद यहां ज्यादा हिंसा की घटनाएं नहीं देखी जाती हैं।
कोहिमा में नागालैंड की विधान सभा 
तो यह मान लें कई सालों से नागालैंड में शांति का आलम है। आप राज्य के कई इलाकों में घूम सकते हैं।

नागालैंड राज्य में 17 प्रमुख जनजातियां निवास करती हैं। हर ट्राईब की अपनी अलग वेश भूषा और भाषा है। राज्य की तकरीबन पूरी आबादी ईसाई है और भाषा पर अंग्रेजी का प्रभाव है। कुल 11 जिलों में विभाजित राज्य का आबादी में सबसे बड़ा शहर डिमापुर है। राज्य की सीमा असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और अंतरराष्ट्रीय सीमा म्यांमार से लगती है। इस नाते यह एक संवेदनशील राज्य है। 

नागालैंड में पर्यटन - अगर पर्यटन की बात करें तो नागालैंड में हर साल सैलानी कम जाते हैं। पर वहां टूरिज्म की अपार संभावनाएं हैं। कोहिमा शहर में आप सालों भर जा सकते हैं। दिसंबर में होने वाले हार्नबिल फेस्टिवल में काफी लोग पहुंचते हैं। पर नागालैंड में इको टूरिज्म की संभावनाएं हर जिले में हो सकती हैं। प्रकृति ने नागालैंड को ऐसा मौसम प्रदान किया है कि यहां आप सालों भर घूमने के लिए आ सकते हैं। ट्रैकिंग, जंगल कैंप, रॉक क्लाइंबिंग आदि के लिए यह आदर्श राज्य है। डिमापुर, कोहिमा के अलावा आप यहां मोकोचुंग जा सकते हैं। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य

Friday, November 29, 2013

डिमापुर से कोहिमा की ओर... बस से

डिमापुर - रेलवे स्टेशन के पास स्थित बस स्टैंड 
सुबह सुबह डिमापुर रेलवे स्टेशन के बाहर मैं कोहिमा जाने के लिए विकल्प की तलाश में हूं। टैक्सी या फिर बस। बस सस्ती है टैक्सी की तुलना में। फिर बस से ही जाना तय करता हूं।
नागालैंड की राजधानी कोहिमा पहुंचने के लिए डिमापुर निकटतम रेलवे स्टेशन है। यहां से नगालैंड की राजधानी कोहिमा की दूरी 74 किलोमीटर है। कोहिमा के लिए आपको रेलवे स्टेशन परिसर से पीली टैक्सियां मिलती हैं। इन शेयरिंग टैक्सियों में एक व्यक्ति का किराया 220 रुपये है। अगर टैक्सी के बजाय बस से जाना चाहते हैं तो रेलवे स्टेशन के सामने ही नगालैंड स्टेट ट्रांसपोर्ट ( एनएसटी) का बस स्टैंड है। यहां से कोहिमा का बस किराया 120 रुपये है। मैंने बस से ही सफर करने का फैसला लिया। एनएसटी की कार्य पद्धति काफी अनुशासित है।

बस काउंटर से कंप्यूटरीकृत टिकट मिलने के साथ ही उस पर आपका सीट नंबर और बस का नंबर अंकित होता है। मैं यहां देख पा रहा हूं कि स्टेशन परिसर में सुबह लगे नोटिस बोर्ड में दिन भर खुलने वाली बसों के नंबरखुलने का समयगंतव्य के साथ ड्राइवर और कंडक्टर के नाम भी प्रकाशित किए जाते हैं। ये शासकीय पारदर्शिता का सुंदर नमूना है। संयोग से मुझे बस में खिड़की वाली सीट मिल गई है। हालांकि बाद में कोहिमा में हमारे साथी अमित ने बताया कि टैक्सी से आना ज्यादा सुविधाजनक है।

पीफेमा में चाय नास्ते के लिए ठहराव। 
बस अपने नियत समय पर खुली। डिमापुर कोहिमा का सफर तीन घंटे का है। डिमापुर शहर पार करते ही नेशनल हाईवे नंबर 29 पर पहाड़ी रास्ते शुरू हो जाते हैं। धीरे-धीरे ठंड बढ़ने लगती है। पहाड़ घाटियां और हरियाली ये बताते हैं कि क्यों नागालैंड को पूर्वोत्तर का स्वीटजरलैंड कहा जाता है। रास्ते में मेडिजफेमा में राष्ट्रीय मिथुन अनुसंधान केंद्र आता है।

हमारी बस पीफेमा में देर तक रूकती है चाय नास्ते के लिए। पीफेमा छोटा सा बाजार है जो डिमापुर कोहिमा के मध्य में स्थित है। हमारे बस के ड्राइवर बड़े अनुशासन से बस को धीरे धीरे चला रहे हैं। ये अच्छी बात वरना पहाड़ के घुमावदार रास्तों में चकरघिन्नी से लोगों को उल्टियां आने लगती हैं।

सुबह के दस बजे हैं, पहाड़ों पर चटकीली धूप खिली है। एक प्रवेश द्वार आता है जिस पर लिखा है वेलकम टू कोहिमा। शिमला, दार्जिलिंग की तरह एक और पहाड़ी शहर कोहिमा में हम पहुंच चुके थे। एनएसटी स्टैंड के पास ही एक होटल का बोर्ड नजर आता है -बोनांजा लॉज। कमरे का किराया कम है, मैं इसी में एक कमरा बुक करा लेता हूं।
वैसे कोहिमा में रुकने के लिए और कई होटल उपलब्ध हैं। अगर आपको डिमापुर में ही रात को रुकना पड़ जाए तो वहां भी कई होटल उपलब्ध हैं। इनमें से एक है जल महल होटल। जहां हर तरह के कमरे और शाकाहारी रेस्टेरोंट भी उपलब्ध है। http://hoteljalmahal.com/
- vidyutp@gmail.com

Thursday, November 28, 2013

डिमापुर – नागालैंड का प्रवेश द्वार

पूर्वोत्तर के अनूठे राज्य नागालैंड के लिए हमारा सफर शुरू हो रहा था । नागालैंड देश का वह राज्य है जिसके बारे में कई तरह की बातें कही जाती हैं। कई तरह की आशंकाएं अभी भी लोगों ने पाल रखी हैं। गुवाहाटी रेलवे स्टेशन से रात 11.35 बजे नागालैंड एक्सप्रेस खुलती है। इसके स्लिपर कोच में मेरा आरक्षण था। रात को गुवाहाटी के पलटन बाजार में डिनर के बाद नियत समय पर मैंने अपने कोच में जगह ले ली। हमारे सामने वाले बर्थ पर दो नागा महिलाएं जा रही हैं। उनकी कोहिमा में दुकान है खिलौनों की। वे गुवाहाटी से दुकान में बिक्री का सामान लेकर जा रही हैं। उनको देखकर मुझे पूर्वोत्तर में नारी सशक्तिकरण की झलक साफ दिखाई दे रही है।
नागालैंड एक्सप्रेस के कोच साफ सुथरे नहीं है। खासकर टायलेट काफी गंदे हैं। पर एक रात का सफर है। अपने बर्थ पर मैं सो जाता हूं। पर आखों ने नींद कहां। एक नए राज्य में प्रवेश को लेकर उत्सुकता जो है। रास्ते में लंका, लमडिंग जंक्शन, दीफू जैसे रेलवे स्टेशन आते हैं। ये ट्रेन ठीक सुबह पांच बजे नागालैंड के एकमात्र रेलवे स्टेशन डिमापुर ( स्टेशन कोड DMV) पहुंच जाती है। वैसे दिन में डिमापुर जाने के लिए कई ट्रेनें हैं जो 4 से 5 घंटे में डिमापुर पहुंचा देती हैं। 

डिमापुर के बाद आगे तिनसुकिया ढिब्रूगढ़ की तरफ जाने वाली ट्रेनें एक बार फिर से असम में प्रवेश कर जाती हैं। सिर्फ डिमापुर रेलवे स्टेशन ही नागालैंड में पड़ता है। अब डिमापुर से राजधानी कोहिमा को रेल से जोड़ने की परियोजना पर विचार चल रहा है। फिलहाल कोहिमा जाना हो तो स्टेशन के बाहर से शेयरिंग टैक्सी या पास में ही स्थित बस स्टैंड से बस मिल जाती है।
डिमापुर स्टेशन के बाहर कोहिमा जाने के लिए पीली टैक्सियां। 

लमडिंग-डिमापुर-ढिब्रूगढ़ रेलवे लाइन कभी मीटर गेज हुआ करता था। यह 1997 में ब्राडगेज में बदला गया। उसके बाद यहां दिल्ली गुवाहाटी और शेष भारत से सीधी रेलगाड़ियां आ जाती हैं। डिमापुर नगालैंड का एकमात्र रेलवे स्टेशन है। इस रेलवे स्टेशन पर तीन प्लेटफार्म हैं। स्टेशन पर रेलवे बुक स्टाल, कैंटीन आदि सुविधाएं उपलब्ध हैं। स्टेशन का बिल्डिंग अब बाहर से भव्य बन गया है।     

नागालैंड में - डिमापुर रेलवे स्टेशन पर। 
सुबह की चाय डिमापुर में - शेष भारत की तुलना में डिमापुर में उजाला थोड़ा पहले हो जाता है। सुबह के पांच बजे उजाला हो चुका है। रेलवे स्टेशन प्लेटफार्म नंबर एक पर कैंटीन की चाय पांच रुपये की है। चाय वाले के पास दूध और पानी अलग अलग केतली में गर्म हैं। चाय मांगने पर वह कप में एक चम्मच चीनी डालता है फिर थोड़ा दूध। छन्नी में ताजी डस्ट चाय पत्ती डालता है। इसके ऊपर और गर्म पानी उड़ेलता और हो जाती है चाय तैयार। तो सुबह सुबह नगालैंड की पहली चाय पीकर स्टेशन से बाहर निकल पड़ता हूं। नागालैंड में प्रवेश के लिए मेरे पास इनर लाइन परमिट दिल्ली से ही बना हुआ है इसलिए कोई चिंता की बात नहीं है। 

वैसे डिमापुर रेलवे स्टेशन पर दक्षिण भारतीय कैंटीन भी है। वहीं स्टेशन के बाहर परिसर में ही एक पंजाबी ढाबा भी है। स्टेशन परिसर में ही दो मंदिर भी हैं। हालांकि नगालैंड में डिमापुर के बाहर कहीं भी कोई मंदिर दिखाई नहीं देता। डिमापुर नागालैंड का एक जिला है। यह राज्य का एकमात्र औद्योगिक और व्यापारिक शहर हैं। यहां बड़ी संख्या में मारवाड़ी व्यापारी हैं जो देश भर से व्यापार करते हैं। हालांकि सुनने में आता है कि उन्हें भी उग्रवादी संगठनों को अंडरग्राउंड टैक्स देना ही पड़ता है।

डिमापुर रेलवे स्टेशन परिसर में मंदिर
लकड़ी के सामानों के लिए प्रसिद्ध - 
डिमापुर से खासतौर सागवान की लकड़ी और उससे बने फर्नीचर की तिजारत होती है। छुटपन में डिमापुर का नाम मैं अपने परिवार में आने वाले एक भैया जय प्रकाश जायसवाल से सुनता था, जो यहां रहकर टिंबर ट्रेडिंग करते थे। अब मैं उस नागालैंड की धरती पर पहुंच गया हूं। हालांकि बाहरी लोग नागालैंड में घर नहीं बना सकते है। इसलिए यहां व्यापारी लीज पर जमीन लेकर अपने लिए आवास बनाते हैं। अब डिमापुर में कई उद्योग भी लग गए हैं। कुछ कपड़ों के तो कुछ अन्य उत्पादों के भी।
अगर आप यहां रूकना चाहें तो डिमापुर में रहने के लिए होटल भी हैं। यहां पर आप नागालैंड में जाने के लिए इनर लाइन परमिट भी बनवा सकते हैं।

वैसे कभी डिमापुर कछारी राजवंश की राजधानी हुआ करता था। अंग्रेजों के जमाने से ये भारत का बहुत बड़ा रेलवे स्टेशन हुआ करता है। ब्रिटिश काल में यह बड़ा व्यापारिक केंद्र भी बन गया था। डिमापुर से म्यांमार और चीन के साथ बड़े पैमाने पर व्यापार हुआ करता था। आज भी वह सिलसिला जारी है। 


-    -- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 

Tuesday, November 26, 2013

पूर्वोत्तर में मंहगे बिकते हैं हिंदी के अखबार

गुवाहाटी ऐसा शहर है जहां से हिंदी के अखबार प्रकाशित होते हैं। सेंटिनेल असम का पुराना और प्रतिष्ठित समाचार पत्र है। इसका हिंदी संस्करण सेंटिनेल नाम से ही प्रकाशित होता है। तो पूर्वांचल प्रहरी दूसरा प्रमुख हिंदी अखबार है। इसके मालिक जीएल अग्रवाला हैं। आजकल गुवाहाटी शहर में प्रातः खबर और पूर्वोदय टाइम्स जैसे दो नए हिंदी के अखबार शुरू हो चुके हैं। जिन्होंने दोनों पुराने अखबारों को चुनौती दी है।

सबसे महंगे हिंदी अखबार गुवाहाटी में 

गुवाहाटी से प्रकाशित होने वाले सभी हिंदी के अखबार काफी महंगे हैं। एक कापी की कीमत 7 रुपये हो चुकी है। मैं समझता हूं कि अभी किसी भी शहर में हिंदी के अखबार इतने महंगे नहीं हुए हैं। दिल्ली में अभी 3 से साढ़े तीन रुपये के अखबार मिल जाते हैं। पूर्वोत्तर में अखबारों के पाठक या तो मारवाड़ी, व्यापारी परिवार हैं या फिर यूपी बिहार से गए मजदूर और दुकानदार वर्ग के लोग। इतना महंगा अखबार उनके साथ ज्यादती लगती है। लमडिंग शहर की सड़कों पर सभी हिंदी के अखबार बिकते हुए मिले। पर नागालैंड में कोई हिंदी का अखबार नहीं पहुंचता। पर मुझे इंफाल में कोलकाता का सन्मार्ग दिखाई दिया। पता चला ये हवाई डाक से यहां पहुंचता है। इसी तरह त्रिपुरा की राजधानी अगरतला में कोलकाता का विश्वमित्र पहुंचता हैं।


पूरे नार्थ ईस्ट में कोलकाता से प्रकाशित द हिंदू की मांग है। पर छह रुपये का द हिंदू कोहिमा में पहुंचकर 11 रुपये का हो जाता है। ऊपर से हॉकर घर पहुंचाने के लिए 4 रुपये और मांगते हैं। यानी एक अखबार 15 रुपये में। बहुत ज्यादती लगती है। लेकिन पढ़ने वाले इतने रुपये देकर भी अखबार खरीदते ही हैं।
हिंदी के कई पत्रकारों ने गुवाहाटी में अच्छा समय गुजारकर अपनी पत्रकारिता में अनुभव और ज्ञान को नई ऊंचाइयां प्रदान की हैं। टीवी के वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार लंबे समय तक गुवाहाटी सेंटिनेल में रहे। मुकेश भूषण ने भी गुवाहाटी में अच्छा वक्त गुजारा। मेरे दो मित्र आनंद सिंह और संतोष सारंग भी गुवाहाटी के अखबारों में कुछ वक्त रहे। आईआईएमसी के साथी अपूर्व कृष्ण की भी गुवाहाटी में पोस्टिंग रही।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य ( GUWAHATI, ASSAM, NEWSPAPERS) 


असम में छह उग्रवादी संगठन सक्रिय
गुवाहाटी। असम के वन मंत्री रकीबुल हुसैन ने सोमवार को कहा कि वार्ता विरोधी उल्फा (आई) और एनडीएफबी (एस) सहित छह उग्रवादी संगठन राज्य में सक्रिय हैं और उनके कार्यकर्ताओं की संख्या 760 है। विधानसभा में असम गण परिषद के फणिभूषण चौधरी को दिए मौखिक जवाब में हुसैन ने मुख्यमंत्री और गृह विभाग के प्रभारी तरुण गोगोई की जगह जवाब दिया। उन्होंने कहा कि अन्य सक्रिय संगठन कार्बी पीपुल्स लिबरेशन टाइगर, कमातपुर लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन, मुस्लिम यूनाइटेड लिबरेशन टाइगर्स ऑफ असम और हरकत उल मुजाहिदीन (असम इकाई) हैं। उन्होंने कहा कि एनडीएफबी (एस) के कार्यकर्ताओं की संख्या सबसे अधिक 300, उल्फा (आई) की 240, केएलओ की 100 और एमयूएलटीए तथा हरकत उल की 40- 40 है। मंत्री ने कहा कि 15 भूमिगत संगठनों ने सरकार के साथ संघर्षविराम समझौता किया है और उनके कार्यकर्ता राज्य के शिविरों में रह रहे हैं। ( 16 दिसंबर  2013 को गुवाहाटी के सभी अखबारों में प्रकाशित खबर )

असम और पूर्वोत्तर की यात्रा को शुरू से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें 

Monday, November 25, 2013

ये गुवाहाटी का पलटन बाजार है....

भोजपुरी में एक प्रसिद्ध लोकगीत है - पनिया के जहाज से पलटनिया बनी अइह पिया ... ले ले अइह हो झुमका बंगाल के। लोक गायिका शारदा सिन्हा के गाए इस गाने का  पलटन बाजार से क्या संबंध हो सकता है। गुवाहाटी रेलवे स्टेशन और ब्रह्मपुत्र नदी के बीच बसे इस पलटन बाजार के नाम के साथ कोई दिलचस्प कहानी जरूर होगी। ब्रह्मपुत्र नदी में जमाने से छोटे छोटे स्टीमर चलते हैं। तो इन छोटे पानी के जहाज पर पलटनों क बहाली होती होगी। हो सकता है इसी से नदी के किनारे के इस बाजार का नाम पलटन बाजार पड़ा हो।

जीएस रोड, एमई रोड के साथ जुड़े इस पलटन बाजार से आप गुवाहाटी के दूसरे सभी हिस्सों में और नूतन राजधानी दिसपुर जा सकते हैं। बगल में ही गुवाहाटी का हाईकोर्ट और भारतीय रिजर्व बैंक भी है। पलटन बाजार में सस्ती शापिंग, सस्ता खाना और सस्ते में रहना सब कुछ संभव है। यहां की सड़कों पर घूमते हुए एमई रोड पर मुझे मिला तिरुमला ढाबा जिसमें 60 रुपये की शाकाहारी थाली है।

 
वैसे आप यहां मछली, मुर्गा कुछ भी खा सकते हैं। पलटन बाजार में खाने के लिए अच्छी जगह है। इसके अगल बगल में रहने के लिए कई मध्यमवर्गीय होटल भी हैं। अगर आप तवे वाली चपाती खाना चाहते हैं तो एमई रोड और केसी सेन रोड के क्रास पर कई ऐसे होटल हैं जहां आपको बिहार जैसा खाना मिल जाएगा। वह भी कितने में – 20 रुपये में चार चपाती सब्जी के साथ। यानी दिल्ली से सस्ता में पेट भर सकते हैं।

पलटन बाजार में कई ऐसी दुकाने हैं जिन्हें बिहार यूपी के लोग चलाते हैं। यहां पूर्वांचल महासंघ के लोगों के छठ पर्व के भव्य आयोजन के पोस्टर दिखाई दिए। मेरी बाल कटवाने की इच्छा हुई तो एमई रोड ( मणिपुर ईस्ट रोड) एक सैलून में घुस गया। सैलून वाले भाई साहब छपरा के निकले। पिछले 20 सालों से गुवाहाटी में सैलून चला रहे हैं।

अगर आप पूर्वोत्तर में कहीं भी जा रहे हों तो जरूरत की चीजें यहां से खरीद सकते हैं। हो सकता है उन प्रदेशों में आपको दैनिक जरूरत की चीजें महंगी मिलें। खास तौर पर कपड़े, कंबल, चादरें आदि यहीं से खरीद लें तो अच्छा रहेगा।

पलटन बाजार में कहां ठहरें -  यहां कुछ महंगे शानदार होटल हैं तो लॉज और मध्यम वर्गीय होटलों की लंबी सूची है। स्टेशन के सामने जीएस रोड, केसी सेन रोड और एमई रोड पर दर्जनों होटल हैं। गुवाहाटी में कहीं भी जाना हो या फिर आपको अगली ट्रेन पकड़नी हो पलटन बाजार में ठहरना मुफीद है।

- होटल इंद्र, केसी सेन रोड,पलटन बाजार, गुवाहाटी
- होटल गीतांजली, जीएस रोड गुवाहाटी
-    सूमी लॉज, एमई रोड -0361-2541600
अमर लॉज - 0361-2733568
-    सराई लॉज - 0361-2734772  - 
-   होटल वैशाली, केसी सेन रोड –0361-2512661

गुवाहाटी में क्या देखें -
- कामाख्या देवी मंदिर, ब्रह्मपुत्र नदी का किनारा, उमा नंदा मंदिर, भूपेन हजारिका समाधि स्थल, जालुकबाड़ी आदि।
-    -  विद्युत प्रकाश मौर्य

Sunday, November 24, 2013

नील पर्वत वासिनी मां कामाख्या

गुवाहाटी शहर में ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे नील पर्वत पर मां कामाख्या निवास करती हैं। ऊंचाई पर स्थित मांके मंदिर को देखकर लगता है मानो यहां से पूरे शहर को आशीष दे रही हों।  कहा जाता है जो व्यक्ति गुवाहाटी गया और मां के दर्शन करने नहीं पहुंचा उसे मां कहीं भी हो बुला लेती हैं। देश भर के हिंदू समाज में मां कामाख्या को लेकर गजब की आस्था है। इसलिए मंदिर में सालों भर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ लगी रहती है।


सती की योनि गिरी थी यहां - यह मंदिर शक्ति की देवी सती का है। कहा जाता है शिव के तांडव नृत्य के दौरान यहां सती की योनि गिरी थी। इसलिए यहां मां के दर्शन योनि स्वरूप में होते हैं। पुराणों के अनुसार जहां-जहां सती के अंग के टुकड़े, धारण किए वस्त्र या आभूषण गिरे,  वहां-वहां शक्तिपीठ अस्तित्व में आए। इसलिए ये माता के 51 शक्तिपीठों में से एक है। 


हिन्दूओं के प्राचीन 51 शक्तिपीठों में कामाख्या शक्ति पीठ को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। ये मंदिर जो असम राज्य के समृद्ध ऐतिहासिक विरासत की दास्तां बयान करता है। तो यह पवित्र मंदिर असम शहर का हृदय है। कामाख्या मंदिर देश भर में तंत्रमंत्र साधना के लिए भी विख्यात है। इसी तरह की साधना उत्तर प्रदेश के विंध्याचल में मां विंध्यवासिनी देवी के मंदिर में भी की जाती है।


नीलांचल पर्वत को कामगिरी पर्वत भी कहते हैं। मां कामाख्या मंदिर का दर्शन करने के बाद श्रद्धालुओं को असम के वैभव और शक्ति का अहसास हो जाता है। वर्तमान में भव्य एवं प्रभावोत्पादक मां कामाख्या का जो  मंदिर है वह वर्ष 1565 ई. का बना हुआ है। इसे कूच बिहार के महाराजा विश्व सिंह और उनके पुत्र नर नारायण सिंह ने बनवाया था। ऐसा विवरण मिलता है कि मां के प्राचीन मंदिर को 1564 ई में बंगाल के कुख्यात कला विध्वंसक काला पहाड़ ने तोड़ दिया था।


ऐसा माना जाता है कि गुवाहाटी के पास कामाख्या में स्थित देवी के दर्शन पूजन किए बिना यदि कोई असम छोड़ कर स्थाई रूप से देश के किसी अन्य भाग में बस जाना चाहता है तो मां कामाख्या उसे एक बार फिर अपने पास एक नहीं सात बार बुला लेती हैं। इसलिए पूर्वोत्तर के लोगों में देवी के प्रति अखंड आस्था है। 

अंबुवाची पर्व पर बंद होते हैं कपाट - विश्व प्रसिद्ध शक्तिपीठ कामाख्या मंदिर के पट अंबुवाची पर्व के मौके पर तीन दिनों के लिए बंद कर दिए जाते है। कहा जाता है कि इस दौरान देवी मां रजस्वला होती हैं। तब मंदिर परिसर में बड़ा मेला लगता है। इसे पूरब का महाकुंभ कहा जाता है। इस चार दिवसीय मेले के दौरान हर साल देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु आते हैं।​ हालांकि कामाख्या मंदिर परिसर में अभी भी बलि दी जाती है। देश के कई मंदिरों में ये प्रथा बंद हो चुकी है लेकिन यहां बदस्तूर जारी है।


मां की पूजा का मंत्र - 
कामाख्ये वरदे देवी नील पर्वत वासिनी।
त्वं देवी जगतं माता योनि मुद्रे नमोस्तुते।।
आर्थात ,  हे  नील पहाड़ों पर बसने वाली देवी कामाख्या,  तुम जगत की माता हो, योनि मुद्रा  में हो, तुम्हें हमारा  नमस्कार है। 


-    - - विद्युत प्रकाश मौर्य

Saturday, November 23, 2013

तंत्र साधना के लिए विख्यात है कामरूप कामाख्या

मां कामाख्या मंदिर का प्रवेश द्वार 
बचपन में कोर्स की किताबों में कंवरू कामख्या के बारे में पढ़ा था। खासकर भोजपुरी इलाके में कामाख्या मंदिर में की जाने वाले तंत्र मंत्र साधना के बारे में खूब कहानियां सुनी थी। इस मंदिर को लेकर भोजपुरी समाज में कई तरह के मिथक और गल्प प्रचलित हैं। कहा जाता है कि यहां खास तौर पर नवरात्र में लोग तंत्र सिद्धी के लिए जाते हैं। यहां से सिद्ध होकर लोग तरह तरह के चमत्कार करते हैं। जितने मुंह उतनी बातें। पर हिंदी पट्टी के गांव-गांव में कंवरू कामाख्या का बड़ा नाम है। इसलिए गुवाहाटी पहुंचने के साथ ही मां कामाख्या के दरबार में हाजिरी लगानी जरूरी थी। 

तांत्रिकों की सबसे महत्वपूर्ण देवी - काली और त्रिपुर सुंदरी देवी के बाद कामाख्या माता तांत्रिकों की सबसे महत्वपूर्ण देवी है। मंदिर के गर्भगृह में कोई प्रतिमा स्थापित नहीं की गई है। इसकी जगह एक समतल चट्टान के बीच बना विभाजन देवी की योनि को दर्शाता है।

एक प्रकृतिक झरने के कारण यह जगह हमेशा गीला रहता है। इस झरने के जल को काफी प्रभावकारी और शक्तिशाली माना जाता है।   तांत्रिकों की देवी कामाख्या देवी की पूजा भक्तजन भगवान शिव के नववधू के रूप में भी करते हैं। 

माना जाता है कि देवी मुक्ति को स्वीकार करती हैं और सभी इच्छाएं पूर्ण करती है। यह पीठ माता के सभी शक्तिपीठों के बीच माहापीठ के तौर पर माना जाता है।

गुवाहाटी से ठीक पहले ब्रह्मपुत्र नद पर रेल पुल आता है। इसे सरायघाट का पुल कहते हैं। इस रेल पुल के साथ ही सड़क पुल भी है। नीचे नीचे रेल तो ऊपर से सड़क। ये पुल नेशनल हाईवे नंबर 31 पर है। न्यू जलपाईगुड़ी की ओर आ रही ये सड़क गुवाहाटी को शेष भारत से जोड़ती है। ब्रह्मपुत्र नदी पर पुल से पहले चांगसारी नामक रेलवे स्टेशन आता है। कई बार रेलगाड़ियां देर तक इस स्टेशन पर रूक जाती हैं क्योंकि पुल पर सिंगल रेल लाइन है, आगे जाने का सिग्नल नहीं मिलता। 
अब ब्रह्मपुत्र पर एक नए रेल पुल का निर्माण जारी है। अब गुवाहाटी शहर के काफी उद्योग धंधे पुल के इस पार चांगसारी की तरफ शिफ्ट हो रहे हैं। आईआईटी गुवाहाटी भी पुल से पहले ही स्थित है। यानी पूर्वोत्तर के सबसे बडे शहर के आने से पहले उसकी आहट शुरू हो जाती है।   लोहित यानी ब्रह्मपुत्र नद ( नदी नहीं, क्योंकि ब्रह्मपुत्र तो पुलिंग है ना ) पर बने इस रेल पुल को पार करने के बाद आता है कामाख्या रेलवे स्टेशन। 


ये कामरूप जिले में पड़ता है। मां कामाख्या के नाम पर बने इस रेलवे स्टेशन से अब कई ट्रेनें बनकर चलती हैं। कामाख्या को गुवाहाटी के बाद एक रेल टर्मिनल के तौर पर विकसित किया जा रहा है। पूर्वोत्तर में कहीं जाने से पहले मैं मां कामाख्या के आशीर्वाद लेना चाहता था इसलिए मैं ब्रह्मपुत्र मेल से कामाख्या में ही उतर गया। कामाख्या रेलवे स्टेशन का नूतन भवन भी मंदिर की शक्ल में बनाया गया है।
असम में महिलाएं करती थीं काला जादू 
कामाख्या देवी मंदिर परिसर में नवरात्रा में तंत्र साधना में जुटे लोग। 
असम को ही पुराने समय में कामरूप प्रदेश के रूप में जाना जाता था। कामरुप प्रदेश को तन्त्र साधना के गढ़ के रुप में दुनिया भर में बहुत नाम रहा है। पुराने समय में इस प्रदेश में मातृ सत्तात्मक समाज व्यवस्था प्रचलित थीयानि कि यंहा बसने वाले परिवारों में महिला ही घर की मुखिया होती थी। कामरुप की स्त्रियां भी तंत्र साधना में बड़ी ही प्रवीण होती थीं। 


भेड़ बकरा बना कर रख लेती थीं महिलाएं   -   कामरुप में श्मशान साधना व्यापक रुप से प्रचलित रहा है। इस प्रदेश के विषय में तमाम आश्चर्यजनक कथाएं कही सुनी जाती हैं। पुरानी किताबों में यहां के काले जादू के विषय में बड़ी अद्भुत बातें पढने को मिलती हैं। कहा जाता है कि बाहर से आए लोगों को यहां की महिलाओं द्वारा भेड़बकरी बनाकर रख लिया करती थीं। इसलिए लोग असम जाने से डरते थे। खास तौर पर महिलाएं नहीं चाहती थीं कि उनका पति असम की ओर जाए। असम यानी कामरूप प्रदेश की तरह बंगाल को भी तांत्रिक साधनाओं और चमत्कारों का गढ़ माना जाता रहा है।

कैसे पहुंचे - मां कामाख्या के मंदिर के लिए आप गुवाहाटी रेलवे स्टेशन या फिर कामाख्या रेलवे स्टेशन कहीं से भी उतर कर जा सकते है। यह मंदिर दोनों स्टेशनों के बीच में स्थित है। गुवाहाटी रेलवे स्टेशन के पलटन बाजार से आप बस या आटो से जुलाकबाड़ी की तरफ जाते हैं कामाख्या मंदिर के प्रवेश द्वार के पास उतरें। यहां से मंदिर 3 किलोमीटर दूर पहाडी पर  स्थित है।

प्रवेश द्वार से मंदिर तक जाने के लिए बसें और शेयरिंग टैक्सियां चलती हैं। बस में 10 रुपये तो टैक्सी वाले चढ़ाई के समय 20 रुपये किराया लेते हैं। वहीं उतरते समय 10 रुपये में भी लेकर आते हैं। आप पदयात्रा करके भी मां के मंदिर तक पहुंच सकते हैं। अगर आप अपने वाहन से पहुंचे हैं तो मंदिर के प्रवेश द्वार से पहले विशाल पार्किंग का भी इंतजाम है। 

--- विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com 

Friday, November 22, 2013

पूर्वोत्तर का सबसे बड़ा स्टेशन - गुवाहाटी रेलवे स्टेशन

असम की राजधानी गुवाहाटी पूर्वोत्तर का सबसे बडा शहर और व्यापारिक केंद्र है। गुवाहाटी इस क्षेत्र का सबसे बड़ा रेलवे स्टेशन है। यहां कुल 9 प्लेटफार्म हैं। स्टेशन कोड GHY ( GUWAHATI) है। प्लेटफार्म नंबर एक की ओर स्टेशन का मुख्य प्रवेश द्वार है। पूर्वोत्तर में अधिकांश जगहों से मीटर गेज की विदाई हो रही है। स्टेशन के बाहर 1950-60 के दशक का एक मीटर गेज ईंजन प्रदर्शित किया गया है जो भारतीय रेल के प्रगति का इतिहास सुना रहा है। रात को रोशनी और संगीत के साथ भाप इंजन के सफर की दास्तां ये इंजन सुनाता है।

 गुवाहाटी रेलवे स्टेशन के बाहर एक मीटर गेज का लोकोमोटिव इंजन दिखाई देता है। यह लोकोमोटिव जिसका नाम वाईजी 4119 है, इसका निर्माण टाटा लोकोमोटिव ने 1956 में किया था। यह पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे में 1997 तक सेवा में रहा। कुल 41 साल तक बराकघाटी में अपनी सेवाएं देने के बाद रिटायर हुआ। काफी समय तक बदरपुर शेड में पड़ा रहा। बाद में इसे गुवाहाटी रेलवे स्टेशन के बाहर लाकर स्थापित किया गया है।

गुवाहाटी रेलवे स्टेशन का बुकिंग और आरक्षण दफ्तर स्टेशन से अलग भवन में शिफ्ट हो चुका है। ये रेलवे स्टेशन सन 1900 में आरंभ हुआ था। अब स्टेशन पर ट्रेनों का बोझ कम करने के लिए यहां से छह किलोमीटर आगे कामाख्या को दूसरे बड़े टर्मिनल के तौर पर विकसित किया जा रहा है। गुवाहाटी नार्थ इस्ट फ्रंटियर रेलवे के लमडिंग डिविजन में आता है। यहां से देश हर प्रमुख बड़े शहर के लिए रेलगाड़ियां उपलब्ध हैं। 

रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर एक पर जन आहार भोजनालय है जहां 35 रुपये की अच्छी खाने की थाली उपलब्ध है। इसी प्लेटफार्म पर दक्षिण भारतीय कैंटीन भी है। जहां महज 15 रुपये में छोटा मसाला डोसा उपलब्ध है। हालांकि देश भर में अब डोसा 40 से 60 रुपये तक में बिकने लगा है। एक नंबर प्लेटफार्म पर आप पूर्वोत्तर का हैंडीक्राफ्ट और ऊनी शॉल आदि भी खरीद सकते हैं।

अगर आप प्लेटफार्म नंबर नौ की ओर बाहर निकलते हैं तो पहुंच जाते हैं गुवाहाटी के पलटन बाजार और जीएस रोड की ओर। पलटन बाजार गुवाहाटी का लोकप्रिय बाजार है। पलटन बाजार की मुख्य सड़क पर आते ही एक साइनबोर्ड लगा है जिसपर लिखा है- यहां से आगे सैनिकों का प्रवेश वर्जित है। ( क्यों...)
 पलटन बाजार में खाने पीने के अच्छे होटल, रहने के लिए सस्ते होटल उपलब्ध हैं। पलटन बाजार की तरफ स्टेशन से लगता हुआ एक छोटा बस स्टैंड भी है। पलटन बाजार में निजी ट्रैवेल एजेंसियों के दफ्तर भी हैं।
रेलवे स्टेशन के पास से आप मेघालय की राजधानी शिलांग जाने के लिए टैक्सी या फिर पूरे उत्तर पूर्व में कहीं भी जाने के लिए बस और टैक्सी बुक कर सकते हैं। गुवाहाटी से एनएच 40 शिलांग को जोड़ती है। शिलांग का रास्ता तीन घंटे का है। पूर्वोत्तर में निजी क्षेत्र में नेटवर्क ट्रैवेल्स बसों का बड़ा आपरेटर हैं। यहां सरकारी परिवहन निगमों की हालात ज्यादा अच्छी नहीं है। ज्यादातर निजी बस कंपनियां असम के नेताओं की बताई जाती हैं जो फलफूल रही हैं। पूर्वोत्तर में बसों के लिए देश के कई दूसरे राज्यों की तरह आनलाइन बुकिंग की सुविधा अभी ठीक से शुरू नहीं हो सकी है।
गुवाहाटी में क्या देखें -   - कामाख्या देवी मंदिर, ब्रह्मपुत्र नदी का किनारा, उमा नंदा मंदिर, भूपेन हजारिका समाधि स्थल, जालुकबाड़ी आदि।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य

Thursday, November 21, 2013

सिलिगु़डी से गुवाहाटी - रेलगाड़ी में चलता है बाजार

वैसे तो भारतीय रेल में आप कहीं किसी भी मार्ग पर सफर करें रेलगाड़ी के डिब्बे के अंदर सामान बेचने वाले जरूर आ धमकते हैं, लेकिन न्यू जलपाईगुड़ी से गुवाहाटी के बीच के सफर की तो बात ही निराली है। 

यहां वह सब कुछ आप रेलगाडी के अंदर की खरीद सकते हैं जो आप बाजार में जाकर खरीदेंगे। मैं गारंटी के साथ कह सकता हूं कि इस तरह का बाजार आपको देश के किसी और रेल मार्ग पर शायद नहीं देखे को मिलेगा।इसकी शुरुआत न्यू जलपाईगुड़ी (एनजेपी) रेलवे स्टेशन से ही हो जाती है।
सबसे पहले न्यू जलपाईगुड़ी में दार्जिलिंग की चाय बेचने वाले डिब्बे में पहुंच जाते हैं। वह चाय पत्ती जिसके लिए आपको 90 किलोमीटर आगे दार्जिलिंग के बाजार में या सिलिगुड़ी मार्केट जाने की कोई जरूरत नहीं है। यहीं से खरीद डालिए। ट्रेन आगे बढ़ती है इसके साथ ही बच्चों के खिलौने, महिलाओं के लिए साड़ियां, सलवार सूट के कपड़े, आर्टिफिशियल से लेकर चांदी की ज्वेलरी, तरह तरह के शॉल, रजाई, कंबल बेचने वाले आते रहते हैं। यानी घर जा रहे हैं तो अपने परिवार के लिए सब कुछ आप रेलगाड़ी के डिब्बे में ही खरीद सकते हैं।

इतना ही नहीं आगे शूटिंग, शर्टिंग और पैंट कोट के कपड़े बेचने वाले भी डिब्बे में आ धमकते हैं। तो मोबाइल फोन, पेन ड्राइव, मेमोरी कार्ड, बैटरी क्या कुछ चाहिए जनाब। सब कुछ यहीं रेलगाड़ी में ही हाजिर है। यहां तक की मल्टी मीडिया फोन और स्मार्ट फोन बेचने वाले भी डिब्बे में पहुंच जाते हैं। पर ये सामान कितने असली और टिकाउ हैं ये आपकी सूझबूझ पर निर्भर करता है। हां खाने पीने की चीजें बेचने वाले भी खूब आते हैं। खास तौर पर इस मार्ग पर लाल चाय मतलब नींबू की चाय पी सकते हैं। यह चाय मिलती है पांच रुपये में एक कप। 

खूब करें मोलभाव - रेल गाड़ी में बिकने वाले इन सामानों के रेट को लेकर मोलभाव भी खूब होता है। आप को समान की परख हो तो खरीदिए नहीं तो किनारे हो लिजिए। आप घर जा रहे हैं और घर वालों के लिए कुछ लेना भूल गए हैं तो ट्रेन में ही खरीद लिजिए। एसी कोच में भी जनरल डिब्बों में भी। कूच बिहार और अलीपुर दुआर के साथ असम में प्रवेश तक ये बाजार चलता रहता है। हमने भी अपने सफर के दौरान लकड़ी के खिलौने रेलगाड़ी में ही खरीदे। पर रेलगाड़ी में बिकने वाले इलेक्ट्रानिक सामानों की कोई गारंटी नहीं रहती।


कामतापुर राज्य की मांग - कूच बिहार से गुजरते हुए कुछ याद आया। ये वही इलाका है जहां अलग कामतापुर राज्य की मांग हो रही है। दार्जिलिंग वाले गोरखालैंड मांग रहे हैं तो पश्चिम बंगाल के दुआर्स क्षेत्र और असम के कोकराझार आदि इलाकों को मिलाकर अलग कामतापुर राज्य की भी मांग की जा रही है। इसके लिए ऐतिहासिक कामतापुर राज्य के सीमाओं की दुहाई दी जा रही है।

कई बार कामतपुर राज्य की मांग का आंदोलन उग्र भी हो उठता है। अगर कोलकाता से दूरी की बात करें तो दुआर्स और दार्जिलिंग के इलाके काफी दूर हैं। इसलिए ये लोग खुद को कोलकाता से गहराई से जोड़ नहीं पाते। यहां के लोगों की जन आकंक्षा बार-बार अलग राज्य की मांग को लेकर हिलोरें मारने लगती है।  


-    विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
 ( TRAIN, COACH, MOBILE MARKET, TOWARDS GUWAHATI ) 
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