Saturday, November 30, 2013

पूर्वोत्तर का सबसे बड़ा स्टेशन - गुवाहाटी रेलवे स्टेशन

असम की राजधानी गुवाहाटी पूर्वोत्तर का सबसे बडा शहर और व्यापारिक केंद्र है। गुवाहाटी इस क्षेत्र का सबसे बड़ा रेलवे स्टेशन है। यहां कुल 9 प्लेटफार्म हैं। स्टेशन कोड GHY ( GUWAHATI) है। प्लेटफार्म नंबर एक की ओर स्टेशन का मुख्य प्रवेश द्वार है। पूर्वोत्तर में अधिकांश जगहों से मीटर गेज की विदाई हो रही है। स्टेशन के बाहर 1950-60 के दशक का एक मीटर गेज ईंजन प्रदर्शित किया गया है जो भारतीय रेल के प्रगति का इतिहास सुना रहा है। रात को रोशनी और संगीत के साथ भाप इंजन के सफर की दास्तां ये इंजन सुनाता है।

गुवाहाटी रेलवे स्टेशन का बुकिंग और आरक्षण दफ्तर स्टेशन से अलग भवन में शिफ्ट हो चुका है। ये रेलवे स्टेशन सन 1900 में आरंभ हुआ था। अब स्टेशन पर ट्रेनों का बोझ कम करने के लिए यहां से छह किलोमीटर आगे कामाख्या को दूसरे बड़े टर्मिनल के तौर पर विकसित किया जा रहा है। गुवाहाटी नार्थ इस्ट फ्रंटियर रेलवे के लमडिंग डिविजन में आता है। यहां से देश हर प्रमुख बड़े शहर के लिए रेलगाड़ियां उपलब्ध हैं।  

रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर एक पर जन आहार भोजनालय है जहां 35 रुपये की अच्छी खाने की थाली उपलब्ध है। इसी प्लेटफार्म पर दक्षिण भारतीय कैंटीन भी है। जहां महज 15 रुपये में छोटा मसाला डोसा उपलब्ध है। हालांकि देश भर में अब डोसा 40 से 60 रुपये तक में बिकने लगा है। एक नंबर प्लेटफार्म पर आप पूर्वोत्तर का हैंडीक्राफ्ट और ऊनी शॉल आदि भी खरीद सकते हैं।
अगर आप प्लेटफार्म नंबर नौ की ओर बाहर निकलते हैं तो पहुंच जाते हैं गुवाहाटी के पलटन बाजार और जीएस रोड की ओर। पलटन बाजार गुवाहाटी का लोकप्रिय बाजार है। पलटन बाजार की मुख्य सड़क पर आते ही एक साइनबोर्ड लगा है जिसपर लिखा है- यहां से आगे सैनिकों का प्रवेश वर्जित है। ( क्यों...)

पलटन बाजार में खाने पीने के अच्छे होटल, रहने के लिए सस्ते होटल उपलब्ध हैं। पलटन बाजार की तरफ स्टेशन से लगता हुआ एक छोटा बस स्टैंड भी है। पलटन बाजार में निजी ट्रैवेल एजेंसियों के दफ्तर भी हैं।
रेलवे स्टेशन के पास से आप मेघालय की राजधानी शिलांग जाने के लिए टैक्सी या फिर पूरे उत्तर पूर्व में कहीं भी जाने के लिए बस और टैक्सी बुक कर सकते हैं। गुवाहाटी से एनएच 40 शिलांग को जोड़ती है। शिलांग का रास्ता तीन घंटे का है। पूर्वोत्तर में निजी क्षेत्र में नेटवर्क ट्रैवेल्स बसों का बड़ा आपरेटर हैं। यहां सरकारी परिवहन निगमों की हालात ज्यादा अच्छी नहीं है। ज्यादातर निजी बस कंपनियां असम के नेताओं की बताई जाती हैं जो फलफूल रही हैं। पूर्वोत्तर में बसों के लिए देश के कई दूसरे राज्यों की तरह आनलाइन बुकिंग की सुविधा अभी ठीक से शुरू नहीं हो सकी है।


गुवाहाटी में क्या देखें -

कामाख्या देवी मंदिरब्रह्मपुत्र नदी का किनाराउमा नंदा मंदिरभूपेन हजारिका समाधि स्थलजालुकबाड़ी आदि।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य 
 ( GUWAHATI, PALTAN BAZAR, PAN BAZAR,RAIL, ASSAM ) 

Friday, November 29, 2013

सिलिगु़डी से गुवाहाटी - रेलगाड़ी में चलता है बाजार

वैसे तो भारतीय रेल में आप कहीं सफर करें रेलगाड़ी के डिब्बे के अंदर सामान बेचने वाले जरूर आ धमकते हैं, लेकिन न्यू जलपाईगुड़ी से गुवाहाटी के बीच की बात ही निराली है। यहां वो सब कुछ आप रेलगाडी के अंदर की खरीद सकते हैं जो आप बाजार में जाकर खरीदेंगे। मैं गारंटी के साथ कह सकता हूं कि इस तरह का बाजार आपको देश के किसी और रेल मार्ग पर शायद नहीं देखे को मिले। 

इसकी शुरुआत हो जाती है एनजेपी से ही। न्यू जलपाईगुड़ी में दार्जिलिंग की चाय बेचने वाले पहुंच जाते हैं। वो चायपत्ती जिसके लिए आपको 90 किलोमीटर आगे दार्जिलिंग के बाजार में या सिलिगुड़ी मार्केट जाने की कोई जरूरत नहीं है। ट्रेन आगे बढ़ती है इसके साथ ही बच्चों के खिलौने, महिलाओं के लिए साड़ियां, सलवार सूट के कपड़े, आर्टिफिशियल से लेकर चांदी की ज्वेलरी, शाल, रजाई, कंबल यानी सब कुछ आप रेलगाड़ी के डिब्बे में ही खरीद सकते हैं।


इतना ही नहीं शूटिंग, शर्टिंग और पैंट कोट के कपड़े बेचने वाले भी डिब्बे में आ धमकते हैं। मोबाइल फोन, पेन ड्राइव, मेमोरी कार्ड, बैटरी क्या कुछ चाहिए जनाब। सब कुछ हाजिर है। यहां तक की मल्टी मीडिया फोन और स्मार्ट फोन बेचने वाले भी डिब्बे में पहुंच जाते हैं।

सामानों के रेट की बार्गेनिंग भी खूब होती है। आप को समान की परख तो खरीदिए नहीं तो किनारे हो लिजिए। आप घर जा रहे हैं और घर वालों के लिए कुछ लेना भूल गए हैं तो ट्रेन में ही खरीद लिजिए। एसी कोच में भी जनरल डिब्बों में भी। कूचबिहार और अलीपुर दुआर के साथ असम में प्रवेश तक ये बाजार चलता रहता है। हमने भी अपने सफर के दौरान लकड़ी के खिलौने रेलगाड़ी में ही खरीदा। पर रेलगाड़ी में बिकने वाले इलेक्ट्रानिक सामानों की कोई गारंटी नहीं रहती।


कामतापुर राज्य की मांग - कूच बिहार से गुजरते हुए कुछ याद आया। ये वही इलाका है जहां अलग कामतापुर राज्य की मांग हो रही है। दार्जिलिंग वाले गोरखालैंड मांग रहे हैं तो पश्चिम बंगाल के दुआर्स क्षेत्र और असम के कोकराझार आदि इलाकों को मिलाकर अलग कामतापुर राज्य की भी मांग की जा रही है। इसके लिए ऐतिहासिक कामतापुर राज्य के सीमाओं की दुहाई दी जा रही है।

कई बार कामतपुर राज्य की मांग का आंदोलन उग्र भी हो उठता है। अगर कोलकाता से दूरी की बात करें तो दुआर्स और दार्जिलिंग के इलाके काफी दूर हैं। इसलिए ये लोग खुद को कोलकाता से गहराई से जोड़ नहीं पाते। यहां के लोगों की जन आकंक्षा बार बार अलग राज्य की मांग को लेकर हिलोरें मारने लगती है।  

-    विद्युत प्रकाश मौर्य ( TRAIN, COACH, MOBILE MARKET, TOWARDS GUWAHATI ) 

Thursday, November 28, 2013

चलो चलें चाय और अनानास के देश में

ब्रह्मपुत्र मेल में - पूर्वोत्तर की ओर....
पूर्वोत्तर यानी सात बहनों वाला राज्य। उसका एक भाई भी है सिक्किम। सात बहनें यानी अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय, मणिपुर, मिजोरमनागालैंड और त्रिपुरा। इनमें असम सबसे बड़ी बहन है। हम सबके अंदर थोड़ा पूर्वोत्तर जरूर है। भारत का पूर्वोत्तर हिस्सा जिसे हम नार्थ ईस्ट कहते हैं। हरा भरा प्रदेश हमारी प्याली की चाय प्रदान करता है तो हमारे वाहनों के लिए पेट्रोल डीजल पूर्वोत्तर से आता है। सागवान और बांस के फर्नीचर का भी बड़ा स्रोत पूर्वोत्तर है। पू्र्वोत्तर अनानास (पाइनएपल) का भी बड़ा उत्पादक है।

देश के कई राज्यों घूमने का मौका मिला है पर पूर्वोत्तर जाने की लालसा पुरानी थी। राष्ट्रीय युवा योजना के शिविरों में पूर्वोत्तर के हर राज्य के लोगों से मुलाकात होती थी, तो जाने का एक मौका और बहाना मिल ही गया। साल 2013 महीना नवंबर। सफर की शुरूआत बिहार के पटना जंक्शन से हुई। कुछ दिन पहले ही मैं दिल्ली से पटना पहुंचा था। दिल्ली से पूर्वोत्तर को जोड़ने वाली रेलगाड़ियां हैं नार्थ ईस्ट, अवध आसाम एक्सप्रेस, लोहित एक्सप्रेस, ब्रह्मपुत्र मेल आदि। अब असम के आखिरी छोर न्यू तिनसुकिया तक ब्राडगेज लाइन है। मैं ब्रह्मपुत्र मेल के एसी-2 कोच में हूं। ट्रेन पटना जंक्शन पर दो घंटे देर से पहुंची है।
न्यू जलपाईगुड़ी रेलवे स्टेशन ...
मेरे सामने वाली बर्थ पर पटना से चढ़े सहयात्री असम राइफल्स में अधिकारी हैं। वे भी पटना से ही बैठे हैं। वे 1984 से पूर्वोत्तर के अलग राज्यों में तबादलों के साथ घूम रहे हैं। आजकल उनकी पोस्टिंग डिमापुर में है। वे बताते हैं पहले बरौनी से छोटी लाइन ( मीटर गेज) से गुवाहाटी जाया करता था। तब काफी समय लग जाता था। अब पटना से बरौनी, फिर बेगुसराय, मानसी, खगड़िया, कटिहार, किशनगंज, बारसोई जैसे स्टेशनों से गुजरते हुए पाया कि ब्राडगेज लाइन का दोहरीकरण और विद्युतीकरण काम तेजी से जारी है।

पटना से न्यू जलपाईगुड़ी (एनजेपी) तक जाने के दो मार्ग हैं एक जमालपुर, भागलपुर, साहेबगंज मालदा टाउन होते हुए तो दूसरा बरौनी, कटिहार होते हुए है। हमारी ब्रह्मपुत्र मेल का मार्ग भागलपुर, मालदा टाउन होकर है। ट्रेन का आखिरी पड़ाव ढिब्रूगढ़ है।
दुआर्स में चाय के बगान - रेलगाड़ी की खिड़की से....
हमारी सुबह न्यू जलपाईगुडी स्टेशन पर होती है। यहां प्लेटफार्म नंबर एक पर बहुत अच्छी कैंटीन है, जहां नास्ते में सुस्वादु इडली और डोसा मिल रहा है। यहां रोटी सब्जी अभी सस्ती मिल रही है। साल 2013 में 20 रुपये में आठ रोटियां सब्जी के साथ।

न्यू जलपाईगुडी (एनजेपी) बंगाल में पड़ने वाला रेलवे का बड़ा स्टेशन है। यहां से दार्जिलिंग और सिक्किम की राजधानी गंगटोक और भूटान के शहर फुटशिलांग जाने के लिए सड़क मार्ग जाता है। एनजेपी से गुवाहाटी के रेलमार्ग का भी दोहरीकरण जारी है। इस मार्ग पर बंगाल के अलीपुर दुआर और कूच बिहार जैसे रेलवे स्टेशन आते हैं। न्यू जलपाईगुड़ी मैं 2010 में दार्जिलिंग यात्रा के क्रम में आ चुका हूं। यहां से गुवाहाटी की ओर मेरी पहली यात्रा है।


और ये रहा अनानास। 
ट्रेन आगे चलती हुई श्रीरामपुर नामक स्टेशन के बाद असम में प्रवेश कर जाती है। गुवाहाटी से पहले बोंगाइगांव, कोकराझार, रंगिया जैसे प्रमुख शहर आते हैं। रंगिया जंक्शन है जहां से हारामुती के लिए रेलमार्ग जाता है। ये मार्ग अरूणाचल प्रदेश की राजधानी ईटानगर ( नाहरालागुन ) को रेलवे नेटवर्क से जोड़ता है।

रेलगाड़ी में अनानास बेचने वाले भी आ रहे हैं। यह मेरा प्रिय फल है। दिल्ली में भी जहां मिले खाता हूं तो भला यहां क्यों नहीं... असम में प्रवेश के साथ ही रेलगाड़ी की खिड़की से तांबुल के पेड़ और चाय के बगान दिखाई देने लगते हैं। तांबुल ( सुपारी या कसैली) पूर्वोत्तर में ज्यादातर लोग खाते हैं। हमारे साथ वाले फौजी भाई बताते हैं कि घर आने वाले मेहमानों को लोग तांबुल पेश करके स्वागत करते हैं।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य           (  यात्रा काल-  नवंबर 2013 ) 

( RAIL, BRAHMPUTRA MAIL, ASSAM, NORTH EAST, PINEAPPLE, TEA, GUWAHATI ) 

Tuesday, November 26, 2013

दूर दूर तक मशहूर है सिलाव का खाजा


दिन भर राजगीर की सैर के बाद अब हम बस से लौटने लगे हैं। बिहार में राजगीर के रास्ते में पड़ता है छोटा सा कस्बा सिलाव। वापसी में हमारी बस सिलाव में रुकती है। सामने एक पंक्ति में खाजा की कई दुकानें दिखाई दे रही हैं। वास्तव में सिलाव नामक ये छोटा सा कस्बा खाजा के लिए जाना जाता है। खाजा यानी जमकर खा और जा। खाजा बिहार की वह मिठाई है जिसके बिना कोई शादी पूरी नहीं होती। शादी के बाद नवेली दुल्हन के पांव जब ससुराल में पड़ते हैं तो वह कई झंपोली ( डिब्बे ) खाजा अपने साथ लाती है। और ये खाजा गांव मुहल्ले में कई दिनों तक बांटा जाता है। शादी का सम्मान इसी बात से बढ़ता है कि खाजा की कितनी झंपोलियां ससुराल से आईं।

वैसे खाजा बहुत पुरानी मिठाई है। तभी तो सैकड़ों साल पहले ये कहावत बनी थी- अंधेर नगरी चौपट राजा टके सेर भाजी टके सेर खाजा। खाजा रसगुल्ले से तो पुराना है ही। वैसे बिलग्रामी और शक्करपारे और लकठो भी पुरानी मिठाइयां हैं। खाजा की खासियत है ये कई दिनों तक खराब नहीं होता। और सिलाव में बने खाजे की तो बात ही क्या है।
सिलाव जैसा स्वाद कहीं और के खाजे में नहीं आ पाता। खाजे के बेहतरीन होने की अपनी पहचान है। पारखी अलग अलग तरीके से पहचानते हैं। अब सिलाव के खाजा का स्वाद दिल्ली  के प्रगति मैदान तक पहुंच चुका है। हर साल व्यापार मेले में खाजा का स्टाल आता है। आप राजगीर पहुंच गए हैं तो सिलाव के खाजा का आनंद लिए बगैर वापस नहीं जाएं। सिलाव के मुख्य बाजार में ही खाजा की कई दुकाने हैं। खाजा खाएं और साथ में पैक करा कर भी ले जाएं। क्योंकि ये हफ्तों रखा जा सकता है। 
 बाकी मिठाइयों की तुलना में खाजा अभी भी सस्ता है। सिलाव में खाजा का भाव 80 रुपये किलो से लेकर 100 रुपये किलो तक है। हल्का होने के कारण एक किलो खाजा ढेर सारी जगह घेरता है। एक बार आपने खाजा खरीदा तो कई दिनों तक मजे लेकर खाते रहें। अगर आप सिलाव से होकर गुजर रहे हैं तो यहां के बस स्टाप के ठीक सामने कुशवाहा खाजा भंडार से खाजा खरीद सकते हैं। 
-    कुशवाहा खाजा भंडार ( कामेश्वर सिंह कुशवाहाप्रो शिवशंकर प्रसाद मौर्य - 9430250202)
सिलाव शहर में कई परिवार खाजा बनाने का कारोबार से कई पीढ़ियों से जुड़े हुए हैं। इनमें काली शाह और कोकिल शाह के नाम प्रमुख हैं। वैसे नालंदा और पावापुरी रोड रेलवे स्टेशन पर रूकने वाली हर ट्रेन के साथ खाजा बेचने वाले हॉकर रेलगाड़ी के हर कोच तक पहुंचते हैं। 
खाजा के मार्केटिंग की तैयारी -  साल 2015 में बिहार सरकार की ओर से सिलाव के इस प्रसिद्ध खाजा को विकसित एवं गुणवत्तापूर्ण बनाने को लेकर उद्योग का दर्जा दिया गया। इसे मुख्यमंत्री कलस्टर विकास योजना में जोड़ा गया है। तैयारी है कि अब मशीन से खाजा बनाया जाएगा। जिसकी गुणवत्ता करीब छह महीने तक बरकरार रहेगी। इसके बाद खाजा का एक-एक किलो का पैकेट बनाया जाएगा। जिसे विदेशों में भेजने में सुविधा होगी और मानव श्रम में भी कमी आएगी।
-- विद्युत प्रकाश मौर्य

( BIHAR, RAJGIR, KHAJA, SILAO, NALANDA )

Sunday, November 24, 2013

जैन,बौद्ध और हिंदू मंदिरों की नगरी है राजगीर

पांच पहाडियों से घिरे राजगीर में कई मंदिर हैं। राजगीर न सिर्फ हिंदू बल्कि बौद्ध और जैन मतावलंबियों के लिए समान रूप से आस्था का केंद्र है।

देश के कोने कोने से आने वाले जैन श्रद्धालुओं की सूची में राजगीर जरूर होता है तो दुनिया के हर देश से आने वाले बौद्ध श्रद्धालु भी राजगीर जरूर आते हैं।


वेणुवन महाविहार – गर्म जल कुंड के पास ही वेणुवन महाविहार स्थित है। ये बांस का जंगल कभी राजकीय उद्यान था। कहा जाता है गौतम बुद्ध बुद्धत्व की प्राप्ति के बाद पहली बरसात के चार महीने यहीं रूके थे। बौद्ध श्रद्धालुओं के बीच वेणुवन विहार आस्था का बड़ा केंद्र है। 


राजगृह के महाराज अजातशत्रु ने ये विहार खास तौर पर भगवान बुद्ध को उपहार में दिया था ताकि श्रद्धालु उनके आसानी से दर्शन लाभ प्राप्त कर सकें। इसलिए वेणुवन को विश्व का पहला बौद्ध विहार होने का गौरव प्राप्त है। अब वेणुवन के ही परिसर में एक नव वेणुवन विहार का निर्माण कराया गया है। यहां एक विशाल बुद्ध प्रतिमा भी लगी है। नव वेणुवन विहार के वास्तुकार उपेंद्र महारथी हैं। 24 अक्तूबर 1981 को इस विहार का उदघाटन तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने किया था।

विरायतन जैन आश्रम वेणुवन विहार से थोड़ी दूर आगे वैभवगिरी पहाड़ी के निचले हिस्से में विरायतन जैन आश्रम और संग्रहालय है। विरायतन की स्थापना 1973 में की गई थी। 40 एकड़ क्षेत्र में फैले इस आश्रम में गरीबों का मुफ्त उपचार किया जाता है। विरायतन तीन दशक में लाखों लोगों का उपचार कर चुका है। यहां एक विशाल जैन संग्रहालय और अतिथि गृह भी है।
कुल 26 जैन मंदिर - इसके अलावा राजगीर और आसपास में 26 जैन मंदिर हैं। इनमें से कई मंदिर पहाड़ों पर हैं जहां ट्रैकिंग करेक पहुंचा जा सकता है। चलने में असमर्थ जैन श्रद्धालुओं के लिए पालकी मिल जाती है। 
हालांकि इसका किराया हजारों में है। राजगीर में जापानी मंदिर, नौलखा मंदिर, बर्मी बौद्ध मंदिर जैसे मंदिर भी हैं। पास में कुंडलपुर गांव और पावापुरी जैन आस्था से जुडे दूसरे महत्वपूर्ण स्थल हैं।

-   ----- विद्युत प्रकाश मौर्य  

( BIHAR, RAJGIR, BUDDHA, JAIN, NALANDA )

Saturday, November 23, 2013

राजवैद्य जीवक की औषधिशाला- आम्रवन विहार


राजगीर में राजवैद्य जीवक का औषधिशाला का अवशेष जरूर देखें। ये विश्व शांति स्तूप की पहाड़ी से ठीक पहले पड़ता है। इसका नाम जीवक आम्रवन विहार है। कदाचित यहां कभी बड़ी संख्या में आम के पेड़ रहे होंगे इसलिए इसका नाम आम्रवन विहार रखा गया होगा। वैसे तो राजगीर की आबोहवा स्वास्थ्य कर है लेकिन जीवन कायह अस्पताल खासतौर पर बेहतर वातावरण में बनाया गया था।
जीवक राजगृह के राजा अजातशत्रु का राजवैद्य थे। उनकी ख्याति दूर दूर तक थी। एक कथा प्रचलित है कि एक बार देवदत्त ने राजगीर प्रवास के दौरान  भगवान बुद्ध को आहत कर दिया। देवदत्त सिद्धार्थ ( गौतम बुद्ध) का चचेरा भाई था। वह किसी कारण से भगवान बुद्ध से नाराज था। आहत भगवान को तब स्ट्रेचर पर लाद कर जीवक के चिकित्सालय में लाना पड़ा था। बुद्ध का जीवक ने उनके घावों पर पट्टियां बांध कर उपचार किया। लंबे  उपचार के बाद उन्हें पूरी तरह स्वस्थ कर दिया। इस दौरान भगवान बुद्ध जीवक की चिकित्साशाला में ही रहे।
बाद में जीवक ने बौद्ध धर्मावलंबियों के निवास के लिए एक विहार का निर्माण कराया। इसका नाम आम्रवन रखा गया। कभी यहां घने आम के पेड़ हुआ करते थे। इस स्थल पर कुछ समय के लिए भगवान बुद्ध भी रहे। कहा जाता है। इसी स्थल पर भगवान बुद्ध उनसे उपदेश लेने के लिए आए थे। इसलिए बौद्ध मतावलंबियों में जीवक आम्रवन विहार को लेकर बड़ी आस्था है।


मगध नरेश बिंबिसार का प्रसिद्ध राजवैद्य जीवक प्रसिद्ध तक्षशिला महाविद्यालय के छात्र रहे थे। तक्षशिला में धनुर्वेद तथा वैद्यक तथा अन्य विद्याओं की ऊंची शिक्षा दी जाती थी। बिम्बिसार ने राजवैद्य जीवक को भगवान बुद्ध की सेवा में नियुक्‍त किया था।
गौतम बुद्ध का उपचार किया था -  जीवक ने गौतम बुद्ध का उपचार करके भी उन्हें ठीक किया था। जीवक आम्रवन में बुद्ध के साथ घूमता था। इस आम्रवन खास तौर पर बुद्ध के लिए बौद्ध विहार बनवाया गाय था। जीवक सभी बौद्ध भिक्षुओं का निःशुल्क इलाज करता था। कहा जाता है कि बहुत से रोगी इसलिए बौद्ध भिक्षु बन गए ताकि वे अपना मुफ्त में उपचार करवा सकें। 486 ईश्वी पूर्व में जिस साल गौतम बुद्ध का देहावसान हुआ उसी साल जीवक का भी 80 साल की आयु में निधन हो गया।

मगध की नगरवधू का पुत्र था जीवक -  जीवक मगध की नगरवधू शालवती का पुत्र था। शालवती वैशाली की नगर वधू आम्रपाली के मुकाबले में नियुक्त किया गया था। शालवती एक रात्रि का 100 कर्षापण लेती थी जो आम्रपाली से दोगुना रेट था। पर शालवती ने पुत्र पैदा होने पर लोकलाज से उसे कूड़े में फेंक दिया था। पर मगध राज बिंबिसार की उस पर नजर पड़ी तो उसे नया जीवन मिला और उसका नाम जीवक पड़ा। बड़ा होने पर जीवक ने तक्षशिला जाकर आत्रेय से वैद्य विद्या सीखी।


लौटते हुए जीवक ने साकेत में एक सेठ की पत्नी का सफल उपचार किया। राजगृह आने पर उसने राजा के भगंदर रोग को ठीक किया। राजा ने उसे राजवैद्य नियुक्त किया। जीवक औषधीय चिकित्सा, शल् चिकित्सा और मस्तिष्क चिकित्सा का गहन जानकार था। उस समय काशी, कौशल अवंति और वैशाली में उसके टक्कर का कोई वैद्य नहीं था।

दुनिया भर से बौद्ध परिपथ का भ्रमण करने वाले सैलानी और श्रद्धालु राजगीर आते हैं। वे सैलानी जीवक के आम्रवन विहार में जरूर पहुंचते हैं। चूंकि जीवक प्रसिद्ध चिकित्सक थे इसलिए यहां आने वाले श्रद्धालु अपने सेहत के लिए मंगलकामना करते हैं। साथ ही लोग यहां पर अपनी आस्था प्रकट करने के लिए बड़ी संख्या में मोमबत्तियां प्रज्ज्वलित करते हैं। आप भी यहां एक आस्था की मोमबत्ती जला सकते हैं।

राजगीर का वन प्याज - 
राजगीर में शांति स्तूप के मार्ग पर आप वन प्याज बिकते हुए देख सकते हैं। कहा जाता ये दर्द में काफी लाभकारी है। राजगीर में इसका तेल भी बिकता है जिसे आप खरीद कर ले जा सकते हैं। इशके अलावा भी आप कई तरह की जड़ी बूटियां खरीद सकते हैं। 


-    ----   विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com


(BIHAR, RAJGIR, BUDDHA, NALANDA )

Monday, November 18, 2013

पहले गुरु की स्मृतियां हैं यहां - राजगीर का गुरुद्वारा शीतल कुंड

राजगीर अपने ऐतिहासिक कारणों से प्रसिद्ध है। पर बहुत कम लोगों को ही जानकारी होगी कि राजगीर में सिखों के पहले गुरु गुरुनानक जी ने प्रवास किया था। यहां उनकी स्मृति में एक गुरुद्वारा भी है। पहले गुरु ने इस ऐतिहासिक स्थल पर 1506 ई. विक्रम संवत में प्रवास कर इस जगह को धार्मिक दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण बना दिया। गुरुनानक ने अपने प्रवास के दौरान गर्म कुंड को अपने यश से शीतल किया जिसे आज हमलोग गुरुनानक शीतल कुंड के नाम से जानते हैं।  गुरुद्वारे में एक कुंड है जिसके बारे में कहा जाता है कि गुरुनानक देव जी ने धरती पर तीर मारकर यहां से पानी की धार निकाली थी। बड़ी संख्या में सिख श्रद्धालु भी राजगीर पहुंचते हैं और शीतल कुंड गुरुद्वारा में मत्था टेकते हैं। राजगीर में गर्म जलकुंड के पास ही स्थित है गुरुद्वारा शीतल कुंड।

 कहा जाता है कि रजौली से भागलपुर जाने के क्रम में गुरु जी राजगीर में रुके थे। ऐसा माना जाता है कि बौद्ध और जैन संतों के साथ चर्चा के लिए गुरुनानक देव जी यहां रुके थे। पिछले 40 सालों में भाई अजायब सिंह के प्रयासो से इस गुरुद्वारे का सौंदर्यीकरण किया गया है। यहां श्रद्धालुओं के लिए 10 आवासीय कमरे भी बनवाए गए हैं।


सिख धर्म के संस्थापक एवं प्रवर्तक गुरु नानक जी ने अपनी उदासियों ( यात्राओं)  के क्रम में बिहार के कई शहरों में प्रवास किया था। कहा जाता है कि प्रथम गुरु नानक देव जी ने 20 साल में 40 हजार मील से ज्यादा यात्राएं की थी।   1506 में वे पहली उदासी के क्रम में बिहार में पहुंचे। सिख इतिहास के लेखक डाक्टर  त्रिलोचन सिंह के मुताबिक प्रथम गुरु वाराणसी से गया पहुंचे। अलग अलग सिख इतिहासकारों के मुताबिक वे बिहार में गयारजौली ( नवादा) राजगीरपटनामुंगेरभागलपुरकहलगांव आदि स्थानों पर रुके थे।

बिहार में सिख इतिहास से जुडे गुरुद्वारे
-    1. तख्त श्री हरिमंदिर साहिब, गायघाट गुरुद्वारा, पटना। 2. गुरु का बाग, मालसलामी ( कभी नवाब करीमबक्श रहीम बक्श का बाग हुआ करता था) 
    3. कंगन घाट गुरुद्वारा।
    4. बाल लीला गुरुद्वारा, पटना।
-   5. हांडी साहिब, दानापुर ( पंजाब जाने के क्रम में पहली बार गुरु गोबिंद सिंह जी यहां रुके थे)
-   6. नानकशाही गुरुद्वारा, लालगंज (वैशाली)
-   7 . फतुहा गुरुद्वारा ( गुरुनानक देव जी और कबीर की यहां हुई थी मुलाकात) 
    8. सासाराम  गुरुद्वारा चाचा फग्गू मल,  गुरुद्वारा गुरु का बाग और  गुरुद्वारा टकसाली संगत।
-   9. नानकशाही संगत अकबरपुर, रजौली संगत, नवादा
-   10 . बिहार राज्य के भागलपुर, कटिहार, गया और मुंगेर में भी हैं ऐतिहासिक गुरुद्वारे।



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(BIHAR, RAJGIR, NALANDA, SIKH TEMPLE )

Saturday, November 16, 2013

स्वर्ण भंडार का रहस्य - जो पढ़ ले वो ले जाए सोना

राजगीर में बिंबिसार की जेल और जरासंध के अखाड़ा, मनियार मठ जैसे स्थलों के पास ही स्वर्ण भंडार की गुफाएं हैं। मनियार मठ से आगे बढ़ने पर पहाड़ की ओर दो गुफाएं हैं। इस स्वर्ण भंडार को लेकर कई तरह के गल्प प्रचलित हैं। ऐसा माना जाता है कि यहां अभी भी बड़ी मात्रा में सोना छिपा हुआ है। कहा जाता है कि गुफा के द्वार पर लिखे शिलालेखों के संकेतों को जो समझ जाएगा वह सोने के खजाने के दरवाजे को खोल सकेगा।   

इन गुफाओं का पता वैभर पहाड़ की खुदाई के बाद पता चला। मैं बचपन से स्वर्ण भंडार की कहानियां सुनता रहा हूं। जितने मुंह उतनी बातें। मेरे पिताजी के दोस्त अरविंद कुमार सिंह जो नालंदा के पास जुआफर नामक गांव के रहने वाले थे बचपन में राजगीर के बारे में फंतासी वाली कथाएं सुनाते थे। वे कहते थे मगध के राजा बिंबिसार का स्वर्ण भंडार था यहां। लेकिन उसके ताले की चाबी झील में फेंक दी गई है।

सोन भंडार के पश्चिमी गुफा के दक्षिणी दीवार पर एक दरवाजा और एक खिड़की है। दरवाजे का निचला भाग उपरी भाग से 15 सेंटीमीटर से अधिक चौड़ा है। गुफा की दीवारें पौने दो मीटर तक सीधी हैं। उसके बाद अंदर की तरफ जाती हैं। यहां तहखाने जैसी संरचना नजर आती है। यहां दरवाजे किनारे और सामने की दीवार पर कुछ शिलालेख उत्कीर्ण हैं। इनमें से ज्यादातर की भाषा अस्पष्ट है। इसे पढ़ा नहीं जा सका है।

इस गुफा की खोज सबसे पहले इतिहासकार जेएस कनिंघम ने की थी। गुफा के अंदर दाहिनी दीवार पर छह छोटी छोटी जैन तीर्थंकरों की मूर्तियां हैं। इससे प्रतीत होता है कि इन गुफाओं का निर्माण जैन संन्यासियों ने करवाया होगा। यहां एक विष्णु की प्रतिमा भी मिली थी जो गुप्त कालीन लगती है जिसे नालंदा म्यूजिम में रखा गया है।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य Email - vidyutp@gmail.com

( RAJGIR, GOLD, SON BHANDAR, BIHAR )