Monday, October 28, 2013

ओडिशा का अनूठा जैविक उद्यान – नंदन कानन


ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर के बाहरी इलाके में स्थित नंदन कानन उद्यान देश के सुंदरतम चिड़ियाघरों में से एक है। इसके साथ खास बात यह है कि प्राकृतिक वन क्षेत्र में ये जैविक उद्यान बनाया गया है। कुल 990 एकड़ में फैला नंदन कानन पार्क देश का अनूठा चिड़ियाघर है। भुवनेश्वर शहर से 20 किलोमीटर दूर चंदका के जंगलों के एक हिस्से को प्राणी उद्यान में परिणत किया गया है। इस उद्यान की स्थापना 1960 में हुई। यह देश का पहला जू है जो वर्ल्ड एसोशिएशन ऑफ जू एंड एक्वेरियम का सदस्य है।

सफेद बाघों का निवास -  नंदन कानन सफेद बाघों के लिए प्रसिद्ध है। यहां सफेद बाघ 1980 से निवास कर रहे हैं। यहां पर घड़ियालों का भी प्रजनन किया जा रहा है। 1991 से यहां टाइगर सफारी की भी शुरूआत की गई। यहां आप पेंगोलिन और माउस डियर को भी देख सकते हैं। जैविक उद्यान क्षेत्र में राष्ट्रीय महत्व का कांजिया लेक भी स्थित है। नंदन कानन जू के नाम पर अब दिल्ली से ओडिशा के लिए एक ट्रेन चलने लगी है नंदन कानन एक्सप्रेस।



वैसे तो नंदन कानन देखने के लिए भुवनेश्वर में रहकर जाना बेहतर है। ऐसे कार्यक्रम में आप दिन भर नंदन कानन में गुजार सकते हैं। जो सैलानी जगन्नाथ पुरी घूमने जाते हैं। वे अक्सर भुवनेश्वर, कोणार्क और नंदन कानन पार्क घूमते हैं। पुरी से आरंभ होने वाले दिन भर के बस पैकेज टूर में आप नंदन कानन भी घूम सकते हैं। इसमें टूरिस्ट बस के सैलानी तकरीबन दो घंटे ही नंदन कानन की सैर कर पाते हैं।
मुझे 1991 के अपने ओडिशा दौरे की याद आती है। पुरी से हम श्रीराम बस सर्विस में सवार हुए थे। हमारे गाइड जिनका अब मुझे नाम याद नहीं आ रहा है, बडी रोचकता से स्थानों का परिचय करा रहे थे। उन्होंने कहा कि वे नंदन कानन की सैर में गाइड करने के लिए अंदर भी आपके साथ रहेंगे। हमलोग जैविक उद्यान के अंदर प्रवेश करने ही वाले थे कि मेरी सबसे छोटी नन्ही बहन रूठ गई। मैं थक गई हूं अब और नहीं चल सकती। सब लोग आगे बढ़े जा रहे थे। काफी समझाने पर भी वह चलने की तैयार नहीं हुई। थक तो मैं भी गया था इसलिए गोद उठाने में आलस आ रहा था। खैर बहन को गोद उठाना ही पड़ा। हम नंदन कानन के अंदर। गाइड महोदय ने एक हाथी से मिलवाया। वह हाथी उनके हर आदेश को मानता था। हाथी गाने पर डांस करके दिखाता था। नमस्ते करता था। अपने सूंड से पानी निकालकर फेंकता था। गाइड महोदय के कहने पर हाथी ने मेरी एक बहन को चूम लिया। यह मेरी बहन को पसंद नहीं आया। वह घर आने पर महीनों उस कपड़े से दूर रही जिसे हाथी ने चूमा था।
अब नंदन कानन जैविक उद्यान में सुविधाएं और भी बढ़ गई हैं। यहां पर झील में नौकायान यानी बोटिंग का भी आनंद उठाया जा सकता है।



प्रवेश का समय - नंदन कानन जैविक उद्यान में आप सुबह 8 से 5 बजे के बीच जा सकते हैं। ( अक्तूबर से मार्च) शेष काल में 7.30 से 5.30 तक।  हर सोमवार को पार्क बंद रहता है। अब इसे पालीथीन मुक्त जोन घोषित कर दिया गया है। साथ ही यहां बाहरी खाद्य पदार्थ लेकर आना भी मना है। अगर आप समूह में पिकनिक मनाने जाना चाहते हैं तो नंदन कानन प्रशासन उसके लिए आपको मामूली शुल्क पर सुविधाएं प्रदान करता है।  http://www.nandankanan.org/

ऐसा है नंदन कानन

126 प्रजातियों को जानवर है यहां
202 बाड़ों में रखा गया है जानवरों को
812 पक्षी और 134 रेप्टाइल ( सरीसृप) भी देखे जा सकते हैं।
32 विदेशी प्रजाति के जानवर भी हैं यहां



- vidyutp@gmail.com ( NANDAN KANAN ZOO, ODISHA, WHITE TIGER ) 



Saturday, October 26, 2013

पिपली- हजारों साल पुराना शिल्पकारों का गांव

पुरी से भुवनेश्वर के मार्ग पर आता है पिपली गांव। पिपली ओडिशा का शिल्पकारों का गांव है। गांव से गुजरते ही कला शिल्प की खुशबू का एहसास होने लगता है। सड़क के किनारे विशाल बाजार लगा है। इस बाजार में खासतौर पर रंग बिरंगे लैंप शेड लोगो को खूब प्रभावित करते हैं। इन लैंपशेड की आप खरीददारी तो कर ही सकते हैं। इसके साथ ही आप पिपली से हैंड बैग और दूसरे तमाम तरह के हस्तशिल्प के बने उत्पाद खरीद सकते हैं। पिपली की खास बात है कि यहां शिल्पकार खुद अपना सामान बेचते हैं। बीच में कोई मिडलमैन यानी बिचौलिया नहीं होता। इसलिए आपको यहां हस्तशिल्प उत्पाद सस्ते में मिल सकते हैं।
पिपली के कलाकार रंग बिरंगी साड़ियों का भी निर्माण करते हैं। महिलाओं को ये साड़ियां खूब पसंद आती हैं। इस गांव में कुछ वक्त गुजरने के बाद ये लगता है कि पिपली जैसे गांव देश के दूसरे राज्यों में भी होना चाहिए। पिपली की प्रसिद्धी देश के बाहर दुनिया के कई देशों तक पहुंच चुकी है। 


यहां के कलाकार कपड़े के एक टुकड़े पर तरह तरह की कलाकृतियों का निर्माण करते हैं। ये कलाकृतियां आपका ड्राईंग रुम सजाने के काम भी आती हैं। दूर-दूर से आने वाले सैलानी यहां से कुछ न कुछ खरीद कर ले जाना पसंद करते हैं।पिपली के कलाकार रंग बिरंगी साड़ियों का भी निर्माण करते हैं। इस गांव में कुछ वक्त गुजरने के बाद ये लगता है कि पिपली जैसे गांव देश के दूसरे राज्यों में भी होना चाहिए। 


हजारों साल पुरानी परंपरा - पिपली गांव का इतिहास बहुत पुराना है। इस गांव में दसवीं सदी से ही शिल्पकार अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे हैं। तब गांव के लोग सालाना जगन्नाथ रथ यात्रा के लिए छाता और कैनोपी (छतरियां) का निर्माण किया करते थे। तब कलाकार जगन्नाथ मंदिर और राजा की जरूरतों के हिसाब से निर्माण कार्य में लगे रहते थे। 11वीं सदी में पिपली गांव का कलाशिल्प चरम पर था। गांव के कलाकारों को राजा का संरक्षण प्राप्त था। 

पिपली गांव के कलाकार पुरी में होने वाली रथयात्रा के दौरान भगवान कृष्ण, बलभद्र और शुभद्रा के रथों के सजावट के लिए तमाम कलाकृतियां तैयार किया करते थे। यह कलाकारों द्वारा भगवान जगन्नाथ को की जाने वाली एक सेवा हुआ करती थी। यहां आज भी आप कलाकारों को सुंदर कठपुतलियां और पपेट आदि का निर्माण करते हुए भी देख सकते हैं।
पिपली के कलाकार अपनी कलाकृतियों के लिए कोलकाता से सूता मंगाते हैं तो कई सामग्री गुजरात के सूरत से आती है। छतरियों के निर्माण में वाटरप्रूफ रंगों का इस्तेमाल इनकी खासियत है। पिपली में निर्मित कपड़े की कलाकारी में देवी देवताओं का चित्रांकन देखा जा सकता है। खास तौर पर आप इसमें सूरज, चांद और राहु आदि का चित्रण देख सकते हैं। पिपली के शिल्पी हाथ से काम के अलावा आजकल सिलाई मशीन का इस्तेमाल भी बड़े पैमाने पर करते हैं। पर वे दर्जी न होकर कलाकार हैं। 

कैसे पहुंचे - पिपली की दूरी पुरी से 40 किलोमीटर है। वहीं राजधानी भुवनेश्वर से पिपली 26 किलोमीटर की दूरी पर है। अक्सर पुरी-कोणार्क-भुवनेश्वर जाने वाली बसें पिपली गांव में जरूर रुकती हैं। इस ठहराव के दौरान आप वहां से शापिंग कर सकते हैं। अगर आप अपने वाहन से हैं तो पुरी या फिर भुवनेश्वर कहीं से भी पिपली जा सकते हैं।
vidyutp@gmail.com 
(PIPLI VILAGE, ODISHA, HANDICRAFTS ) 


Thursday, October 24, 2013

शांतिस्तूप की ओर - 11 नंबर की बस से धौली पहाड़ी का सफर

धौली शांति स्तूप के बाहर ( 1991) 
पुरी से भुवनेश्वर तक का रास्ता समंदर के साथ साथ चलता है। जुलाई के महीने में हल्की हल्की बारिश के बीच गरमी छूमंतर थी और सफर सुहाना लग रहा था। जुलाई 1991 का समय। हम पुरी से श्रीराम बस सेवा बुक कर ओडिशा दर्शन पर निकले थे। हमारे गाइड बड़ी ही मजेदार शैली में आसपास के स्थलों के बारे में जानकारी दे रहे थे। कोणार्क के सूर्य मंदिर, पीपली गांव, चंद्रभागा समुद्र तट के बाद हमारी अगली मंजिल थी धौली पहाड़ी। हमारे गाइड ने बताया कि ये बस शांति स्तूप तक नहीं जाएगी। पार्किंग में बस रूक जाएगी उसके बाद आपको आगे का सफर 11 नंबर की बस से करना होगा। 11 नंबर की बस। मन में कौतूहल हुआ। ये कौन सी बस है। थोड़ा दिमाग घुमाने पर समझ में आया। आपके दो पांव। कदम ताल करते हुए हम धौली की पहाड़ी पर स्थित शांति स्तूप पहुंचे।

धौली में है कलिंग युद्ध की यादें
ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर से कुछ किलोमीटर पहले पुरी भुवनेश्वर मार्ग पर है धौली पहाड़ी। धौली पहाड़ी पर विशाल शांति स्तूप बना है जो कलिंग युद्ध की याद दिलाता है। इस युद्ध के बाद महान सम्राट अशोक का ह्रदय परिवर्तन हुआ था और उसने आगे सम्राज्य विस्तार के उद्देश्य से युद्ध कर खून नहीं बहाने का संकल्प लिया था। हालांकि इसका मतलब यह कत्तई नहीं था कि अशोक ने कायरता का साथ दिया था।



धौली में बने इस विशाल शांति स्तूप के चारों ओर अलग-अलग मुद्राओं में बुद्ध की चार मूर्तियां हैं। यहां भगवान बुद्ध की लगी प्रतिमाएं संगमरमर की है। स्तूप में जातक कथाओं से जुड़े हुए प्रसंग पत्थरों पर उकेरे गए हैं। यहां पत्थरों पर तराशा गया हाथी का मुख भी है। साथ ही शांति स्तूप में शेर की प्रतिमाएं भी बनी हैं। अशोक के तेरहवें अभिलेख के अनुसार उसने अपने राज्याभिषेक के आठ वर्ष बाद कलिंग युद्ध लडा। कलिंग विजय उसकी आखिरी विजय थी। यह युद्ध 262-261 ईस्वी पूर्व में लड़ा गया।

शांति स्तूप के चारों ओर हरियाली का सुंदर नजारा मनमोहक है। काफी लोग इसे धौली बौद्ध मंदिर भी कहते हैं।

खून से लाल हो गई थी नदी
शांति स्तूप से नीचे दया नाम की नदी बहती दिखायी देती है। कहा जाता है कलिंग युद्ध के समय ये नदी ओडिशा के पराजित हुए सैनिकों के खून से लाल हो गई थी। इस नदी की रक्त रंजित जलधारा का देखकर अशोक मन विक्षिप्त हो गया। यहां अशोक के काल राजकीय आदेशों को भी पढ़ा जा सकता हैं। कलिंग युद्ध के बाद अशोक की शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा की थी जो यहां एक पत्थर पर खुदी हुई  है। धौली का बौद्ध स्तूप  सुबह 6 बजे से रात के आठ बजे तक खुला रहता है।

इधर कुछ सालों से ओडिशा सरकार के पर्यटन विभाग की ओर से ऐतिहासिक धौली पहाड़ पर कलिंग महोत्सव का आयोजन किया जाने लगा है। तीन दिन तक चलने वाले इस महोत्सव देश भर के कलाकार शास्त्रीय संगीत की प्रस्तुति देते हैं। शांति के सुर फूटते हैं, लोग मगन हो जाते हैं। धौली पहाड़ी के रास्ते में काजू के पेड़ दिखाई देते हैं। हालांकि आप इन्हें तोड़कर खा नहीं सकते। क्योंकि काजू के बारे में कहा जाता है कि इसके फलों की प्रोसेसिंग होती है जिससे इसका खट्टापन दूर किया जाता है फिर ये खाने लायक हो पाता है।




( DHAULI, ODISHA, BUDDHA STUP, KALINGA WAR, ASHOKA  ) 


Tuesday, October 22, 2013

सेबों का राजा - किन्नौर के सेब


वैसे तो सेब अपनी गुणवत्ता के लिए फलों में खास स्थान रखता है। पर हर जगह के सेब की अपनी खासियत होती है। भारत में उत्पादित होने वाले सेब में हिमाचल प्रदेश के किन्नौर के सेब अपनी प्राकृतिक मिठासरंग और रसीलेपन के लिए जाने जाते हैं।

कश्मीर में सोपियां जिले का सेब बेहतर माना जाता है। पर करीब 10 हजार फुट की ऊंचाई पर पैदा होने वाले किन्नौर के सांगला और पोह ब्लॉक में पैदा होने वाले इस सेब की दो प्रजातियां-रॉयल और गोल्डन-बेहद लोकप्रिय हैं। बीते साल इसका औसतन मूल्य 250 रुपये प्रतिकिलो था और किन्नौर के चांगोमें हर साल एक लाख पेटी (10 किलोग्राम की एक पेटी) सेब का उत्पादन होता है।

हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले के सेब बाजार पहुंचते हैं तो इन्हें दिल्लीचण्डीगढ़ जैसे शहरों के साथ पंजाब और हरियाणा में सबसे ऊंची कीमत मिलती है। अन्य जिलों से आ रहे सेब के मुकाबलले 25-30 फीसदी महगा बिकता है किन्नौरी सेब।
किन्नौर में 10 हजार फुट से अधिक ऊंचे क्षेत्रों में सेब के बागान हैं। ये बागान मुख्यत: सांग्लाकल्पाचांगोनिहार और पूह जिले में हैं। कई बार खुदरा कारोबारी  हिमाचल प्रदेश के अन्य हिस्सों के सेब को किन्नौरी सेब बताकर बेचना शुरू कर देते हैलेकिन सच्चाई यह है कि किन्नौरी सेब अक्टूबर में ही बाजार में पहुंचने शुरू होते हैं।

अगर पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो किन्नौर जिला में हर साल सेब की पैदावार कम हो रही है। इस कारण यहां के बागवानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। वहींहर साल कम हो रही सेब की पैदावार भी बागवानों के लिए भी चिंता का कारण बना गया है। वहींकिन्नौर में लगातार धंस रही जमीन और मौसम में बदलाव भी एक कारण है। 



किन्नौर के सेब की मांग देश के अलावा विदेश में भी है। यह सेब लंबे समय तक सुरक्षित रहता है। जबकि निचले क्षेत्र के अधिक मिठास और रस इस सेब में होता है। अंग्रेजी में कहा गया हैएन एपल ए डेकीप्स द डॉक्टर अवे। मतलब एक सेब रोज खाओ और डॉक्टर को दूर भगाओ। सेब पौष्टिक तत्वों से भरा है। ये न केवल रोगों से लड़ने में मदद करता है बल्कि आपके शरीर को भी स्वस्त रखता है। वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि सेब के सेवन से ह्वदय रोगकैंसरमधुमेह के साथ ही दिमागी बीमारियों जैसे पार्किंसन और अल्जाइमर आदि में भी आराम मिलता है।
vidyutp@gmail.com

( APPLE, KINNOR, HIMACHAL, GOLDEN, ROYAL ) 

Sunday, October 20, 2013

मिट्टी के बरतन बड़े लाभकारी

अपने बचपन को याद किजिए, गांव में मिट्टी के बरतनों का खूब इस्तेमाल होता था। गांव में तो कभी घी भी मिट्टी की हांडी से ही निकालती थी और दही का मट्ठा भी मिट्टी की हांडी में ही बना करता था । कुछ दशक पहले तक गांव की शादियों में तो मिट्टी के बर्तन  ही उपयोग में आते थे। घरो में दाल पकाने, दूध गर्म करने चावल बनाने और अचार रखने के लिए मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग भी खूब होता रहा है। 
लोग मिट्टी के बरतनों को भूलते जा रहे थे, पर एक बार फिर महानगरों में मिट्टी के बरतन चर्चा में आ गए हैं। लोगों की जागरुकता मिट्टी के बरतनों को लेकर बढ़ी है। दिल्ली के कई बाजारों में मिट्टी के तवे मिल सकते हैं। इनमें सुविधा के लिए स्टील का हैंडल लगा दिया गया है।बताया जाता है कि देश में आज से दो सौ साल पहले ही मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग होना कम होने लगा। इसकी मुख्य वजह थी एल्युमिनियम के बर्तनों का ज्यादा इस्तेमाल करना, जो कि शरीर के लिए हानिकारक है। भले ही आज के विज्ञान ने हमें अपनी रसोई के लिए बहुत ही आधुनिक और सुविधाजनक बर्तन उपलब्ध कराए है किन्तु ऐसे नॉन स्टिक बर्तन तथा अन्य आधुनिक बर्तन भोजन की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं।
देश में प्राचीन काल से ही मिट्टी के बर्तन में खाना बनाने की प्रथा रही है परन्तु आधुनिक युग में यह लाभदाययक प्रथा बहुत कम हो गई है। हम कोई भी सब्जी या फल या आहार लेते समय यह ध्यान रखते है कि वह सबसे अच्छी गुणवत्ता वाला हों। किन्तु उससे भी अधिक जरुरी है कि पकाते वक़्त और पकाने के बाद उसकी वही गुणवत्ता बनी रहें।
सबसे ज्यादा पोषक तत्व
मिट्टी के बर्तनों में खाना पकाने से ऐसे पोषक तत्व मिलते हैं, जो हर बीमारी को शरीर से दूर रखते थे. इस बात को अब आधुनिक विज्ञान भी साबित कर चुका है कि मिट्टी के बर्तनों में खाना बनाने से शरीर के कई तरह के रोग ठीक होते हैं। पीतल से 93, कांसे से 97 और मिटटी से 100फीसदी पोषक तत्व मिलते हैं।
 कई बीमारियों में लाभकारी
कई बार बैठे-बैठे लोग बड़ी-बड़ी डकारें लेते रहते हैं। ये गैस की समस्या है। अगर आपको भी बिना खाए-पिए बड़ी-बड़ी डकारें आती हैं तो मिट्टी के बर्तनों का इस्तेमाल करें। खासकर रोटी मिट्टी के तवे पर ही बनाकर खाएं। कभी मिट्टी के बरतन में बिरयानी या दाल बनाकर देखें। स्वाद का फर्क मालूम हो जाएगा। अब भारतीय कुम्हारों के विदेशों से भी मिट्टी के बरतनों के आर्डर मिल रहे हैं

वास्तु में के अनुसार भी मंगलकारी
वास्तु शास्त्र के अनुसार मिट्टी के बर्तनों को बहुत शुभ माना जाता है। वास्तुशास्त्र की मानें तो घर में रखें मिट्टी के बर्तन  आपके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा लाते हैं। इसके साथ ही इनके घर या ऑफिस में होने से गुडलक, धन-वैभव, सफलता आदि सब कुछ हासिल किया जा सकता है। पूजा घर से लेकर विवाह के मौके पर पूजा के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले सभी बर्तन मिट्टी के होते हैं।
मिट्टी पर भोजपुरी की इन पंक्तियों पर गौर फरमाएं...  
माटी के मनई हईं,  मटिए के बा घर दुआर,  
मटिए से छोह बा,  मटिए के बनल संसार...

-विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com


Wednesday, October 16, 2013

मेहनत पूजा राम की.... गांव के लोगों ने कर डाला कमाल


वह मई 1998 के आखिरी दिन थे। तब दिल्ली में गर्मी चरम पर होती है। अक्सर ऐसे मौसम में लोग पहाड़ों पर घूमने जाते हैं। अचानक हमारे पास राष्ट्रीय युवा योजना से संदेश आया कि इसके देश भर के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं की चार दिन की एक बैठक जौरा आश्रम (जिला मुरैना,मध्य प्रदेश) में रखी गई है। हालांकि जौरा आश्रम तो मैं कई बार जा चुका था। पर देश भर के कुछ पुराने साथियों संग चर्चा के इरादे से हमलोग जौरा के लिए चल पड़े। मैं और साथ में अनुज तड़ित प्रकाश। सुबह सुबह दिल्ली के निजामुद्दीन स्टेशन से ताज एक्सप्रेस में सवार हुए और मुरैना स्टेशन पर उतरे। वहां से बस से जौरा के महात्मा गांधी सेवा आश्रम पहुंचे।

जौरा में भी गर्मी का वही आलम था जो दिल्ली में था। पर वहां कुछ नए और पुराने दोस्तों से मुलाकात के बीच में गर्मी का एहसास कम रहा। पूरे देश से कोई सौ लोग आए थे। आश्रम में हमारी बैठक विशाल बरगद के पेड़ की छांव में हुआ करती थी।
सुबह स्नान करने के बजाए दोपहर मे देर तक नहाना अच्छा लगता है। मई जून के महीने में खाने पीने में भी थोड़ी सावधानी बरतनी पड़ती है। कुछ भी खाकर आप पचा नहीं सकते। छाछ और दही का इस्तेमाल ज्यादा। खैर हमारी बैठकों में चर्चा इस बात पर हो रही थी कि कौन अपने इलाके में सामाजिक कार्यों में कैसी भागीदारी निभा रहा है। कुछ लोग नए आइडिया लेकर भी आए थे। राष्ट्रीय युवा योजना के निदेशक एसएन सुब्बराव जी और सचिव रणसिंह परमार जी हम सबकी बातें सुन रहे थे।

जौरा मुरैना जिले में चंबल घाटी का वह इलाका है जहां सुब्बराव जी पहली बार 1954 में आए थे। बाद में उन्होंने डाकू के आतंक वाले इस इलाके में कई शिविर लगाए थे। इन शिविरों में देश भर से आए युवा श्रमदान से गांव की तस्वीर बदल रहे थे। 1960 से 1970 के बीच ऐसे श्रम शिविरों का गवाह बना मुरैना जिले का बागचीनी गांव। यहां कई दर्जन शिविरों का आयोजन हुआ था। अपने इस शिविर के दौरान हमें बागचीनी जाने का भी मौका मिला। पर इस यात्रा के दौरान हम एक अनूठे कार्यक्रम के गवाह बने।
बागचीनी के बीहड़ में 1970 के दशक में लगा एक युवा शिविर

बागचीनी गांव के बगल से क्वारी नदी बहती है। बागचीनी और देवगढ़ के बीच लोग बहुत दिनों से क्वारी नदी पर पुल बनाने की मांग कर रहे थे। पर प्रशासन लोगों की सुन नहीं रहा था। सुब्बराव जी की सलाह पर गांव के लोगों ने आपस में चंदा जुटाकर खुद पुल बनाने का काम शुरू कर दिया। बाद में प्रशासन ने भी सुध ली और अपनी तरफ से इस पुल के निर्माण में सहयोग किया। तो आज उस पुल का उदघाटन समारोह था। कई गांव के लिए खुशियों का मौका था। खुशियां कई गुना ज्यादा थीं क्योंकि इस पुल के निर्माण में सबका खून पसीना लगा था। सुब्बराव जी  के हाथों इस पुल का उदघाटन हुआ। इस मौके पर सुब्बराव जी ने श्रम की महत्ता को इंगित करता हुआ गीत गाया....

मेहनत पूजा राम की...मेहनत सेवा राम की... मेहनत भक्ति राम की... अब न घड़ी आराम की....
जौरा आश्रम में सुब्बराव जी (  फोटो  सौ - जय सिंह जादोन ) 

हम सबने इस गीत को दुहराया। उसके बाद हमलोग इस नवनिर्मित पुल पर चलकर भी गए। बाद में हमें पता चला कि अतीत में सुब्बराव जी ने बागचीनी और आसपास के गांव में पेयजल और सिंचाई की समस्या से निजात के लिए श्रमदान से 23 कुएं खुदवाए थे। तो बागचीनी और आसपास के लोग सुब्बराव जी को तो भगवान की तरह सम्मान देते हैं। यह हमें उस दौरे में देखने को मिला।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - Email- vidyutp@gmail.com 
(BAGCHINI, MORENA, JOURA, NYP, BRIDGE ) 

Monday, October 14, 2013

संकटमोचन मंदिर – परीक्षा के समय बढ़ जाती थी भीड़

वाराणसी का संकटमोचन मंदिर। इस मंदिर के साथ सैकड़ो यादें जुड़ी हैं। पांच साल तक काशी हिंदू विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान हर छात्र सबसे ज्यादा इसी मंदिर में मत्था टेकने जाता है। खास तौर पर परीक्षा नजदीक आने पर मंदिर में छात्रों की भीड़ बढ़ जाती है। हनुमान जी करेंगे बेड़ा पार।  खास तौर पर जिन छात्रों की परीक्षा की तैयार कमजोर रहती थी वे संकटमोचन ज्यादा पहुंचते थे। हमारे कुछ साथी तो हर मंगलवार और शनिवार बिना नागा संकटमोचन के दर्शन करने जाते थे।
 तो 1990 से 1995 के दौरान में मैं भी अनगिनत बार संकटमोचन मंदिर में गया। बीएचयू के लंका गेट से मंदिर की दूरी एक किलोमीटर है। कई बार संकटमोचन मंदिर के पास स्थित महेंद्रवी छात्रावास में साइकिल लगाकर हमलोग मंदिर में जाते थे हनुमान जी के दर्शन करने। खास तौर पर संकटमोचन संगीत समारोह के दौरान तो मैं पांच रातें मंदिर परिसर में ही गुजार देता था। इस दौरान देश के चोटी के शास्त्रीय साधकों को यहां सुनने का मौका मिला। पांच दिनों तक चलने वाला यह देश का प्रमुख शास्त्रीय आयोजन है। यहां बड़े शास्त्रीय साधन बिना किसी शुल्क के अपनी प्रस्तुति देने आते हैं, तो नए कलाकार इस मंच पर एक बार अपनी कला की प्रस्तुति देने का मौका चाहते हैं।
यहां हमने पंडित शिवकुमार शर्मा (संतूर) पंडित जसराज, सुलक्षणा पंडित, तबला वादक सुभाष निर्वाण जैसे अनगिनत नामों का कला प्रदर्शन देखा। 2006 में संकटमोचन परिसर में आतंकी हमले के बाद अब यहां सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। मंदिर के प्रवेश द्वार में बदलाव दिखाई देता है। पहले इतनी सुरक्षा नहीं हुआ करती थी।

यहां राम और हनुमान विराजते हैं साथ-साथ
वाराणसी का संकटमोचन हनुमान मंदिर काशी के प्रसिद्ध मंदिरों में शामिल है। यह मंदिर ऐतिहासिकआध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है। विशाल परिसर में यहां हनुमान जी और रामचंद्र जी का मंदिर स्थित है। काशी प्रवास के दौरान रामचरितमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने आराध्य हनुमान जी के कई मंदिरों की स्थापना की। उनके द्वारा स्थापित हनुमान मंदिरों में से एक संकटमोचन मंदिर भी है। यह मंदिर भक्ति की शक्ति का अदभुत प्रमाण देता है। इस मंदिर में स्थापित मूर्ति को देखकर ऐसा आभास होता है जैसे साक्षात हनुमान जी विराजमान हों।

तुलसीदास ने यहां रचे थे पद - मूर्ति के बारे में कहा जाता है कि इसे कवि गोस्वामी तुलसीदास ने स्वयं अपने हाथों से गढ़ा था और तब एक छोटा-सा मंदिर बाद में विस्तृत होता गया। ऐसी भी मान्यता है कि 16वीं शताब्दी में तुलसीदास ने पवित्र हिंदू ग्रंथ रामचरितमानस् का एक अच्छा-ख़ासा हिस्सा वहीं रहकर लिखा था। मान्यता है कि तुलसीदास जी ने रामचरितमानस का कुछ अंशसंकटमोचन मंदिर के पास विशाल पीपल के पेड़े के नीचे बैठकर लिखा था।

संकटमोचन हनुमान मंदिर में भगवान हनुमान के गले में गेंदे के फूलों की माला सुशोभित रहती है। इस मंदिर की एक अद्भुत विशेषता यह हैं कि भगवान हनुमान की मूर्ति की स्थापना इस प्रकार हुई हैं कि वह भगवान राम की ओर ही देख रहे हैंजिनकी वे निःस्वार्थ श्रद्धा से पूजा किया करते थे। भगवान हनुमान की मूर्ति की विशेषता यह भी है कि मूर्ति मिट्टी की बनी है।संकटमोचन महराज कि मूर्ति के हृदय के ठीक सीध में श्री राम लला की मूर्ति विद्यमान हैऐसा प्रतीत होता है संकट मोचन महराज के हृदय में श्री राम सीता जी विराजमान है। मंदिर का निर्माण साल 1611  के आसपास हुआ माना जाता है। चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को यहां हनुमान जयंती धूम-धाम से मनाई जाती है। 
संकटमोचन के लड्डू - 
मंदिर परिसर में प्रसाद की दुकानें भी है। संकटमोचन के बेसन लड्डू श्रद्धालुओं में काफी लोकप्रिय है। इसके लिए कूपन लेना पड़ता है। 
मंदिर परिसर में विवाह आदि संस्कार भी अत्यंत सस्ती दरों पर कराए जाते हैं। हर साल हनुमान जयंती के मौके पर संकटमोचन मंदिर परिसर में पांच दिन तक चलने वाला शास्त्रीय संगीत समारोह चलता है। इसमें देश के प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक और वादक पहुंचते हैं।

राम मिलेंगे कीर्तन में मंदिर में रोज शाम को अक्सर कीर्तन होता है। तब यहां आस्था का सुंदर वातावरण दिखाई देता है। यहां लिखा है राम मिलेंगे कीर्तन में। राम मंदिर और हनुमान मंदिर के बीच के विशाल कूप स्थित है। मंदिर परिसर में हरित वातावरण है। इस हरियाली में बड़ी संख्या में बंदर भी निवास करते हैं। श्रद्धालुओं को तनिक उनसे सावधान रहना पड़ता है।
कैसे पहुंचे - मंदिर वाराणसी के दुर्गाकुंड क्षेत्र में स्थित है जो प्रख्यात काशी हिंदू विश्ववविद्यालय के भी काफी नजदीक है। वाराणसी कैंट रेलवे स्टेशन से शेयरिंग आटो या सिटी बस से आसानी संकटमोचन पहुंचा जा सकता है।  हर मंगलवार और शनिवार को मंदिर में अन्य दिनों की अपेक्षा श्रद्धालुओं की ज्यादा भीड़ रहती है।
 विशाल परिसर
8.5 एकड़ मे फैला है संकटमोचन मंदिर का परिसर
2006 में मंदिर ने आतंकवादी हमला झेला था। शहर तीन विस्फोटों से एक विस्फोट मंदिर में हुआ था।
07 मार्च को जब मंदिर पर हमला हुआ तब मंदिर में आरती हो रही थी।

 -vidyutp@gmail.com
(SANKATMOCHAN HANUMAN TEMPLE, VARANASI ) 

Saturday, October 12, 2013

स्व प्रेरणा से बने महान कलाकार नेकचंद सैनी


वे स्व प्रेरणा से बने महान कलाकार हैं जिनका दुनिया के कई देश और बड़े बड़े कलाकार सम्मान करते हैं। 15 दिसंबर 1924 को जन्मे नेकचंद सैनी पंजाब के गुरदासपुर जिले के शकरगढ़ के रहने वाले थे। 1947 में देश विभाजन के बाद उनका परिवार चंडीगढ़ पहुंच गया। तब चंडीगढ़ शहर का निर्माण जारी था और उन्हें 1951 नौकरी मिली लोक निर्माण विभाग (पीडब्लूडी) में रोड इंस्पेक्टर की। रॉक गार्डन के इस चितेरे के इस काम के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से नवाजा तो दुनिया के कई देशों ने उन्हें अपने यहां भी इसी तरह का गार्डन बनाने के लिए आमंत्रित किया। मूर्तिकला से जुड़े कलाकार उनका सम्मान करते हैं।

ऐसे बना रॉक गार्डन  सत्तर के दशक में नेकचंद सैनी ने चंडीगढ़ के किनारे में जंगलों के बीच रास्ता बनाकर एक छोटा सा बागीचा बनाया। यहीं उन्हें चंडीगढ़ शहर निर्माण के दौरान फेंकी गई बेकार की चीजों को संग्रह कर उन्हें कलाकृतियों का रुप देने का ख्याल आया। बेकार पड़े पत्थरों को रुप मिलने लगा नायाब मूर्तियों का। टूटी फूटी चीजें बनने लगी एक श्रंखला में कलाकृतियां। लेकिन ये क्या नेकचंद की इन कलाकृतियों ने कई एकड़ जमीन को घेर लिया। और ये जमीन सरकारी थी।
चंडीगढ के रॉक गार्डन में 2003 
गैर कानूनी तरीके से सरकारी जमीन पर रॉक गार्डन तैयार हो रहा था। नेकचंद को पता था कि ये काम गैर कानूनी ही इसलिए वे ज्यादातर काम को अंजाम रात में देते थे जिससे की सरकारी महकमे को पता न चले। लेकिन जब पता चला तो एक अदभुत संसार का सृजन हो चुका था जिसका हर कोई लोहा मानने को तैयार था। इस काम के लिए नेकचंद को सजा नहीं बल्कि पुरस्कार मिला।

 जनता के लिए खुला पार्क - 1975 में रॉक गार्डनका 12 एकड़ का पहला फेज सामने आ गया था। 1976 में पार्क को जनता के लिए खोल दिया गया। पार्क में मूल रूप से सीमेंट, कंक्रीट, टूटे ग्लास, चूड़ियां, क्राकरी, मोजेक के दानों से कलाकृतियां बनाई गई हैं जो मन मोह लेती हैं।
नेकचंदफाउंडेशन - 199में रॉक गार्डन के सौंदर्य को बनाए रखने के लिए नेकचंद फाउंडेशन की स्थापना की गई। फाउंडेशन स्वयंसेवकों को आमंत्रित करता है साथ ही नए शिल्पकारों की गार्डन के विकास के लिए सेवाएं लेता है।  रॉक गार्डन के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए वेबसाइट देखें - http://www.nekchand.com/about-the-garden रॉक गार्डन का संपर्क फोन नंबर है-  (+91 172) 740 645


कार्य को सम्मान - नेकचंद सैनी की तुलना महान शिल्पी हेनरी मून से की जाती है। हेनरी ने बड़ी बड़ी मूर्तियां बनाई थी। पर नेकचंद सैनी स्वप्रेरणा से बने कलाकार हैं जो अंतरराष्ट्रीय पटल पर छा गए। सैनी के कार्यों का सम्मान करते हुए 1983 में उनके उपर डाक टिकट जारी हुआ था अगले ही साल 1984 में उन्हें पद्मश्री से नवाजा गया। इसके बाद  तो सैकड़ो सम्मान और पुरस्कार मिलने का सिलसिला जारी है।

नहीं रहे नेकचंद सैनी - 11 जून 2015 को रॉकगार्डन के क्रिएटर पद्मश्री नेकचंद सैनी का देर रात पीजीआई में निधन हो गया। 90 साल के नेकचंद डायबिटीज, हाइपरटेंशन के साथ ही कैंसर से पीड़ित थे। 

-    विद्युत प्रकाश मौर्य
(ROCK GARDEN, NEK CHAND SAINI )

Thursday, October 10, 2013

रॉक गार्डन - बेकार की चीजों से बना नायाब संग्रहालय


अक्सर हम जिन चीजों को बेकार समझ कर फेंक देते हैं, उन्ही बेकारी चीजों से रचा गया ऐसा नायाब संसार जिसे दुनिया भर ने सराहा। हम बात कर रहे हैं नेकचंद सैनी की कल्पना के साकार रुप रॉक गार्डन की। चंडीगढ़ के सेक्टर एक स्थित इस नायाब दुनिया को देखे बिना कोई दर्शक नहीं लौटना चाहता।

फ्रेंच वास्तुविद ला कार्बुजिए द्वारा डिजाइन किए गए शहर चंडीगढ़ का सबसे लोकप्रिय दर्शनीय स्थल बन चुका है रॉक गार्डन। 25 एकड़ में फैला ये रॉक गार्डन चंडीगढ़ के सेक्टर एक में स्थित है। दर्शकों के लिए गार्डन सप्ताह में सातो दिन खुला रहता है। 
रॉक गार्डन का प्रवेश शुल्क मामूली सा है। और इतना बड़ा दायरा की आप घूमते घूमते थक जाएं। रूचिकर इतना है कि बच्चे, बूढ़े जवान सबको पसंद आता है। नदी, पहाड़, झरने, गुफाएं, झूले सब कुछ देखिए यहां। थक जाएं तो खाने पीने का भी इंतजाम है।

प्रतिदिन 5000 से ज्यादा लोग रॉक गार्डन देखने पहुंचते हैं। साल में एक करोड़ से ज्यादा लोग। देश में ये ताजमहल के बाद दूसरा लोकप्रिय दर्शनीय स्थल बन चुका है।



कई सालों अगर आप रॉक गार्डन जाते हैं तो यहां कुछ बदलाव भी नजर आता है। यहां मूर्तिकला से जुड़े कलाकार अपनी सेवाएं देकर इसे और सुंदर बनाने में लगे हैं। रॉक गार्डन के विकास के लिए नेकचंद फाउंडेशन की स्थापना की गई है। अपने जीवन काल में जब भी नेकचंद सैनी चंडीगढ़ में होते थे तो एक खास समय में रॉक गार्डन घूमने आने वाले लोगों से मुलाकात भी करते थे। इस दौरान वे लोगों के सलाह सुझाव लिया करते थे।
दक्षिण भारत में रॉक गार्डन - केरल सरकार ने नेकचंद सैनी को अपने यहां भी इसी तरह का गार्डन विकसित करने के लिए आमंत्रित किया। केरल पर्यटन की कोशिश से नेकचंद सैनी के मार्गदर्शन में पालघाट शहर में लघु रॉक गार्डन दर्शकों का मन मोह रहा है। डेढ़ एकड़ के दायरे में इसी तरह का गार्डन 1993 से 1995 के बीच बनाया गया। केरल सरकार को ये परिकल्पना साकार हुई तो इतनी पसंद आई की  मालापुझा में भी इस तरह का एक और बागीचा बनाया गया है। यह गार्डन पश्चिमी घाट के सौंदर्य को और बढ़ा रहा है। सिर्फ दक्षिण भारत ही नहीं नेकचंद सैनी दुनिया के कई देशों  भी आमंत्रण पर जाकर वहां रॉक गार्डन जैसे ही संसार का सृजन कर चुके हैं।
 --- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
(ROCK GARDEN, CHANDIGARH, NEK CHAND SAINI )